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दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका
हिंदी मित्र पत्रिका
Wednesday, June 11, 2008
मनुस्मृतिःपरस्त्रीगमन से आयु कम होती है
यादृशं पुरुषस्येह परदारोपसेवनम्
हिंदी में भावार्थ- किसी दूसरे की स्त्री के साथ संपर्क करने जैसा कोई निकृष्ट कर्म नहीं है, उससे व्यक्ति की आयु कम हो जाती है। इसलिये पुरुषों का इस तरह की प्रवृत्ति से दूर ही रहना चाहिए।
नात्मानमवमन्येत पूर्वाभिरसमृद्धिभिः
आमृत्योः श्रियमन्विच्छेन्नैनां मन्येत दुर्लभाम्
हिंदी में भावार्थ-अपनी समृद्धि के लिये सभी प्रयास करते हैं पर अगर किसी को अपने प्रयत्नों से भी सफलता नहीं मिलती तो उसे अपनी भाग्यहीनता की निंदा स्वयं नहीं करना चाहिए। अपने प्रयत्न जारी रखना ही मनुष्य का धर्म है और कभी न कभी उसमें सफलता मिलती है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस विश्व में सभी आदमी अमीर बनना चाहते हैं पर यह संभव नहीं है। किसी को इसमे सफलता मिलती है तो किसी को नर्हीं। जिनको सफलता नहीं मिलती उनमें कुछ लोग तो चुप बैठ जाते हैं पर कुछ लोग व्याकुल होकर सभी के सामने अपनी भाग्यहीनता को कोसने लगते हैं। इससे कोई लाभ नहीं होता बल्कि ऐसा कर वह अपना ही खून जलाते हैं। जिस तरह विद्वान लोग अपनी आत्मप्रवंचना से बचने की सलाह देते हैं वैसे ही आत्मनिंदा से भी बचना चाहिए।
समय के साथ समृद्धि बढ़ी है तो देखिये समाज में नैतिक आचरण में भी कमी आती गयी है। लोगों की मित्रता के रिश्ते बदनाम हो रहे हैं। अनेक मामलों में समृद्ध लोगों पर दूसरे की स्त्री से संपर्क रखने के आरोप भी लगते हैं। कहा जाता है कि बड़े लोगों के पाप तो छिपे रहते हैं पर प्रकृति का नियम है कि सभी के लिये पाप का दंड समान है। आदमी से किसी के पाप छिप जाये पर अपने आपसे वह छिपा नहीं सकता। परस्त्रीगमन से आदमी के अंदर एक डर बैठा रहता है जो धीरे-धीरे उसकी आयु को कम करता है। कहने को बड़े और समृद्ध लोगों को सामने कुछ नहीं कहता पर स्वयं उनके मन में तो डर रहता ही है।
Sunday, June 8, 2008
भृतहरि शतकःसंतोष होने पर अमीर-गरीब समान हो जाते हैं
स तु भवतु यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्थवान् को दरिद्र
भावार्थ-इस भौतिक संसार में कोई मनुष्य वृक्ष की छाल के वस्+त्र पहनकर ही संतुष्ट होता है तो किसी का मन रेशमी सूत के बने वस्त्र धारण कर ही प्रसन्न होता है। इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। धनी और निर्धन के संतोष में कोई अंतर नही। जिसकी बहुत बड़ी इच्छाएं वह दरिद्र होते हुए भी मन के संतुष्ट हो जाता है तो भला किसे धनी कहा जाये और किसे दरिद्र।
संक्षिप्त व्याख्या-यहां कोई धनी अपने धन पर इतराता है तो कोई अपनी निर्धनता को लेकर त्रस्त रहता है। अपनी देह में विचरने वाले मन की ओर कोई दृष्टिपात नहीं करता। अगर मन में संतोष है तो फिर किस बात की चिंता रह जाती है। कुछ लोग ऐसे है जो अपने पास भौतिक साधनों के अभाव की परवाह न करते हुए भक्ति भाव से अपना जीवन व्यतीत करते हैं। वह परमात्मा द्वारा दिये गये धन से संतुष्ट हो जाते हैं पर कई धनिक हैं जो धन क पीछे सदैव पड़े रहते हैं पर मन की शांति उनसे कोसों दूर रहती है। इतना ही नहीं अपनी कम आवश्यकताओं के कारण संतुष्ट लोगों के मन की शांति उनको नहीं सुहाती और तब वह सोचते हैं कि काश! हमें मन की शांति मिल जाये।
