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Wednesday, August 27, 2008

विदुर नीति:मित्र निर्धन हो तो भी उसका सम्मान करें

१.जो मित्रों से सत्कार और सहायता पाकर कृतार्थ होकर भी उनका साथ नहीं निभाते ऐसे कृत्घ्नों के मरने पर उनका मांस तो मांसाहारी पशु भी नहीं खाते।
२.धनवान हो धनहीन मित्र का सम्मान करें। मित्रों से न तो किसी प्रकार की याचना करें और न ही उनकी परीक्षा लें।
३.दुष्ट पुरुषों का स्वभाव मेघ के समान चंचल होता है, वे सहसा क्रोध कर बैठते हैं और अकारण ही प्रसन्न हो जाते हैं।
४.हंस जिस प्रकार सूखे सरोवर के पास मंडरा कर रह जाते हैं उनके अन्दर प्रवेश नहीं करते उसी प्रकार जिसके ह्रदय में चंचलता का भाव विद्यमान है और अज्ञानी हैं वह भी इन्द्रियों के वश में रहता है अरु उसे अर्थ की प्राप्ति नहीं होती।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Wednesday, August 20, 2008

रहीम के दोहे:राम का नाम न जानने वालों का जीवन व्यर्थ

राम नाम जान्यो नहीं, जान्यो सदा उपाधि
कहि रहीम तिहिं आपुनो, जनम गंवायो वादि


कविवर रहीम कहते हैं कि जिन लोगों ने नाम का नाम धारण न कर अपने धन, पद और उपाधि को ही जाना और राम के नाम पर विवाद खडे किये उनका जन्म व्यर्थ है. वह केवल वाद-विवाद कर अपना जीवन नष्ट करते हैं।

राम नाम जान्यो नहीं, भइ पूजा में हानि
कहि रहीम क्यों मानिहै, जम के किंकर कानि


कविवर रही कहते हैं कि जिस मानव ने राम की महिमा नहीं समझी और अन्य देवों की ही पूजा की तो उसमें उसे हानि ही होती है। ऐसे में यमराज के सेवक किसी मर्यादा को नहीं मानेंगे।
भाव-राम का नाम ही सत्य है और बाक़ी अन्य देवों की पूजा से क्या लाभ. उससे तो मन इधर उधर भटकता है ऐसे में जब मृत्यु आती है तो बहुत तकलीफ होती है और पूरा जीवन भी राम का नाम लिए बिना बडे कष्ट से बीतता है।

rahim,hindi

Tuesday, August 19, 2008

रहीम के दोहे:छाहँ देने वाले बड़े पेड़ अब कहाँ होते हैं

रहिमन अब वे बिरछ कहं जिनकी छांह गंभीर

बागन बिच बिच देखिअत, सेंहुड, कुंज करीर

कवीवर रहीम कहते हैं की अब इस संसार रुपी बैग में अब वह वृक्ष कहाँ है जो घनी छाया देते हैं। अब तो इस बगीचे में सेमल और घास फूस के ढेर या करील के वृक्ष ही दिखाई देते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हम कहते हैं कि ज़माना बहुत खराब हैं पर देखें तो यह केवल हमारा एक नजरिया है। इस कलियुग में तो झूठे और लघु चरित्र के लोगों का बोलबाला है। रहीम जी के समय तो फिर भी सात्विक भाव कुछ अधिक रहा होगा पर अब तो स्थिति बदतर है।

पहले तो लोग दान -पुण्यके द्वारा समाज के गरीब तबके पर दया करते थे और अन्य भी तमाम तरह की समाज सेवा करते थे। आपने देखा होगा कि अनेक धर्म स्थलों पर तीर्थ यात्रियों के लिए धर्मशालाएं बनीं हैं जो अनेक तरह के दानी सेठों और साहूकारों ने बनवाईं पर आज उन जगहों पर फाईव स्टारहोटल बन गए हैं। कहने का तात्पर्य अब वह लोग नहीं है जो समाज को अपने पैसे, पद और प्रतिष्ठा से छाया देते थे। अगर कुछ लोग दानवीर या दयालू बनने का दिखावा करते हैं तो उनके निज स्वार्थ होते हैं। ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरूरत है।

Tuesday, May 27, 2008

संत कबीर वाणी:विचार कर बोलने वाला कभी अपमानित नहीं होता

सहज तराजू आनि के, सब रस देख तोल
सब रस माहीं जीभ रस, ज कोय जानै बोल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि इस दुनिया मेे विभिन्न प्रकार के रस है पर भी को परख लिया। इमने सबसे अधिक वजन जीभ के रस का है। जो मीठे वचन बोलता है वही इस रस का महत्व जानता है।

बौलै बोल विचारि के, बैठे ठौर संभारि
कहैं कबीर ता दास को, कबहू न आवै हारि

संत कबीरदास जी कहते हैं कि जो सोच समझकर समय के अनुसार बोलता है और उपयुक्त स्थान पर बैठता है तो वह कभी पराजित नहीं कर सकता।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमने कुछ लोग ऐसे देखे होंगे जो शांत भाव से जीवन जीते हैं और उनको किसी की परवाह नहीं रहती। दरअसल वह समय के अनुसार उचित और अनुचित का महत्व जानते हुए कार्य करते हैं। अनावश्यक रूप से किसी से वार्ता नहीं करते और जब बोलते हैं तो बहुत ही सधे शब्दों में का उपयोग करते है। ऐसे लोग कभी भी कहीं अपमानित नहीं होते। ऐसे लोग अंर्तमुखी होते हैं और बहुत सोच विचार कर बोलते हैं। जीवन में सफलता उनके कदम चूमती है।
इस संसार में ऐसे भी बहुत लोग हैं जो जीवन में बहुत काम करते हैं। उनका पूरा जीवन परिश्रम करते हुए निकल जाता है और फिर भी समाज में सम्मान नहीं प्राप्त कर पाते वजह यह कि वह अपने मुख से अनर्गल प्रलाप कर अपने ही किये पर पानी फेर देते हैं। बहुत काम करते हैं पर फिर भी अनुभव के नाम पर कोरे रह जाते हैं। अपनी सारी ऊर्जा व्यर्थ बोलने में लगाते है।

Thursday, May 22, 2008

संत कबीर वाणी:अंहकार की रस्सी बांधकर भवसागर पार करना कठिन

मोर तोर की जेवरी, गल बंधा संसार
दास कबीरा क्यों बंधै, जाके नाम अधार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि तेरे मेरे की रस्सी से बंधा आदमी इस संसार को पार करना चाहता है। परमात्मा के जो सच्चे भक्त है उनको इस संासरिक मोह माया से लगाव नहीं होता वह तो केवल भगवान के नाम से बंधे होते हैं।

