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Sunday, July 4, 2010

हिन्दू धर्म संदेंश-शास्त्रों का सार ग्रहण करें (shastron ka sar grahan karen-hindu dharma sandesh)

हमारे अनेक धार्मिक ग्रन्थ हैं  और सभी का अपना अपना महत्व है परन्तु कुछ कथित ज्ञानी आत्मा प्रचार के लिए उनके विविध अर्थ निकाल कर समाज में भ्रम पैदा करते हैं जिसके कारन अनेक प्रकार के विवाद पैदा होते हैं। ऐसे में भर्तृहरि महाराज का यह सन्देश अत्यंत  महत्वपूर्ण है कि उनका सार ग्रहण करना चाहिए।
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अनन्तशास्त्रं बहुलाश्चय विद्याः अल्पश्च कालो बहुविघ्नता च।
यत्सारभूतं तदुपासनीयं हंसो यथा क्षरमिवाम्बुपमध्यात्
हिन्दी में भावार्थ-
शास्त्र और विद्या अनंत है। शास्त्रों में बहुत कुछ लिखा गया है। मनुष्य का जीवन संक्षिप्त है। उसके पास समय कम है जबकि जीवन में आने वाली बाधायें बहुत हैं। इसलिये उसे शास्त्रों का सार ग्रहण कर वैसे ही जीवन में आगे बढ़ना चाहिये जसे कि दूध में से हंस पानी को अलग ग्रहण करता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में जीवन दर्शन का रहस्य और ज्ञान का भंडार समेटे अनेक वेद, पुराण और उपनिषदों के साथ ही अनेक महापुरुषों की पुस्तकें हैं। हमारे देश पर प्रकृति की ऐसी कृपा रही है कि हर काल में एक अनेक महापुरुष एक साथ उपस्थित रहते हैं। कहने का अभिप्राय यह है कि हमारे अध्यात्मिक ग्रंथों में ज्ञान का अपार भंडार भरा पड़ा है पर उसमें कथा और उदाहरणों से विस्तार किया गया है। मूल ज्ञान अत्यंत संक्षिप्त है और उसके निष्कर्ष भी अधिक व्यापक नहीं है। अतः ऐसे बृहद ग्रंथों को पढ़ने में समय लगाना एक सामान्य व्यक्ति के लिये संभव नहीं पर अनेक विद्वानों ने इसमें डुबकी लगाकर इन व्यापक ग्रंथों का सार समय समय पर प्रस्तुत किया है। इतना ही नहीं कुछ विद्वानों ने तो लोगों के हृदय में महापुरुष की उपाधि प्राप्त कर ली।
वैसे वेद, पुराण, और उपनिषदों के साथ अन्य अनेक पावन ग्रंथों का ज्ञान और सार तत्व श्रीमद्भागवत गीता में मिल जाता है। अगर जीवन में शांति और सुख प्राप्त करना है तो उसमें वर्णित ज्ञान को ग्रहण करना ही श्रेयस्कर है। वैसे प्राचीन ग्रंथों की कथायें और उदाहरण सुनने में बहुत अच्छे लगते हैं और समय हो तो सत्संग में जाकर उनका भी श्रवण करना अच्छी बात है। जहां समय का अभाव हो वहां श्रीमद्भागवत गीता का अध्ययन अत्यंत फलदायी है। अगर श्रीगीता का अध्ययन और श्रवण करेंगे तो हंस के समान वैसे ही ज्ञान प्राप्त करेंगे जैसे वह दूध से पानी अलग कर ग्रहण करता है। एक बात निश्चित है कि उसका ज्ञान न तो गूढ़ है न कठिन जैसा कि कहा जाता है। उसे ग्रहण करने के लिये उसे पढ़ते हुए यह संकल्प धारण करना चाहिये कि उस ज्ञान को हम धारण कर जीवन में अपनायेंगे तभी उसे समझा जा सकता है।
संकलक,लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Sunday, May 30, 2010

श्री गुरवाणी-अहंकार और आडम्बर बढ़ाने वाला दहेज़ किस काम का (dahej ki kaam ka-shri gurvani)

गुरुवाणी में कहा गया है
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होर मनमुख दाज जि रखि दिखलाहि,सु कूड़ि अहंकार कच पाजो
      हिंदी में भावार्थ-श्री गुरू ग्रन्थ साहिब के अनुसार लड़की के विवाह में  ऐसा दहेज दिया जाना चाहिए जिससे मन का सुख मिले और जो सभी को दिखलाया जा सके। ऐसा दहेज देने से क्या लाभ जिससे अहंकार और आडम्बर ही दिखाई दे।
हरि प्रभ मेरे बाबुला, हरि देवहु दान में दाजो।