आज का भौतिक संसार तो आपने देखा होगा मनुष्य की अशांति पर ही अधिक चल रहा है। टीवी चैनलों पर एक विज्ञापन आता है जिसमें एक अभिनेता कहता है-‘डोंट बी संतुष्ट‘। मतलब यह कि आज के युग के व्यवसायी अपने हित के लिऐ ऐसे प्रयास करते हैं कि आम आदमी के मन में असंतोष भड़काकर उन्हें माया के ऐसे चक्कर में फंसाया जहां से वह निकल नहीं सके।
अगर आदमी के मन में संतोष है इससे कोई अंतर नहीं पड़ता कि वह धनी है या निर्धन। हमारा काम कम आवश्यकता से चल जाता है तो उससे संतुष्ट हो जाना चाहिए। संतोष ही सबसे बड़ा धन है।
Saturday, May 10, 2008
संत कबीर वाणी:शब्द का महत्व चुम्बक समान
यही बड़ाई शब्द की, जैसे चुम्बक भाय
बिना शब्द नहिं ऊबरै, केता करै उपाय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि शब्द का महत्व तो चुम्बक के समान है जो आदमी को अपनी आकर्षित करता है। बिना शब्द के कोई भी अपने जीवन में उबर नहीं सकता चाहे जितने भी उपाय कर ले।
सीखै सुनै विचार ले, ताहि शब्द सुख देय
बिना समझै शब्द गहे, कछु न लोहा लेय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो शब्द सुनकर कुछ सीखता और उस पर विचार करता है उसे वह सुख प्रदान करते हैं। बिना सोचे समझे ग्रहण कर बोलने वाला व्यक्ति कोई लाभ नहीं ले पाता।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई बार कुछ लोगों को देखकर हमें यह लगता होगा कि कि अधिक बोल जाते हैं। कई बार यह अनुभव भी होता है कि वह कुछ कार्यों को समय रहते सीख नहीं पाये। यह अनुभव हमें अपने बारे में भी होता है। मनुष्य का एक दूसरे से संपर्क वार्तालाप को माध्यम से होता है और आजकल अंतर्जाल पर संपर्क होता है तो शब्द लिखकर भी संपर्क होता है। शब्द बोला जाय या लिखा जाये उसमें आकर्षण होता है। इन पंक्तियों का लेखक अंतर्जाल पर लिखता है और कई बार दूसरे का लिखा ही दिल को ऐसा छू जाता है जैसे उसने बोला हो। कई लोग ऐसे भी है जो दुःख पहुंचाने वाले शब्द लिखते हैं। ऐसे लोग अज्ञान के अंधेरे में होते हैं। वह सोचते हैं कि इस तरह शब्द लिखने या कहने से किसी पर कोई प्रभाव नहीं होता या हम अपने मन की भडास निकाल लें दूसरे पर उसका जो प्रभाव होता है उसकी हम चिंता क्यों करें? यह ऐसे लोग होते हैं जो जिनको जीवन का ज्ञान देने वाला गुरू नहीं मिला होता या फिर उन्होने उसके ज्ञान को गंभीरता से ग्रहण नहीं किया होता।
कई बार लोग एक दूसरे के लिए पीठ पीछे अभद्र शब्द का करते हुए निंदा करते हैं सोचते हैं कि कौन वह सुन रहा है या जाकर उससे कहेगा। यह सच भी होता है पर ऐसा कर वह अपने मन और देह को भी भारी कष्ट देते हैं। अपना खून जलाते हैं। अतः उनकी कमियों से सीखकर हमें अपने अंदर सुधार कर लेना चाहिए।
Wednesday, May 7, 2008
मनुस्मृति:घर चलाने का दायित्व स्त्रियों को सौंप देना चाहिए
शौचे धर्मेऽन्नपक्तयां च पारिणाहृास्य योजने
धन का संग्रह करना एवं खर्च करना, घर की स्वच्छता, भोजन बनाना तथा घर की सभा वस्तुओं को संभालने का दायित्व स्त्रियों को सौप देना चाहिए। इस तरह स्त्रियों को अपने दायित्व का निर्वहन से सुखद अनुभूति होती है और उनका मन घर में लगा रहता है।
स्वां प्रसूति चरित्रं च कुलमात्मानमेव च
स्वं च धर्म प्रयत्नेन जायां रक्षन् हि रक्षति
जो पुरुष प्रयत्नपूर्वक अपनी स्त्री की रक्षा करता है वही अपनी संतान, चरित्र, परिवार तथा अपने साथ अपने धर्म की रक्षा कर पाता है।