नान्हा काती चित्त दे, महंगे मोल बिकाय
ग्राहक राजा राम है, और न नीरा जाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने हृदय को एकाग्र कर परमात्मा के नाम लेकर ज्ञान के रूप में सूत कातो। उसके ग्राहक तो भगवान राम है जो घट घट वासी है। अन्य किसी के पास जाने का कोई लाभ नहीं है।

Tuesday, May 6, 2008

संत कबीर वाणी:स्वार्थी लोग करते हैं झूठी प्रशंसा Sant Kabir Speech: People are selfish false praise

स्वारथ कूं स्वारथ मिले, पडि पडि लूंबा बूंब
निस्प्रेही निरधार को, कोय न राखै झूंब


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब लोग अपने हृदय में स्वार्थ की भावना लेकर परस्पर मिलते हैं तब एक दूसरे की आवश्यकता से अधिक प्रशंसा करते हैं। इस मिलन पर वह लोग बहुत प्रसन्न होते हैं। परंतु जो निस्वार्थ और निष्काम भाव से मिलते हैं वह इस तरह से एक दूसरे के प्रति दिखावे का सम्मान नहीं व्यक्त करते।

संसार से प्रीतड़ी, सरै न एकौ काम
दुविधा से दोनों गये, माया मिली न राम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि संसार के विषयों की प्रवृत्ति के लोगों से संपर्क रखने पर शुभ कार्य नहीं होता। इससे तो व्यर्थ ही दुविधा में पड़ कर दोनों ही तरफ खाली हाथ रह जायेंगे। न तो इससे कोई धन की प्राप्ति होगी न ही भगवान की भक्ति ही कर पायेंगे।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-हमारे यहां सत्संग की परंपरा है जिसमें सम्मिलित होकर अपने हृदय की शुद्धि कर सकते हैं-यह अलग बात है कि लोग वहां भी अपने वार्तालाप में संसार विषयों पर ही चर्चा करते हैं। जिसे देखो वही अपने मित्रों और रिश्तेदारों को एकत्रित कर समाज में अपनी शक्ति का प्रदर्शन करता है। सच तो यह है कि मित्र, परिवार और अन्य संबंध मात्र स्वार्थ के आधार पर ही होते हैं। सामने लोग प्रशंसा करते हैं जो कभी कभी स्वयं को झूठी लगती है। अगर अपने ज्ञान चक्षु खोलकर ऐसे लोगों के परस्पर मिलन को देखें तो इस बात का अनुभव होगा कि सभी एक दूसरे की झूठी प्रशंसा करते हैं। सच्ची प्रशंसा वही है जो पीठ पीछे हो। अतः अपने मुख के समक्ष की गयी प्रशंसा पर कभी अपने हृदय में अहंकार को स्थान नहीं देना चाहिए।

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1.Sant Kabir G says that the head when people in your heart to the spirit of mutual self-interest, then get each other's needs more than praise them. The meeting of the people are very happy. But the sense of selfless get it this way, a second show of respect not expressed.




2.Sant Kabir G says that the head of the subjects of the world's people to maintain contact on the good work does not. It is futile to the dilemma facing both sides in the left hand will be empty. It's not the receipt of any money not only God's will only be able devotional.


In the context of the current interpretation - There Satsang is the tradition of their own which included correction of the heart can - it's another matter that the people of the world where their conversation topics on the talk. Look what your friends and relatives of the same collecting society of their power of the performance. The fact is that friends, family and other relations on the basis of mere self-interest are. In front of people who are sometimes praised itself seems to be false. If your knowledge of such eye opening to get people to see if there is mutual experience that all the false praise to each other. The same is true appreciation of the behind the back. So your mouth before your heart ever been on the appreciation of the place of arrogance should not.

Saturday, May 3, 2008

रहीम के दोहे:अहंकार है आदमी के छोटे होने का प्रमाण

बड़े पेट के भरन को, है रहीम देख बाढि
यातें हाथी हहरि कै, दया दांत द्वे काढि

कविवर रहीम कहते हैं कि जो आदमी बड़ा है वह अपना दुख अधिक दिन तक नहीं छिपा सकता क्योंकि उसकी संपन्नता लोगों ने देखी होती है जब उसके रहन सहन में गिरावट आ जाती है तब लोगों को उसके दुख का पता लग जाता है। हाथी के दो दांत इसलिये बाहर निकल आये क्योंकि वह अपनी भूख सहन नहीं कर पाया।

बड़े बड़ाई नहिं तजैं, लघु रहीम इतराइ
राइ करौंदा होत है, कटहर होत न राइ

कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े आदमी कभी अपने मुख से स्वयं अपनी बड़ाई नहीं करते जबकि छोटे लोग अहंकार दिखाते है। करौंदा पहले राई की तरह छोटा दिखाई देता है परंतु कटहल कभी भी राई के समान छोटा नजर नहीं आता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कहा जाता है कि धनाढ्य व्यक्ति इतना अहंकार नहीं दिखाता जितना नव धनाढ्य दिखाते हैं। होता यह है कि जो पहले से ही धनाढ्य हैं उनको स्वाभाविक रूप से समाज में सम्मान प्राप्त होता है जबकि नव धनाढ्य उससे वंचित होते हैं इसलिये वह अपना बखान कर अपनी प्रभुता का बखान करते हैं और अपनी संपत्ति को उपयोग इस तरह करते हैं जैसे कि किसी अन्य के पास न हो।

वैसे बड़ा आदमी तो उसी को ही माना जाता है कि जिसका आचरण समाज के हित श्रेयस्कर हो। इसके अलावा वह दूसरों की सहायता करता हो। लोग हृदय से उसी का सम्मान करते हैं जो उनके काम आता है पर धन, पद और बाहुबल से संपन्न लोगों को दिखावटी सम्मान भी मिल जाता है और वह उसे पाकर अहंकार में आ जाते हैं। आज तो सभी जगह यह हालत है कि धन और समाज के शिखर पर जो लोग बैठे हैं वह बौने चरित्र के हैं। वह इस योग्य नहीं है कि उस मायावी शिखर पर बैठें पर जब उस पर विराजमान होते हैं तो अपनी शक्ति का अहंकार उन्हें हो ही जाता है। जिन लोगों का चरित्र और व्यवसाय ईमानदारी का है वह कहीं भी पहुंच जायें उनको अहंकार नहीं आता क्योंकि उनको अपने गुणों के कारण वैसे भी सब जगह सम्मान मिलता है।
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Rahim's couplets: arrogance of the small man's testimony
Rahim says that big man who is suffering more days, it can not hide its prosperity because people have seen a decline in tolerance when his life is his grief to the people it takes to address it. So two out of elephant teeth come because he could not tolerate their hunger.


Rahim says that the big man his mouth sometimes do not boast their own people while the small show of arrogance. Like the first gooseberry mustard small but appears like a small mustard jackfruit ever is missing.

