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Tuesday, May 3, 2011

समय के अनुसार पराक्रमी और नम्र बने-हिन्दू धार्मिक चिंत्तन (samay ke anusar prakrami aur namra bane-hindu dharmik chittan)

                 हमें अपने जीवन में अनेक उतार चढ़ाव का सामना करना पड़ता है। कई बार इष्ट लोग साथ होते हैं तो दुष्ट लोग भी सामने आते हैं। ऐसे में हमेशा एकरसता में बहकर नहीं जिया जा सकता। हमें शांति पूर्ण जीवन व्यतीत करना चाहिए पर उसमें खलल डालने वाले के साथ अगर द्वैरथ यानि दो दो हाथ भी करना पड़े तो चूकना नहीं चाहिए। आत्मरक्षा करना हमारा अधिकार और धर्म है। जिस तरह दुनियां में ऐसे दानवीरों की कमी नहीं है जो दूसरे को दान देकर कृतार्थ करते हैं तो ऐसे दुष्ट भी कम नहीं हैं जो दूसरे का हक मारने के लिये तत्पर रहते हैं। उनसे जूझना अच्छा नहीं लगता पर उनको छोड़ने का मतलब भी अपनी शांति भंग करना है। अतः अपने अधिकार के लिये पराक्रम प्रकट करना पड़ता है।
                 इस विषय पर कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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बलीयसि प्रणमतां काले विक्रमतामपि।
सम्पदो नापसर्पनित प्रतीपमिप निम्नगाः।
                      ‘‘जो लोग समय आने पर अपना कौशल तथा पराक्रम करने के साथ ही समय पर विनम्रता का भाव दिखाते हैं उनकी सपंत्ति उनका कभी साथ नहीं छोड़ती है।’’
जमदग्नेः सूतस्येव सर्वः सर्वत्र संवदा।
अनेकवृद्धजयिन प्रतापादेव भुज्यते।।
               ‘‘जमदग्नि के पुत्र परशुराम के समान सर्वत्र युद्ध जीतने वाले ही अपने प्रताप से राज करते हैं।’’
                   यह सही है कि इस संसार में अधिकतर लोग अहिंसक प्रवृत्ति के होते हैं। किसी से वाद विवाद हो तो विनम्रता से निपटना चाहिए। विनम्रता हिंसक से हिंसक मनुष्य को अहिंसक बना देती है। उसका दामन कभी नहीं छोड़ना चाहिए। हालांकि इस संसार में ऐसे लोग भी बहुत हैं जो अकारण दूसरे को कष्ट देते हैं, उनके अधिकारों का अपहरण करते हैं और दूसरे को धोखा देने में उनको मजा देता है। उनके अपराध के अनुसार उनका दण्डित करने के लिये पराक्रम प्रकट करना भी आवश्यक है। जो समय के अनुसार चलते हैं उनकी संपत्ति, वैभव तथा प्रतिष्ठा में उत्तरोत्तर वृद्धि होती है और उनका पतन नहीं होता।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Saturday, March 27, 2010

मनुस्मृति-सामान्य मनुष्य के लिये मदिरा का सेवन वर्जित (wine not for man-manu smriti)

सुरा वै मनमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते।
तस्माद् ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
सभी अन्नों के मल को सुरा कहा गया है मल का ही दूसरा नाम पाप है। अतः विद्वान, शक्तिशाली तथा व्यवसायियों को कभी सुरापान नहीं करना चाहिये।
यक्षरक्षः पिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम्।
तद् ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हवि।।
हिन्दी में भावार्थ-
मदिरा, मांस सुरा, आसव यक्षांे, राक्षसों व पिशाचों द्वारा सेवन किये जाने वाले पदार्थ हैं। अतः देवताओं की पूजा करने वाले इनका सेवन न करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहने को तो हमारे देश में धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है पर दूसरा तथ्य यह भी है कि शराब, मांस और जुआ जैसी प्रवृत्तियों के पोषक भी उतनी ही संख्या में बढ़ रहे हैं। बात तो लोग संस्कारों और संस्कृति की करते हैं पर आधुनिकता के नाम राक्षसी और पैशाचिक प्रवृत्तियों के संवाहक बनते जा रहे हैं। मुंह में देवताओं का नाम और व्यवहार में पिशाचों का काम करते हुए लोग जरा भी संकोच नहीं करते।
आपने देखा होगा कि हमारे टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकायें अपने देश भारत की वैदिक विवाह परंपरा की प्रशंसा करते हुए नहीं अघाते। कहीं कोई विदेशी इस परंपरा का निर्वाह करता है तो समाचार प्रकाशित होते हैं। सच तो यह है कि हमारी कथित संस्कृति और संस्कार कुछ कर्मकांडों तक ही सिमट गये हैं। अपनी संस्कृति और संस्कारों की प्रशंसा करने वाले यह कहते हुए नहीं अघाते कि हमारे देश में ‘तैंतीस करोड़ देवता रहते हैं’। मगर इन्हीं कर्मकांडों के निर्वाह के समय शराब और मांस का सेवन आधुनिकता का प्रमाण बन गया है। विवाह हों या कोई अन्य सामूहिक कार्यक्रम उसमें शराब का सेवन करने को समाज ने मान्यता दी है यह जाने बिना कि इसका सेवन यक्ष, राक्षस तथा पिशाच करते हैं। मांस खाने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। हम यहां मांस या शराब का सेवन करने वालों पर कोई आक्षेप नहंी करना चाहते बल्कि समाज की सोच पर ही प्रश्न उठा रहे हैं।
विवाह एक धार्मिक संस्कार है जिसका पालन करते हुए लोग फूले नहीं समाते। अभी हाल ही में बिना विवाह ही युवक युवतियों के साथ रहने को कानूनी मान्यता मिलने पर अनेक संस्कार और संस्कृति के ठेकेदारों ने बहुत शोर मचाया था पर इसी पवित्र विवाह संस्कार के समय शराब के सेवन पर सभी चुप क्यों हो जाते है? इसके विरुद्ध कोई प्रचार क्यों नहीं करते? यह सोच का विषय है। इतना ही नहीं हमारे देश में कुछ जगह तो मंदिरों में शराब भी प्रसाद के रूप मेंचढ़ाने की परंपरा प्रचलन में आई है। ताज्जुब इस बात का है कि इस पर किसी भी धार्मिक प्रवृत्ति को आपत्ति करते हुए नहीं देखा। देश में शराब को जिस तरह एक सामान्य आदत के रूप में मान्यता मिली है वह चिंता की बात है और समाज को इस बात पर विचार करना चाहिये कि यह सामान्य मनुष्य द्वारा उपभोग में लाया जाने वाला पदार्थ नहीं है।


संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Friday, December 25, 2009

श्री गुरु ग्रंथ साहिब-जहां गरीब की सेवा हो, वही भगवान की कृपा बरसती (garib aur bhagvan-shri guru granth sahib)

‘जाति जनमु नह पूछीअै, सच घर लेहु बताई।

सा जाति सा पति है, जेहे करम होई।।’

हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब के अनुसार किसी की जाति या जन्म के बारे में न पूछें। सभी एक ही सर्वशक्तिमान के घर से जुड़े हुए हैं।  आदमी की जाति और समाज (पति) वही है जैसे  उसका कर्म है।

‘नीचा अंदरि नीच जाति, नीची हू अति नीचु।

नानक तिल कै संगि साथि, वडिआ सिउ किआ रीस।

जिथै नीच समालिअन, तिथे नदर तेरी बख्सीस।

हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुनानकदेव कहते हैं जे नीच से भी नीच जाति का है हम उसके साथ हैं। बड़ी जाति वालों से होड़ करना व्यर्थ है बल्कि जहां गरीब, पीड़ित और निचले वर्ग के व्यक्ति की सहायता की जाती है वहीं सर्वशक्तिमान की कृपा बरसती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जन्म के आधार पर किसी व्यक्ति को निम्न जाति का मानकर उसकी अवहेलना करना बहुत बड़ा अपराध है। आज के समय में तो यह हास्यास्पद लगता है।  दरअसल पहले व्यवसायों के आधार पर जातियों का वर्गीकरण एक तरह से तर्कपूर्ण भी लगता था पर आजकल तो लोगों ने अपने परंपरागत पारिवारिक व्यवसाय ही त्याग दिये हैं पर फिर भी वह पुरानी जातिप्रथाओं के आधार पर अपने को श्रेष्ठ और दूसरे को नीच बताते हैं।  न केवल लोगों ने अपने व्यवसाय बदले हैं बल्कि उनका आचरण भी बदल गया है। भ्रष्टाचार और अहंकार में डूबे लोग अर्थ के आधार पर सभी का आंकलन करते हैं मगर जब किसी की निंदा करनी हो तो उसकी जाति की निंदा करते हैं।

फिर आजकल पाश्चात्य जीवन शैली अपनाने की वजह से पुराने सामाजिक आधार ध्वस्त हो गये हैं।  आप किसी भी शहर में नये बने बाजार या कालोनियों में चले जायें वहां के कारोबारी और रहवासी विभिन्न संप्रदायों के होते हैं।  उनके दुकान और मकान जितने बड़े और आकर्षक होते हैं उतना ही समाज उनका सम्मान करता है।  हर कोई अपनी आर्थिक श्रेणी के अनुसार एक दूसरे से संपर्क रखता है। इतना ही नहीं अगर जाति में अपनी श्रेणी के समकक्ष अपनी संतान का रिश्ता मिल गया तो ठीक नहीं तो दूसरी जाति में भी विवाह करने को लोग अब तैयार होने लगे हैं।  कहने का तात्पर्य यह है कि धनवानों को ही समाज बड़ा मानता है पर वह अपने समाज की चिंता नहीं करते।  सच बात तो यह है कि धर्म, जाति, और भाषाओं की सेवा जितने गरीब और निम्न वर्ग के लोग करते हैं उतना अमीर और बड़े वर्ग के नहीं करते।  भारतीय समाजों का मजबूत ढांचा अगर ध्यान से देखें तो हमें यह साफ लगेगा कि भारतीय संस्कृति, संस्कारों, भाषाओं तथा नैतिक मूल्यों की रक्षा निचले तबके के लोगों ने अधिक की है।  यही कारण कि देश के सभी महापुरुष गरीब की सेवा को सर्वाधिक महत्व देते हैं।  
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Wednesday, July 29, 2009

भर्तृहरि नीति शतक-प्रमाद से धन नष्ट होता है (adhyatmik sandesh in hindi)

भर्तृहरि महाराज कहते है कि
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दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनष्यति यतिः सङगात्सुतालालनात् विप्रोऽन्ध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्
ह्यीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्मैत्री चाप्रणयात्सृद्धिरनयात् त्यागपमादाद्धनम्


हिंदी में भावार्थ-कुमित्रता से राजा, विषयासक्ति और कामना योगी, अधिक स्नेह से पुत्र, स्वाध्याय के अभाव से विद्वान, दुष्टों की संगत से सदाचार, मद्यपान से लज्जा, रक्षा के अभाव से कृषि, परदेस में मित्रता, अनैतिक आचरण से ऐश्वर्य, कुपात्र को दान देने वह प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ संक्षिप्त व्याख्या-आशय यह है कि जीवन में मनुष्य जब कोई कर्म करता है तो उसका अच्छा और बुरा परिणाम यथानुसार प्राप्त होता है। कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो हमेशा बुरा काम करे या कोई हमेशा अच्छा काम करे। कर्म के अनुसार फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्म से अर्थ और सम्मान की प्राप्ति होती है। ऐसे में अपनी उपलब्ध्यिों से जब आदमी में अहंकार या लापरवाही का भाव पैदा होता है तब अपनी छबि गंवाने लगता है। अतः सदैव अपने कर्म संलिप्त रहते हुए अहंकार रहित जीवन बिताना चाहिये।
अगर हमें अपने कुल, कर्म या कांति से धन और प्रतिष्ठा प्राप्त होती है तो उसका उपयोग परमार्थ में करना चाहिये न कि अनैतिक आचरण कर उसकी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए लोगों का प्रभावित करने का प्रयास करें। इससे वह जल्दी नष्ट हो जाता है।
यह मानकर चलना चहिये कि हमें मान, सम्मान तथा लोगों का विश्वास प्राप्त हो रहा है वह अच्छे कर्मों की देन है और उनमें निरंतरता बनी रहे उसके लिये कार्य करना चाहिये। अगर अपनी उपलब्धियों से बौखला कर जीवन पथ से हट गये तो फिर वह मान सम्मान और लोगों का विश्वास दूर होने लगता है।
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Monday, September 29, 2008