           
हिन्दी में भावार्थ-श्री गुरुग्रंथ साहिब में दहेज प्रथा का आलोचना करते हुए कहा गया है कि वह पुत्रियां प्रशंसनीय हैं जो दहेज में अपने पिता से हरि के नाम का दान मांगती हैं।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-दहेज हमारे समाज की सबसे बड़ी बुराई है। चाहे कोई भी समाज हो वह इस प्रथा से मुक्त नहीं है। अक्सर हम दावा करते हैं कि हमारे यहां सभी धर्मों का सम्मान होता है और हमारे देश के लोगों का यह गुण है कि वह विचारधारा को अपने यहां समाहित कर लेते हैं। इस बात पर केवल इसलिये ही यकीन किया जाता है क्योंकि यह लड़की वालों से दहेज वसूलने की प्रथा उन धर्म के लोगों में भी बनी रहती है जो विदेश में निर्मित हुए और दहेज लेने देने की बात उनकी रीति का हिस्सा नहीं है। कहने का आशय यह है कि दहेज लेने और देने को हम यह मानते हैं कि यह ऐसे संस्कार हैं जो हमारी पहचान हैं  मिटने नहीं चाहिए।  कोई भी धर्म या  समाज हो  कथित रूप से इसी पर इतराता है।
       इस प्रथा के दुष्परिणामों पर बहुत कम लोग विचार करते हैं। इतना ही नहीं आधुनिक अर्थशास्त्र की भी इस पर नज़र नहीं है क्योंकि यह दहेज प्रथा हमारे यहां भ्रष्टाचार और बेईमानी का कारण है और इस तथ्य पर कोई भी नहीं देख पाता। अधिकतर लोग अपनी बेटियों की शादी अच्छे घर में करने के लिये ढेर सारा दहेज देते हैं इसलिये उसके संग्रह की चिंता उनको नैतिकता और ईमानदारी के पथ से विचलित कर देती है। केवल दहेज देने की चिंता ही नहीं लेने की चिंता में भी आदमी अपने घर पर धन संग्रह करता है ताकि उसकी धन संपदा देखकर बेटे की शादी में अच्छा दहेज मिले। यह दहेज प्रथा हमारी अध्यात्मिक विरासत की सबसे बड़ी शत्रु हैं और इससे बचना चाहिये। यह अलग बात है कि अध्यात्मिक, धर्म और समाज सेवा के शिखर पुरुष ही अपने बेटे बेटियों की शादी कर समाज को चिढ़ाते हैं। सच बात तो यह है कि यह पर्थ हमारे समाज के अस्तित्व पर संकर खड़ा किये हुए है और अगर यह ख़त्म नहीं हुए तो एक दिन यह समाज भी कह्तं हो जाएगा।
---------संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Tuesday, May 4, 2010

रहीम संदेश-सूखे तालाब पर जाने से लाभ नहीं (sukhe talab se labh nahin-rahim sandesh

तेहि प्रमाण चलिबो भलो, जो सब दिन ठहराइ।
उमड़ि चलै जल पार तें, जो रहीम बढ़ि जाइ।।
कविवर रहीम का कहना है कि जिससे सब दिन आनंद प्राप्त हो वही सुख प्रमाणिक माना जाना चाहिये।  ऐसे सुख से क्या लाभ जो क्षणिक हो और वह ऐसे ही उतर जाये जैसे बाढ़ का पानी।
तासो ही कछु पाइए, कीजै जाकी आस।
रीते सरवर पर गए, कैसे बुझे पियास।
कविवर रहीम कहते हैं कि जिससे कुछ पाने की संभावना हो उससे ही कोई आशा करना चाहिये। खाली तालाब के पास जाकर कोई प्यास नहीं बुझती।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह जरूरी नहीं है कि जिसे धन, पद और अन्य भौतिक साधन हों वह समय पड़ने पर सहायता करने वाला हो। सबसे बड़ी बात यह है कि इंसान में दूसरे की मदद करने का भाव होना चाहिये। यही भाव मदद चाहने वाले के लिये रस बनकर प्रवाहित होता है।  जिस व्यक्ति के पास ढेर सारा धन हो पर अगर उसमें उदार भाव नहीं है तो उससे कोई आशा करना स्वयं को धोखा देना है।  कहने का अभिप्राय यही है कि अपने आसपास ऐसे लोगों का संग्रह करना चाहिये जिनके हृदय में शुद्धता और स्नेह का भाव हो वरना उनसे दूरी ही भली क्योंकि उनसे संकट में सहायता की आशा करना व्यर्थ है। आजकल विज्ञापन का युग है और हर तरफ सुख बिक रहा है। कहीं कोई व्यक्ति हृदय का नायक बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है तो कहीं जिंदगी भर का आराम दिलाने वाली वस्तुओं का प्रदर्शन हो रहा है।  यह केवल जेब से पैसा निकालने की नीति है जिस पर वणिक वर्ग चल रहा है।  याद रखिये हर मनुष्य में दोष होता है अतः कोई इतना पवित्र नहीं हो सकता कि उसे फरिश्ता मान लिया जाये। उसी तरह हम अपने सुख के लिये जो चीजें खरीदते हैं वह कभी न कभी खराब हो जाती हैं और तब हम जो काम हाथ से करते हैं वह नहीं हो पाता और हमारे लिये तनाव का कारण बनता है। उल्टे इन कथित सुख प्रदान करने वाले साधनों से हमारी देह काम करने की आदी नहीं रहती और इससे बीमारियां तो पैदा ही होती हैं मानसिक रूप से भी हम पंगु होते चले जाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि इस तरह के सुख क्षणिक हैं और फिर समय आने पर वह विदा हो जाते हैं। अतः जितना हो सके स्वावलंबी बने। जब मनुष्य स्वावलंबी होता है तभी अपने स्वाभिमान की रक्षा कर पाता है।


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Saturday, March 27, 2010

मनुस्मृति-सामान्य मनुष्य के लिये मदिरा का सेवन वर्जित (wine not for man-manu smriti)