In the context of the current interpretation - is said that such a wealthy person does not show arrogance as the newly rich show. It appears that they are already naturally rich in the society honours is the newly wealthy are deprived of it because his deeds to his mastery of his deeds, and to use the property as a way to Others have not.

However, the big man is considered to be the same as that which best practice in the interest of society. In addition, he helps others. The heart of the same people who respect their work comes on the money, rank and power from rich people to get respect is to mock him and he is satisfied they are in arrogance. Today, all that money and place the condition of society are sitting on top of what the people of the dwarf character. He is not eligible to sit on top of that illusory when he sits on are, they have the arrogance of his power is. The people of character and integrity of the business, is the arrogance they do not go anywhere access to their properties because they are coming because even though there is respected everywhere.

Friday, April 25, 2008

संत कबीर वाणी:माया संत की दासी और अज्ञानी की ताज होती है

गुरू का चेला बीष दे, जो गांठी होय दाम
पूत पिता को मारसी, ये माया के काम


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते है। कि शिष्य अगर गुरू के पास अधिक संपत्ति देखते हैं तो उसे विष देकर मार डालते है। और पुत्र पिता की हत्या तक कर देता है।

माया दासी संत की साकट की शिर ताज
साकुट की सिर मानिनी, संतो सहेली लाज


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि माया तो संतों के लिए दासी की तरह होती है पर अज्ञानियों का ताज बन जाती है। अज्ञानी लोग का माया संचालन करती है जबकि संतों के सामने उसका भाव विनम्र होता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अगर देखा जाये तो पैसे की औकात केवल जेब तक ही रहती है जबकि अज्ञानी लोग इसे सदैव अपने सिर पर धारण किए रहती है।। वह बात-बात में अपने धनी होने का प्रमाणपत्र लेकर आ जाते हैं। अपनी तमाम प्रकार टींगें हांकते है। परमार्थ से तो दनका दूर तक नाता नहीं होता। जो लोग ज्ञानी हैं वह जेब मैं पैसा है यह बात अपने दिमाग में लेकर नहीं घूमते। आवश्यकतानुसार उसमें से पैसा खर्च करते हैं पर उसकी चर्चा अधिक नहीं करती। आजकल जिसके भी घर जाओं वह अपने घर के फर्नीचर, टीवी, फ्रिज, वीडियो और कंप्यूटर दिखाकर उनका मूल्य बताना नही भूलता और इस तरह प्रदर्शन करता है जैसे कि केवल उसी के पास है अन्य किसी के पास नहीं।


लोग आपस में बैठकर अपने धन और आर्थिक उपलब्धियों पर ही चर्चा करते हैं। अगर कोई गौर करे और सही विश्लेषण करे तो लोग नब्बे फीसदी से अधिक केवल पैसे के मामलों पर ही चर्चा करते हैं।

Thursday, April 24, 2008

संत कबीर वाणी:देह के अन्दर, मन हैं बन्दर

कबीर मन मरकट भया, नेक न कहुं ठहराय
राम नाम बांधे बिना, जित भावै तित जाय


संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि मन तो बंदर के समान चंचल है कहीं ठहरता हैं। राम नाम लिये और भक्ति के बिना इस पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है।

कबीर बैरी सबल है, एक जीव रिपु पांच
अपने-अपने स्वाद को, बहुत नचावै नाच


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हमारी पांचों इंद्रियां-नाक कान, जीभ आंख और त्वचा- शत्रू की तरह लगे हुए हैं और इनके अपनी अपनी चाहते है जो हमें नचाती हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- दरअसल हम अपने मन की महिमा को नहीं समझते इसलिये जीवन भर भटकते रहते हैं। मन कभी एक जगह नहीं टिक सकता और वह बंदर की तरह नाचता और नाचता है। हम यह नहीं समझ पाते। वह किसी एक स्थिति से संतुष्ट नहीं होता तमाम तरह के स्वार्थों के काम के बाद भी उसमें तृप्ति इसलिये नहीं होते क्योंकि हम परमार्थ कर उसे संतुष्ट नहीं कर सकते। स्वार्थ एक दिशा है तो परमार्थ दूसरी दिशा। वह इस दूसरी दिशा भी जाना चाहता है पर हम वह नहीं करते। नतीजा यह है कि हमारी पांच इंद्रिया शत्रू बनकर हमें सताती है। अगर हम यह मान लें कि हमारा मन बंदर है और उसे नाचने दें और परमार्थ का भी कम करें पर ऐसा तभी संभव हो जब हम भगवान की भक्ति करें। वह हमें व्यर्थ नजर आती है इसी कारण अपने मन को समझ ही नहीं पाते तो उस पर नियंत्रण कैसे हो सकता है।

यही वह मन है जिसका इस्तेमाल समझदार लोग दूसरे लोग कर अपना व्यापार चला रहे हैं। आप टीवी और पत्रपत्रिकाओं में आकर्षक विज्ञापन देखते होंगे तब आपको लगता है कि उसमें जिस उत्पाद की प्रशंसा की जा रही है वह ठीक होगा और आपका मन उसे खरीदने को लालायित होने लगता है। इतना ही नहीं आजकल विभिन्न खेलों में सट्टे की खबरें सुनते होंगे। वह कौन लोग हैं जो अपनी जीत-हार की बजाय दूसरों की जीतहार पर दांव खेलते हैं? यह वह लोग हैं जिनका अपने मन पर बस नहीं है। बस कुछ खेलना है और इसलिये खेलते हैं उनकी आंखें और कान ऐसे शत्रू की तरह हो जाते हैं जो कुछ देखना चाहते हैं। क्या? आप मनन करिये क्या इन खेलों को परिणामो से क्या होता है? कुछ देर का सुख या दुःख! पर कुछ लोगों का मन इसमें अपने लिये लाभ समेटना चाहता है। इसमें हानि ही होती है पर फिर भी उनका मन नहीं मानता। ऐसे हजारों लोग हैं जो ऐसी बेवकूफियों में पैसा गंवाते हैं जिनमें समझदार लोग फंसने की सोच भी नहीं सकते। इसलिये अपने मन के गुणदोषों को समझना जरूरी है। अगर हम भक्ति भाव से रहेंगे तो इस पर नियंत्रण कर सकते हैं अन्यथा बंदरों की तरह तो सभी नाच रहे है।

