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Monday, September 29, 2008

भृतहरि शतक: स्वाध्याय के अभाव में विद्वता नष्ट होने लगती है

दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनष्यति यतिः सङगात्सुतालालनात् विप्रोऽन्ध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्
ह्यीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्मैत्री चाप्रणयात्सृद्धिरनयात् त्यागपमादाद्धनम्


हिंदी में भावार्थ-कुमित्रता से राजा, विषयासक्ति और कामना योगी, अधिक स्नेह से पुत्र, स्वाध्याय के अभाव से विद्वान, दुष्टों की संगत से सदाचार, मद्यपान से लज्जा, रक्षा के अभाव से कृषि, परदेस में मित्रता, अनैतिक आचरण से ऐश्वर्य, कुपात्र को दान देने वह प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ संक्षिप्त व्याख्या-आशय यह है कि जीवन में मनुष्य जब कोई कर्म करता है तो उसका अच्छा और बुरा परिणाम यथानुसार प्राप्त होता है। कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो हमेशा बुरा काम करे या कोई हमेशा अच्छा काम करे। कर्म के अनुसार फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्म से अर्थ और सम्मान की प्राप्ति होती है। ऐसे में अपनी उपलब्ध्यिों से जब आदमी में अहंकार या लापरवाही का भाव पैदा होता है तब अपनी छबि गंवाने लगता है। अतः सदैव अपने कर्म संलिप्त रहते हुए अहंकार रहित जीवन बिताना चाहिये।

यह मानकर चलना चहिये कि हमें मान, सम्मान तथा लोगों का विश्वास प्राप्त हो रहा है वह अच्छे कर्मों की देन है और उनमें निरंतरता बनी रहे उसके लिये कार्य करना चाहिये। अगर अपनी उपलब्धियों से बौखला कर जीवन पथ से हट गये तो फिर वह मान सम्मान और लोगों का विश्वास दूर होने लगता है।
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Tuesday, July 29, 2008

संत कबीर वाणी:पत्थर के सालिग्राम का भरोसा नहीं

कबीर पाहन पूजि के, होन चहै भौ पार
भींजि पानि भेदे नदी, बूड़ै, जिन सिर भार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य पत्थरों की पूजाकर इस संसार के भवसागर को पार करना चाहते हैं वह अपने अज्ञान का एक बहुत भारी बोझ अपने सिर पर बोझा उठाये होते हैं और इसलिये डूब जायेंगे।

कबीर जेसा आतमा, तेता सालिगराम
बोलनहारा पूजिये, नहिं पाहन सो काम

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस विश्व में सभी प्रकार के देहधारियों में बसने वाला जीवात्मा सालिग्राम (परमात्मा) का ही रूप है। जो बोलते और चलते हैं उनको तो पूजा जा सकता है पर पत्थर पूजने से कोई लाभ नहीं है।
कबीर सालिगराम का, मोहि भरोसा नांहि
काल कहर की चोट में, बिनसि जाय छिन मांहि

संत कबीरदास जी कहते हैं कि पत्थर के सालिग्राम का भरोसा नहीं किया जा सकता है क्योंकि क्रुर काल की चोट वह सहन नहीं कर पाता और उसे कोई दूसरा छीन भी सकता है।

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Monday, July 21, 2008

चाणक्य नीतिःकाम शुरू कर घबड़ाना नहीं चाहिए

1.कोई भी काम प्रारंभ करने के बाद घबड़ाना नहीं चाहिए और उसे मध्य में नहीं छोड़ना चाहिए। कर्म करने ही इस दैहिक जीवन के सबसे अधिक पूजा है। जो प्राणी काम करते हैं वही सदा सुखी रहते हैं।
2. धन की हानि, मन की अशांति और संदेह के बारे में अन्य लोगों को नहीं बताना चाहिये क्योंकि इससे मजाक बनता है।


वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व में अशांति का मुख्य कारण यही है कि लोग शारीरिक श्रम को हेय समझने लगे हैं। अपने शरीर का अधिक से अधिक आराम देने के लिये लोगों मशीनों पर निर्भर होते जा रहे हैं। इससे व्यक्ति, परिवार और समाज में जो वैमनस्य और तनाव फैल रहा है उसका अनुमान किसी को नहीं है। एक तरफ श्रम न करने से शरीर से विकार निकालने वाला पसीना बाहर नहीं आता उससे शरीर को रोग घेर लेते हैं दूसरे शारीरिक श्रम करने वाले लोगों को यह लगता है कि उनका समाज में कोई सम्मान नहीं है इसलिये वह आत्मग्लानि की अग्नि मेंं जलते हैं और अपने से धनी आदमी की सहायता के लिये आगे नहीं आते हैं। देखा जाये तो राष्ट्र और समाज की रक्षा के लिये जो श्रमिक और गरीब व्यक्ति अपनी शारीरिक शक्ति से रक्षा करने में समर्थ है वह क्षुब्ध है यही कारण है कि हम अपने आसपास ऐसे खतरों को देख रहे हैं जिनका सामना केवल शक्ति के सहारे ही किया जा सकता है। इसलिये न केवल स्वयं ही शरीर से श्रम करना चाहिए बल्कि जो शारीरिक श्रम कर रहे हैं उनका भी सम्मान करना चाहिए।

अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अपने मन का बोझ किसी से कहने पर मन हल्का हो जाता है पर होता इसका उल्टा ही है। सभी लोग कष्ट झेलते हैं पर कुछ लोग कहने की बजाय दूसरों के कष्ट का मजाक उड़ाकर ही दिल को तसल्ली देते हैं। ऐसे में अगर कोई सज्जन पुरुष यह सोचता है िक अपना कष्ट दूसरे को बताने से संतोष मिल जायेगा तो उसे यह भ्रम दूर कर लेना चहिए।