भृतहरि शतक: स्वाध्याय के अभाव में विद्वता नष्ट होने लगती है

दौर्मन्त्र्यान्नृपतिर्विनष्यति यतिः सङगात्सुतालालनात् विप्रोऽन्ध्ययनात्कुलं कुतनयाच्छीलं खलोपासनात्
ह्यीर्मद्यादनवेक्षणादपि कृषिः स्नेहः प्रवासाश्रयान्मैत्री चाप्रणयात्सृद्धिरनयात् त्यागपमादाद्धनम्


हिंदी में भावार्थ-कुमित्रता से राजा, विषयासक्ति और कामना योगी, अधिक स्नेह से पुत्र, स्वाध्याय के अभाव से विद्वान, दुष्टों की संगत से सदाचार, मद्यपान से लज्जा, रक्षा के अभाव से कृषि, परदेस में मित्रता, अनैतिक आचरण से ऐश्वर्य, कुपात्र को दान देने वह प्रमाद से धन नष्ट हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ संक्षिप्त व्याख्या-आशय यह है कि जीवन में मनुष्य जब कोई कर्म करता है तो उसका अच्छा और बुरा परिणाम यथानुसार प्राप्त होता है। कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो हमेशा बुरा काम करे या कोई हमेशा अच्छा काम करे। कर्म के अनुसार फल प्राप्त होता है। अच्छे कर्म से अर्थ और सम्मान की प्राप्ति होती है। ऐसे में अपनी उपलब्ध्यिों से जब आदमी में अहंकार या लापरवाही का भाव पैदा होता है तब अपनी छबि गंवाने लगता है। अतः सदैव अपने कर्म संलिप्त रहते हुए अहंकार रहित जीवन बिताना चाहिये।

यह मानकर चलना चहिये कि हमें मान, सम्मान तथा लोगों का विश्वास प्राप्त हो रहा है वह अच्छे कर्मों की देन है और उनमें निरंतरता बनी रहे उसके लिये कार्य करना चाहिये। अगर अपनी उपलब्धियों से बौखला कर जीवन पथ से हट गये तो फिर वह मान सम्मान और लोगों का विश्वास दूर होने लगता है।
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Wednesday, July 30, 2008

विदुर नीतिःदूसरों की मजाक उड़ाने वाला महादरिद्र

1.दूसरों के अभद्र शब्द सुनकर भी स्वयं उन्हें न कहे। क्षमा करने वाला अगर अपने क्रोध को रोककर भी बदतमीजी करने वाले का नष्ट कर और उसके पुण्य भी स्वयं प्राप्त कर लेता है।
2.दूसरों से न तो अपशब्द कहे न किसी का अपमान करें, मित्रों से विरोध तथा नीच पुरुषों की सेवा न करें।सदाचार से हीन एवं अभिमानी न हो। रूखी तथा रोष भरी वाणी का परित्याग करं।
3.इस जगत में रूखी या शुष्क वाणी, बोलने वाले मनुष्य के ही मर्मस्थान हड्डी तथा प्राणों को दग्ध करती रहती है। इस कारण धर्मप्रिय लोग जलाने वाली रूखी वाणी का उपयोग कतई न करें।
4.जिसकी वाणी रूखी और शुष्क है, स्वभाव कठोर होने के साथ ही वह जो दूसरों के मर्म कटु वचन बोलकर दूसरों के मन पर आघात और मजाक उड़ाकर पीड़ा पहुंचाता है वह मनुष्यों में महादरिद्र है और वह अपने साथ दरिद्रता और मृत्यु को बांधे घूम रहा है।
5.कोई मनुष्य आग और सूर्य के समान दग्ध करने वाले तीखे वाग्बाणों से बहुत चोट पहुंचाए तो विद्वान व्यक्ति को चोट खाकर अत्यंत वेदना सहते हुए भी यह समझना कि बोलने वाला अपने ही पुण्यों को नष्ट कर रहा है।
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Tuesday, July 29, 2008

संत कबीर वाणी:पत्थर के सालिग्राम का भरोसा नहीं

कबीर पाहन पूजि के, होन चहै भौ पार
भींजि पानि भेदे नदी, बूड़ै, जिन सिर भार

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य पत्थरों की पूजाकर इस संसार के भवसागर को पार करना चाहते हैं वह अपने अज्ञान का एक बहुत भारी बोझ अपने सिर पर बोझा उठाये होते हैं और इसलिये डूब जायेंगे।

कबीर जेसा आतमा, तेता सालिगराम
बोलनहारा पूजिये, नहिं पाहन सो काम

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस विश्व में सभी प्रकार के देहधारियों में बसने वाला जीवात्मा सालिग्राम (परमात्मा) का ही रूप है। जो बोलते और चलते हैं उनको तो पूजा जा सकता है पर पत्थर पूजने से कोई लाभ नहीं है।
कबीर सालिगराम का, मोहि भरोसा नांहि
काल कहर की चोट में, बिनसि जाय छिन मांहि

संत कबीरदास जी कहते हैं कि पत्थर के सालिग्राम का भरोसा नहीं किया जा सकता है क्योंकि क्रुर काल की चोट वह सहन नहीं कर पाता और उसे कोई दूसरा छीन भी सकता है।

