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Thursday, August 14, 2008

चाणक्य नीति:जिसके पास अक्ल उसी के पास होती है ताकत

१.इतने भारी शरीर वाला हाथी छोटे से अंकुश सा वश में किया जाता है. सब जानते हैं की अंकुश परिमाण में हाथी से बहुत छोटा होता है. प्रज्जवलित दीपक आसपास अंधकार को ख़त्म कर देता है. जबकि परिमाण में अन्धकार तो दीपक से कहीं अधिक विस्तृत एवं व्यापक होता है.वज्र के प्रभाव से बडे-बडे पर्वत टूट जाते हैं. जबकि वज्र पर्वत से बहुत छोटा होता है.
चाणक्य के इस कथन से आशय यह है की अंकुश से इतने बडे हाथी को बाँधना, छोटे से वज्र से विशाल एवं उन्मत पर्वतों का टूटना, इतने घने अन्धकार का छोटे से प्रज्जवलित दीपक से समाप्त हो जाना इसी सत्य के प्रमाण है की तेज ओज की ही विजय होती है. तेज में ही अधिक शक्ति होती है.
२.जिस प्राणी के पास बुद्धि है उसके पास सभी तरह का बल भी है. वह सभी कठिन परिस्थितियों का मुकाबला सहजता से करते हुए उस पर विजय पा लेता है. बुद्धिहीन का बल भी निरर्थक है, क्योंकि वह उसका उपयोग ही नहीं कर पता. बुद्धि के बल पर ही के छोटे से जीव खरगोश ने महाबली सिंह को कुएँ में गिराकर मार डाला. यह उसकी बुद्धि के बल पर ही संभव हो सका.
३.यह एक कटु सच्चाई है की किसी भी ढंग से समझाने पर भी कोई दुष्ट सज्जन नहीं बन जाता, जैसे घी-दूध से सींचा गया, नीम का वृक्ष मीठा नहीं हो जाता.
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Monday, July 21, 2008

चाणक्य नीतिःकाम शुरू कर घबड़ाना नहीं चाहिए

1.कोई भी काम प्रारंभ करने के बाद घबड़ाना नहीं चाहिए और उसे मध्य में नहीं छोड़ना चाहिए। कर्म करने ही इस दैहिक जीवन के सबसे अधिक पूजा है। जो प्राणी काम करते हैं वही सदा सुखी रहते हैं।
2. धन की हानि, मन की अशांति और संदेह के बारे में अन्य लोगों को नहीं बताना चाहिये क्योंकि इससे मजाक बनता है।


वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व में अशांति का मुख्य कारण यही है कि लोग शारीरिक श्रम को हेय समझने लगे हैं। अपने शरीर का अधिक से अधिक आराम देने के लिये लोगों मशीनों पर निर्भर होते जा रहे हैं। इससे व्यक्ति, परिवार और समाज में जो वैमनस्य और तनाव फैल रहा है उसका अनुमान किसी को नहीं है। एक तरफ श्रम न करने से शरीर से विकार निकालने वाला पसीना बाहर नहीं आता उससे शरीर को रोग घेर लेते हैं दूसरे शारीरिक श्रम करने वाले लोगों को यह लगता है कि उनका समाज में कोई सम्मान नहीं है इसलिये वह आत्मग्लानि की अग्नि मेंं जलते हैं और अपने से धनी आदमी की सहायता के लिये आगे नहीं आते हैं। देखा जाये तो राष्ट्र और समाज की रक्षा के लिये जो श्रमिक और गरीब व्यक्ति अपनी शारीरिक शक्ति से रक्षा करने में समर्थ है वह क्षुब्ध है यही कारण है कि हम अपने आसपास ऐसे खतरों को देख रहे हैं जिनका सामना केवल शक्ति के सहारे ही किया जा सकता है। इसलिये न केवल स्वयं ही शरीर से श्रम करना चाहिए बल्कि जो शारीरिक श्रम कर रहे हैं उनका भी सम्मान करना चाहिए।

अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अपने मन का बोझ किसी से कहने पर मन हल्का हो जाता है पर होता इसका उल्टा ही है। सभी लोग कष्ट झेलते हैं पर कुछ लोग कहने की बजाय दूसरों के कष्ट का मजाक उड़ाकर ही दिल को तसल्ली देते हैं। ऐसे में अगर कोई सज्जन पुरुष यह सोचता है िक अपना कष्ट दूसरे को बताने से संतोष मिल जायेगा तो उसे यह भ्रम दूर कर लेना चहिए।

Thursday, July 10, 2008

चाणक्य नीतिःअंधत्व के होते हैं कई प्रकार

1.मनुष्य में अंधापन कई प्रकार का होता है। एक तो जन्मांध होते हैं जिनको वास्तव में आंखों से कुछ भी नहीं दिखता, पर दूसरे वह होते हैं जो आखें होते हुए भी नहीं देखते या न देखने का नाटक करते हैं।
2.सावन क अंधे को केवल हरियाली ही दिखती है। इसका तात्पर्य यह है कि आदमी को आंखें तो हैं पर वह सूखे में भी सावन की हरियाली की बात करता है क्योंकि उस पर केवल उसी का प्रभाव होता है
3.कामवासना के अंधे को कुछ भी नहीं सूझता उसकी आखों में केवल मद छाया रहता है। वह केवल इसी विषय पर बात कर अपना तथा दूसरों को मनोरंन का प्रयास करता है। इसी प्रकार लोभी को भी अपने स्वार्थ की अलावा कुछ नहीं सूझता।
कुल प्रकार कामांध, मदांध और लोभी ऐसे मनुष्य होते हैं जो आंखें रहते हुए भी अंधों की तरह व्यवहार करते हैं। ऐसे लोग अपने नजरिये से दुनियां को देखते हैं और अपने स्वार्थ के अनुसार उसके स्वरूप का वर्णन करते हैं।

Wednesday, July 9, 2008

चाणक्य नीतिःहृदय में जगह नहीं तो पास वाला भी दूर लगता है

1.राजा, अग्नि, गुरु, स्त्री इनसे निकटता खतरनाक होती है। इनसे थोड़ा परे रहकर संपर्क रखना चाहिए। अग्नि, जल, सर्प, मूर्ख, और राजा कभी भी रुष्ट होने पर मनुष्य के प्राण तक ले सकते हैं।
2.सच्चा ज्ञानी तो वही है जो प्रसंग के अनुसार वार्तालाप में अपने तर्क उचित ढंग से प्रस्तुत करता है। वह अनुकूल होने पर प्रेम करता है और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध प्रदर्शन करने वाला भी होता है।
3.हृदय में रहने वाला दूर रहकर भी पास है और हृदय में न रहने वाला पास रहकर भी दूर रहता है। परे और निकट के संबंध का आधार हृदय के भाव से है।
4.जल में तेल पड़ते ही कम होने के बावजूद तेल का विस्तार हो जाता है। उसी तरह दुष्ट के साथ गोपनीय विषय पर की गयी वार्ता विद्युत गति से फैल जाती है। उसी तरह सुदान की चर्चा भी विस्तार पाती है। विस्तार की शक्ति अपने पात्र के कार्य करने पर निर्भर रहती है।
5.निर्धन को पत्नी, मित्र, सेवक, भाई और परिजन सब छोड़ देते हैं।