संपादकीय व्याख्या-आजकल स्त्रियों को सार्वजनिक रूप से अपमानित करने केे समाचार आये दिन अखबारों में छपते और टीवी चैनलों पर दिखाये जाते है। इससे यह जाहिर होता है कि उनके परिवार के पुरुष सदस्य उनके प्रति अपने दायित्वों में कहीं न कहीं कमी रखते है। स्त्रियों पर दैहिक आक्रमण ही नहीं बल्कि वाणी से भी कोई अभद्र शब्द कहना निषेध है। अब तो सरकार ने स्त्रियों के रक्षा के करने के लिये अनेक प्रकार के कानून भी बना दिये हैं। स्त्री के सम्मान की रक्षा ही धर्म की रक्षा है। कई लोग इस प्रकार के अहंकार में रहते हैं कि वह चूंकि पुरुष हैं इसलिये वहीं घर का खर्च चलाने के साथ धन का संग्रह करेंगे। ऐसे लोग स्वयं ही परेशानी बुलाते है। उनको घर चलाने का जिम्मा अपनी गृहिणी को ही सौंपना चाहिए। वह उससे बचत भी करतीं हैं और समय आने पर अपने ही पति और परिवार की सहायता करतीं हैं।
Thursday, April 24, 2008
संत कबीर वाणी:देह के अन्दर, मन हैं बन्दर
राम नाम बांधे बिना, जित भावै तित जाय
संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि मन तो बंदर के समान चंचल है कहीं ठहरता हैं। राम नाम लिये और भक्ति के बिना इस पर नियंत्रण नहीं किया जा सकता है।
कबीर बैरी सबल है, एक जीव रिपु पांच
अपने-अपने स्वाद को, बहुत नचावै नाच
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि हमारी पांचों इंद्रियां-नाक कान, जीभ आंख और त्वचा- शत्रू की तरह लगे हुए हैं और इनके अपनी अपनी चाहते है जो हमें नचाती हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- दरअसल हम अपने मन की महिमा को नहीं समझते इसलिये जीवन भर भटकते रहते हैं। मन कभी एक जगह नहीं टिक सकता और वह बंदर की तरह नाचता और नाचता है। हम यह नहीं समझ पाते। वह किसी एक स्थिति से संतुष्ट नहीं होता तमाम तरह के स्वार्थों के काम के बाद भी उसमें तृप्ति इसलिये नहीं होते क्योंकि हम परमार्थ कर उसे संतुष्ट नहीं कर सकते। स्वार्थ एक दिशा है तो परमार्थ दूसरी दिशा। वह इस दूसरी दिशा भी जाना चाहता है पर हम वह नहीं करते। नतीजा यह है कि हमारी पांच इंद्रिया शत्रू बनकर हमें सताती है। अगर हम यह मान लें कि हमारा मन बंदर है और उसे नाचने दें और परमार्थ का भी कम करें पर ऐसा तभी संभव हो जब हम भगवान की भक्ति करें। वह हमें व्यर्थ नजर आती है इसी कारण अपने मन को समझ ही नहीं पाते तो उस पर नियंत्रण कैसे हो सकता है।
यही वह मन है जिसका इस्तेमाल समझदार लोग दूसरे लोग कर अपना व्यापार चला रहे हैं। आप टीवी और पत्रपत्रिकाओं में आकर्षक विज्ञापन देखते होंगे तब आपको लगता है कि उसमें जिस उत्पाद की प्रशंसा की जा रही है वह ठीक होगा और आपका मन उसे खरीदने को लालायित होने लगता है। इतना ही नहीं आजकल विभिन्न खेलों में सट्टे की खबरें सुनते होंगे। वह कौन लोग हैं जो अपनी जीत-हार की बजाय दूसरों की जीतहार पर दांव खेलते हैं? यह वह लोग हैं जिनका अपने मन पर बस नहीं है। बस कुछ खेलना है और इसलिये खेलते हैं उनकी आंखें और कान ऐसे शत्रू की तरह हो जाते हैं जो कुछ देखना चाहते हैं। क्या? आप मनन करिये क्या इन खेलों को परिणामो से क्या होता है? कुछ देर का सुख या दुःख! पर कुछ लोगों का मन इसमें अपने लिये लाभ समेटना चाहता है। इसमें हानि ही होती है पर फिर भी उनका मन नहीं मानता। ऐसे हजारों लोग हैं जो ऐसी बेवकूफियों में पैसा गंवाते हैं जिनमें समझदार लोग फंसने की सोच भी नहीं सकते। इसलिये अपने मन के गुणदोषों को समझना जरूरी है। अगर हम भक्ति भाव से रहेंगे तो इस पर नियंत्रण कर सकते हैं अन्यथा बंदरों की तरह तो सभी नाच रहे है।
Thursday, April 17, 2008
रहीम के दोहे:पराए देश में कमाना, आत्मसम्मान गंवाना
काके काके नवत हम, अपन पेट के हेत