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Saturday, July 26, 2008

संत कबीर वाणीःअलख ने ही रचा है यह सब संसार

काम कनागत कारटा, आनदेव का खाय
कहैं कबीर समुझै नहीं, बांधा जमपुर जाय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो श्राद्ध का काम कराते हैं और अन्य देवों को चढ़ायी हुई सामग्री खाते हैं वह अज्ञानी नहीं जानते कि अपने साथ पाप बांधकर यमपुर जाना है।

देवि देव मानै सबै, अलख न मानै कोय
जा अलेख का सब किया, तासों बेमुख होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी मनुष्य अपने सामने देवी देवताओं को तो मानते हैं परंतु जो निराकार परमात्मा उसे कोई नहीं मानता जिसने इस सारे संसार की रचना की है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी भारतीय समाज में व्याप्त अंधविश्वास के अत्यंत विरोधी थे। जीवन और मृत्यु को लेकर जितना ढोंग हमारे समाज में हैं वह कहीं अन्यत्र दृष्टिगोचर नहीं होता है। इनमें एक हैं श्राद्ध कर्म करवाना और उसका भोजन करना। देखा जाये तो यह देह पांच तत्वों से बनी है जिसका संचालन इसे धारण करने वाला जीवात्मा करता है और उसके निकल जाने के बाद यह देह तो मिट्टी है पर इसी को लेकर लोग अपने प्रियजनों की मृत्यु पर जो दिखावे का शोक व्यक्त करते हुए जो भोजन आदि कराते हैं उसका कोई औचित्य नहीं है। इससे जीवित लोग केवल अपनी आर्थिक शक्ति का प्रदर्शन करते हैं ताकि जो विपन्न लोग ऐसा करने मेंे असमर्थ हैं वह उनसे प्रभावित रहें।

सच तो यह है कि इस दृश्व्य जगत को देखकर लोग पत्थर की मूर्तियों को पूजते हैं पर इसका निर्माण करने वाले निरंकार अलख ईश्वर की उपासना कोई नहीं करता। सभी मनुष्य केवल जीवन भर अपनी आंखों से देखी माया के इर्दगिर्द ही घूमते हैं। जो निराकार परब्रह्म हैं उसमें ध्यान लगाकर उसकी भक्ति करने के लिये कोई तैयार नहीं होता जबकि भक्ति और ज्ञान की प्राप्ति उसी निष्काम भक्ति से प्राप्त होता है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, July 25, 2008

संत कबीर वाणीःअपना इष्टदेव बदलकर भक्ति करने वाला तर नहीं सकता

कामी तरि, क्रोधी तरै, लोभी तरै अनन्त
आन उपासी कृतधनी, तरै न गुरु कहन्त

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कामी और क्रोधी तर सकते हैं और लोभी भी इस भव सागर से तरकर परमात्मा को पा सकते हैं पर जो अपने इष्ट देव की उपासना त्यागता है और गुरु का संदेश नहीं मानता वह कभी तर नहीं सकता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर कबीरदास जी के इस दोहे का आशय समझें तो उनके अनुसार वह उस हर व्यक्ति को अपने इष्ट देव की उपासना न छोड़ने का संदेश दे रहे हैं। एक तरह से धर्म परिवर्तन को एक भ्रम बता रहे हैं। उस समय धर्म शब्द उस रूप में प्रचलित नहीं था जिस तरह आज है बल्कि लोगों को अपने अपने इष्ट देवों को उपासक के रूप में पहचान थी यही कारण है कि कबीरदास जी के साहित्य में धर्मों के नाम नहीं मिलते बल्कि सभी लोगों को एक समाज मानकर उन्होंने अपनी बात कही है।
दरअसल धर्म का आशय यह है कि निंरकार परमात्मा की उपासना, परोपकार, दान और सभी के साथ सद्व्यवहार करना। वर्तमान समय में इष्ट देवों की उपासना के नाम पर धर्म बनाकर भ्रम फैला दिया गया है और विश्व के अनेक भागों में कई लोगोंं को धन तथा रोजगार का लालच या जीवन का भय दिखाकर धर्म परिवर्तन करवाने की प्रवृत्ति बढ़ी है। ऐसे कई समाचार आते हैं कि अमुक जगह धर्म अमुक ने धर्म परिवर्तन कर लिया। ऐसा समाचार केवल भारत में नहीं अन्य देशों से भी आते है। यह केवल कुछ लोगों का भ्रम है या वह भ्रम फैलाने और प्रचार पाने के लिये ऐसा करते हैं।

देख जाये तो परमात्मा एक ही है सब मानते हैं। लोग उसे विभिन्न रूपों और नामों से जानते हैं। ऐसे में उसके किसी स्वरूप का बदलकर दूसरे स्वरूप में पूजने का आशय यही है कि आदमी भ्रमित हैं। हमारे देश में तो चाहे आदमी कैसा भी हो किसी न किसी रूप में उसकी उपासना करता है। कोई न कोई पवित्र ग्रंथ ऐसा है जिसे पढ़ता न हो पर मानता है। ऐसे में वह एक स्वरूप को छोड़कर दूसरे की उपासना और एक पवित्र ग्रंथ को छोड़कर दूसरा पढ़ने लगता है तो इसका आशय यह है कि उसकी नीयत ठीक नहीं और जो इसके लिये प्रेरित कर रहे हैं उन पर भी संदेह होता है। संत कबीरदास जी के कथानुसार ऐसे लोग कभी जीवन में तर नहीं सकते भले ही दुष्ट और कामी लोग तर जायें। संत कबीरदास जी तो निरंकार के उपासक थे और वर्तमान में तो पूरा विश्व एक ही परमात्मा को मानता है और ऐसे में उसके स्वरूप को बदलकर दूसरे के रूप में पूजना वह स्वार्थ और लोभ का परिणाम मानकर सभी को उसके लिये रोकने का संदेश कबीरदास जी देते थे।
आशय यह यही है कि बचपन से जिस इष्ट का माना उसे छोड़कर दूसरे की उपासना नहीं करना चाहिए। न ही अपने गुरु, माता पिता और बंधुओं द्वारा सुझाये गये इष्ट के अलावा किसी और का विचार नहीं करना चाहिए। अगर कोई ऐसा करता है तो वह स्वार्थ से प्रेरित है और स्वार्थ से की गयी भक्ति से कोई लाभ नहीं होता। सबसे बड़ी आवश्यकता इस बात की चाहे जो भी इष्ट हो उसकी निष्काम भक्ति करना चाहिए।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Thursday, July 24, 2008