सुरा वै मनमन्नानां पाप्मा च मलमुच्यते।
तस्माद् ब्राह्मणराजन्यौ वैश्यश्च न सुरां पिबेत्।
हिन्दी में भावार्थ-
सभी अन्नों के मल को सुरा कहा गया है मल का ही दूसरा नाम पाप है। अतः विद्वान, शक्तिशाली तथा व्यवसायियों को कभी सुरापान नहीं करना चाहिये।
यक्षरक्षः पिशाचान्नं मद्यं मांसं सुरासवम्।
तद् ब्राह्मणेन नात्तव्यं देवानामश्नता हवि।।
हिन्दी में भावार्थ-
मदिरा, मांस सुरा, आसव यक्षांे, राक्षसों व पिशाचों द्वारा सेवन किये जाने वाले पदार्थ हैं। अतः देवताओं की पूजा करने वाले इनका सेवन न करें।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कहने को तो हमारे देश में धार्मिक प्रवृत्ति वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है पर दूसरा तथ्य यह भी है कि शराब, मांस और जुआ जैसी प्रवृत्तियों के पोषक भी उतनी ही संख्या में बढ़ रहे हैं। बात तो लोग संस्कारों और संस्कृति की करते हैं पर आधुनिकता के नाम राक्षसी और पैशाचिक प्रवृत्तियों के संवाहक बनते जा रहे हैं। मुंह में देवताओं का नाम और व्यवहार में पिशाचों का काम करते हुए लोग जरा भी संकोच नहीं करते।
आपने देखा होगा कि हमारे टीवी चैनल और समाचार पत्र पत्रिकायें अपने देश भारत की वैदिक विवाह परंपरा की प्रशंसा करते हुए नहीं अघाते। कहीं कोई विदेशी इस परंपरा का निर्वाह करता है तो समाचार प्रकाशित होते हैं। सच तो यह है कि हमारी कथित संस्कृति और संस्कार कुछ कर्मकांडों तक ही सिमट गये हैं। अपनी संस्कृति और संस्कारों की प्रशंसा करने वाले यह कहते हुए नहीं अघाते कि हमारे देश में ‘तैंतीस करोड़ देवता रहते हैं’। मगर इन्हीं कर्मकांडों के निर्वाह के समय शराब और मांस का सेवन आधुनिकता का प्रमाण बन गया है। विवाह हों या कोई अन्य सामूहिक कार्यक्रम उसमें शराब का सेवन करने को समाज ने मान्यता दी है यह जाने बिना कि इसका सेवन यक्ष, राक्षस तथा पिशाच करते हैं। मांस खाने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही है। हम यहां मांस या शराब का सेवन करने वालों पर कोई आक्षेप नहंी करना चाहते बल्कि समाज की सोच पर ही प्रश्न उठा रहे हैं।
विवाह एक धार्मिक संस्कार है जिसका पालन करते हुए लोग फूले नहीं समाते। अभी हाल ही में बिना विवाह ही युवक युवतियों के साथ रहने को कानूनी मान्यता मिलने पर अनेक संस्कार और संस्कृति के ठेकेदारों ने बहुत शोर मचाया था पर इसी पवित्र विवाह संस्कार के समय शराब के सेवन पर सभी चुप क्यों हो जाते है? इसके विरुद्ध कोई प्रचार क्यों नहीं करते? यह सोच का विषय है। इतना ही नहीं हमारे देश में कुछ जगह तो मंदिरों में शराब भी प्रसाद के रूप मेंचढ़ाने की परंपरा प्रचलन में आई है। ताज्जुब इस बात का है कि इस पर किसी भी धार्मिक प्रवृत्ति को आपत्ति करते हुए नहीं देखा। देश में शराब को जिस तरह एक सामान्य आदत के रूप में मान्यता मिली है वह चिंता की बात है और समाज को इस बात पर विचार करना चाहिये कि यह सामान्य मनुष्य द्वारा उपभोग में लाया जाने वाला पदार्थ नहीं है।


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Wednesday, February 24, 2010

चाणक्य नीति-अपनी प्रशंसा स्वयं देवराज इंद्र करे तो भी ठीक नहीं ( apni prashnasa na karen-chankya niti)

अतिक्लेशेन ये चार्था धर्मस्यातिक्रमेण तु।
शत्रूणां प्रणिपातेन ते ह्यर्था मा भवंतु में।।
हिन्दी में भावार्थ-
जिस धन की प्राप्ति दूसरों को क्लेश पहुंचानेे या शत्रु के सामने सिर झुकाने से हो वह स्वीकार करने योग्य नहीं है।
पर-प्रोक्तगुणो वस्तु निर्गृणऽपि गुणी भवेत्।
इन्द्रोऽ लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गृणैः।।
हिन्दी में भावार्थ-
चाहे कोई मनुष्य कम ज्ञानी हो पर अगर दूसरे उसके गुणों की प्रशंसा करते हैं तो वह गुणवान माना जायेगा किन्तु जो पूर्ण ज्ञानी है और स्वयं अपना गुणगान करता है तो भी वह प्रशंसनीय नहीं माना जा सकता चाहे भले ही स्वयं देवराज इंद्र हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-थोथा चना बाजे घना इसलिये ही कहा जाता है कि जिसके पास गुण नहीं है वह अपने गुणों की व्याख्या स्वयं करता है। यह मानवीय प्रकृत्ति है कि अपने घर परिवार के लिये रोटी की जुगाड़ में हर कोई लगा है और विरले ही ऐसे लोग हैं जो दूसरों के हित की सोचते हैं पर अधिकतर तो खालीपीली प्रशंसा पाने के लिये लालायित रहते हैं। धन, वैभव और भौतिक साधनों के संग्रह से लोगों को फुरसत नहीं है पर फिर भी चाहते हैं कि उनको परमार्थी मानकर समाज प्रशंसा प्रदान करे। वैसे अब परमार्थ भी एक तरह से व्यापार बन गया है और लोग चंदा वसूल कर यह भी करने लगे हैं पर यह धर्म पालन का प्रमाण नहीं है। यह अलग बात है कि ऐसे लोगों का कथित रूप से सम्मान मिल जाता है पर समाज उनको ऐसी मान्यता नही देता जैसी की वह अपेक्षा करते हैं। ऐसे लोग स्वयं ही अपनी प्रशंसा में विज्ञापन देते हैं या फिर अपनी प्रशंसा में लिखने और बोलने के लिये दूसरे प्रचारकों का इंतजाम करते हैं। कहीं कहीं तो ऐसा भी होता है कि ‘तू मुझे चाट, मैं तुझे चाटूं’, यानि एक दूसरे की प्रशंसा कर काम चलाते हैं। इसके बावजूद यह वास्तविकता है कि हृदय से केवल सम्मान उसी को प्राप्त होता है जो ईमानदारी सें परमार्थ का काम करते हैं।
धन प्राप्त तो कहीं से भी किया जा सकता है पर उसका स्त्रोत पवित्र होना चाहिये। दूसरों को क्लेश पहुंचाकर धन का संग्र्रह करने से पाप का बोझ सिर पर चढ़ता है। उसी तरह ऐसा धन भी प्राप्त करने का प्रयास नहीं करना चाहिये जो शत्रु के सामने सिर झुकाकर प्राप्त होता है। आखिर मनुष्य धन किसी लिये प्राप्त करता है? यश अर्जित करने के लिये! अगर शत्रु के आगे सिर झुका दिया तो फिर वह कहां रह जायेगा।
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Monday, February 22, 2010