कविवर रहीम कहते हैं कि घर से छूटकर दूसरी जगह पर कमाना बहुत अच्छा लगता है पर इसके लिये वहां पर दूसरों के आगे सिर नवाना पड़ता है और हमारे ऊपर बैठा सबका रक्षक परमात्मा हंसता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अनेक लोग धन कमाने के लिये अपने गांव और प्रदेश से बाहर जाकर अपनी प्रतिभा से अच्छी आय भी अच्छी अर्जित करते हैं पर उनको कई कारणवश दूसरों के सामने झुकना पड़ता है तब उनकी आत्मा को भारी कष्ट होता है। हमारे देश से कई लोग विदेशों में जाकर बसे हैं इसमें कुछ देश ऐसे है जिनके राज्य धार्मिक आधार पर चलते हैं और वहां दूसरे धर्म के लोगों के लिये किसी भी प्रकार की आराधना करने की अनुमति नहीं है। ऐसे देशों के रहने वाले भारतीयों को उस देश की आराधना के वक्त अपने काम बंद रखने पड़ते हैं। इसके अलावा चूंकि उन देशों के पुराने धार्मिक कानून चलते हैं अतः उन्हें सतर्क रहना पड़ता है कि कहीं से उनके धर्म पर कोई ऐसी टिप्पणी न हो जाये जिसका परिणाम उन्हें भोगना पड़े।
हमारे देश के विद्वान मनीषी उदार रहे हैं और यह हम समझते हैं कि सभी जगह ऐसा है तो यह भ्रम है। धार्मिक राष्ट्रों में तो विद्वान लोग ही हिंसक कानूनों को लागू करने में सहायता करते हैं और इतना ही नहीं वह अपने यहां किसी अन्य धर्म के पालन की अनुमति देने के भी विरुद्ध हैं। हां, वह दूसरे स्थानों से दूसरे धर्म के लोगों के आने के खिलाफ नहीं हैं क्योंकि वह तो उनकी प्रतिभा का लाभ उठाकर अपने देश के हित साध रहे हैं। भारत में बेरोजगारी अधिक है इसलिये अनेक लोग ऐसे राष्ट्रों में जाते हैं और खूब कमाते हैं पर अपने इष्ट का स्मरण न कर जो पीड़ा झेलते हैं वह उसे कह भी नहीं पाते। कुछ लोगों ने अपनी बातें घुमाफिराकर लिखीं पर स्पष्ट किसी ने नहीं लिखा और न वह मांग कर पाते हैं कि वह भी उन देशों की सेवा करते हैं और उनको अपने धर्म पालन की अनुमति दी जाये। ऐसे कई देशों में भारतीयों के मानसिक तनाव की चर्चा तो आती है पर उस पर कोई रोशनी नहीं डालता कि वह किस कारण से है?
उनके मानसिक तनाव का कारण भी यही है कि हमारे देश का आदमी अपने इष्टों की प्रतिमाओं के आगे शीश नवाकर अपने मन का बोझ हल्का करता है और वहां इसकी अनुमति न होने से उनकी आत्मा त्रस्त होती है। उनको ऐसे कानून मानने पड़ते हैं जो उनके अनुकूल नही है। ऐसे में रहीम को दोहे में उन लोगों के की मानसिक पीड़ा की अभिव्यक्ति प्रकट होती है वह विचारणीय है।
Sunday, April 13, 2008
संत कबीर वाणी:दूसरे को प्रसन्न करें ऐसे लोगों का है अकाल
जाको देखत दिल घिरे, लाका पड़ा दुकाल
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मैं इधर-उधर फिरकर मनुष्य ढूंढता फिरा जिनमें शुद्ध भावना हो उनका एकदम अकाल है। ऐसे मनुष्य जिनको देखकर दिल में प्रसन्नता हो उनका तो यहां मिलना दुर्लभ है।
कायर सेरी ताकवै, सूरा भांड़ पांव
सीस जीव दोऊ दिया, पीठ न आया घाव
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि कायर तो भाग जाता है पर जो योद्धा होता है वह अपना पांव अड़ा कर खड़ा हो जाता है। भगवान के दर पर सच्चा भक्त अपना सिर झुकाता है और पीठ देकर वहां से भागता नहीं है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दुनियां में मनुष्य तो बहुत हैं पर उनमें कितने लोग ऐसे है जिनको देखकर दूसरे लोग प्रसन्न होते है यह एक विचारणीन विषय है। सभी लोग अपने स्वार्थवश एक दूसरे से संपर्क करते हैं और इसी कारण किसी से हार्दिक प्रेम हो नहीं पाता है। फिर मनुष्य को उसके मन से पहचाना जाता है और वह उस अपने स्वार्थो के बंधन में रख देता है इसलिये किसी को किसी का मिलना सुहाता नहीं है।
