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Wednesday, April 2, 2008

संत कबीर वाणी:प्रेम तो होता है स्वार्थ का

प्रीत रीत सब अर्थ की, परमारथ की नाहिं
कहैं कबीर परमारथी, बिरला कोई कलि माहिं


संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि प्रेम की बात तो केवल स्वार्थ से युक्त होती है उसमें कोई परमार्थ नहीं करता। इस युग में परमार्थी तो कोई विरला ही होता है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-आजकल आप चाहे जो भी टीवी चैनल या रेडियो खोल लें उसमें प्रेम-प्रेम एक नारे के रूप में सुनाई देगा। इसी तरह फिल्मी गानों में तो कोई ऐसा नहीं होता जिसमें प्रेम शब्द न हो। यह प्रेम केवल दैहिक है और स्वार्थ पर आधारित है। हिंदी में प्रेम के बहुत व्यापक अर्थ हैं पर इसे अब इसे केवल स्त्री-पुरुष तक ही सीमित कर दिया गया है। कई बार तो हंसी आती है। कोई लड़का-लड़की घर से भाग जाते हैं और उनके परिवार वाले उसका विरोध करते हैं और प्रचार माध्यम कथित पवित्र प्रेम के समर्थन में नारे लगाने लगते हैं। अब बताईये क्या उनका प्रेम कामना से रहित हो सकता है? कतई नहीं! कुछ उर्दू शायरों ने अपने शायरियों में प्यार को स्त्री-पुरुष के प्यार के इर्द-गिर्द ही केद्रित रखा और हिंदी फिल्मी गीत लेखकों ने भी वही शैली अपनाई। एक तरह से जो प्रेम भारतीय अध्यात्म में व्यापक आधार वाला है वही विदेशी विचारधाराओं में संकीर्ण अर्थ वाला है। केवल यह एक शब्द नहीं बल्कि कई ऐसे शब्द हैं जो हमारी भाषा में व्यापक आधार वाले हैं पर पाश्चात्य सभ्यता मे उसे छोटे रूप में ही लिया जाता है। जैसे धर्म-पश्चिम में व्यक्ति का धर्म उसके इष्ट के आधार पर तय किया जाता है जबकि हमारे भारत में उसका निर्धारण उस व्यक्ति के कार्यों के आधार होता है।

आशय यह है कि प्रेम वह है जो निष्काम है जिसमें प्रेम करने वाला अपने किसी स्वार्थ की पूर्ति नहीं करता और न ही कोई आकांक्षा करता है। जहां कामना है वहां काम है और उसकी पूर्ति होते ही वह भाव नष्ट हो जाता है जबकि प्रेम कभी भी नष्ट नहीं होता।

Thursday, March 27, 2008

रहीम के दोहे:प्रेम में कुछ न दे वह पशु समान

नाद रीझि तन देत मृग, नर धन हेत समेत

ते रहीम पशु से अधिक, रीझेहु कछु न देत

कविवर रहीम कहते हैं कि बंसी की धुन पर रीझकर हिरन शिकार हो जाता है उसी तरह मनुष्य भी प्रेम के वशीभूत होकर अपना तन, मन और धन न्योछावर कर देता है लेकिन वह लोग पशु से भी बदतर हैं जो किसी से खुशी तो पाते हैं पर उसे देते कुछ नहीं है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-वैसे देखा जाये तो आज के युग भी यह सत्य है कि अधिकतर लोग मुफ्त में मजे करना चाहते हैं। किसी से बिना लिए-दिए काम करने में चतुराई समझी जाती है। कई सरल ह्रदय लोग प्रेमवश दूसरों का काम कर देते हैं तो उनको मूर्ख समझा जाता है। हालांकि चतुर लोग भी प्रेम में ही मूर्ख बनते हैं। आजकल आपने देखा होगा कि तमाम तरह के विज्ञापन आते हैं जिनमें बडे प्रेम से विनिवेश और अन्य लाभों के बारे में बताया जाता है और लोग उसके शिकार हो जाते हैं। अनेक पढी-लिखी लडकियां प्रेम में अपना सर्वस्व लुटा बैठतीं है और बाद में उनके पास पछताने का भी अवसर नहीं होता। हालात यह है कि अपने से बहुत अधिक आयु और अकमाऊ व्यक्ति के साथ घर से भाग कर विवाह कर अपना जीवन तबाह कर बैठतीं हैं।

कुछ लड़के भी ऐसे हैं जो सुन्दर और शिक्षित लडकी से प्रेम का ढोंग करते हैं पर विवाह के समय अपने परिवार वालों का वास्ता देकर नाता तोड़ लेते हैं। इतना ही नहीं कई माता-पिता भी लड़की के सुयोग्य होते हुए भी बिना दहेज़ के विवाह करने से इनकार कर देते हैं। कहते हैं कि हर माता-पिता अपने बच्चे से प्रेम करते हैं पर कई ऐसे लड़के हैं जो विवाह की आयु पार कर चुके हैं पर उनका दिल नहीं पसीजता कि उसका विवाह कम दहेज़ में कर दें। कुल मिलाकर प्रेम एक दिखावा हो गया है और कहा जाये तो अब मानव भेष में पशु होने लगे हैं। अत: समझदार लोगोंको चाहिए कि अगर कोई उनको प्रसन्न करता है तो उसे भी कुछ दें तभी वह अपने इंसान होने की अनुभूति कर सकते हैं और यही ईश्वर भक्ति कीतरह भी है।

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