विदुर नीति-संग का रंग तो चढ़ता ही है (sangat ka rang-hindi dharm sandesh)

यदि सन्तं सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव।
वासो तथा रंगवश्र प्रयानि तथा तेषा वशमभ्युवैति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जैसे कोई वस्त्र जिस रंग में रंगा जाये, वैसा ही हो जाता है उसी तरह जब कोई सज्जन आदमी किसी तपस्वी, दुष्ट या चोर की सेवा करता है तो उनके वश में हो जाता है-उनका रंग उस पर चढ़ता है।
अतिवादं न प्रवदेव वाद्येद् योऽनाहतः प्रतहन्यान्न घातयेत्।
हन्तुं च यो नेच्छति पापकं वै तस्मै देखाः समुहयन्त्यागताय।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो स्वयं किसी के प्रति बुरी बात न स्वयं कहता न दूसरे को कहने के लिये प्रेरित करता, बिना मार खाये किसी को नहीं मारता और न मरवाता है, अपराधी को भी क्षमा करता है, ऐसे मनुष्य के आगमन की तो देवता भी बाट जोहते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-कहा जाता है कि शक्ति ही सहनशीलता की पहचान होती है। जिसमें शक्ति नहीं है वह बहुत जल्दी उत्तेजित हो जाता है। आजकल तो सहनशीलता का लोगों को सर्वथा अभाव दिखता है। अशुद्ध खानपान, भौतिक पदार्थों के प्रति अधिक आकर्षण तथा विलासिता को जीवन के लिये अनिवार्य मानने की प्रवृत्ति ने लोगों को शारीरिक, मानसिक तथा वैचारिक रूप से कमजोर बना दिया है। किसी को न तो अपनी स्वयं की आलोचना सहन होती है और न ही कोई अपने विचार पर बहस सुनना चाहता है। कहते हैं कि थोथा चना, बाजे घना-इसके दर्शन अब हर कदम पर किये जा सकते हैं। अल्पज्ञानियों का झुंड बहस करता है। निष्कर्ष कुछ नहीं निकलता उल्टे झगड़े ही होते हैं। स्थिति यह है कि अमन का प्रयास करने के के लिये एक साथ निकलने वाले लोग आपस में लड़ पड़ते हैं।
यह सब हमारे समाज और लोगों की कमजोरी की निशानी है। अशुद्ध तथा मिलावटी पदार्थों के सेवन से हमारे देश के नागरिकों की शारीरिक शक्ति नित प्रतिदिन कम होती जा रही है। यह शक्तिहीनता अंततः चिढ़ में बदल जाती है। फिर संगत करने के लिये ऐसे ही लोग मिलते हैं तो जो सहज और सज्जन भाव वाले होते हैं उन पर भी रंग चढ़ जाता है। बहुत कम लोग हैं जो शांति के लिये सक्रिय रहते हैं वरना तो अधिकतर झगड़ा कर उसे देखने का शौक रखते हैं। अतः जहां तक हो सके अपने खान पान में शुद्धता के साथ अपने निजी संपर्क भी ऐसे तरह बनाये जहां से वैमनस्य फैलाने का संदेश न मिलता हो।

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Friday, May 30, 2008

संत कबीर वाणी:अहिरन की चोरी कर, सुई का करें दान

संत कबीर दास ने कहा है कि
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अहिरन की चोरी करै, करे सुई का का दान
ऊंचा चढि़ कर देखता, केतिक दूर विमान
      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य अपने जीवन में तमाम तरह के अपराध और चालाकियां कर धन कमाता है पर उसके अनुपात में नगण्य धन दान कर अपने मन में प्रसन्न होते हुए फिर आसमान की ओर दृष्टिपात करता है कि उसको स्वर्ग मेेंं ले जाने वाला विमान अभी कितनी दूरी पर रह गया है।
संत कबीर दास ने कहा है कि
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आंखि न देखि बावरा, शब्द सुनै नहिं कान
सिर के केस उज्जल भये, अबहुं निपट अजान

      संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं आंखों से देख नहीं पाता, कानों से शब्द पर रहे जाते हैं और सिर के बाद सफेद होने के बावजूद भी मनुष्य अज्ञानी रह जाता है और माया के जाल में फंसा रहता है।
      वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमारे देश आधुनिक समय में अंग्रेजों की सृजित अर्थ, राजकीय, शैक्षिक, सामाजिक तथा सांस्कृतिक व्यवस्था पद्धति का अनुकरण कर रहा है उसके ही एक प्रमुख विद्वान का मानना है कि  कोई भी धनी नहीं बन सकता है-ऐसा मानने वाले बहुत हैं तो हम स्वयं देख भी सकते हैं। धनी होने के बाद समाज में प्रतिष्ठा पाने के मोह से लोग दान करते हैं। कहीं मंदिर में घंटा चढ़ाकर, पंखे या कूलर लगवाकर या बैंच बनवाकर उस पर अपना नाम खुदवाते हैं। एक तीर से दो शिकार-दान भी हो गया और नाम भी हो गया। फिर मान लेते हैं कि उनको स्वर्ग का टिकट मिल गया। यह दान कोई सामान्य वर्ग के व्यक्ति नहीं कर पाते बल्कि जिनके पास तमाम तरह के छल कपट और चालाकियों से अर्जित माया का भंडार है वही करते हैं। उन्होंने इतना धन कमाया होता है कि उसकी गिनती वह स्वयं नहीं कर पाते। अगर वह इस तरह अपने नाम प्रचारित करते हुए दान न करें तो समाज में उनका कोई नाम भी न पहचाने। कई धनपतियों ने अपने मंदिरों के नाम पर ट्रस्ट बनाये हैं। वह मंदिर उनकी निजी संपत्ति होते हैं और वहां कोई इस दावे के साथ प्रविष्ट नहीं हो सकता कि वह सार्वजनिक मंदिर है। इस तरह उनके और कुल का नाम भी दानियों में शुमार हो जाता है और जेब से भी पैसा नहीं जाता। वहां भक्तों का चढ़ावा आता है सो अलग। ऐसे लोग हमेशा इस भ्रम में जीते हैं कि उनको स्वर्ग मिल जायेगा।

Tuesday, May 27, 2008

संत कबीर वाणी:विचार कर बोलने वाला कभी अपमानित नहीं होता

सहज तराजू आनि के, सब रस देख तोल
सब रस माहीं जीभ रस, ज कोय जानै बोल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस दुनिया मेे विभिन्न प्रकार के रस है पर भी को परख लिया। इमने सबसे अधिक वजन जीभ के रस का है। जो मीठे वचन बोलता है वही इस रस का महत्व जानता है।

बौलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि
कहैं कबीर ता दास को, कबहू न आवै हारि

संत कबीरदास जी कहते हैं कि जो सोच समझकर समय के अनुसार बोलता है और उपयुक्त स्थान पर बैठता है तो वह कभी पराजित नहीं कर सकता।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमने कुछ लोग ऐसे देखे होंगे जो शांत भाव से जीवन जीते हैं और उनको किसी की परवाह नहीं रहती। दरअसल वह समय के अनुसार उचित और अनुचित का महत्व जानते हुए कार्य करते हैं। अनावश्यक रूप से किसी से वार्ता नहीं करते और जब बोलते हैं तो बहुत ही सधे शब्दों में का उपयोग करते है। ऐसे लोग कभी भी कहीं अपमानित नहीं होते। ऐसे लोग अंर्तमुखी होते हैं और बहुत सोच विचार कर बोलते हैं। जीवन में सफलता उनके कदम चूमती है।
इस संसार में ऐसे भी बहुत लोग हैं जो जीवन में बहुत काम करते हैं। उनका पूरा जीवन परिश्रम करते हुए निकल जाता है और फिर भी समाज में सम्मान नहीं प्राप्त कर पाते वजह यह कि वह अपने मुख से अनर्गल प्रलाप कर अपने ही किये पर पानी फेर देते हैं। बहुत काम करते हैं पर फिर भी अनुभव के नाम पर कोरे रह जाते हैं। अपनी सारी ऊर्जा व्यर्थ बोलने में लगाते है।

Sunday, May 25, 2008

भृतहरि शतक:कामदेव की है विचित्र लीला

कृशः काणः खञ्ज श्रवणरहितः पुच्छविकलो
व्रणी पूयक्लिनः कृमिकुलशतैरावुततनु
क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरककापालार्पिततगलः
शनीमन्वेति श्वा हतमपि निहन्त्येव मदनः

हिंदी में भावार्थ-देह से दुर्बल, खुजली वाला, बहरा काना, पुंछ विहीन, फोड़ों से भरा, पीव और कीट कृमियों से लिपटा, भूख से व्याकुल, बूढ़ा मिट्टी के घड़े में फंसी हुई गर्दन वाला कुत्ता भी नई तथा युवा कुतिया के पीछे पीछे दुम हिलाता हुआ फिरता है। यह कामदेव की लीला है कि वह मरे हुए में भी काम भावना लाकर उसे गहरी खाई में ढकेल कर मार देते हैं।

Thursday, May 22, 2008

संत कबीर वाणी:अंहकार की रस्सी बांधकर भवसागर पार करना कठिन

मोर तोर की जेवरी, गल बंधा संसार
दास कबीरा क्यों बंधै, जाके नाम अधार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि तेरे मेरे की रस्सी से बंधा आदमी इस संसार को पार करना चाहता है। परमात्मा के जो सच्चे भक्त है उनको इस संासरिक मोह माया से लगाव नहीं होता वह तो केवल भगवान के नाम से बंधे होते हैं।

नान्हा काती चित्त दे, महंगे मोल बिकाय
ग्राहक राजा राम है, और न नीरा जाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने हृदय को एकाग्र कर परमात्मा के नाम लेकर ज्ञान के रूप में सूत कातो। उसके ग्राहक तो भगवान राम है जो घट घट वासी है। अन्य किसी के पास जाने का कोई लाभ नहीं है।