हम लोगों को लगता है कि हमारी नीयत और कुविचारों को कोई नहीं जानता है-यह वास्तव में भ्रम है। कोई अपनी नीयत खराब रखकर हमसे कोई अच्छी बात कहता है तो हम उसकी कुटिलता को समझ जाते हैं। उसी तरह अगर हम ऐसा करते हैं तो दूसरा व्यक्ति भी समझ जाता है। असल में हमारे विचारो कहीं न कहीं हमारे चेहरे और वाणी से भी बाहर संप्रेक्षण होता है जिसकी अनुभूति हमारी आंतरिक इंद्रियां कर लेतीं हैं इसलिये ही किसी का भी सच किसी से छिप नहीं पाता। यही कारण है कि ऐसे लोग नहीं मिल पाते जिनको देखते ही मन प्रफुल्लित हो उठता है। अगर हम चाहते हैं कि हम दूसरों को प्रसन्न करें तो उसके लिये पहले अपनी नीयत और विचारों में शुद्धता लायें।
Saturday, April 5, 2008
रहीम के दोहे:अपनी पीडा दूसरों को सुनाकर उपहास का पत्र बने
सुनि अठिलैहैं लोग सब, बांटि न लैहैं कोय
कविवर रहीम कहते है अपने मन के दुःख दर्द किसी से मत करो। लोग उसे सुनकर उपहास करेंगे। कोई भी उसे बांटने वाला नहीं मिलेगा।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-जीवन में दुख दर्द तो सभी को होता है पर जो उसे दूसरों को सुनाकर उसे हल्का करने का प्रयास करते हैं उन्हें समाज में उपहास का पात्र बनना पड़ता है। अब तो वैसे भी लोगों की पीड़ाएं इतनी हो गयीं हैं कि कोई किसी की पीड़ा क्या सुनेगा? सब अपनी कह रहे हैं पर कोई किसी की सुनता नहीं है। अमीर हो या गरीब सब अपने तनाव से जूझ रहे हैं। ऐसे में बस सबके पास हंसने का बस एक ही रास्ता है वह यह कि दूसरा अपनी पीड़ा कहे तो दिल को संतोष हो कि कोई अन्य व्यक्ति भी दुखी है। उसकी पीड़ा का मजाक उड़ाओ ‘‘देख हम भी झेल रहे हैं पर भला किसी से कह रहे हैं‘।
कई चालाक लोग अपने दुख को कहते नहीं है पर अपनी पीड़ा को हल्का करने के लिये दूसरों की पीड़ा को सबके सामने सुनाकर उसे निशाना बनाते हैं। ऐसे लोगों को अपनी थोड़ी पीड़ा बताना भी मूर्खता है। वह सार्वजनिक रूप से उसकी चर्चा कर उपहास बनाते है। ऐसे में अपना दर्द कम होने की बजाय बढ़ और जाता है। अपने दुःख दर्द जब हमें खुद ही झेलने हैं तब दूसरों को वह बताकर क्या मिलने वाला है? जब हमारे दर्द को कोई इलाज करने वाला नहीं है उसकी दवा हमें ढूंढनी है तो फिर क्योंकर उसे सार्वजनिक चर्चा का विषय बनाएं। उसका हल हो न हो पर लोग पूछते फिरेंगे-‘‘क्या हुआ उसका?’’
हम अपनी उस पीड़ा को भूल गये हों पर लोग उसे याद कर बढ़ा देते हैं। ऐसे में कुछ अन्य विषय पर सोच रहे हों तो उससे ध्यान हटकर अपनी उसी समस्या की तरफ चला जाता है। बेहतर है अपने दर्द अपने मन में रखें।
Thursday, April 3, 2008
रहीम के दोहे:किसी के कहने से बडे लोग छोटे नहीं हो जाते
गिरधर मुरलीधर कहे, कछु दुख मानत नाहिं
कविवर रहीम कहते हैं कि बड़े लोगों को कोई छोटा कहता है तो वह छोटे नहीं हो जाते। भगवान श्री कृष्ण जिन्होंने गिरधर पर्वत उठाया उनको कुछ लोग मुरलीधर भी कहते हैं पर इससे उनकी मर्यादा कम नहीं हो जाती।
जो मरजाद चली सदा, सोई तो ठहराय
जो जल उमगै पारतें, कहे रहीम बहि जाय
कविवर रहीम कहते हैं कि जो सदा से मर्यादा चली आती है, वही स्थिर रहती है। जो पानी नदी के तट को पार करके जाता है वह बेकार हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-कई लोगों को तब बहुत पीड़ा होती है जब कोई उनको छोटा या महत्वहीन बताता है। सच बात तो यह है कि आजकल हर कोई एक-दूसरे को छोटा बताकर अपना महत्व साबित करना चाहता है। ऐसे में कोई व्यक्ति अगर हमको छोटा कहता है या आलोचना करता है तो उसे सहज भाव से ग्रहण करना चाहिए। अपने मन में यह सोचना चाहिए कि जो हम और हमारा कार्य है वह अपने आप हमारा महत्व साबित कर देगा। भौतिक साधनों की उपलब्धता आदमी को बड़ा नही बनाती और उनका अभाव छोटा नहीं बनाती। आजकल के युग में जिसके पास भौतिक साधनों का भंडार है लोग उसे बड़ा कहते है और जिसके पास नहीं है उसे छोटा कहते है। जबकि वास्तविकता यह है कि जो अपने चरित्र में दृढ़ रहते हुए मर्यादित जीवन व्यतीत करता है वही व्यक्ति बड़ा है। इसलिये अगर हम इस कसौटी पर अपने को खरा अनुभव करते हैं तो फिर लोगों की आलोचना को अनसुना कर देना चाहिए।