Wednesday, April 23, 2008

रहीम के दोहे:अपने मन की वेदना सबके सामने मत प्रगट करो

रहिमन आंसुवा नैन ढरि, जिस दुख प्रगट करेइ
जाहिं निकारो गेह तें, कस न भेद कहिं देइ


कविवर रहीम कहते हैं कि अपने दिल का हाल हर किसी से मत कहो। सबके सामने आपने आंसु गिराने से कोई लाभ नहीं। यहां लोग दूसरे की वेदना का रहस्य सबके सामने कहकर उपहास उड़ाते हैं। अपने दुःख भुलाने के लिये दूसरों की वेदना का मजाक उड़ाने में उनको मजा आता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-समाज सिकुड़ रहा छोटे और विघटित परिवारों तथा अन्यत्र स्थानों पर कार्य करने की वजह से कई लोग अकेलेपन को झेल रहे हैं। ऐसे में जब उनकी पीड़ा असहनीय हो जाती है तब वह अपने आसपास के लोगों को अपना समझकर कहने लगते हैं जबकि वही लोग बाद में उनका उपहास उड़ाते है। उसके बाद होता यह है कि अपनी समरूया का हल तो होता नहीं उल्टे लोग हंसी उड़ाकर तकलीफ और देते हैं। सच बात तो यह है कि सभी लोग अनेक प्रकार के तनाव झेल रहे हैं पर जब कोई उनको तकलीफ सुनाता है तो वह यह सोचकर तसल्ली कर लेते हैं कि चलो दूसरा भी दुःखी है। अपना दर्द पीते हैं फिर कोई अपनी तकलीफ सुना जाये तो सबके सामने उसका मजाक कर अपना मनोरंजन करते हैं। उसके साथ यह हुआ। देखो उसने यह गलती कर डाली।

ऐसे में अच्छा यही है कि अपनी पीड़ा आप झेलते रहो। समय कभी एक जैसा नहंी रहता। अच्छा समय निकल गया तो बुरा भी निकल जायेगा-यही सोचकर दिल को तसल्ली देना ठीक है। अगर कोई सोचता है कि दिल का हाल सुनाकर तसल्ली हो जाये तो वह संभव नहीं है। हां, अगर यह विश्वास हो जाये कि कोई व्यक्ति वाकई समस्या का हल कर देगा तो फिर उसे सच बता देना चाहिए।

Tuesday, April 22, 2008

रहीम के दोहे:अपव्यय से संपत्ति का नाश होता है

संपति भरम गंवाइ के, हाथ रहत कछु नाहिं
ज्यों रहीम ससि रहत है, दिवस अकासहिं मांहि


कविवर रहीम कहते हैं कि भ्रम में आकर आदमी तमाम तरह की आदतों का शिकार हो जाता है और उसमें अपनी संपत्ति का अपव्यय करता रहता है और एक दिन ऐसा आ जाता है जब उसके पास कुछ भी शेष नहीं रह जाता। इसके साथ ही समाज में उसकी प्रतिष्ठा खत्म हो जाती है।

संतत संपति जानि कै, सबको सब कुछ देत
दीन बंधु बिन दीन की, कौ रहीम सुधि लेत


कविवर रहीम कहते हैं कि जिनके पास धन पर्याप्त मात्रा में लोग उनको सब कुछ देने को तैयार हो जाते हैं और जिसके पास कम है उसकी कोई सुधि नहीं लेता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस संसार में माया का खेल विचित्र है। वह कभी स्थिर नहीं रहती। आजकल जितने धन के उद्भव के काले स्त्रोत बने हैं उतने उसके पराभव के मार्ग बने हैं। ऐसे अनेक लोग हैं जिन्होंने अपने पद, प्रतिष्ठा और परिवार के नाम पर गलत तरीक से अथाह धनार्जन किया पर उनके घर के सदस्यों ने ही गलत मार्ग अपना कर जूए, शराब, सट्टे तथा अन्य व्यसनों में तबाह कर दिया। देखने के लिये अनेक भले लोग अपने धन का अहंकार दिखते हैं पन अपने बच्चों की आदतों से उनका मन हमेशा विचलित होता है। हालांकि कुछ लोग अनाप-शनाप पैसा कमा रहे हैं और अपने बच्चों के विरुद्ध शिकायत न तो सुनते हैं और न ही कोई उनके सामने करता है।

यह कारण है कि आजकल जो कथित बड़े लोग उनके अनेक घर के रहस्य जब सामने आते हैं तो लोग हैरान रह जाते हैं। उनका अपने परिवार पर बस नहीं हैं। कई लोग तो जिनका नाम था अब इसलिये गुमनाम हो गये क्योंकि उनका धन पूरी तरह गलत कामों की वजह से तबाह हो गया। उनकी चर्चा अब इसलिये नहीं होती क्योंकि जिनके पास धन नहीं है उनकी चर्चा भला कौन करता है? इसके बावजूद भी शिक्षित और कथित ज्ञानी लोग भी वैभवशाली लोगों का चाटुकारिता करते हैं और गरीब को अनदेखा करते हैं। अमीर के दौलत से कुद पाने के लिये ही वह लोग उनके इर्दगिर्द चक्कर लगाते है। गरीब को तो वह पांव की जुती समझते हैं। इसके बावजूद हमें समझदार होना चाहिए और सबके प्रति समान व्यवहार करना चाहिए। ऐसा भी होता है कि अमीर की चाटुकारिता करते रहो पर हाथ कुछ नहीं आता। कोई अमीर किसी की बिना कारण सहायता नहीं करता। यह हमें समझना चाहिए। अगर कोई हमारी सहायता करने आ रहा है तो समझ लो उसका कोई स्वाथ है।

Monday, April 21, 2008

रहीम के दोहे:समय छोटे को भी बड़ा बना देता है


छोटेन सों साहैं बंड़े, कहि रहीम यह लेख
सहसन का हय बांधियत, लै दमरी की मेख


कविवर रहीम कहते हैं कि छोटा आदमी भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता। समय छोटे को कभी कभी महत्वपूर्ण बना देता है। हजारों में मोल वाली गाय भैंस और घोड़े को जिस खूंटे में बांधा जाता है वह सस्ता मिलता है, पर वह अपने से कीमती पशु को बाँधने के काम आते है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जब कमीज में बटन नहीं होता तो उसे पहनने में संकोच होता है और उसे टांकने के लिये घर में हम सुई ढूंढते हैं। होता यह है कि एक कमीज को बटन टांगने के लिये सुई लाते हैं और फिर उसे कहीं लापरवाही से रख देते हैं। सस्ती होती है तो परवाह नहीं करते पर वक्त पर वह भी काम आती है। ऐसे ही लोगों की मनोवृत्ति होती है कि छोटे आदमी की परवाह नहीं करता। वैसे अगर थोड़ा चिंतन करें तो अनेक मौके पर छोटे आदमी ही काम करते हैं। ऐसा हो सकता है कि हमारी मित्रता और संपर्क बड़े लोगों से हैं पर क्या हम अपना कोई काम उनको सामने कह सकते हैं। घर में कोई कार्यक्रम है तो हम अपने से अमीर और बड़े रिश्तेदार से काम नहीं कह पाते जबकि छोटे और गरीब रिश्तेदार से कह सकते हैं।
इतना ही नहीं आपने देखा होगा कि अनेक जगह नौकरों द्वारा मालिक के प्रति अपराध के समाचार आते हैं होता यह है कि या तो कभी वह मालिक के रवैये से क्षुब्ध होकर अपराध करते हैं या फिर मालिक नौकर से यह सोचकर लापरवाह हो जाते हैं कि यह क्या कर लेगा। दोनों ही स्थितियों से बचने का एक ही रास्ता है वह यह कि हम समदर्शी हो जायें। इससे एक लोग हमसे नाराज नहीं होंगे और सतर्कता का भाव भी पैदा होगा। चुभ जाये तो कांटा भी भारी तकलीफ देता है और काम आये तो सुई भी काम आती है-यह ध्यान हमेशा रखना चाहिए।