Friday, July 18, 2008

अगर अर्जुन नहीं बन सकते तो एकलव्य बन जायें-आलेख

गुरु की महिमा का वर्णन करना कठिन है पर जीवन की सार्थकता और अध्यात्मिक शांति के लिये किसी से ज्ञान लेना बहुत आवश्यक है। अक्सर आपस में ही लोग एक दूसरे स यह पूछते हैं कि ‘योग्य गुरू की पहचान क्या है और उसे कैसे ढूंढा कैसे जाये? इसका उत्तर यही है कि जो सांसरिक विषयों की चर्चा किये बिना अध्यात्म का ज्ञान प्रदान करे वही सच्चा गुरु है। अध्यात्म ज्ञान वह है जिससे आदमी अपने को पहले पहचानने के बाद परमात्मा और उसके बनाये इस संसार को समझ सकता है। अगर कोई गुरु सांसरिक विषयों पर बोलता है तो समझ लीजिये वह स्वयं ज्ञानी नहीं है भले ही वह तत्व ज्ञान बताता हो पर उसे धारण किये हुए नहीं होता।

वैसे जो भी अध्यात्मिक ज्ञान है वह हमारे प्राचीन ग्रंथों में लिखा हुआ है और उसे पढ़कर कोई भी साधक सिद्ध बन सकता है। सिद्ध से आशय यह नहीं है कि वह कोई चमत्कार करने लगेगा बल्कि जो अपना जीवन परमार्थ, परोपकार तथा भगवान भक्ति के साथ शांतिपूर्ण ढंग से व्यतीत करता है वही सिद्ध है। उसी अध्यात्म ज्ञान को पढ़कर और पढ़ाकर उसकी विवेचना करने वाला व्यक्ति ही गुरु बन सकता है। अगर कोई ऐसा गुरु नहीं मिलता तो फिर इसका एक उपाय यह है कि अपने प्राचीन ग्रंथ पढ़ने के लिये स्वयं ही तैयार हो जायें और पढ़ते हुए उसकी मन ही मन विवेचना करें। गुरु की उपस्थिति अगर आवश्यक हो तो कोई एक तस्वीर अपने सामने रख लें। नहीं तो एक पत्थर ही रख लें और उसे अपने मन में गुरु का स्थान दें।

वैसे तो योग्य गुरु मिलना हर युग में कठिन रहा है क्योंकि अगर ऐसा होता तो अनेक सच्चे संत इस बात को दोहराते नहीं कि योग्य गुरु की शरण लो। संत कबीर समेत सभी भक्ति कालीन कवियों ने योग्य गुरु की शरण लेने का संदेश दिया है। बिना गुरु के जीवन को समझना कठिन हैं ऐसे में अगर हम अर्जुन नहीं बन सकते तो एकलव्य ही बन जायें। एकलव्य ने गुरु द्रोणाचार्य की मूर्ति बनाकर ही धनुर्विद्या का का ज्ञान प्राप्त किया था। अतः अपने किसी पूज्यनीय या किसी प्राचीन गुरु की तस्वीर या किसी चित्रकार द्वारा रेखाचित्रों के द्वारा बनाया गया या पत्थर पर गढ़ा गया चित्र ही सामने रख लें। अगर अपने अंदर अध्यात्मिक शांति और सहजता अनुभव करें तो उस कल्पित गुरु की दक्षिणा के नाम किसी सुपात्र को अपनी श्रद्धा और सामथर््यानुसार आर्थिक राशि या वस्तु का दान करें। हमारे प्राचीन ग्रंंथों में अघ्यात्म का संपूर्ण सार श्रीगीता में हैं बस उसे पढ़ने और समझने की है। उसे पढ़ें और ऐसे लोगों की संगत करें तो अध्यात्मिक विषयों में रुचि लेते हों। उनकी बात सुने, कहीं लिखा हुआ मिले तो पढ़ें और अपने कल्पित गुरू को सामने रखकर उसका अध्ययन करें।

वैसे कोई गुरु मिल जाये तो अच्छी बात, पर नहीं मिलता तो यही भी एक तरीका है। एकलव्य भी एक अध्यात्मिक पुरुष थे और अर्जुन भी। दोनों ही योग्य शिष्यों के रूप में समान रूप से प्रसिद्ध हैं। अगर कोई योग्य गुरु नहीं मिलता तो हम श्री अजुर््न का अनुकरण नहीं कर सकते और ऐसे में एकलव्य का मार्ग की अपनाया जा सकता है।

Thursday, July 10, 2008

चाणक्य नीतिःअंधत्व के होते हैं कई प्रकार

1.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है। एक तो जन्मांध होते हैं जिनको वास्तव में आंखों से कुछ भी नहीं दिखता, पर दूसरे वह होते हैं जो आखें होते हुए भी नहीं देखते या न देखने का नाटक करते हैं।
2.सावन क अंधे को केवल हरियाली ही दिखती है। इसका तात्पर्य यह है कि आदमी को आंखें तो हैं पर वह सूखे में भी सावन की हरियाली की बात करता है क्योंकि उस पर केवल उसी का प्रभाव होता है
3.कामवासना के अंधे को कुछ भी नहीं सूझता उसकी आखों में केवल मद छाया रहता है। वह केवल इसी विषय पर बात कर अपना तथा दूसरों को मनोरंन का प्रयास करता है। इसी प्रकार लोभी को भी अपने स्वार्थ की अलावा कुछ नहीं सूझता।
कुल प्रकार कामांध, मदांध और लोभी ऐसे मनुष्य होते हैं जो आंखें रहते हुए भी अंधों की तरह व्यवहार करते हैं। ऐसे लोग अपने नजरिये से दुनियां को देखते हैं और अपने स्वार्थ के अनुसार उसके स्वरूप का वर्णन करते हैं।