Sunday, March 30, 2008
संत कबीर वाणी:पंडित और मशालची को कुछ नहीं सूझता
औरन को करै चांदना, आप अंधेरे मांहि
संत शिरोमणि कबीरदासजी कहते हैं कि पोथी पढ़कर अपने आपको पंडित कहलाने वाले और मशाल लेकर दूसरे को मार्ग बतलाने वाले दोनों ही अज्ञान और अंधेरे में रहते हैं।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या- आपने देखा होगा कि अनेक लोग धार्मिक पुस्तकें पढ़ते हैं और अवसर मिलने पर लोगों के बीच अपना ज्ञान बघारते हैं। ऐसे लोगों का व्यवहार और कार्य देखें तो यह लगेगा कि उनका ज्ञान केवल गले तक ही सीमित है और उन्होंने उसे अपने मस्तिष्क में धारण नहीं किया है। कुछ मामलों में तो आम सांसरिक व्यक्ति से भी अधिक लोभी, लालची, कामी, और क्रोधी होते है।
आज के समय तो धार्मिक प्रवचन करना एक व्यवसाय होता है। प्रवचनकर्ता अपने कार्यक्रमों के लिये भारी फीस वसूल करते हैं और अपने यजमानों की प्रशंसा में अपने भक्तों के सामने ही तमाम वाक्य व्यक्त करते हैं। कार्यक्रमों की समाप्ति के बाद अपने सामान्य भक्तों से वह ऐसे ही दूर हो जाते हैं जैसे कि कोई वी.आई.पी. हो। इतना ही नहीं कुछ घटनाएं ऐसीं भीं हुंईं हैं कि कम पैसा मिलने पर वह ऐसे तथाकथित ज्ञानी कार्यक्रम बीच में ही छोडकर चले जाते है। वह लोग अपने को कभी भगवान का सामान्य भक्त तक नहीं कहते क्योंकि उनमें अपने ज्ञान का इतना अहंकार होता है कि ऐसा कहने में अपने को छोटा अनुभव करते है। कुल मिलाकर वह दूसरों को उपदेश करते हैं पर खुद अज्ञान के अंधेरे में रहते है।
ऐसे लोगों के कार्यक्रम में जाकर उनके प्रवचन कार्यक्रम में अपना समय पास करने या ज्ञान के वचन सुनने में कोई बुराई नहीं है पर उनके आकर्षण में आकर उन्हें अपना गुरू बनाना कभी लाभदायक नहीं हो सकता।
Friday, March 7, 2008
संत कबीर वाणी:परनिंदक अपने दोष नहीं देखते
दोष पराया देखि करी, चले हसन्त हसन्त
अपना याद न आवई, जाकर आदि न अंत
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की दूसरों की निंदा करने वाले दूसरों के दोष देख कर हँसते-हँसते चलते हैं परन्तु अपने दोष देखने का प्रयास नहीं करते। ऐसे लोगों की संख्या बहुत है और उनका न आदि है और अंत।
भावार्थ- दूसरे के निंदा करना एक मानवीय स्वभाव है, और यह काम एकदम आसान भी है। कुछ लोग तो बस इसी काम में जुटे रहते हैं। उनके पास कोई काम नहीं होता सिवाय दूसरे के छिद्र ढूँढने के।वैसे तो सभी लोग एक-दूसरे की निंदा करते हैं पर कुछ लोग तो इसका अधिक रस लेते हैं। वह दूसरे के दुर्गुणों का बखान इस तरह करते हैं जैसे वह उनमें नहीं है। वह इस कदर परनिंदा में रहते हैं की लोग उनसे घृणा करते हैं पर सामने कुछ नहीं कहते कि वह व्यक्ति दूसरे स्थान पर जाकर फिर उनकी निंदा करेगा। निंदक लोग दूसरे की निंदा करते हुए हँसते जाते हैं। सामने वाला आदमी इन्तजार करता है कि कब वह जाएं पर जाते नहीं। वह दूसरे की निंदा करते हुए हँसते जाते है और उनके जाने के बाद ही सामने वाला चैन की सांस ले पाता है। अगर हमें लगे यह परनिंदा का गुण हमारे अन्दर भी है और उसे लोग नाराज हैं तो उसे दूर हटने का प्रयास करना चाहिए।
Thursday, March 6, 2008
संत कबीर वाणी: मसखरा मन कब कहाँ जाये