Tuesday, July 8, 2008

चाणक्य नीतिःरोग और शत्रू सोते हुए पर हमला करते हैं

1.निरंतर परिश्रम करना ही अपनी निर्धनता हटाने का सबसे अधिक अच्छा उपाय है। परिश्रमी कभी निर्धन नहीं रह सकता। उद्यम करने वाले को उसका भाग्य का लिखा मिलता है। अगर कोई सिंह सो रहा है तो उसके मूंह में पशु अपने आप नहीं चले जाते। अगर वह परिश्रम न करे तो उसे भी भूखा मरना पड़ता है।
2.भगवान का नाम जपने से सभी पाप अपने आप नष्ट हो जाते हैं। प्राचीन ग्रंथों में पापों के प्रायश्चित को के रूप में तप का ही महत्व प्रतिपादित किया गया है, जो व्यक्ति निरंतर जप करता रहता है उसके पाप तो रह ही नहीं सकते।
3.उत्तर का प्रत्युत्तर देना ही झगड़े का कारण बनता है। अगर किसी ने अपशब्द कहें हैं और दूसरा भी उसके उत्तर में अपशब्द कहता है तो झगड़ा अपने आप शूरू हो जाता है। अगर की झगड़े का निराकरण करना है तो उसका सबसे अच्छा उत्तर मौन है।
4.जागरुक और सावधान व्यक्ति को किसी प्रकार के भय की आशंका नहीं रहती। प्रायः रोग, शत्रू तथा अपराधिक प्रवृत्ति के लोग असावधान और सोते व्यक्ति पर ही प्रहार करते हैं और उनके जागते ही भाग जाते हैं।

Thursday, June 26, 2008

चाणक्य नीतिःअनावश्यक रूप से भटकना ठीक नहीं

1.मर्यादा पालन के लिए सागर आदर्श माना जाता है। वर्षकाल मं उफनती हुई अनेक नदियां अपना जल लेकर उसमें विसर्जित करती हैं पर वह अपनी मर्यादा को लांघकर कभी बाहर नहीं आता परंतु प्रलय आने सागर अपने किनारे तोड़कर बाहर आता है और पूरी धरती को जलमग्न कर देता है। महान लोग सागर से भी अधिक मर्यादित होते हैं जो भयंकर विपत्ति आने पर भी अपनी मर्यादा नहीं छोड़ते।
2.मंद बुद्धि या मूर्ख व्यक्ति अपने जीवन में पशु के समान ही समझा जाता है। जिस तरह पशु को उचित अनुचित का ज्ञान नहीं होता उसी तरह मूर्ख व्यक्ति भी अज्ञान के अंधेरे में रहता है। जिस तरह पैर में पड़ा कांटा पीड़ा पहुंचाता है वैसे ही वह अपने लोगों के लिये संकट खड़े करता है।
3.प्रत्येक वस्तु या व्यवहार अपनी सीमा में ही सुशोभित होता है। अति हमेशा खराब होती है। अति विनम्रता, अति सहनशीलता, अति प्रशंसा और अति घनिष्ठता भी घातक होती है। अति का सभी जगह त्याग कर देना चाहिए।

4.मनुष्य के जीवन में सब कुछ पूर्व निर्धारित होता है इसलिये अनावश्यक रूप से भटकना या चिंतित होना ठीक नहीं है इससे कोई समस्या हल नहीं होती। मनुष्य जैसे ही मां के गर्भ में आता है उसका भविष्य निर्धारित हो जाता है। उसका जीवन, मरण, समय, प्रवृत्तियां, सुख दुःख, अच्छा-बुरा एवं ख्याति कुख्याति परमात्मा द्वारा निर्धारित हो जाती है।

Wednesday, June 25, 2008

चाणक्य नीतिःकपट रहित शुद्ध आचरण ही होता है धर्म

1.आज के युग में अर्थ की प्रधानता है और धन संचय प्रमुख आधर है। धन संचय हर मनुष्य के लिये आवश्यक है क्योंकि समय पड़ने पर कब उसकी जरूरत होती है पता ही नहीं पड़ता।
2.संसार में कोैन ऐसा व्यक्ति है जिसके कुल में दोष नहीं है। अगर गौर से देखों तो सभी कुलों में कहीं न कहीं कोई दोष दिखाई देता है। उसी प्रकार इस भूतल पर ऐसा कौनसा प्राणी है जो कभी रोग से पीडि़त नहीं होता या उस पर विपत्ति नहीं आती। इस प्रथ्वी पर ऐसा प्राणीनहीं मिल सकता जिसने हमेशा सुख ही देखा हो
3.किसी भी व्यक्ति के कुल का अनुमान उसके व्यवहार से लग जाता है। उसकी भाषा से उसके प्रदेश का का ज्ञान होता है। उसके शरीर को देखकर उसके खानपान का अनुमान किया जा सकता है। इस तरह किसी भी व्यक्ति से बातचीत में उसके बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है।
4.वह भोजन पवित्र कहलाता है जो विद्वानों के भोजन करने पर शेष रह जाता है। दूसरे का हित करने वाली वृत्ति ही सच्ची सहृदयता है। श्रेष्ठ और बुद्धिमान पुरुष वही होता है जो पापकर्मों में प्रवृत्त नहीं होता। कल्याण क लिये वह धर्म और कर्म श्रेष्ठ है जो अहंकार के बिना किया जाये। छलकपट से दूर रहकर शुद्ध आचरण ही करना धर्म है।