Wednesday, July 9, 2008

चाणक्य नीतिःहृदय में जगह नहीं तो पास वाला भी दूर लगता है

1.राजा, अग्नि, गुरु, स्त्री इनसे निकटता खतरनाक होती है। इनसे थोड़ा परे रहकर संपर्क रखना चाहिए। अग्नि, जल, सर्प, मूर्ख, और राजा कभी भी रुष्ट होने पर मनुष्य के प्राण तक ले सकते हैं।
2.सच्चा ज्ञानी तो वही है जो प्रसंग के अनुसार वार्तालाप में अपने तर्क उचित ढंग से प्रस्तुत करता है। वह अनुकूल होने पर प्रेम करता है और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध प्रदर्शन करने वाला भी होता है।
3.हृदय में रहने वाला दूर रहकर भी पास है और हृदय में न रहने वाला पास रहकर भी दूर रहता है। परे और निकट के संबंध का आधार हृदय के भाव से है।
4.जल में तेल पड़ते ही कम होने के बावजूद तेल का विस्तार हो जाता है। उसी तरह दुष्ट के साथ गोपनीय विषय पर की गयी वार्ता विद्युत गति से फैल जाती है। उसी तरह सुदान की चर्चा भी विस्तार पाती है। विस्तार की शक्ति अपने पात्र के कार्य करने पर निर्भर रहती है।
5.निर्धन को पत्नी, मित्र, सेवक, भाई और परिजन सब छोड़ देते हैं।

Wednesday, June 25, 2008

चाणक्य नीतिःकपट रहित शुद्ध आचरण ही होता है धर्म

1.आज के युग में अर्थ की प्रधानता है और धन संचय प्रमुख आधर है। धन संचय हर मनुष्य के लिये आवश्यक है क्योंकि समय पड़ने पर कब उसकी जरूरत होती है पता ही नहीं पड़ता।
2.संसार में कोैन ऐसा व्यक्ति है जिसके कुल में दोष नहीं है। अगर गौर से देखों तो सभी कुलों में कहीं न कहीं कोई दोष दिखाई देता है। उसी प्रकार इस भूतल पर ऐसा कौनसा प्राणी है जो कभी रोग से पीडि़त नहीं होता या उस पर विपत्ति नहीं आती। इस प्रथ्वी पर ऐसा प्राणीनहीं मिल सकता जिसने हमेशा सुख ही देखा हो
3.किसी भी व्यक्ति के कुल का अनुमान उसके व्यवहार से लग जाता है। उसकी भाषा से उसके प्रदेश का का ज्ञान होता है। उसके शरीर को देखकर उसके खानपान का अनुमान किया जा सकता है। इस तरह किसी भी व्यक्ति से बातचीत में उसके बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है।
4.वह भोजन पवित्र कहलाता है जो विद्वानों के भोजन करने पर शेष रह जाता है। दूसरे का हित करने वाली वृत्ति ही सच्ची सहृदयता है। श्रेष्ठ और बुद्धिमान पुरुष वही होता है जो पापकर्मों में प्रवृत्त नहीं होता। कल्याण क लिये वह धर्म और कर्म श्रेष्ठ है जो अहंकार के बिना किया जाये। छलकपट से दूर रहकर शुद्ध आचरण ही करना धर्म है।

Tuesday, June 24, 2008

चाणक्य नीतिःस्त्री में होता है पुरुष से छह गुना अधिक साहस

1.कोयल की मधुर वाणी उसका रूप है। वह भी कौए की तरह काली और कुरूप होती है पर उसका कर्णप्रिय स्वर मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करता है लोग उसके कुरूप होने का दुर्गुण भूल जाते हैं। वह उसके काले और भद्दे होने की उपेक्षा कर उससे प्रेम करने लगते हैं।
2.नारी में पुरुष से दोगुना भोजन करने की क्षमता होती है जबकि लज्जा चार गुना अधिक होती है। साहस छह गुना अधिक होता है।
3.नदी के तेज बहाव के कारण उसके किनारे खडे पेड़ पौधे जिस तरह नष्ट हो जाते हैं उसी तरह दूसरे के घर में रहने वाली स्त्री भी लांछित हो जाती है क्योंकि उसके लिये अपनी रक्षा करना अत्यंत कठिन होता है।
4.किसी भी पुरुष का घर स्त्री के कारण ही बसता है इसलिये नारी में कुल गुण और सहृदयता का होना आवश्यक है। जहां उसका पति के प्रति अनुराग नहीं होगा वहां जीवन की गाड़ी नहीं चल पायेगी। इसलिये स्त्री मन और वचन से सत्य बोलने, सदुव्यवहार करने और श्रेष्ठ गुणों वाली होना आवश्यक है।
5.धरती से निकलने वाला जल, पवित्र व शुद्ध होता है उसी तरह पतिव्रता नारी सदैव शुद्ध और पवित्र होती है। प्रजा के हित के संलिप्त रहने वाला राज तथा संतोष करने वाला विद्वान हमेशा पवित्र होता है।

Thursday, June 19, 2008

विदुर नीति:रोगमुक्त हुआ व्यक्ति चिकित्सक का तिरस्कार करता है

1.निरोग रहना, ऋणी न होना, विदेश में रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निर्भय होना ये किसी मनुष्य के लिए लिये इस लोक में छह सुख हैं।
2. ईष्र्या करने वाला, घृणा करने वाला, मन में असंतोष रखने वाला, क्रोधी, सदैव संशय में रहने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीवन पर निर्भर रहने वाला छह लोग सदा दुखी रहते है।
3. शिक्षा समाप्त कर चुका शिष्य अपने गुरु का, विवाहित पुत्र अपनी मां का, काम भावना शांत होने पर पुरुष स्त्री का, कार्य संपन्न होने पर मनुष्य अपने सहायक का, नदी की धारा पार कर लेने वाला पुरुष नाव का तथा रोग मुक्त हुआ रोगी अपने चिकित्सक का सदा अपने अनादर करते हैं
4.स्त्रियों के विषय में आसक्त रहना, जुआ, शिकार, मद्यपान, कठोर वाणी बोलना, अत्यंत कठोर दंड देना और अपने धन का दुरुपयोग करना यह सात दुर्गुण त्याग देना में ही भलाई है।