Sunday, April 20, 2008

सेवक होकर स्वामी जैसा पाया सम्मान, जय श्री हनुमान

आज हनुमान जयंती है। हनुमान जी में हªदय से भक्तिभाव रखने वाले लोग उनके प्रभाव को जानते है। हनुमान जी के चरित्र को आज के संदर्भों में देखें तो ऐसा लगता है कि उनमें भक्तिभाव रखने के साथ उनके चरित्र की भी चर्चा करना चाहिए। श्री हनुमान जी के चरित्र के मूल में उनका भगवान श्रीराम के प्रति ‘सेवाभाव‘ और ‘भक्ति भाव’’ और श्री सुग्रीव के प्रति मैत्रीभाव सदैव लोगों को आकर्षित करता रहा है। मैं जब उनका स्मरण करता हूं तो ‘सेवक से स्वामी’और ‘भक्त से भगवान’ बनने वाले एक इष्ट की तस्वीर मेरे मस्तिष्क में उभरती है। यह तस्वीरे मस्तिष्क में इस तरह स्थापित है कि जब प्रति मंगलवार जब मंदिर जाता हूं तो उनकी वहां स्थापित तस्वीर से अधिक मेरे हªदय में स्थापित तस्वीर आकर्षित किये रहती है और लगता है वही मेरे सामने है।
वर्तमान में जब समाज की हालत देखता हूं तो लगता है कि हनुमान जी चरित्र के मूल गुणों की भी व्याख्या करना चाहिए। आजकल लोग सेवक की बजाय स्वामी बनने के लिये आतुर रहते है और जिनके हाथ में वैभव का भंडार है वह भगवान बनकर अपने लिये भक्तों को खरीदना चाहते है। हनुमान जी का राम और सुग्रीव के प्रति जो समर्पण का भाव था वह सत्य और धर्म की वजह से था-न कि उसके पीछे उनका कोई स्वार्थ था।

श्री राम मर्यादा पुरुषोतम थे ओर किसी भी स्थिति में उन्होंने धर्म से मूंह नहीं मोड़ा। सुग्रीव ने हर स्थिति में श्रीराम को सहायता का आश्वासन दिया था। जब राजपाट मिल गया और उन्होंने वैभव और व्यसनों के मायाजाल में फंसकर अपना मूल कर्तव्य भुला दिया। तब एक हनुमान ही थे जो उन्हें लगातार समझाते रहे कि उन्हें अपने कर्तव्य का स्मरण करना चाहिए। श्रीसुग्रीव ने उनकी बात मान ली और उन्हे अपनी सेना तैयार होने का आदेश दिया। इसी बीच कुपित लक्ष्मण जब उनके महल में दाखिल हो गये तो सबसे पहले हनुमानजी ने ही उन्हें अपनी चतुराई और वाक्पट्ता से उनको प्रसन्न किया। श्रीलक्ष्मण जी उनकी बात सुनकर ही शांत हुए। इस प्रसंग में यह स्पष्ट होता है कि श्रीहनुमान जी कोई सामान्य वानरजातीय मनुष्य नहीं वरन् समय, देशकाल तथा राज्य की परिस्थितियों का ज्ञान रखने वाले विद्वान थे। उन्हें राजनीति का भी अच्छा ज्ञान था। वानरों के राज्य में सुग्रीव के बाद श्री हनुमान जी को ही सम्मान होना उनके बाहूबल के साथ उनके बुद्धिमान होने का भी प्रमाण था।
जब सीता जी की खोज में सब वानर थक गये तब उनके नेता अंगद का धीरज टूट गया और वह आमरण अनशन पर बैठ गये। श्री हनुमान ने तब विचार किया कि इस तरह तो अंगद संभवतः सुग्रीव का राज्य छीन लेंगे-कारण वानरों में कष्ट सहने की क्षमता वैसे ही कम होती है, और जब भूख से यह लोग बिलबिलाऐंगे ओर उनको परिवार की याद आयेगी तो वह उग्र हो जायेंगे और सुग्रीव का भय इनमें समाप्त हो जायेगा। तब वह अंगद को आगे कर उनसे लड़ने को भी तैयार हो जायेंगे।
विचार करते हुए श्रीहनुमान जी ने वहां सब वानरों को आपनी वाक्पट्ता से अंगद से अलग कर दिया और फिर उनको समझाने लगे कि यह वानर आपका लंबे समय तक साथ देने वाले नहीं है पर इससे आप सुग्रीव को जरूर नाराज कर लेंगे। उनकी बात का अंगद पर प्रभाव हुआ और वह अपना अभियान आगे जारी रखने को तैयार हुए। इस प्रसंग से श्रीहनुमान जी के रणनीतिक चातुर्य और बौद्धिक कौशल की जो अनूठी मिसाल मिलती है वह विरले ही चरित्रों में होती है।
उनका एक गुण जिसने उनके चरित्र को भगवान पद पर प्रतिष्ठित किया वह है अहंकार रहित होना। इतने शक्तिशाली और बुद्धिमान होते हुए भी किसी को हानि पहुंचाना या अपमानित करने जैसा कार्य उन्होंने कभी नहीं किया। वह अपनी शक्ति का स्मरण तक नहीं करते थे। जब लंका जाने का प्रश्न आया तो सब घबड़ा गये तब जाम्बवान ने श्रीहनुमान को अपनी शक्ति का स्मरण कराकर इस कार्य के लिये प्रेरित किया तब वह तैयार हो गये। जरा हम आजकल लोगों को देखों थोड़ा धन, छोटा पद, और छोटी सफलता में ही मदमस्त हो जाते है। उन्हें श्रीहनुमान जी यह सीखना चाहिए कि शक्ति का प्रदर्शन दूसरों का दिखाने के लिये वरन् उनके हित के लिये करना चाहिए।
मैंने श्रीहनुमान जी के चरित्र की जो चर्चा की उसे हर कोई जानता है। मेरा मानना है चर्चा फिर भी होती रहना चाहिए। जब हम किसी के अच्छे गुणों की चर्चा करते हैतो वह धीरे धीरे हम में भी स्थापित हो जाते है और हम कभी किसी की बुराईयों की चर्चा करते हैं तो वह भी हमारे अंदर आ जाती है। इसीलिये सार्थक चर्चा जिन्हें मैं सत्संग का ही रूप मानता हूं करते रहना अच्छा लगता है

