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Tuesday, February 17, 2009

कबीर के दोहेःपहले आदमी को परखें फिर संपर्क बढ़ायें

संत कबीर कहते हैं कि
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कबीर देखी परखि ले, परखि के मुखा बुलाय
जैसी अन्तर होयगी, मुख निकलेगी आय
जब कोई मिले तो उसे पहले अच्छी प्रकार देख परख के पश्चात् ही उससे मुख मिलाओ। जैसी उसके मन में बात होगी वैसी कहीं न कहीं मुंह से निकल ही आयेगी।
पहिले शब्द पिछानिये, पीछे कीजै मोल
पारख परखै रतन को,शब्द का मोल न तोल

पहले किसी की बात सुनकर उसके शब्द पर विचार करें फिर अपने विवेक से निर्णय ले। हीरे का मोल तो होता है इसलिये उसके लिये मोलभाव किया जाता है पर सच्चे शब्दों का कोई मोल नहीं होता-यानि दूसरे के जो शब्द हैं उनमें अगर कमी दिखाई दे तो उस पर यकीन न करें और केवल अच्छी संभावना को मानकर संपर्क न बढ़ायें।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्रचार माध्यमों ने आदमी की मन बुद्धि पर अधिकार कर लिया है इसलिये लोगों की अपने विवेक से काम करने की शक्ति नष्ट हो गयी है। अभिनेता,कलाकार,लेखक और बुद्धिजीवियों को उनके सुंदर शब्दों पर ही योग्य मान लिया जाता है। फिल्मों में अभिनेता और अभिनेत्रियां दूसरे लेखकों द्वारा बोले गये शब्द बोलते हैं पर यह भ्रम हो जाता है कि जैसे वह स्वयं बोल रहे हैं। अनेक विज्ञापन आते हैं जिसमें सुंदर शब्दों के साथ प्रचार होता है और लोग मान लेते हैं। शब्दों के जाल मं किसी को भी फंसाना आसान हो गया है और जो एक बार किसी के जाल में फंस गया तो उसके हितैषी चाहें भी तो उसे नहीं निकाल सकते।

इस मायावी दुनियां में पहले भी कोई कम छल नहीं था पर अब तो खुलेआम होने लगा है। अनेक ऐसे लोग हैं जो बदनाम हैं पर वह पर्दे पर चमक रहे हैं क्योंकि वह बोलते बहुत सुंदर हैं। प्रचार माध्यमों में अपराधियों का महिमा मंडन हो रहा है और वह भी अपने को पवित्र बताते हैं। तब लगता है कि जब सभी लोग पवित्र हैं तब इस दुनियां में अपराध क्यों हो रहा है? यह सब समाज की विवेक शक्ति के पतन का परिचायक हैं क्योंकि हम दूसरें के शब्दों पर विचार नहीं करते जबकि होना यह चाहिये कि जब कोई दूसरा व्यक्ति बोल रहा है तो उसके शब्दों पर विचार करें। इतना ही नहीं जब तक किसी के शब्दों को परख न लें तब तक उस पर यकीन न करें। अपना किसी से संपर्क धीरज से बढ़ायें क्योंकि बातचीत में कहीं न कहीं आदमी में मूंह से सच निकल ही आता है।
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Monday, December 29, 2008

कबीर वाणी: कायर पीठ पीछे ही वार करता है

कबीर तो सांचै मतै, सहै जू सनमुख वार
कायर अनी चुभाय के, पीछे झखै अपार


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहत हैं कि सच्चा वीर तो वह है जो सामने आकर लड़ता है पर जो कायर है वर पीठ पीछे से वार करता है।

तीर तुपक सों जो लड़ैं, सो तो सूरा नाहिं
सूरा सोइ सराहिये, बांटि बांटि धन खांहि

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो अस्त्र शस्त्र से लड़ते है। उनको वीर नहीं कहा जा सकता है। सच्चे शूरवीर तो हैं जो आपस में मिल बैठकर खाते हैं। वह जो भी कमाते हैं उसे समान रूप से आपस में बांटते हैं।

वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-शूरवीर हमेशा उसे ही माना जाता है जो अस्त्र शस्त्र का उपयोग करता है। उनमें भी वही वीर है जो सामने से वार करता है पर जो कायर हैं वह पीठ पीछे वार करते हैं। वैसे अस्त्र शस्त्र से लड़ने में भी साहस की आवश्यकता कहां होती है। अगर अस्त्र शस्त्र हाथ में हों तो वेसे भी मनुष्य के मन में दुस्साहस आ ही जाता है और कोई भी उपयोग कर सकता है। कुछ लोग कहते हैं कि हथियार रखने से क्या होता है उसे चलाने के लिये साहस भी होना चाहिये-विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर लोहे से बना कोई हथियार मनुष्य के हाथ में हो तो उसमें आक्रामता आ ही जाती है।