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की जब मनुष्य अपने जीवन में संघर्ष करता है तब उसके परिणाम के बारे में कुछ कह नहीं पाता क्योंकि उसका अपने मन पर नियंत्रण नहीं रहता। कब कोई भारी विपदा आ जायेऔर मसखरा मन किधर भाग जाये यह कोई बता नहीं सकता।
लेखकीय अभिमंत--यहाँ कबीरदास जी लोगों को अपने मन पर नियंत्रण रखने का संदेश देते हैं। हम अगर देखें तो कई जगह कोई घटनाक्रम होता है तो हम अपनी कोई राय कायम नहीं कर पाते कि पता नहीं हम गलत तो नहीं हैं। कहीं किन्हीं दो व्यक्तियों में विवाद होता है तो हम सत्य बात नहीं कह पाते क्योंकि लगता है पता नहीं कब गलत पक्ष वाले के सहयोग की जरूरत पड़ जाये। कई बार हमारे सामने किसी विषय पर दो मार्ग होते हैं पर हम किसी एक का चयन नहीं कर पाते कि पता नहीं अधिक लाभदायक कौनसा है। हम कई बार ऐसे काम करते हैं क्योंकि दूसरे भी करते हैं भले ही कोई परिणाम हमें न प्राप्त हो पर लगता है कि कहींहम दूसरों से पीछे न रह जाएं। चलाता है मन और लगता है कि हम चल रहे हैं।
पूरा जीवन यही भ्रम रहता है और हमारा मसखरा मन हमें भटकाता है और हम समझ नहीं पाते। विषयों में मन लगता है और हम लगे रहते हैं। उसके ऐसे अभ्यस्त हो जाते हैं कि जब मन भक्ति की तरफ जाना चाहता है तो अपनी बुद्धि से उसे रोकते हैं और पुन: विषयों की तरफ लगाते हैं तब वह त्रस्त भी होता है पर तब समझ नहीं पाते। अपनी मसखरी का शिकार खुद होता है पर फिर हमारी देह में करता है विकारों को उत्पन्न। इसलिए मन पर नियंत्रण करना जरूरी है। अपने मन को विषयों में उतना ही लगाएं जितना सांसरिक दृष्टि से आवश्यक है और फिर उसे भक्ति में भी लगाओ। मान लो मन हमें चला रहा है। कभी उसे सुख चाहिऐ तो कभी परिश्रम की इच्छा भी उसमें होती है तो कभी भक्ति की। मन से ही मनुष्य हैं तो उसे समझना जरूरी है तभी हम अपने को समझ पायेंगे.
Saturday, February 9, 2008
रहीम के दोहे:विपदा में ही होती है हितैषी की पहचान
हित अनहित या जगत में, जनि परत सब कोय
कविवर रहीम कहते हैं की विपता का समय भी अच्छा है. वह भले ही काम समय के लिए आता है पर तब पता लगता है कि कौन अपना हितैषी है और कौन शत्रु है, यह भली भाँती समझ में आ जाता है.
रहिमन सुधि सबतें भली लगै जो बांरबार
बिछुरै मानुष फिरि मिलें, यही जान अवतार
कविवर रहीम कहते हैं कि स्मृति तो सबसे प्यारी है, जो बार-बार आती है. इसके द्वारा बिछुड़े मानवों का मिलन हो जाता है. यह बात सभी मनुष्यों को समझ लेना चाहिऐ.
Saturday, January 12, 2008
रहीम के दोहे:याचना करने से चाक कभी दीपक नहीं बना देता
छेद में डंडा डारि कै, चहै नांद लै लेइ
कविवर रहीम कह्ते हैं कि कुम्हार का चाक याचना करने से दीपक नहीं बंना देता। चाक में छेद में डंडा डालकर घुमाने से दीपक तो क्या पूरी नांद (मिट्टी का बडा पात्र) का पात्र बना जाता है।
भावार्थ- आजकल सहजता से कोई काम नही होता। कई बार ऐसे अवसर आते हैं जब हमें कठोर होना पड्ता। हालांकि ऐसा हमेशा नहीं होता और कई बार सह्जता से काम भी होते हैं, पर कुछ लोगों का यह स्वभाव होता है कि वह कठोर होने पर ही आपकी बात
मानते हैं।
रहिमन खोटी आदि की, सो परिनाम लखाय
जैसे दीपक तम भखै, कज्जल वमन कराय
कविवर रहीम कहते हैं कि बुराई होने पर उसका फ़ल अवश्य दिखाई देता है। जैसे दीपक अंधकार को दूर कर देता है, परंतु शीघ्र ही कालिमा उगलने लगता है।
Friday, January 11, 2008
रहीम के दोहे:विदेश में धन कमाने के लिए सम्मान खोना पड़ता है
काके काके नवत हम, अपने पेट के हेत
कविवर रहीम कहते हैं की घर से निकलकर भला ही हुआ, परन्तु सिर पर जो रक्षक है उसने उपहास किया, क्योंकि अपने पेट की खातिर परदेश में जाकर न जाने किस-किस के आगे झुकना पडा.