Saturday, April 19, 2008

संत कबीर वाणी:खेत में फ़ैली मिसरी को हाथी नहीं चुन सकता

मिसरी बिखरी खेत में, हस्ती चुनी न जाए
कीड़ी ह्वै कर सब चुनै, तब साहिब कू पाए


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि यदि खेत में मिसरी बिखरी पड़ी है तो हाथ उसे नहीं चुन सकता जबकि चींटी उसे चुन कर खाती है। व्यक्ति नम्रता से ही कुछ पा सकता है अहंकार से नहीं।

कबीर नवै सो आपको, परको नवै न कोय
घालि तराजू तोलिये, नवै सो भारी होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि यदि कोई अपने अगर किसी में नम्रता का गुण के कारण झुकता है तो वह उसके संस्कारों और योग्यता का मापदंड है जैसे तराजू वह पलड़ा जिसमें वजन होता है नीचे झुकता और जिसमें नहीं वह उठा रहता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जैसे हमारा समाज अपने अध्यात्मिक ज्ञान से दूर होता जा रहा है वैसे ही तमाम तरह का तनाव बढ़ रहा है। लोगों को विद्यालयों में अर्थशास्त्र, गणित, विज्ञान, सांख्यिकी, भौतिकी, इतिहास तथा अन्य विषयों की शिक्षा तो दे रहे हैं पर संस्कारों के लिये जिस अध्यात्मिक शिक्षा की आवश्यकता है उससे सब परे हैं। जिन माता पिता ने यह शिक्षा अपने बुजुर्गों से प्राप्त की है वह भी अब उसे भूल कर इस मायामय संसार में अपने बच्चों को मायावी बनाना चाहते हैं। उनसे अपेक्षा करते हैं कि वह किसी भी तरह धनार्जन कर समाज में उनकी प्रतिष्ठा बढ़ायें इसलिये उनको अध्यात्मिक शिक्षा देना तो दूर उससे परे रखना चाहते हैं। परिणाम सबके सामने है।
अहंकार ऐसा गुण है जो इस देह के साथ पैदा होते ही आता है इसलिये उस पर नियंत्रण के लिये बच्चे को छोटे में ही अध्यात्मिक शिक्षा की आवश्यकता होती है। उससे परे रहने के कारण उनमें हिंसक प्रवृति छोटी आयु मेंे ही घर करने लगती हैं। आजकल हम स्कूलों में बच्चों द्वारा अपने साथी छात्रों की हत्या के समाचार पढ़ते रहते है वह इसी अहंकार की प्रवृत्ति का परिणाम है अब हम भले ही यह कहते रहें कि बच्चे हैं हो जाता है पर वास्तविकता यह है कि बड़ों का कोई भी गुण या दुर्गुण बच्चे जल्दी ग्रहण करते हैं और जिन बच्चों में हिसा और घृणा का भाव है वह उनके परिजनों की ही देन है।

इसलिये अपने तथा बच्चों के अंदर नम्रता का भाव आये इसके लिये उनको शुरू में ही अध्यात्म की तरफ प्रेरित करना चाहिए। उनके सामने घर में भगवान की आरती गानी चाहिए और समय समय पर उनको मंदिर भी ले जाना चाहिए ताकि भगवान की मूर्ति के आगे शीश नवाने से उनमें नम्रता का भाव आये।
नोट-यह इस ब्लोग की २०० वीं पोस्ट है। पाठकों और मित्रों के स्नेह और ईश्वरीय प्रेरणा के यह संभव नहीं था क्योंकि यह ब्लोग मैंने क्यों शुरू किया मुझे स्वयं भी पता नहीं था। मैं इस पर क्यों और कैसे लिखता हूँ यह भी नहीं मालुम। कोई अदृश्य शक्ति है जो मुझसे यह लिखवाती है ऐसा लगता है और वह मित्रों और और पाठकों के स्नेह और ईश्वरीय प्रेरणा के और कौन हो सकता है।

Friday, April 18, 2008

संत कबीर वाणी:खुद को पानी नहीं मिले दूसरों को बांटे खीर

पानी मिले न आपको, औरन बकसत छीर
आपन मन निहचल नहीं और बंधावत धीर


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कुछ लोगों को पानी तक नहीं मिलता और दूसरों को खीर प्रदान करने की बात करते हैं और अपनी बुद्धि निश्चयात्मक नहीं है और दूसरों को धीरज प्रदान करते हैं।

पढि पढि के समुझावई, मन नहीं धरि धीर
रोटी का संसै पड़ा, यौं कहें दास कबीर

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कई लोग धर्मग्रंथों को पढ़कर उसे रट लेते हैं और दूसरों को समझाने लगते हैं पर उनका आचरण भी कोई अच्छा नहीं होता। सदैव अपनी रोटी की जुगाड़ में रहते हैं दूसरों को ज्ञान बघारते हैं

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल धर्मोंपदेश करना व्यवसाय हो गया है। ऐसे अनेक संत हैं जो केवल धन कमाने के लिए ही कथा या उपदेश काम काम करते हैं। ऐसी बातें करते हैं जैसे कि बहुत बड़े ज्ञानी हों और अनेक लोग उनको गुरू मानकर उनकी चरण वंदना करने लगते हैं। यह उनका भ्रम होता है। कई धर्मोपदेशक तो स्वयं भी उस ज्ञान को ग्रहण नहीं करते और अपने अपना काम समाप्त कर उसका दाम वसूल करते हैं। कई जगह जाने से पहले ही दाम तय कर लेते हैं।

यहां हमारा आशय किसी की निंदा करना नहीं है। हम तो बस यह कहना चाहते हैं कि वह व्यवसाय करते हैं यह सभी भक्तों को समझ लेना चाहिए। इन पंक्तियों का लेखक स्वयं ही कई कथाओं में समय पास करने या ज्ञान पाने के लिये जाता है पर उसका उद्देश्य केवल धर्मग्रंथें में पढ़े हुए ज्ञान को स्मरण करना मात्र होता है। ऐसे धर्मोपदेशकों को साधु या संत मानकर सेवा करने या दान से कोई लाभ नहीं होता। उनकी चरणवदंना के कभी भक्ति प्राप्त नहीं होता और जो उनको गुरू बनाते हैं वह भी कोई भगवान का आर्शीवाद नहीं पाते। इनके प्रवचन तो सुनना चाहिए पर फिर भगवान का ध्यान लगाना चाहिए न कि इनके आकर्षण में बंधकर भगवान की भक्ति से विमुख होना जरूरी है। ऐसे लोगों पर माया की कृपा तो होती है पर भगवान की कृपा तो गरीब की सहायता करने, प्यासे को पानी पिलाने और परमार्थ के अन्य काम करने से होती है।