असली साहस तो अपने कमाये धन का दूसरे के साथ बांटकर खाने में दिखाना चाहिये। आदमी जब धन कमाता है तो उसके प्रति उसका मोह इतना हो जाता है कि वह उसे किसी को थोड़ा देने में भी हिचकता है। मिलकर बांटने की बात तो छोडि़ये अपनी रोटी का छोटा टुकड़ा देने में भी आदमी की जान जाती है।

हमारे प्राचीन मनीषियों ने दान की महिमा को इसलिये प्रतिपादित किया कि समाज में सामाजिक समरसता का भाव रहे। हमारे अध्यात्म में इतना तक कहा गया है कि किसी को दान देते हुए आंखें नीची करना चाहिये ताकि दूसरे को हमारा अहंकार नहीं दिखाई दे और उसके अंदर अपने प्रति कुंठा भाव न उत्पन्न हो। मगर अब तो समाज कल्याण की बात राज्य के भरोसे छोड़ दी गयी है और वही लोग जन कल्याण के लिये मैदान में उतर रहे हैं जिनको उससे कुछ आर्थिक फायदा है। यह लोग कायर होते हैं क्योंकि दान और कल्याण क लिये प्राप्त धन का वह हरण करते हैं।

कलुषित तरीके से प्राप्त धन का भी वह दान करने का साहस नहीं कर पाते। अपने धन देने में सभी का हृदय कांपने लगता है। सच है कि जो दानी है वही सच्चा शूरवीर है। वह भी सच्चा वीर है जो अस्त्र शस्त्र लेकर कहकर सामने से प्रहार करता है पर आजकल तो कायरों की पूरी फौज है जो पीठ पीछे से वार करती है। चोर और डकैतों द्वारा किये गये और अपराध और निरंतर बम धमाकों की बढ़ती घटनायें इस बात का प्रमाण हैं।
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Wednesday, December 24, 2008

कबीर वाणी:अपना ऊंचा आवास देख कर घमंड न करें

कबीर गर्व न कीजिए, ऊंचा देखि आवास
काल परौं भूईं लेटना, ऊपर जमसी घास


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की अपना शानदार मकान और शानशौकत देख कर अपने मन में अभिमान मत पालो जब देह से आत्मा निकल जाती हैं तो देह जमीन पर रख दी जाती है और ऊपर से घास रख दी जाती है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-यह कोई नैराश्यवादी विचार नहीं है बल्कि एक सत्य दर्शन है। चाहे अमीर हो या गरीब उसका अंत एक जैसा ही है। अगर इसे समझ लिया जाये तो कभी न तो दिखावटी खुशी होगी न मानसिक संताप। सबमें आत्मा का स्वरूप एक जैसा है पर जो लोग जीवन के सत्य को समझ लेते हैं वह सबके साथ समान व्यवहार करते हैं। हम जब किसी अमीर को देखते हैं तो उसको चमत्कृत दृष्टि से देखते हैं और कोई गरीब हमारे सामने होता है तो उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है। यह अज्ञान हमारे लिए कष्टकारक होता है। जब थोडा धन आता है तो मन में अंहकार आ जाता है और अगर नहीं होता तो निराशा में घिर जाते हैं और अपने अन्दर मौजूद आत्मा को नहीं जान पाते। यह आत्मा जब हमारी देह से निकल जाता है तो फिर कौन इस शरीर को पूछता है, यह अन्य लोगों की मृतक देह की स्थिति को देख सीख लेना चाहिये।
कई शानदार मकान बनते हैं पर समय के अनुसार सभी पुराने हो जाते हैं। कई महल ढह गये और कई राजा और जमींदार उसमें रहते हुए पुजे पर समय की धारा उनको बहा ले गयी। इनमें से कई का नाम लोग याद तक नहीं करते। हां, इतिहास उन लोगों को याद करता है जो समाज को कुछ दे जाते हैं। वैसे अपने इहकाल में भी किसी धनी को वही लोग सम्मान देते हैं जो उससे स्वार्थ की पूर्ति करते हैं पर जो ज्ञानी,प्रतिभाशाली और दयालु है समाज उसको वैसे ही सम्मान देता है यह जाने बगैर कि उसका घर कैसा है?
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Wednesday, July 23, 2008