Sunday, June 8, 2008

भृतहरि शतकःसंतोष होने पर अमीर-गरीब समान हो जाते हैं

वयमहि परितृष्टा वल्कलैस्त्वं दृकूलैस्सम इह परितोषो निर्विशेषो विशेषः।
स तु भवतु यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्र

भावार्थ-इस भौतिक संसार में कोई मनुष्य वृक्ष की छाल के वस्+त्र पहनकर ही संतुष्ट होता है तो किसी का मन रेशमी सूत के बने वस्त्र धारण कर ही प्रसन्न होता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। धनी और निर्धन के संतोष में कोई अंतर नही। जिसकी बहुत बड़ी इच्छाएं वह दरिद्र होते हुए भी मन के संतुष्ट हो जाता है तो भला किसे धनी कहा जाये और किसे दरिद्र।

संक्षिप्त व्याख्या-यहां कोई धनी अपने धन पर इतराता है तो कोई अपनी निर्धनता को लेकर त्रस्त रहता है। अपनी देह में विचरने वाले मन की ओर कोई दृष्टिपात नहीं करता। अगर मन में संतोष है तो फिर किस बात की चिंता रह जाती है। कुछ लोग ऐसे है जो अपने पास भौतिक साधनों के अभाव की परवाह न करते हुए भक्ति भाव से अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वह परमात्मा द्वारा दिये गये धन से संतुष्ट हो जाते हैं पर कई धनिक हैं जो धन क पीछे सदैव पड़े रहते हैं पर मन की शांति उनसे कोसों दूर रहती है। इतना ही नहीं अपनी कम आवश्यकताओं के कारण संतुष्ट लोगों के मन की शांति उनको नहीं सुहाती और तब वह सोचते हैं कि काश! हमें मन की शांति मिल जाये।

आज का भौतिक संसार तो आपने देखा होगा मनुष्य की अशांति पर ही अधिक चल रहा है। टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक अभिनेता कहता है-‘डोंट बी संतुष्ट‘। मतलब यह कि आज के युग के व्यवसायी अपने हित के लिऐ ऐसे प्रयास करते हैं कि आम आदमी के मन में असंतोष भड़काकर उन्हें माया के ऐसे चक्कर में फंसाया जहां से वह निकल नहीं सके।

अगर आदमी के मन में संतोष है इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह धनी है या निर्धन। हमारा काम कम आवश्यकता से चल जाता है तो उससे संतुष्ट हो जाना चाहिए। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।

Friday, June 6, 2008

संत कबीर वाणीःगरीब पर कभी हंसना नहीं चाहिए

अहं अगनि हिरदै, जरै, गुरू सों चाहै मान
जिनको जम नयौता दिया, हो हमरे मिहमान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब किसी मनुष्य में अहंकार की भावना जाग्रत होती है तो वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहता है। ऐसी प्रवृत्ति के लोग अपने देह को कष्ट देकर विपत्तियों को आमंत्रण भेजते हैं और अंततः मौत के मूंह में समा जाते हैं।

कबीर गर्व न कीजिये, रंक न हंसिये कोय
अजहूं नाव समुद्र में, ना जानौं क्या होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी उपलब्ध्यिों पर अहंकार करते हुए किसी निर्धन पर हंसना नहीं चाहिए। हमारा जीवन ऐसे ही जैसे समुद्र में नाव और पता नहीं कब क्या हो जाये।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अहंकार आदमी का सबसे बड़ा शत्रू होता है। कुछ लोग अपने गुरू से कुछ सीख लेकर जब अपने जीवन में उपलब्धियां प्राप्त कर लेते हैं तब उनमें इतना अहंकार आ जाता है कि वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहते हैं। वैसे आजकल के गुरू भी कम नहीं है वह ऐसे ही शिष्यों को सम्मान देते हैं जिसके पास माल टाल हो। यह गुरू दिखावे के ही होते हैं और उन्होंने केवल भारतीय अध्यात्म ग्रंथों की विषय सामग्री को रट लिया होता है और जिसे सुनाकर वह अपने लिये कमाऊ शिष्य जुटाते हैं। गरीब भक्तों को वह भी ऐसे ही दुत्कारते हैं जैसे कोई आम आदमी। कहते सभी है कि अहंकार छोड़ दो पर माया के चक्कर में फंस गुरू और शिष्य इससे मुक्त नहीं हो पाते। ऐसे में यह विचार करना चाहिए कि हमारा जीवन तो ऐसे ही जैसे समुद्र के मझधार में नाव। कब क्या हो जाये पता नहीं। माया का खेल तो निराला है। खेलती वह है और मनुष्य सोचता है कि वह खेल रहा है। आज यहां तो कल वहां जाने वाली माया पर यकीन नहीं करना चाहिए। इसलिये अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति को सम्मान देने का विचार मन में रखें तो बहुत अच्छा।

Thursday, June 5, 2008

संत कबीर वाणी:भिखारी के लिए बोलना और चोर के लिए चुप रहना अच्छा

चातुर को चिन्ता घनी, नहिं मूरख को लाज
सर अवसर जानै नहीं, पेट भरन सूं काज


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो चतुर और ज्ञानी होते हैं उनके ढेर सारी चिंताएं होती हैं जबकि जो अज्ञानी और मूर्ख है उसे किसी प्रकार की चिंता नहीं सताती और वह शर्म से परे होता है। उसे तो किसी तरह अपना पेट भरने से मतलब होता है। वह तो समय असमय को नहंी जानता उसे तो अपना पेट भरने से मतलब होता है।