रहीम के दोहे-परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत

रहिमन बात अगम्य की, कहन सुनन की नाहिं
जो जानत सो कहत नहिं, कहत त जानत नाहिं

कविवर रहीम कहते हैं कि परमात्मा का वर्णन करना कठिन है। उसका स्वरूप अगम्य है और कहना सुनना कठिन है जो जानते हैं वह कहते नहीं हैं जो कहते हैं वह जानते नहीं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सच तो यह है कि परमात्मा के स्वरूप कोई समझ नहीं सकता । उसकी व्याख्या हर कोई अपने अनुसार हर कोई करता है पर वास्तविकता का वर्णन करना कठिन है। अनेक लोग अपने अनुसार भगवान के स्वरूप की व्याख्या करते है। पर सच तो यह है कि उनके स्वरूप का वर्णन कहना और सुनना कठिन है। उनको तो केवल भक्ति से ही धारण किया जा सकता है। परमात्मा का चरित्र वर्णनातीत है और सच्चे भक्त इस बात को जानते हैं पर कहते नहीं है और जो कहते हैं वह जानते नहीं है। अनेक लोग परमात्मा के अनेक स्वरूपों में से हरेक के जीवन चरित्र पर व्याख्या करते हुए अपना ज्ञान बघारते हैं पर सच तो यह है कि यह उनका व्यवसाय है और वह उसके बारे में कुछ नहीं जानते हैं। उनके वास्तविक स्वरूप को सच्चे भक्त ही जानते हैं पर वह उसका बखान कर अपने अहंकार का प्रदर्शन नहीं करते। अनेक लोग तमाम तरह की खोज का दावा करते हैं तो कुछ लोग कहीं एकांत में तपस्या कर सिद्धि प्राप्त कर फिर समाज में अपना अध्यात्मिक सम्राज्य कायम करने के लिये जुट जाते हैं। ऐसे ढोंगी लोग परमात्मा के स्वरूप का उतना ही बखान करते है जितने से उनका हित और आय का साधन बनता हो।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, July 22, 2008

रहीम के दोहेःमन पर नियंत्रण हो तो चिंता की बात नहीं

जो रहीम होती कहूं, प्रभू गति अपने हाथ
तो काधों केहि मानतो, आप बढ़ाई साथ

कविवर रहीम कहते हैं कि यदि परमात्मा ने मनुष्य को अपना भाग्य स्वयं लिखन की शक्ति दी होती तो जाने क्या होता? सभी अपनी महिमा बढ़ाने करने का प्रयास करते और कोई किसी को नहीं मानता।

जो रहीम मन हाथ है, तो तन कहुं किन जाहिं
ज्यों जल में छाया परे, काया भीजत नाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि यदि मन अपने वश में है तो चाहे जहां जायें उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। चाहे कोई कितना भी प्रेरित करे अगर मन पर नियंत्रण है तो कोई बुरे मार्ग पर चलने के लिये प्रेरित नहीं कर सकता।

संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान उसके मन से ही है। वह उसका संचालन करता है और मनुष्य को स्वयं ही चलने का भ्रम होता है। परमात्मा ने मन की गति को बहुत तीव्र बनाया है पर मनुष्य की देह की शक्ति को सीमित रखा है अगर वह ऐसा नहीं करता तो इस पूरी दुनियां में सिवाय खून खराबे के कुछ नहीं होता। मनुष्य को अपनी नियति तय करने की शक्ति नहीं है तब यह हाल है कि अहंकार को त्यागने को तैयार नहीं होता अगर होती तो वह सिवाय अपने किसी को सहन नहीं करता।

जो मनुष्य अपने मन पर नियंत्रण करते हैं वह आत्मसंयम के साथ जीवन सुख पूर्वक व्यतीत करते हैं पर जो अनियंत्रित गति के साथ दौड़ रहे मन के साथ चलने का प्रयास करते हैं उनको भारी कष्ट उठाने पड़ते हैंं। दुर्घटनाओं का भय तो लगा ही रहता है। मन के मार्ग में भला कोई आता है पर देह का मार्ग में तो अन्य देह और वाहन आ जाते हैं और उनसे टक्कर होने की आशंक रहती है।
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक

Monday, July 21, 2008

चाणक्य नीतिःकाम शुरू कर घबड़ाना नहीं चाहिए

1.कोई भी काम प्रारंभ करने के बाद घबड़ाना नहीं चाहिए और उसे मध्य में नहीं छोड़ना चाहिए। कर्म करने ही इस दैहिक जीवन के सबसे अधिक पूजा है। जो प्राणी काम करते हैं वही सदा सुखी रहते हैं।
2. धन की हानि, मन की अशांति और संदेह के बारे में अन्य लोगों को नहीं बताना चाहिये क्योंकि इससे मजाक बनता है।


वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-विश्व में अशांति का मुख्य कारण यही है कि लोग शारीरिक श्रम को हेय समझने लगे हैं। अपने शरीर का अधिक से अधिक आराम देने के लिये लोगों मशीनों पर निर्भर होते जा रहे हैं। इससे व्यक्ति, परिवार और समाज में जो वैमनस्य और तनाव फैल रहा है उसका अनुमान किसी को नहीं है। एक तरफ श्रम न करने से शरीर से विकार निकालने वाला पसीना बाहर नहीं आता उससे शरीर को रोग घेर लेते हैं दूसरे शारीरिक श्रम करने वाले लोगों को यह लगता है कि उनका समाज में कोई सम्मान नहीं है इसलिये वह आत्मग्लानि की अग्नि मेंं जलते हैं और अपने से धनी आदमी की सहायता के लिये आगे नहीं आते हैं। देखा जाये तो राष्ट्र और समाज की रक्षा के लिये जो श्रमिक और गरीब व्यक्ति अपनी शारीरिक शक्ति से रक्षा करने में समर्थ है वह क्षुब्ध है यही कारण है कि हम अपने आसपास ऐसे खतरों को देख रहे हैं जिनका सामना केवल शक्ति के सहारे ही किया जा सकता है। इसलिये न केवल स्वयं ही शरीर से श्रम करना चाहिए बल्कि जो शारीरिक श्रम कर रहे हैं उनका भी सम्मान करना चाहिए।

अक्सर लोग यह सोचते हैं कि अपने मन का बोझ किसी से कहने पर मन हल्का हो जाता है पर होता इसका उल्टा ही है। सभी लोग कष्ट झेलते हैं पर कुछ लोग कहने की बजाय दूसरों के कष्ट का मजाक उड़ाकर ही दिल को तसल्ली देते हैं। ऐसे में अगर कोई सज्जन पुरुष यह सोचता है िक अपना कष्ट दूसरे को बताने से संतोष मिल जायेगा तो उसे यह भ्रम दूर कर लेना चहिए।

Thursday, July 17, 2008

रहीम के दोहे:स्वारथ के अनुसार लोग गुण-दोष ढूंढते हैं

स्वारथ रचत रहीम सब, औगनहूं जग मांहि
बड़े बड़े बैठे लखौ, पथ रथ कूबर छांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि लोग अपने स्वार्थ के लिये दूसरे में गुण दोष निकालते हैं। जो कभी अपनी हित साधने के लिये मार्ग में रुके रथ के हरसे की टेढ़ी-मेढ़ी छाया को अशुभ कहा करते थे वही लोग उसी हरसी की छाया में बैठ कर अपने को धूप से बचाते हैं।

सर सूखै पंछी उड़ै, औरे सरन समाहि
दीन मीन बिन पंख के, कहु रहीम कहं जाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि तालाब का पानी सूखते ही पक्षी उड़कर दूसरे तालाब में चले जाते हैं पर उसमें रहने वाली मछली का क्या? वह तो असमर्थ होकर वहीं पड़ी रहती है। परमात्मा का ही उसे आसरा होता है।

साधु सराहै साधुता, जती जोखिता जान
रहिमन सांचे सूर को, बैरी करे बखान


सज्जन लोग ही सज्जनता की सराहना करते हैं दुष्ट नहीं। जो योगी हैं वही ज्ञान और ध्यान की सराहना करते है जबकि सामान्य जन उससे परे रहते हैं। पर जो शूरवीर हैं उनकी वीरता की प्रशंसा सभी करते हैं।

Tuesday, July 15, 2008

रहीम के दोहेःसमय के अनुसार कर्म का फल प्रकट होता है

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जात
सदा रहै नहीं एक सौ, का रहीम पछितात?

कविवर रहीम कहते हैं कि समय चक्र तो घूमता रहता है और उसी के अनुसार मनुष्य को अपने कर्मो का फल मिलता है। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिये बुरा समय आने पर परेशान होने से कोई लाभ नहीं है।

उत्तम जाती ब्राह्मनी, देखत चित्त लुभाय
परम पाप पल में हरत, परसत वाके पास

कविवर रहीम कहते हैं कि मनुष्य की पहचान उसके उत्तम गुणों से होती है। ब्रह्मज्ञानी को देखते ही हृदय में प्रसन्नता के भावों का प्रवाह होता है। ऐसे विद्वान के सामने सिर झुकाने मात्र से ही सारे पाप धुल जाते है।

आदि रूप की परम दुति, घट घट रही समाई
लघु मति ते मो मन रसन, अस्तुति कही न जाई


कविवर रहीम कहते हैं कि आदि रूप परमात्मा का प्रकाश चारों तरफ फैला है। वह कणकण में समाया हुआ है। उसके प्रभाव करने में किसी का भी बौद्धिक ज्ञान कम पड़ जायेगा। उसकी महिमा गाने में तो शब्द भी कम पड़ जाते हैं।

Saturday, July 12, 2008

रहीम के दोहे:जैसी होती संगति वैसी हो जाती प्रवृति

अनकीन्ही बातें करै, सोवत जागै जोय
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय

कविवर रहीम कहते हैं कि कई लोग ऐसे हैं जो कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। ऐसे लोग जागते हुए भी सेाते हैं। ऐसे अहंकार व्यक्ति को सिखाना या जागृत करना बिल्कुल व्यर्थ है।

कदल सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन

कविवर रहीम कहते हैं कि कि स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूंदें कदली में प्रवेश कर कपूर बना जाता है, समुद्र की सीपी में जाकर मोती का रूप धारण कर लेता है और वही जल सर्प के मुख में जाकर विष बन जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे व्यक्तियों की अभाव नहीं है जो अपनी कथनी और करनी में भारी भेद प्रकट करते हुए थोड़ा भी संकोच अनुभव नहीं करते। एक तरफ वह आदर्श की बात करते हुए नहीं थकते पर दिन भर वह माया के फेरे में सारी नैतिकता को तिलांजलि देते हैंं। अगर ऐसा न होता तो इस देश में इतने सारे साधु और संत और उनके करोड़ों शिष्य हैं फिर भी पूरे देश मेंे अनैतिकता, भ्रष्टाचार, गरीबों और परिश्रमियों का दोहन तथा अन्य अपराधों की प्रवृतियों वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आजकल ईमादारी से संग्रह करना कठिन हो गया है। इसका आशय यह है कि जो कमा रहे हैं वही दान कर रहे हैं और अपने गुरुओं के आश्रमों में भी उपस्थिति दिखाते हैं। हर जगह धन सम्राज्य है पर माया से दूर रहने की बात सभी करते हैं। अपराधी हो या सामान्य आदमी भक्ति जरूर करते दिखते हैं। अपराधी अपने दुष्कर्म से बाज नहीं आता और सामान्य आदमी को अपने काम से ही समय नहीं मिलता। बातें सभी आदर्श की करते हैं। यही भेद है जिसके कारण देश में अव्यवस्था फैली है।