Thursday, April 17, 2008

रहीम के दोहे:पराए देश में कमाना, आत्मसम्मान गंवाना

भला भयो घर से छुट्यो, हंस्यो सीस परिखेत
काके काके नवत हम, अपन पेट के हेत

कविवर रहीम कहते हैं कि घर से छूटकर दूसरी जगह पर कमाना बहुत अच्छा लगता है पर इसके लिये वहां पर दूसरों के आगे सिर नवाना पड़ता है और हमारे ऊपर बैठा सबका रक्षक परमात्मा हंसता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अनेक लोग धन कमाने के लिये अपने गांव और प्रदेश से बाहर जाकर अपनी प्रतिभा से अच्छी आय भी अच्छी अर्जित करते हैं पर उनको कई कारणवश दूसरों के सामने झुकना पड़ता है तब उनकी आत्मा को भारी कष्ट होता है। हमारे देश से कई लोग विदेशों में जाकर बसे हैं इसमें कुछ देश ऐसे है जिनके राज्य धार्मिक आधार पर चलते हैं और वहां दूसरे धर्म के लोगों के लिये किसी भी प्रकार की आराधना करने की अनुमति नहीं है। ऐसे देशों के रहने वाले भारतीयों को उस देश की आराधना के वक्त अपने काम बंद रखने पड़ते हैं। इसके अलावा चूंकि उन देशों के पुराने धार्मिक कानून चलते हैं अतः उन्हें सतर्क रहना पड़ता है कि कहीं से उनके धर्म पर कोई ऐसी टिप्पणी न हो जाये जिसका परिणाम उन्हें भोगना पड़े।

हमारे देश के विद्वान मनीषी उदार रहे हैं और यह हम समझते हैं कि सभी जगह ऐसा है तो यह भ्रम है। धार्मिक राष्ट्रों में तो विद्वान लोग ही हिंसक कानूनों को लागू करने में सहायता करते हैं और इतना ही नहीं वह अपने यहां किसी अन्य धर्म के पालन की अनुमति देने के भी विरुद्ध हैं। हां, वह दूसरे स्थानों से दूसरे धर्म के लोगों के आने के खिलाफ नहीं हैं क्योंकि वह तो उनकी प्रतिभा का लाभ उठाकर अपने देश के हित साध रहे हैं। भारत में बेरोजगारी अधिक है इसलिये अनेक लोग ऐसे राष्ट्रों में जाते हैं और खूब कमाते हैं पर अपने इष्ट का स्मरण न कर जो पीड़ा झेलते हैं वह उसे कह भी नहीं पाते। कुछ लोगों ने अपनी बातें घुमाफिराकर लिखीं पर स्पष्ट किसी ने नहीं लिखा और न वह मांग कर पाते हैं कि वह भी उन देशों की सेवा करते हैं और उनको अपने धर्म पालन की अनुमति दी जाये। ऐसे कई देशों में भारतीयों के मानसिक तनाव की चर्चा तो आती है पर उस पर कोई रोशनी नहीं डालता कि वह किस कारण से है?

उनके मानसिक तनाव का कारण भी यही है कि हमारे देश का आदमी अपने इष्टों की प्रतिमाओं के आगे शीश नवाकर अपने मन का बोझ हल्का करता है और वहां इसकी अनुमति न होने से उनकी आत्मा त्रस्त होती है। उनको ऐसे कानून मानने पड़ते हैं जो उनके अनुकूल नही है। ऐसे में रहीम को दोहे में उन लोगों के की मानसिक पीड़ा की अभिव्यक्ति प्रकट होती है वह विचारणीय है।

Wednesday, April 16, 2008

संत कबीर वाणी:जो शिक्षा भ्रम में रखे वह किस काम की

पढ़ै गुनै सीखै सुनै, मिटी न संसे सूल
कहैं कबीर कासों कहूं, ये ही दुख का मूल

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि बहुत पढ़ा सीखा और गुना पर मन में जो संशय के कांटे हैं वह न नहीं निकल सके। यह बात किसको बतायें कि यह पढ़ना लिखना ही दुःख का मूल कारण है।

पण्डित पोथी बांधि के, दे सिरहाने सोय
वह अक्षर इनमे नहंी, हंसि दे भावे रोय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी पोथी बांध कर अपने सिरहाने रख दो क्योंकि इनमें वह अक्षर ज्ञान नहीं है जो रोते हुए को अच्छा लगे और वह हंसने लगे।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-ऐसा लगता है कि कबीर दास जी के समय ही लोग अध्यात्मिक शिक्षा से दूर होने लगे थे और धर्म में नाम पर भी केवल सांसरिक कार्यों तथा कर्मकांडों की शिक्षा दी जा रही थी इसलिये कबीरदास जी ने ऐसा शिक्षा की आलोचना की। आज तो पूरी तरह से अंग्रेजों द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति को-जो उन्होंने भारत की पुरातत्व ज्ञान को यहां के लोगों के दिमाग से निकाल फैंकने तथा उन्हें हमेशा गुलाम बनाये रखने के लिये बनायी-अपनाये हुए हैं। दुनियां में बहुत लोग अंग्रेजी बोलते हैं पर सभी सभ्य और धनी नहीं है। अंग्रेजी से सबको रोटी भी नहीं देती। फिर यहां हर आदमी अपने बच्चे को अंग्रेजी सिखाना क्यों चाहता है? कहीं उसे अच्छी नौकरी मिल जायेगी। बड़े-बड़े धनाढ्य सेठ अंगूठा टेक हैं फिर समाज में उनकी इज्जत है क्योंकि वह किसी की नौकरी यानि गुलामी नहीं करते। नौकरी कितनी भी अच्छी क्यों न हो गुलामी होती है इस सत्य को कोई बदल नहीं सकता फिर भी करोड़ों की संख्या में लोग इसीलिये पढ़ रहे हैं कि उनको कही नौकरी मिल जाये।

अब आदमी पढ़ा लिखा भी है तो क्या केवल गुलामी करने वास्त ही न! तब ऐसी किताबों को पढ़ने से क्या फायदा जो गुलामी करने के लिये मजबूर करतीं है। इसलिये अच्छा है कि अध्यात्मिक शिक्षा भी प्राप्त की जाये। चूंकि आजकल की शिक्ष से एकदम परे होने का मतलब है अक्षर ज्ञान से वंचित होना इसलिये जितनी आवश्यक हो उतनी प्राप्त कर अपना स्वतंत्र काम करते हुए भगवान भजन करना चााहिए।