मांगन को भल बोलनो, चोरन को भल चूप
माली को भल बरसनो, धोबी को भल धूप


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भिक्षा मांगने वालों के लिए बोलना अच्छा है, क्योंकि उसी से उनको कार्य में सिद्धि मिलेगी। चोरों के लिए चुप रहना ही अच्छा है, अन्यथा उसे पकड़ लिया जायेगा। माली के लिए वर्षा का होना बहुत अच्छा है जबकि धोबी के लिए धूप अच्छी है ताकि उसके कपड़े सूखते रहें।

Wednesday, June 4, 2008

संत कबीर वाणी:प्रपंची गुरूओं से कोई लाभ नहीं


शब्द कहै सौ कीजिये, बहुतक गुरु लबार
अपने अपने लाभ को, ठौर ठौर बटपार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सत्य का शब्द हो उसी के अनुसार कार्य करो। इस संसार में कई ऐसे गुरू हैं जो पांखडी और प्रपंची होते हैं। वह अपने स्वार्थ के अनुसार कार्य करते हुए उपदेश देते हैं और उनसे कोई लाभ नहीं होता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संबंध में मेरे द्वारा एक आलेख अन्य ब्लाग पर लिखा गया था जो यहां प्रस्तुत है।

आज के कथित संत और भक्त प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का प्रतीक नहीं
भगवान श्रीराम ने गुरु वसिष्ठ से शिक्षा प्राप्त की और एक बार वहाँ से निकले तो फिर चल पड़े अपने जीवन पथ पर। फिर विश्वामित्र का सानिध्य प्राप्त किया और उनसे अनेक प्रकार का ज्ञान प्राप्त किया। फिर उन्होने अपना जीवन समाज के हित में लगा दिया न कि केवल गुरु के आश्रमों के चक्कर काटकर उसे व्यर्थ किया। भगवान श्री कृष्ण ने भी महर्षि संदीपनि से शिक्षा पाई और फिर धर्म की स्थापना के लिए उतरे तो वह कर दिखाया। न गुरु ने उन्हें अपने पास बाँध कर रखा न ही उन्होने हर ख़ास अवसर पर जाकर उनंके आश्रम पर कोई पिकनिक नहीं मनाई। अर्जुन ने अपने गुरु से शिक्षा पाई और अवसर आने पर अपने ही गुरु को परास्त भी किया। आशय यह है कि इस देश में गुरु-शिष्य की परंपरा ऐसी है जिसमें गुरु अपने शिष्य को अपना ज्ञान देकर विदा करता है और जब तक शिष्य उसके सानिध्य में है उसकी सेवा करता है। उसके बाद चल पड्ता है अपने जीवन पथ पर और अपने गुरु का नाम रोशन करता है।

भारत की इसी प्राचीनतम गुरु-शिष्य परंपरा का बखान करने वाले गुरु आज अपने शिष्यों को उस समय गुरु दीक्षा देते हैं जब उसकी शिक्षा प्राप्त करने की आयु निकल चुकी होती है और फिर उसे हर ख़ास मौके पर अपने दर्शन करने के लिए प्रेरित करते हैं। कई तथाकथित गुरु पूरे साल भर तमाम तरह के पर्वों के साथ अपने जन्मदिन भी मनाते हैं और उस पर अपने इर्द-गिर्द शिष्यों की भीड़ जमा कर अपनी आध्यात्मिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं. यहाँ इस बात का उल्लेख करना गलत नहीं होगा की भारतीय जीवन दर्शन में जन्मदिन मनाने की कोई ऐसी परंपरा नहीं है जिसका पालन यह लोग कर रहे हैं.

भारत में गुरु शिष्य की परंपरा एक बहुत रोमांचित करने वाली बात है, पूरे विश्व में इसकी गाथा गाई जाती है पर आजकल इसका दोहन कुछ धर्मचार्य अपने भक्तो का भावनात्मक शोषण कर रहे हैं वह उसका प्रतीक बिल्कुल नहीं है। हर व्यक्ति को जीवन में गुरु की आवश्यकता होती है और खासतौर से उस समय जब जीवन के शुरूआती दौर में एक छात्र होता है। अब गुरुकुल तो हैं नहीं और अँग्रेज़ी पद्धति पर आधारित शिक्षा में गुरु की शिक्षा केवल एक ही विषय तक सीमित रह गयी है-जैसे हिन्दी अँग्रेज़ी, इतिहास, भूगोल, विज्ञानआदि। शिक्षा के समय ही आदमी को चरित्र और जीवन के गूढ रहस्यों का ज्ञान दिया जाना चाहिए। यह देश के लोगों के खून में ही है कि आज के कुछ शिक्षक इसके बावजूद अपने विषयों से हटकर शिष्यों को गाहे-बगाहे अपनी तरफ से कई बार जीवन के संबंध में ज्ञान देते हैं पर उसे औपचारिक मान कर अनेक छात्र अनदेखा करते हैं पर कुछ समझदार छात्र उसे धारण भी करते हैं.