भावार्थ-आदमी पेट की खातिर अपना घर,अपना देश और अपना परिवार छोड़कर विदेश जाता और अच्छी आय अर्जित कर बहुत खुश होता है पर इसके लिए उसे कैसे-कैसे लोगों के सामने सिर झुकाना पढता है. एक तरह से अपना सम्मान खोना पड़ता है. आदमी की इस प्रवृति को देखकर परमात्मा भी हँसता रहता है.
भार झोंकी के भार में, रहिमन उतरे पार
ये बूड़े बड़े मझधार में, जिनके सिर पर भर
कवि रहीम कहते हैं की इस संसार में भाड़ झोंककर भवसागर से हमारा उद्धार हुआ, परन्तु जिनके मस्तक पर सांसारिक भार (पारिवारिक और सामाजिक उत्त्दायित्व) था वे बेचारे मझधार में ही डूब गए.
Sunday, August 12, 2007
चाणक्य नीति: सुख और विद्या
- जो सुख चाहते है वह विद्या छोड़ दें। जो विद्या चाहते हैं वह सुख छोड़ दें। सुखार्थी को ज्ञान और ज्ञानार्थी को सुख कहाँ मिलता है।
- बिना सोचे-समझे खर्च करने वाला, अनाथ, झगडा करने वाला तथा असंयमित जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्ति अल्पायु होते हैं।
- धन-धान्य के लेन-देन में, विद्या संग्रह में और वाद-विवाद में जो निर्लज्ज होता है, वही सुखी होता है।
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मत का अधिकार था भगवान हुए मतदाता-दीपकबापूवाणी (Matadata ka Adhikar thaa Bhagwan hue Matdata-DeepakBapuwani) - *---ज़माने पर सवाल पर सवालसभी उठाते, अपने बारे में कोई पूछे झूठे जवाब जुटाते।‘दीपकबापू’ झांक रहे सभी दूसरे के घरों में, गैर के दर्द ...7 years ago
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भ्रमजाल फैलाकर सिंहासन पा जाते-दीपकबापूवाणी (bhramjal Failakar singhasan paa jaate-DeepakbapuWani - *छोड़ चुके हम सब चाहत,* *मजबूरी से न समझना आहत।* *कहें दीपकबापू खुश होंगे हम* *ढूंढ लो अपने लिये तुम राहत।* *----* *बुझे मन से न बात करो* *कभी दिल से भी हंसा...7 years ago
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राम का नाम लेते हुए महलों में कदम जमा लिये-दीपक बापू कहिन (ram nam japte mahalon mein kadam jama dtla-DeepakBapukahin) - *जिसमें थक जायें वह भक्ति नहीं है* *आंसुओं में कोई शक्ति नहीं है।* *कहें दीपकबापू मन के वीर वह* *जिनमें कोई आसक्ति नहीं है।* *---* *सड़क पर चलकर नहीं देखते...7 years ago
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रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते-दीपक बापू कहिन (Rank ka naam jaapte bhi raja ban jate-DeepakBapuKahin) - *रंक का नाम जापते भी राजा बन जाते, भलाई के दावे से ही मजे बन आते।* *‘दीपकबापू’ जाने राम करें सबका भला, ठगों के महल भी मुफ्त में तन जाते।।* *-----* *रुपये से...7 years ago
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पश्चिमी दबाव में धर्म और नाम बदलने वाले धर्मनिरपेक्षता का नाटक करते रहेंगे-हिन्दी लेख (Convrted Hindu Now will Drama As Secularism Presure of West society-Hindi Article on Conversion of Religion) - हम पुराने भक्त हैं। चिंत्तक भी हैं। भक्तों का राजनीतिक तथा कथित सामाजिक संगठन के लोगों से संपर्क रहा है। यह अलग बात है ...8 years ago
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जयश्रीराम का राजनीतिकरण कौन कर रहा है-हिन्दी संपादकीय - जब देश में रामजन्मभूमि आंदोलन चल रहा था तब ‘जयश्रीराम’ नारे का जिस तरह चुनावी राजनीतिकरण हुआ उसकी अनेक मिसाल...9 years ago
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अधर्मी व्यक्ति की तरक्की देखकर विचलित न हो-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख - विश्व के अधिकतर देशों में जो राजनीतक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थायें हैं उनमें सादगी, सदाचार तथा सिद्धांतों के साथ विकास करते हुए उच...12 years ago