इसके अलावा सभी लोग भले आदमी से संगति तो करना ही नहीं चाहते। जो समाज को अपनी शक्ति से आतंकित कर सकता है लोग उससे अपने संपर्क बनाने को लालायित रहते हैं। वह सोचते हैं कि ऐसे असामाजिक तत्व समय पर उनके काम में आयेंगे पर धीरे-धीरे उनके संपर्क में रहते हुए उनका स्वयं का नैतिक आचरण पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। संगति का प्रभाव होता है-यह बात निश्चित है। अगर किसी शराबी के पास कोई व्यक्ति बैठ जाये तो उसकी बातें सुनकर उसका स्वयं का मन वितृष्णा से भर जाता है और वही व्यक्ति किसी सत्संगी के पास बैठे तो उसमें अच्छे और सुंदर भावों का प्रवाह अनभूति कर सकता है। अतः अपने लिये हमेशा अच्छी संगति ही ढूंढना चाहिए।

Wednesday, July 9, 2008

चाणक्य नीतिःहृदय में जगह नहीं तो पास वाला भी दूर लगता है

1.राजा, अग्नि, गुरु, स्त्री इनसे निकटता खतरनाक होती है। इनसे थोड़ा परे रहकर संपर्क रखना चाहिए। अग्नि, जल, सर्प, मूर्ख, और राजा कभी भी रुष्ट होने पर मनुष्य के प्राण तक ले सकते हैं।
2.सच्चा ज्ञानी तो वही है जो प्रसंग के अनुसार वार्तालाप में अपने तर्क उचित ढंग से प्रस्तुत करता है। वह अनुकूल होने पर प्रेम करता है और अपनी शक्ति के अनुसार क्रोध प्रदर्शन करने वाला भी होता है।
3.हृदय में रहने वाला दूर रहकर भी पास है और हृदय में न रहने वाला पास रहकर भी दूर रहता है। परे और निकट के संबंध का आधार हृदय के भाव से है।
4.जल में तेल पड़ते ही कम होने के बावजूद तेल का विस्तार हो जाता है। उसी तरह दुष्ट के साथ गोपनीय विषय पर की गयी वार्ता विद्युत गति से फैल जाती है। उसी तरह सुदान की चर्चा भी विस्तार पाती है। विस्तार की शक्ति अपने पात्र के कार्य करने पर निर्भर रहती है।
5.निर्धन को पत्नी, मित्र, सेवक, भाई और परिजन सब छोड़ देते हैं।

Tuesday, June 24, 2008

चाणक्य नीतिःस्त्री में होता है पुरुष से छह गुना अधिक साहस

1.कोयल की मधुर वाणी उसका रूप है। वह भी कौए की तरह काली और कुरूप होती है पर उसका कर्णप्रिय स्वर मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करता है लोग उसके कुरूप होने का दुर्गुण भूल जाते हैं। वह उसके काले और भद्दे होने की उपेक्षा कर उससे प्रेम करने लगते हैं।
2.नारी में पुरुष से दोगुना भोजन करने की क्षमता होती है जबकि लज्जा चार गुना अधिक होती है। साहस छह गुना अधिक होता है।
3.नदी के तेज बहाव के कारण उसके किनारे खडे पेड़ पौधे जिस तरह नष्ट हो जाते हैं उसी तरह दूसरे के घर में रहने वाली स्त्री भी लांछित हो जाती है क्योंकि उसके लिये अपनी रक्षा करना अत्यंत कठिन होता है।
4.किसी भी पुरुष का घर स्त्री के कारण ही बसता है इसलिये नारी में कुल गुण और सहृदयता का होना आवश्यक है। जहां उसका पति के प्रति अनुराग नहीं होगा वहां जीवन की गाड़ी नहीं चल पायेगी। इसलिये स्त्री मन और वचन से सत्य बोलने, सदुव्यवहार करने और श्रेष्ठ गुणों वाली होना आवश्यक है।
5.धरती से निकलने वाला जल, पवित्र व शुद्ध होता है उसी तरह पतिव्रता नारी सदैव शुद्ध और पवित्र होती है। प्रजा के हित के संलिप्त रहने वाला राज तथा संतोष करने वाला विद्वान हमेशा पवित्र होता है।

Monday, June 23, 2008

संत कबीर वाणी:नाक तक खाना भरे वह साधू नहीं

जीभ स्वाद के कूप में, जहां हलाहल काम
अंग अविद्या ऊपजै, जाय हिये ते नाम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक जीभी स्वाद के गहरे कुऐं में है तब तक आदमी में अज्ञान रहेगा और वह परमात्मा के नाम से दूर ही रहेगा क्योंकि उसमें विष अपना काम करता है।