यही कारण है कि आज अपने विषयक ज्ञान में प्रवीण तो बहुत लोग हैं पर आचरण, नैतिकता और अध्यात्म ज्ञान की लोगों में कमी पाई जाती है। इस वजह से लोगों के दिमाग में तनाव होता है और उसको उससे मुक्ति दिलाने के लिए धर्मगुरू आगे आ जाते हैं। आज इस समय देश में धर्म गुरु कितने हैं और उनकी शक्ति किस तरह राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक क्षेत्र में फैली है यह बताने की ज़रूरत नहीं है। तमाम तरह के आयोजनों में आप भीड़ देखिए। कितनी भारी संख्या में लोग जाते हैं। इस पर एक प्रख्यात लेखक जो बहुत समय तक प्रगतिशील विचारधारा से जुडे थे का मैने एक लेख पढ़ा था तो उसमें उन्होने कहा था की ''हम इन धर्म गुरुओं की कितनी भी आलोचना करें पर यह एक वास्तविकता है कि वह कुछ देर के लिए अपने प्रवचनों से तनाव झेल रहे लोगों को मुक्त कर देते हैं।''

मतलब किसी धार्मिक विचारधारा के एकदम विरोधी उन जैसे लेखक को भी इनमें एक गुण नज़र आया। यह आज से पाँच छ: वर्ष पूर्व मैने आलेख पढ़ा था और मुझे ताज्जुब हुआ-मेरा मानना था कि उन लेखक महोदय ने अगर भारतीय आध्यात्म का अध्ययन किया होता तो उनको पता लगता कि भारतीय आध्यात्म में वह अद्वितीय शक्ति है जिसके थोड़े से स्पर्श में ही आदमी का मन प्रूफुल्लित हो जाता है। मगर वह कुछ देर के लिए ही फिर निरंतर अभ्यास नो होने से फिर तनाव में आ जाते हैं।

एक बात बिल्कुल दावे के साथ मैं कहता हूँ कि अगर किसी व्यक्ति में बचपन से ही आध्यात्म के बीज नहीं बोए गये तो उमरभर उसमें आ नहीं सकते और जिसमें आ गये उसका कोई धर्म के नाम पर शोषण नहीं कर सकता।

Tuesday, June 3, 2008

भृतहरि शतक:आजीविका की खोज में आदमी के गुण व्यर्थ हो जाते हैं

संत कबीर दास ने कहा है कि
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अहिरन की चोरी करै, करे सुई का का दान
ऊंचा चढि़ कर देखता, केतिक दूर विमान
      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में तमाम तरह के अपराध और चालाकियां कर धन कमाता है पर उसके अनुपात में नगण्य धन दान कर अपने मन में प्रसन्न होते हुए फिर आसमान की ओर दृष्टिपात करता है कि उसको स्वर्ग में ले जाने वाला विमान अभी कितनी दूरी पर रह गया है।
आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आंखों से देख नहीं पाता, कानों से शब्द दूर ही  रहे जाते हैं और सिर के बाल  सफेद होने के बावजूद भी मनुष्य अज्ञानी रह जाता है और माया के जाल में फंसा रहता है।
      वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमारे देश आधुनिक समय में अंग्रेजों की सृजित अर्थ, राजकीय, शैक्षिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था पद्धति का अनुकरण कर रहा है उसके ही एक प्रमुख विद्वान का मानना है कि  कोई भी धनी नहीं बन सकता है-ऐसा मानने वाले बहुत हैं तो हम स्वयं देख भी सकते हैं। धनी होने के बाद समाज में प्रतिष्ठा पाने के मोह से लोग दान करते हैं। कहीं मंदिर में घंटा चढ़ाकर, पंखे या कूलर लगवाकर या बैंच बनवाकर उस पर अपना नाम खुदवाते हैं। एक तीर से दो शिकार-दान भी हो गया और नाम भी हो गया। फिर मान लेते हैं कि उनको स्वर्ग का टिकट मिल गया। यह दान कोई सामान्य वर्ग के व्यक्ति नहीं कर पाते बल्कि जिनके पास तमाम तरह के छल कपट और चालाकियों से अर्जित माया का भंडार है वही करते हैं। उन्होंने इतना धन कमाया होता है कि उसकी गिनती वह स्वयं नहीं कर पाते। अगर वह इस तरह अपने नाम प्रचारित करते हुए दान न करें तो समाज में उनका कोई नाम भी न पहचाने। कई धनपतियों ने अपने मंदिरों के नाम पर ट्रस्ट बनाये हैं। वह मंदिर उनकी निजी संपत्ति होते हैं और वहां कोई इस दावे के साथ प्रविष्ट नहीं हो सकता कि वह सार्वजनिक मंदिर है। इस तरह उनके और कुल का नाम भी दानियों में शुमार हो जाता है और जेब से भी पैसा नहीं जाता। वहां भक्तों का चढ़ावा आता है सो अलग। ऐसे लोग हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि उनको स्वर्ग मिल जायेगा।

Thursday, May 29, 2008

संत कबीर वाणी:यह संसार दया भाव पर चलता है

कुंजी मुख से कन गिरा, खुटै न वाको आहार
कौड़ी कन लेकर चली, पोषन दे परिवार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि खाते हुए हाथी के मुख से यदि अन्न का दाना गिर जाये तो उसके आहार पर कोई अंतर नहीं पड़ता पर उसे चींटी ले जाकर अपने परिवार का भरण-पोषण करती है। इस तरह यह संसार दया भाव पर चलता है।
भावे जाओ बादरी, भावै जावहु गया
कहै कबीर सुनो भाई साधो, सब ते बड़ी दया

संंत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि चाहे बद्रीनाथ जाओ या गया धाम, जहां अच्छा लगे वहां जाओं पर इस संसार में मन को प्रसन्न करने का केवल एक ही तरीका है कि दूसरे पर दया करो।
जहां दया वहां धर्म है, जहां लोभ तहं पाप
जहां क्रोध वहां काल है, वहां क्षमा वहां आप

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जहां दया है वहीं धर्म स्थित होता है और जहां लोभ है वहां पाप है। जहां क्रोध है वहां काल और जहां क्षमा है वहां परमात्मा का वास है।