Tuesday, April 15, 2008

रहीम के दोहे:जहाँ शील और सदाचार न हो वह स्थान त्याग दें

रहिमन रहिबो वा भलो जो लौं सील समूच
सील ढील जब देखिए, तुरत कीजिए कूच


कविवर रहीम कहते हैं कि वही रहना ठीम है जहां लोगों में शील और सदाचार का भाव है। जहां इसमें कमी दिखाई दे वहां से हट जाना चाहिए।

रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागे बार
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार


कविवर रहीम कहते हैं कि अधर्म से प्राप्त धन को नष्ट हाने में समय नहीं लगता। होली के अवसर पर लोग चोरी की लकड़ी लाते हैं पर उसको जलकर रख होने में क्षण भी नहीं लगता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-वैसे तो देखा जाय बुरे लोग तो रहीम जी के समय में ही रहे हैं इसलिये तो उन्होंने ऐसी बातें कहीं हैं जो आज भी प्रासंगिक लगतीं हैं। एक बात जरूर है कि उस समय आवागमन के साधन इतना तीव्र नहीं थे इसलिये आदमी अधिकतर अपने सीमित क्षेत्र में ही जीवन व्यतीत करता था। वर्तमान में कई कारणों से अपने मूल स्थान से दूर जाना पड़ता है और ऐसे में भले और बुरे दोनों प्रकार के लोगों का कार्यक्षेत्र भी विस्तृत हुआ है अतः दुष्ट लोग अपराध कर अपने क्षेत्र आसानी से बदलने लगते हैं ताकि दूसरी जगह उनकी पहचान न हो पाये। कई जगह तो उनकी बहुतायत हो जाती है और उससे लगता है कि इस दुनियां में भलाई और सदाचार नाम की कोई चीज नहीं है। यह हमारा एक भ्रम है। अगर इस दुनिया से बुराई को लोप नहंी हुआ है तो भलाई का भी नहीं हुआ है। हम अगर ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां दुष्ट और निंदक प्रवृत्ति के लोगों का जमघट है तो हमें वहां से निकल जाना चाहिए। अगर वहां रहेंगे तो हमारे विचारों में दुष्टता का भाव और अधर्म से पैसा कमाने की प्रवृत्ति उत्पन्न होगी। अधर्म को धन वैसे भी अधिक देर नहीं ठहर जाता और कभी कभी तो वह अपने स्वामी को भी नष्ट कर देता है। अतः कुविचारों की बहुतायत वाले स्थान को त्यागने के साथ अधर्म से धन प्राप्त करने को मोह त्याग देना चाहिए।

Sunday, April 13, 2008

संत कबीर वाणी:दूसरे को प्रसन्न करें ऐसे लोगों का है अकाल

मानुस खोजत मैं फिरा, मानुस बड़ा सुकाल
जाको देखत दिल घिरे, लाका पड़ा दुकाल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मैं इधर-उधर फिरकर मनुष्य ढूंढता फिरा जिनमें शुद्ध भावना हो उनका एकदम अकाल है। ऐसे मनुष्य जिनको देखकर दिल में प्रसन्नता हो उनका तो यहां मिलना दुर्लभ है।

कायर सेरी ताकवै, सूरा भांड़ पांव
सीस जीव दोऊ दिया, पीठ न आया घाव


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कायर तो भाग जाता है पर जो योद्धा होता है वह अपना पांव अड़ा कर खड़ा हो जाता है। भगवान के दर पर सच्चा भक्त अपना सिर झुकाता है और पीठ देकर वहां से भागता नहीं है।


वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दुनियां में मनुष्य तो बहुत हैं पर उनमें कितने लोग ऐसे है जिनको देखकर दूसरे लोग प्रसन्न होते है यह एक विचारणीन विषय है। सभी लोग अपने स्वार्थवश एक दूसरे से संपर्क करते हैं और इसी कारण किसी से हार्दिक प्रेम हो नहीं पाता है। फिर मनुष्य को उसके मन से पहचाना जाता है और वह उस अपने स्वार्थो के बंधन में रख देता है इसलिये किसी को किसी का मिलना सुहाता नहीं है।

हम लोगों को लगता है कि हमारी नीयत और कुविचारों को कोई नहीं जानता है-यह वास्तव में भ्रम है। कोई अपनी नीयत खराब रखकर हमसे कोई अच्छी बात कहता है तो हम उसकी कुटिलता को समझ जाते हैं। उसी तरह अगर हम ऐसा करते हैं तो दूसरा व्यक्ति भी समझ जाता है। असल में हमारे विचारो कहीं न कहीं हमारे चेहरे और वाणी से भी बाहर संप्रेक्षण होता है जिसकी अनुभूति हमारी आंतरिक इंद्रियां कर लेतीं हैं इसलिये ही किसी का भी सच किसी से छिप नहीं पाता। यही कारण है कि ऐसे लोग नहीं मिल पाते जिनको देखते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है। अगर हम चाहते हैं कि हम दूसरों को प्रसन्न करें तो उसके लिये पहले अपनी नीयत और विचारों में शुद्धता लायें।

Saturday, April 12, 2008

संत कबीर वाणी:पशुओं को काटने वाले राम को नहीं जानते

काटा कूटी जो करै, ते पाखंड को भेष
निश्चय राम न जानहीं, कहैं कबीर संदेस


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो पशु को मारकर उसकी देह काटा करते हैं वह सब पाखंडी हैं और भगवान श्री राम को नहीं जानते-यही मेरा संदेश है।

बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल
जो बकरी को खात है, तिनका कौन हवाल


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो बकरी केवल घासी खाती है उसकी खाल खींच ली जाती है तो उन मनुष्यों का क्या हाल होता होगा जो बकरी का मांस खाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल समाज में मांस खाने का प्रचलन बढ़ रहा है और अंग्रेजी के आकर्षक नाम रखकर उसके खाद्य पदार्थ बनाये जाते हैं। सच तो यह है कि मांस भक्षण करने के लिये मनुष्य की देह उपयुक्त नहीं है और वर्तमान समय में हम देखें तो अनेक रोग इसी कारण फेल रहे हैं क्योंकि लोग गरिष्ठ भोजन कर रहे है।
मांस खाने से शरीर में मांस बढ़ता है और इससे हमारी नसों में रक्त प्रवाह बाधित होता हैं। एक बात यह याद रखने योग्य है कि हम वैसा ही सोचते और बोलते है जैसे तत्व हमारे रक्त में हेाते हैं। इतना ही नहीं हमारी देह से वैसे ही गंध भी निकलती है जिसके अनुरूप दूसरे लोगों पर हमारा अच्छा प्रभाव पढ़ता है। यह बहुत सूक्ष्म ज्ञान है पर इसकी तरफ लोगों का ध्यान नहीं जाता।

अतः हमें अपना खान-पान में अधिक से अधिक सात्विकता रखनी चाहिए ताकि हमारे तन, मन और विचारों में पवित्रता रहे और लोगों पर उसका अच्छा प्रभाव पड़े।

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