Tuesday, May 20, 2008

भृतहरि शतक:सज्जन की मित्रता पूर्वान्ह की छाया की तरह धीरे-धीरे बढ़ती है

दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर

इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी तो साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।

आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्



जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उतराद्र्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उतराद्र्ध में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है।

Tuesday, April 8, 2008

संत कबीर वाणी:संसार में रमे तो राम का नाम भूल गए

राम नाम जाना नहीं, पाला सकल कुटुम्ब
धन्धाही में पचि मरा, बार भई नहिं बुम्ब


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि इस संसार में माया-मोह में रमकर अपने परिवार का भरण-भोषण किया पर राम का नाम नही ले पाये। सारा समय अपने व्यवसाय में बीत गया और न उससे सत्संग मिला न प्रतिष्ठा।

दुनिया के धोखे मुआ, चला कुटुंब की कानि
तब कुल की क्या लाज है, जब ले धरा मसानि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यह संसार तो एक तरह से धोखा है। इसमें आदमी जीवन भर अपने कुटुंब के बंधन में जकड़ा रह कर उसकी प्रतिष्ठा का यत्न करता है। यह नहीं सोचता कि तब इस कुटुंब के लोग ही उस श्मशान में पहुंचा देंगे तब कुल की क्या इज्जत होगी।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हर कोई अपने कुल की वृद्धि चाहता है। समस्या यही नहीं है। कुछ लोग जिन को अपने समाज का मार्गदर्शन करने का दायित्व है वह भी लोगों को अपने समाज की वृद्धि के लिये प्रेरित करते है। हर आदमी अपने परिवार, जाति, भाषा और धर्म के लोगों की वृद्धि चाहता है। उससे लगता है कि उसकी भी इससे प्रतिष्ठा बढ़ती है। यह सब देह में बैठी आत्मा है जिसकी वजह से सब जगह सम्मान है। जब वह इसमें से निकल जायेगी तब अपने ही लोग श्मशान में पहुंचा देते है तब उनको यह परवाह नही रहती है कि यह हमारा आदमी था।
इसलिये अपने भ्रम को भूलकर भगवान का नाम लेना चाहिए ताकि
हमें प्रेरणा और भक्ति मिलती रहे। इस वंश,जात और धर्म की वृद्धि के चक्कर में तो सारा जीवन संताप मेंे गुजर जाता है। अतः भगवान का नाम लेकर ही हम उससे उबर सकते है।

Wednesday, April 2, 2008

संत कबीर वाणी:प्रेम तो होता है स्वार्थ का

प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं
कहैं कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं


संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि प्रेम की बात तो केवल स्वार्थ से युक्त होती है उसमें कोई परमार्थ नहीं करता। इस युग में परमार्थी तो कोई विरला ही होता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-आजकल आप चाहे जो भी टीवी चैनल या रेडियो खोल लें उसमें प्रेम-प्रेम एक नारे के रूप में सुनाई देगा। इसी तरह फिल्मी गानों में तो कोई ऐसा नहीं होता जिसमें प्रेम शब्द न हो। यह प्रेम केवल दैहिक है और स्वार्थ पर आधारित है। हिंदी में प्रेम के बहुत व्यापक अर्थ हैं पर इसे अब इसे केवल स्त्री-पुरुष तक ही सीमित कर दिया गया है। कई बार तो हंसी आती है। कोई लड़का-लड़की घर से भाग जाते हैं और उनके परिवार वाले उसका विरोध करते हैं और प्रचार माध्यम कथित पवित्र प्रेम के समर्थन में नारे लगाने लगते हैं। अब बताईये क्या उनका प्रेम कामना से रहित हो सकता है? कतई नहीं! कुछ उर्दू शायरों ने अपने शायरियों में प्यार को स्त्री-पुरुष के प्यार के इर्द-गिर्द ही केद्रित रखा और हिंदी फिल्मी गीत लेखकों ने भी वही शैली अपनाई। एक तरह से जो प्रेम भारतीय अध्यात्म में व्यापक आधार वाला है वही विदेशी विचारधाराओं में संकीर्ण अर्थ वाला है। केवल यह एक शब्द नहीं बल्कि कई ऐसे शब्द हैं जो हमारी भाषा में व्यापक आधार वाले हैं पर पाश्चात्य सभ्यता मे उसे छोटे रूप में ही लिया जाता है। जैसे धर्म-पश्चिम में व्यक्ति का धर्म उसके इष्ट के आधार पर तय किया जाता है जबकि हमारे भारत में उसका निर्धारण उस व्यक्ति के कार्यों के आधार होता है।

आशय यह है कि प्रेम वह है जो निष्काम है जिसमें प्रेम करने वाला अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता और न ही कोई आकांक्षा करता है। जहां कामना है वहां काम है और उसकी पूर्ति होते ही वह भाव नष्ट हो जाता है जबकि प्रेम कभी भी नष्ट नहीं होता।

Tuesday, April 1, 2008

संत कबीर वाणी:माया वृक्ष की छाया की भांति अस्थिर

तीन गुनन की बादरी, ज्यों तरुवर की छांहि
बाहर रहै सो ऊबरै, भींजै मन्दिर मांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं तीनों वाली माया रूपी बदली ऐसे ही जैसै वृक्ष की छाया स्थिर नहीं रहती। जो इस माया के जंजाल से परे रहता है। उसी का उद्धार होता है।