Saturday, May 17, 2008

भृतहरि शतक:स्त्री को अबला मानने वाले कवि विपरीत बुद्धि के

नूनं हि ते कविवरा विपरीत वाचो
ये नित्यमाहुरबला इति कामिनीनाम् ।
याभिर्विलालतर तारकदृष्टिपातैः
शक्रायिऽपि विजितास्त्वबलाः कथं ताः


इस श्लोक का आशय यह है कि जो कवि सुंदर स्त्री को अबला मानते हैं उनको तो विपरीत बुद्धि का माना जाना चाहिए। जिन स्त्रियों ने अपने तीक्ष्ण दृष्टि से देवताओं तक को परास्त कर दिया उनको अबला कैसे माना जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अधिकतर कवि और रचयिता स्त्री को अबला मानते हैं पर भर्तुहरि महाराज ने उसके विपरीत उन्हें सबला माना है। सुंदर स्त्री से आशय समूची स्त्री जाति से ही माना जाना चाहिए, क्योंकि स्त्री का सौंदर्य उसके हृदय में स्थित लज्जा और ममता भाव में है जो कमोवेश हर स्त्री में होती है। माता चाहे किसी भी रंग या नस्ल की हो बच्चे पर अपनी ममता लुटा देती है। बच्चा भी अपनी मां को बड़े प्रेम से निहारता है। पूरे विश्व मेंे अनेक कवि और लेखक नारी को अबला मानकर उस पर अपनी विषय सामग्री प्रस्तुत करते हैं। वास्तव में बहुत अज्ञानी होते हैं। उन्हें अपनी रचना के समय यह आभास नहीं होता कि हर स्त्री का किसी न किसी पुरुष-जिसमें पिता, भाई, पति और रिश्ते-से संबंध होता है। वह सबके साथ निभाते हुए उनसे संरक्षण पाती है। जो लोग स्त्री को अबला मानकर अपनी रचना लिखते हैं वह वास्तव में अपने आसपास स्थित नारियों से अपने संबंधों पर दृष्टिपात किये बिना ही केवल नाम पाने के लिये लिखते हैं और इसी कारण आजकल पूरे विश्व में नारी को लेकर असत्य साहित्य की भरमार है। अनेक कहानियां और कवितायें नारियों को अबला और शोषित मानकर कर लिखीं जातीं हैं और उनमें सच कम कल्पना अधिक होती है। ऐसे लोग विपरीत बुद्धि के महत्वांकाक्षी लेखक लोगों की बुद्धि तरस योग्य है।

Tuesday, May 13, 2008

संत कबीर वाणी:कुल की चाल चलते हुए मन का हंस बिगड़ गया

दुनिया के धोखे मुआ, चल कुटुंब की कानि
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा पसानि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है यह दुनियां एक धोखा है जिसमें आदमी केवल अपने परिवार के पालन पोषण के लिये हर समय जुटा रहता है। वह इस बात का विचार नहीं करता कि जब उसका शरीर निर्जीव होकर इस धरती पर पड़ा रहेगा तब उसके कुल शान का क्या होगा?



कुल करनी के कारनै, हंसा गया बिगोय
तब कुल काको लाजि, चारि पांव का होय


संता शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने परिवार की मर्यादा के लिये आदमी ने अपने आपको बिगाड़ लिया वरना वह तो हंस था। उस कुल की मर्यादा का तब क्या होगा जब परमार्थ और सत्संग के बिना जब भविष्य में उसे पशु बनना पड़ेगा।

संपादकीय व्याख्या-मनुष्य मन को हंस भी कहा जाता है पर उसे कोई उड़ने दे सके तभी समझा जा सकता है। हर कोई अपने विचार और लक्ष्यों का दायरा संकीर्ण कर लेता है। अपने और परिवार के हित के आगे उसे कुछ नहीं सूझता। कई लोग मन में शांति न होने की बात कहते हैं पर उसके लिये कोई यत्न नहीं करते। मन एकरसता से ऊब जाता है। स्वार्थ सिद्धि की एक ऐसा रस है जिसमें डूबे रहने से बोरियत लगती है-अगर थोड़ा परमार्थ भी कर लें तो एक सुख का अनुभव होता है। परमार्थ का यह आशय कतई नहीं है कि अपना सर्वस्व लुटा दें बल्कि हम किसी सुपात्र व्यक्ति की सहायता करें ने किसी बेबस का सहारा बने। वैसे लुटाने को लोग लाखों लुटा रहे हैं। अपने परिवार के नाम प्याऊ या किसी मंदिर में बैच या पंखा लगवाकर उस पर अपने परिवार का परिचय अंकित करवा देते हैं और स्वयं ही दानी होने का प्रमाणपत्र ग्रहण करते हैं। इससे मन को शांति नहीं मिलती। दूसरों से दिखावा कर सकते हो पर अपने आप से वह संभव नहीं है। हम हर जगह अपने कुल की परिवार की प्रतिष्ठा लिये घूमते हैं पर अपनी आत्मा से कभी परिचित नहीं होते। इसके लिये जरूरी है कि समय निकालकर भक्ति और संत्संग के कार्यों में बिना किसी दिखावे के निष्काम भाव से सम्मिलित हों।

Monday, May 12, 2008

संत कबीर वाणी:सत्य शब्द की खोज करे वह संत धन्य


खोजी हुआ शब्द का, धन्य संत जन सोय
कहैं कबीर गहि शब्द को, कबहु न जाय बिगोय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि वह सत्य धन्य है जो सत्य के शब्दों की खोज करता है। जो सत्य के शब्द के ज्ञान को धारण करता है वह गलती नहीं करता और उसका कभी पतन नहीं होता।