Tuesday, June 24, 2008

चाणक्य नीतिःस्त्री में होता है पुरुष से छह गुना अधिक साहस

1.कोयल की मधुर वाणी उसका रूप है। वह भी कौए की तरह काली और कुरूप होती है पर उसका कर्णप्रिय स्वर मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करता है लोग उसके कुरूप होने का दुर्गुण भूल जाते हैं। वह उसके काले और भद्दे होने की उपेक्षा कर उससे प्रेम करने लगते हैं।
2.नारी में पुरुष से दोगुना भोजन करने की क्षमता होती है जबकि लज्जा चार गुना अधिक होती है। साहस छह गुना अधिक होता है।
3.नदी के तेज बहाव के कारण उसके किनारे खडे पेड़ पौधे जिस तरह नष्ट हो जाते हैं उसी तरह दूसरे के घर में रहने वाली स्त्री भी लांछित हो जाती है क्योंकि उसके लिये अपनी रक्षा करना अत्यंत कठिन होता है।
4.किसी भी पुरुष का घर स्त्री के कारण ही बसता है इसलिये नारी में कुल गुण और सहृदयता का होना आवश्यक है। जहां उसका पति के प्रति अनुराग नहीं होगा वहां जीवन की गाड़ी नहीं चल पायेगी। इसलिये स्त्री मन और वचन से सत्य बोलने, सदुव्यवहार करने और श्रेष्ठ गुणों वाली होना आवश्यक है।
5.धरती से निकलने वाला जल, पवित्र व शुद्ध होता है उसी तरह पतिव्रता नारी सदैव शुद्ध और पवित्र होती है। प्रजा के हित के संलिप्त रहने वाला राज तथा संतोष करने वाला विद्वान हमेशा पवित्र होता है।

Wednesday, February 27, 2008

चाणक्य नीति:सात को जगाएं और सात को नहीं

१.विद्यार्थी, नौकर, राहगीर, भूखा, भय से ग्रस्त, भंडारी तथा द्वारपाल सो रहे है तो उन्हें जगाना चाहिऐ, क्योंकि इनका कर्तव्य जागने पर ही पूरा होता है।
२.राजा, बालक, दूसरे का कुता, मूर्ख व्यक्ति, सांप, व्याघ्र और सूअर इन सात सोते हुओंको कभी भी नहीं जगाना चाहिए। इनके जागने से मनुष्य को हानि ही होगी। इनके आक्रमण से रक्षा करना कठिन होता है । अत: अच्छा यही है की यह सो रहे हों तो इन्हें जगाना नहीं चाहिए।
३.अपने आचरण के बिना ज्ञान व्यर्थ है और अज्ञानी मनुष्य को तो जीवन ही व्यर्थ है। सेनापति के बिना सेना व्यर्थ है और पति के बिना पत्नी का जीवन व्यर्थ है।
४.सदगुणरहित व्यक्ति की सुन्दरता व्यर्थ है। दुराचारी पुरुष का अच्छे वंश में उत्पन्न होना, आजीविका सुलभ न करने वाली विद्या और उपभोग में न आने वाला धन व्यर्थ है। इनकी कोई उपयोगिता होने के कारण महत्त्व नहीं रहता।