सूम सदा ही उद्धरै, दाता जाय नरवक
कहैं कबीर यह साखि सुनि, मति कोय जाव सरक्क


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने वीर्य को कंजूसी से व्यय करने वाला तो स्वर्ग में जा सकता है पर जो कामी इसका दान करता है नरक में ही जायेगा। इस साखी को जो लोग सुनकर सरकें नहीं बल्कि विचार करें।

व्याख्या-कबीरदास जी व्यंजना विधा में अपनी बात कहने के सिद्ध थे इसलिये कई जगह उनकी बात का अर्थ समझना पड़ता है और उपरोक्त साखी में कबीरदास जी ने जो बात कही है उसका आशय यही है कि अपनी ऊर्जा पर नियंत्रण रखकर ही अपना उद्धार हो सकता है।

Saturday, March 29, 2008

संत कबीर वाणी:दिखावे की भक्ति से कोई लाभ नहीं

बाहर क्या दिखलाइए, अंतर जपिये राम
कहा महोला खल्क सौं, परिहों धनी सौं काम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अनेक तरह का प्रदर्शन कर लोग क्या दिखलाना चाहते हैं? इस तरह के दिखावे से कोई लाभ नही होता। हमारा संबंध तो परमात्मा से है और उसको ह्रदय से एकांत में स्मरण करने से ही हमें लाभ होता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या- हमारे देश में दिखावे की भक्ति करने वाले भी बहुत लोग रहे है। कई लोग तो ऐसे हैं जो ऊंची आवाज में प्रार्थना और आरती गाते हैं ताकि लोग यह समझें कि वह भगवान के भक्त हैं और उनका सम्मान करें। हालांकि कुछ लोगों को इसका सांसरिक लाभ होता है और वह अपनी इस छवि का फायदा उठाकर अपने कई काम निकाल लेते हैं पर उनके मानसिक और शारीरिक संताप कभी कम नहीं होते। वे लोग अवसर आने पर छल, कपट और बेईमानी से भी नहीं चूकते।

जो लोग वास्तव में भक्त हैं वह एकांत साधना करते है और इसका अपने मुख से प्रचार नहीं करते। ऐसे लोगों के चेहरे पर भगवान की निष्काम भक्ति के कारण तेज टपकता हैं। उनके व्यवहार में सदाचार, सहजता और ज्ञान का आभास उनके संपर्क में आने वाले हर व्यक्ति को स्वाभावकि रूप से होता है। ऐसे लोग जीवन में सुख की अनुभूति करते हैं और परमात्मा की उन पर कृपा होती है।

बाहर भक्ति दिखाने की बजाय एकांत में ही करना चाहिये।

Thursday, March 27, 2008

रहीम के दोहे:प्रेम में कुछ न दे वह पशु समान

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत

ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत

कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं।

कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगोंको चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति कीतरह भी है।

Wednesday, March 26, 2008

संत कबीर वाणी:परिश्रम और धैर्य से होता है कार्य सिद्ध

श्रम ही ते सब होत है, जो मन सखी धीर

श्रम ते खोदत कूप ज्यों, थल में प्रगटै नीर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं किपरिश्रम करने से ही सब कार्य संपन्न होते हैं बस मन में धीरज होना चाहिए। बहुत परिश्रम करने से कुआँ खोदा जाता है तो पानी निकल ही आता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में विकास के लिए सब लोग प्रयास करते हैं पर कुछ लोग उतावले रहते हैं कि उनको जल्दी सफलता मिल जाये और नहीं मिलती तो वह निराश हो जाते हैं। इससे उनकी इन्द्रियाँ शिथिल हो जाती हैं और वह प्रयास करना छोड़ देते हैं और उससे उनको सफलता नहीं मिल पाती। उनके धीरज खोने का यह परिणाम होता है कि जो थोडा-बहुत परिश्रम उन्होने किया होता है उस पर पानी भी फिर जाता है। जो लोग अपनी सफलता में विश्वास करते हुए धीरज के साथ परिश्रम करते हैं उनको आखिर सफलती मिल ही जाती है।

आजकल प्रचार माध्यमों में अच्छे भविष्य के लिए जल्दी सफलता का जो प्रचार किया जाता है वह केवल लोगों को उतेजित कर उनकी जेब से पैसे एन्ठने के लिए होता है। कई ऐसे कार्यक्रम होते हैं जिनमें तमाम तरह के लोग पुरस्कार होते हैं तो लोगों को लगता है कि हम भी ऐसी ही सफलता हासित करें, पर सबके लिए यह संभव नहीं हैं। हम इस तरह के जो कार्यक्रम देखते हैं उसमें पुरस्कार आखिर कोई अपनी जेब से नहीं देता बल्कि तमाम तरह की कंपनियां जो अपने उत्पादों को जनता में बेचकर पैसा कमाती हैं वह विज्ञापन के रूप में उन कार्यक्रमों का उपयोग करतीं हैं। इसमें चंद लोगों को पैसा तो मिल जाता है पर बाकी लोग केवल ऐसी जल्दी सफलता की कल्पना करते हैं और बाद में उनको कलपना भी पड़ता है। जीवन में आगे बढ़ने का कोई शार्टकट नहीं है। अगर कुछ लोगों को मिल जाती हैं तो उसे इतने बडे समाज को देखते हुए आदर्श नहीं माना जा सकता है। अत: जीवन में धीरज रखते हुए अपना परिश्रम जारी रखना चाहिऐ।

Tuesday, March 25, 2008

रहीम के दोहे:पेड़ पर फल लगते और झड़ जाते हैं

समय पाय फल होत है, समय पाय झरि जाय

सदा रहे नहिं एक सौ, का रहीम पछिताय

कविवर रहीम कहते हैं कि जिस तरह पेड़ में समय के अनुसार फल लगते हैं और फिर झड़जाते हैं उसी तरह मनुष्य के जीवन में भी दु:ख सुख के पल आते हैं। समय कभी एक जैसा नहीं रहता इसलिए बुरे समय में मनुष्य को घबडाना नहीं चाहिऐ।