सोई शब्द जिन सार है, जो गुरू दिया बताय
बलिहार वा गुरुन की, सीष बियोग न जाय


वह शब्द ज्ञान सत्य है जो हमें अपनु गुरूओं से मिलता है। उस गुरू के सर्वस्व अर्पण कर दो जिससे शब्द ज्ञान मिला है और उससे कभी दूर न जाओ

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल ढोंगी गुरूओं की बाढ़ इस देश में आयी है। कभी कभी तो लगता है कि अध्यात्मिक ज्ञान को रटने वाले पर स्वयं उसे धारण करने से वंचित लोग गुरू बनते जा रहे हैं। सकाम भक्ति का प्रचार इस समय जोरों पर है। सकाम भक्ति से तब तक ही मन में शांति रहती है जब तक हम उसे करते हैं और अधिकतर गुरू इसी प्रकार की भक्ति को प्रोत्साहन देते हैं ताकि जब तक भक्त या शिष्य जब तक उनके पास रहें उसमें मग्न रहें और फिर सांसरिक दुनियां में लौटकर दुःख भोगते हुए उनको याद करें। निष्काम भक्ति तो सदैव ह्ृदय में बनी रहती हैं और करने के बाद भी हमारा मन प्रफुल्लित रहता है। निष्काम भक्ति का आशय ईश्वर का ध्यान करते हुए निरंकार के रूप में उसे देखना। इससे हमारे मन, बुद्धि और विचारों का जो चक्र है वह घूमता रहता है और उससे उसमें शुद्धता आती है।

Saturday, May 10, 2008

संत कबीर वाणी:शब्द का महत्व चुम्बक समान


यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुम्बक भाय
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द का महत्व तो चुम्बक के समान है जो आदमी को अपनी आकर्षित करता है। बिना शब्द के कोई भी अपने जीवन में उबर नहीं सकता चाहे जितने भी उपाय कर ले।

सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहे, कछु न लोहा लेय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सुनकर कुछ सीखता और उस पर विचार करता है उसे वह सुख प्रदान करते हैं। बिना सोचे समझे ग्रहण कर बोलने वाला व्यक्ति कोई लाभ नहीं ले पाता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई बार कुछ लोगों को देखकर हमें यह लगता होगा कि कि अधिक बोल जाते हैं। कई बार यह अनुभव भी होता है कि वह कुछ कार्यों को समय रहते सीख नहीं पाये। यह अनुभव हमें अपने बारे में भी होता है। मनुष्य का एक दूसरे से संपर्क वार्तालाप को माध्यम से होता है और आजकल अंतर्जाल पर संपर्क होता है तो शब्द लिखकर भी संपर्क होता है। शब्द बोला जाय या लिखा जाये उसमें आकर्षण होता है। इन पंक्तियों का लेखक अंतर्जाल पर लिखता है और कई बार दूसरे का लिखा ही दिल को ऐसा छू जाता है जैसे उसने बोला हो। कई लोग ऐसे भी है जो दुःख पहुंचाने वाले शब्द लिखते हैं। ऐसे लोग अज्ञान के अंधेरे में होते हैं। वह सोचते हैं कि इस तरह शब्द लिखने या कहने से किसी पर कोई प्रभाव नहीं होता या हम अपने मन की भडास निकाल लें दूसरे पर उसका जो प्रभाव होता है उसकी हम चिंता क्यों करें? यह ऐसे लोग होते हैं जो जिनको जीवन का ज्ञान देने वाला गुरू नहीं मिला होता या फिर उन्होने उसके ज्ञान को गंभीरता से ग्रहण नहीं किया होता।

कई बार लोग एक दूसरे के लिए पीठ पीछे अभद्र शब्द का करते हुए निंदा करते हैं सोचते हैं कि कौन वह सुन रहा है या जाकर उससे कहेगा। यह सच भी होता है पर ऐसा कर वह अपने मन और देह को भी भारी कष्ट देते हैं। अपना खून जलाते हैं। अतः उनकी कमियों से सीखकर हमें अपने अंदर सुधार कर लेना चाहिए।

Thursday, May 8, 2008

संत कबीर वाणी:टोना-टोटका सब झूठ है

जंत्र मंत्र झूठ है, मति भरमो जग कोय
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यंत्र और मंत्र एकदम बेकार है और इसके भ्रम में कभी मत पड़ो। जब तक परम सत्य और शब्द को नहीं जानेगा तब तक वह सिद्ध नहीं हो सकता। कौवा कभी हंस नहीं हो सकता।

जिहि शब्दे दुख ना लगे, सोईं शब्द उचार
तपत मिटी सीतल भया, सोई शब्द ततसार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने मुख से ऐसे शब्द बोलना चाहिए जिससे दूसरा प्रसन्न हो जाये। अगर दूसरा व्यक्ति हमारे बोलने से प्रसन्न होता है तो हमें स्वाभाविक रूप से आत्मिक सुख की प्राप्ति होती है।

संपादकीय व्याख्या-कहते हैं कि शिक्षा व्यक्ति को जागरूक बनाती है पर कुछ हमारे देश में कुछ लोग ऐसे है जो शिक्षित होने के बावजूद टोने टोटके वालों के पास जाकर अपनी समस्याओं का हल ढूंढते हैं या कथित ढोंगी साधुओं की दरबार में उपस्थित होकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। यह यंत्र-मंत्र और टोना टोटका कई लोगों के लिये व्यापार बना हुआ है। कहीं पैसा लेकर यज्ञ हो रहा है तो कही तावीज आदि बेचा जाता है। किसी के हाथ में कोई सिद्धि नहीं है पर सिद्ध कहलाने वाले बहुत लोग मिल जायेंगे। सच तो यह है जीवन का पहिया घूमता है तो कई काम स्वतः बनते हैं तो कई आदमी के बनाने के बावजूद बिगड़ जाते हैं। ऐसे में अंधविश्वासों की सहायता लेना अपने आपको धोखा देना है।

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