अहार करै मन भावता, जिभ्या केरे स्वाद
नाक तलक पूरन भरै, क्यों कहिये वे साध


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि आदमी जीभ के स्वाद में पड़कर अपने मन को पसंद आने वाले आहार की खोज में लगा रहता है। वह नाक तक खाना भर लेता है फिर उसे साधु कैसे कहा जा सकता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर देखें तो अब सामान्य आदमी केवल खाने के लिये ही अपना जीवन गुजार रहा है। लोग अपने घर के बने भोजन से कहीं अधिक बाहर के भोजन को पसंद करने लगे हैं। चटपटे मसालेदार व्यंजन जो खाने में स्वादिष्ट लगते हैं पर उनका प्रभाव स्वास्थ्य की दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता उनको उदरस्थ करने में जुटी भीड़ कहीं भी देखी जा सकती हैं। कितनी विचित्र बात है कि आदमी अपने घर में अपने खाने की सामग्री ढंक कर रखता है और अगर कहीं वह खुली छूट जाये तो उसको बाहर फैंक देता है क्योंकि उसमें कीड़ों के होने की आशंका हो जाती है पर वही बाहर दुकानों और होटलों पर खुले में रखे व्यंजन खाने में बहुत रुचि लेता है जिसके बारे में उस स्वयं पता ही नहीं होता कि कब से वह खुले पड़ें हैं। अधिकतर स्वास्थ्य विशेषज्ञ लोगों को बाहर की चीजें खाने से रोकने की राय देते हैं पर लोग उनकी अनदेखी कर विषैले पदार्थ स्वाद के ग्रहण करते है और फिर बीमार पड़ते हैं। आजकल जिस तरह बीमार लोगों की संख्या बढ़ रही है उसको देखकर यह चिंता का विषय है। अगर देह में विकार हों तो आदमी के मन में भक्ति और सत्संग की भावना पैदा नहीं होती यह समझ लेना चाहिए।

Saturday, June 21, 2008

भृतहरि शतकःकाल्पनिक स्वर्ग का विचार करना व्यर्थ

स्वपरप्रतारकोऽसौ निन्दति योऽलीकपण्डितो युवतीः
यस्मात्तपसोऽपि फलं स्वर्गस्तयापि फलं तथाप्सरसः


हिंदी में भावार्थ- जो शास्त्र ज्ञान में अधकचरे पण्डित स्त्रियों की निंदा करते हैं वे अपने और पराए सभी को धोखा देते हैं, क्यों तपस्या से जिस स्वर्ग की प्राप्ति होती है, उस स्वर्ग का फल भी अप्सराओं के साथ भोग विलास ही है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अनेक कथित ज्ञानी लोग स्त्री को नरक का द्वार कहते हुए उससे दूर रहने का उपदेश देते हैं। ऐसे लोग केवल पाखंड के अलावा कुछ नहीं करते। वास्तविकता यह है कि वह अपने कथित ज्ञान से वह जिस तपस्या आदि करने का प्रचार करते हैं वह केवल कल्पित स्वर्ग की प्राप्ति करवाने वाला होता है। उसमें भी अप्सराओं से मिलन का सुख बखान किया जाता है। भर्तुहरि कहते हैं कि जब अप्सराओं जैसी सुंदर स्त्रियां इस धरती पर ही मिल जातीं हैं तो उनकी अवहेलना क्यों की जाये। एक तरफ स्वर्ग में अप्सराओं से मिलने के मोह में तप आदि का उपदेश करना और इस धरती की नारी से दूर रहने की बात करना पाखंड के सिवाय कुछ नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में इस बात का उल्लेख करना दिलचस्प रहेगा कि फिल्मों और टीवी चैनलों से जुड़ी अभिनेत्रियों को कहीं सैक्सी और सर्वाधिक सुंदर कहकर इसी संसार में काल्पनिक स्वर्ग की अनुभूति करवाकर यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि अन्य कहीं भी स्त्री सुंदर नहीं है। यह भी एक एसा भ्रम है जिसमें युवक अपने हृदय में उनके चेहरे स्थापित कर लेते हैं। सामान्य लड़कियों में भी पर्दे की कथित सुंदरियों जैसा आकर्षण ढूंढने लगते है। अपनी जेब में उनके फोटो रखने लगते हैं। वह जिस सौंदर्य को वास्तविक समझते हैं केवल उन कथित पर्दे वाली सुंदरियों द्वारा उपयोग में लायी गयी सौदर्य प्रसाधन सामग्री और कैमरे का कमाल होता है। अतः कथित अप्सराओं के सौदर्य की कल्पना-चाहे वह धार्मिक संतों द्वारा प्रचारित हो या अन्य प्रचार माध्यमों द्वारा-में बहना नहीं चाहिए क्योंकि ऐसा करना व्यर्थ है।
दीपक भारतदीप

Friday, June 13, 2008

मनुस्मृतिःपानी का आचमन करने से आती है शुद्धता

सुप्त्वा क्षुत्वा च भुक्तवा च निष्ठीव्योक्त्वाऽनतानि च।
पीत्वाऽपोध्यध्यमाणश्च आचामेत्प्रयतोऽपि सन्।।


हिंदी में भावार्थ-सोने, छींकने, खाने, थूकने और झूठ बोलने के बाद अपनी शुद्धि पानी पीकर करनी चाहिए। इसके बाद भी अध्ययन करने से पहले एक बार जल का आचमन करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समय के साथ हमने कई पुराने संदेशों को भुला दिया है। पानी का सेवन करने से शरीर में कई प्रकार से शुद्धता आती है और तन की शुद्धता से ही मन में शुद्धता का भाव स्थापित हो पाता है। आजकल तो लोग अपने शरीर के साथ अधिक खिलवाड़ करते हैं। कंप्यूटर और टीवी में अपनी आंखों से निरंतर देखते रहते हैं इससे जो तन और मन में हानि होती है उसकी जानकारी उनको नहीं होती है। अनेक जानकार कहते हैं कि कंप्यूटर और टीवी पर एक संक्षिप्त अवधि से दृष्टिपात करने के बाद पानी पीना चाहिए और मूंह में कुल्ला भरकर आंखों में छींटे मारना चाहिए। हमारे देश में किसी भी वस्तु के उपभोग पर लोग उतारू तो हो जाते है पर उससे संबंधित सावधानियों पर ध्यान नहीं देते। कंप्यूटर पर काम करने के बाद अपनी आंखों पर पानी के छींटे मारने से जो राहत मिलती है उससे मस्तिष्क में आये तनाव से मुक्ति मिलती है। सबसे बड़ी बात यह है कि लोगों को यही पता नहीं होता कि तनाव क्या होता है? जब इस तरह पानी के छींटें मारें तब जो राहत मिलती है उस से ही पता लगता है कि कोई तनाव भी होता है।

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