आज के संदर्भ में व्याख्या-कविवर रहीम ने बरसों पहले यह विचार व्यक्त किया था तबतो जीवन शैली इतनी कठिन नहीं थी पर आज के परिवेश में तो पूरी दिनचर्या ही कठिनाईयों से भरी पडी है। ऐसे में आदमी थोडी परेशानी आने पर घबडा जाता है। खास तौर से कार्यस्थलों से घर की दूरी और संयुक्त परिवारों के बिखरने से आदमी अपनी मुसीबतों में अकेला पड़ जाता है और उसके निकट कोई मनोबल बढाने वाला नहीं होता ऐसे में उसे लगता है कि वह तबाह होकर बिखर जायेगा। हम ज़रा इस बात पर गौर करें कि जीवन में अच्छे पल भी हमने ही भोगे होते है और जो अधिक होते हैं तो फिर बुरे पलों में विचलित क्यों होना चाहिए?

रहीम जी का यह सन्देश आज के संदर्भ में और अधिक प्रासंगिक हो जाता है जब सीमित परिवारों के चलते अधिक लोग मनोबल बढाने के लिए नहीं दिखते। कहीं एक भाई और एक बहिन हैतो कहीं दो भाई या कहीं दो बहिन हैं। उनके विवाह भी अब दूर होते हैं। नौकरी के कारण भी अपने लोगों से बिछुड़ना पड़ता है। कहीं पति-पत्नी अकेले हैं और बच्चा छोटा है। मतलब यह यह है लोगों को अपने आसपास आत्मीय लोगों की कमी महसूस होती है ऐसे में थोडी विपत्ति उनको विचलित कर देती है। ऐसे में उनको यह सोचना चाहिऐ कि अगर अच्छा समय नहीं रहा तो बुरा समय भी नहीं रहेगा। इसके साथ ही किसी का बुरा समय देखकर उसका लाभ उठाने या उसका मजाक उड़ने की भी नहीं सोचना चाहिऐ क्योंकि उसका भी कभी अच्छा वक्त आ सकता है और वह अपना बदला ले सकता है या बुरे वक्त में अपनी मजाक उडाने या लाभ लेने वाले से बदला ले सकता है।

Monday, March 24, 2008

संत कबीर वाणी: झूठे गुरु को त्याग देना चाहिए

झूठे गुरु के पक्ष को, तजत न कीजै बार
द्वार न पावै शब्द का, भटके बारम्बार

संत शिरोमणि दस जी कहते हैं कि उस गुरु का त्याग कर देना चाहिऐ जो झूठे ज्ञान का उपदेश करता है। उसकी बात को कभी भी नहीं मानना चाहिऐ। ऐसे गुरु के उपदेश से भगवान् की भक्ति का द्वार तो प्राप्त नहीं होता उल्टे भटकाव होता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या- आजकल ऐसे गुरु बहुत पूज रहे हैं हैं जो इस सांसारिक ज्ञान का उपदेश अधिक देते हैं पर आध्यात्मिक ज्ञान उनको भी नहीं है। हमने कई बार देखा होगा कि कई संत समाज के पुराने कर्मकांडों को ही स्वर्ग में जाने का मार्ग बताते हैं। श्राद्ध आदि से पूर्वजों की आत्मा की मुक्ति का मार्ग बताते हैं- जबकि हमारे मूल ग्रंथों के अनुसार तो हर व्यक्ति अपने कर्मों के अनुसार फल पाता है और भगवान् की भक्ति पर उसका मोक्ष होता है। किसी की मुक्ति किसी दूसरेके दान पुण्यसे संभव नहीं है। इस तरह कुछ संत लोगों में अपने उपदेश कुछ इस तरह देते हैं कि बड़ी आयु के लोग यह सोचकर खुश होते हैं कि उनके बाद उनकी संतानें उनका नाम लेकर दान करेंगी तो उनका नाम भी चलता रहेगा। इससे खासतौर से महिलाएं बहुत खुश होतीं है क्योंकि वह धर्मभीरु होतीं है।

आत्मा अनश्वर हैं और उसकी मुक्ति उसके द्वारा धारण की देह के कर्मों से ही संभव है पर आजकल के गुरु झूठे ज्ञान के द्वारा ही वाह-वाही लूट रहे हैं, अत: ऐसे गुरु की शरण में जाना चाहिए जो ज्ञान की मूल तत्व का जानकर हो।

Sunday, March 16, 2008

संत कबीर वाणी:प्रेम-प्रेम तो सब करते हैं पर उसका मार्ग कोई नहीं जानता

दुनिया ऐसी बावरी, पाथर पूजन जाहि
घर की चकिया कोऊ न पूजै, जी को पीसो खाहि



संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि दुनिया के लोग इतने बावले हैं कि घर के बाहर पत्थरों को पूजने जाते हैं पर घर में मौजूद पत्थर की चक्की को नहीं पूजते जिसका पीसा हुआ आटा खाते हैं।


प्रेम-प्रेम सब कोई कहैं, प्रेम न चीन्है कोय
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय


संत शिरोमणि कबिदास जी कहते हैं कि संसार में सभी लोग प्रेम-प्रेम टू करते हैं किन्तु प्रेम का मतलब कोई नहीं जानता। जिस रास्ते पर चलकर परमात्मा का दर्शन होता है वही सच्चा प्रेम का मार्ग हैं।

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