रहीम के दोहेःअपनी देह की चिंताग्नि में मत जलो

जसी परै सो सहि रहै, कहि रहीम यह देह
धरती पर ही परत है, शीत घाम और मेह

कविवर रहीम कहते हैं कि इस मानव काया पर जैसी परिस्थिति आती है वैसा ही वह सहन भी करती है। इस धरती पर ही सर्दी, गर्मी और वर्षा ऋतु आती है और वह सहन करती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-पश्चिमी चिकित्सा विशेषज्ञों तमाम तरह के शोधों के बाद यह कह पाये कि हमारी देह बहुत लोचदार है उसमें हालतों से निपटने की बहुत क्षमता है। इसके लिये पता नहीं कितने मेंढकों और चूहों को काटा होगा-फिर इस निष्कर्ष पर पहुंचे । हमारे मनीषियों ने अपनी योग साधना और भक्ति से अर्जित ज्ञान से बहुत पहले यह जान लिया कि इस देह में बहुत शक्ति है और वह परिस्थितियों के अनुसार अपने को ढाल लेती है। ज्ञान या तो योग साधना से प्राप्त होता है या भक्ति से। रहीम तो भक्ति के शिखर पुरुष थे और अपनी देह पर कतई ध्यान नहीं देते थे पर फिर भी उनको इस मनुष्य देह के बारे में यह ज्ञान हो गया पर आजकल अगर आप किसी सत्संग में जाकर बैठें तो लोग अपनी दैहिक तकलीफों की चर्चा करते हैं, और वहां ज्ञान कम आत्मप्रवंचना अधिक करते हैं। कोई कहेगा ‘मुझे मधुमेह हो गया है’ तो कोई कहेगा कि मुझे ‘उच्च रक्तचाप’ है। जिन संत लोगों का काम केवल अध्यात्मिक प्रवचन करना है वह उनकी चिकित्सा का ठेका भी लेते हैं। यह अज्ञान और भ्रम की चरम परकाष्ठा है।

मैने अपने संक्षिप्त योग साधना के अनुभव से यह सीखा है कि देह में भारी शक्ति होती है। मुझे योगसाधना का अधिक ज्ञान नहीं है पर उसमें मुझे अपने शरीर के सारे विकार दिखाई देते हैं तब जो लोग बहुत अधिक करते हैं उनको तो कितना अधिक ज्ञान होगा। पहले तो मैं दो घंटे योगसाधना करता था पर थोड़ा स्वस्थ होने और ब्लाग लिखने के बाद कुछ कम करता हूं (वह भी एक घंटे की होती है)तो भी सप्ताह में कम से कम दो बार तो पूरा करता हीं हूं। पहले मुझे अपना शरीर ऐसा लगता था कि मैं उसे ढो रहा हूं पर अब ऐसा लगता है कि हम दोनों साथ चलते हैं। मेरे जीवन का आत्मविश्वास इसी देह के लड़खड़ाने के कारण टूटा था आज मुझे आत्मविश्वास लगता है। आखिर ऐसा क्या हो गया?

इस देह को लेकर हम बहुत चिंतित रहते हैं। गर्मी, सर्दी और वर्षा से इसके त्रस्त होने की हम व्यर्थ ही आशंका करते हैं। सच तो यह है कि यह आशंकाएं ही फिर वैसी ही बीमारियां लातीं हैं। हम अपनी इस देह के बारे में यह मानकर चलें यह हम नहीं है बल्कि आत्मा है तो ही इसे समझ पायेंगे। इसलिये दैहिक तकलीफों की न तो चिंता करें और न ही लोगों से चर्चा करें। ऐसा नहीं है कि योगसाधना करने से आदमी कभी बीमार नहीं होता पर वह अपने आसनों से या घरेलू चिकित्सा से उसका हल कर लेता है। यह बात मैने अपने अनुभव से सीखी है और वही बता रहा हूं। योगसाधना कोई किसी कंपनी का प्राडक्ट नहीं है जो मैं बेच रहा हूं बल्कि अपना सत्य रहीम के दोहे के बहाने आपको बता रहा हूं।
दीपक भारतदीप, संकलक एवं संपादक

Thursday, July 17, 2008

रहीम के दोहे:स्वारथ के अनुसार लोग गुण-दोष ढूंढते हैं

स्वारथ रचत रहीम सब, औगनहूं जग मांहि
बड़े बड़े बैठे लखौ, पथ रथ कूबर छांहि

कविवर रहीम कहते हैं कि लोग अपने स्वार्थ के लिये दूसरे में गुण दोष निकालते हैं। जो कभी अपनी हित साधने के लिये मार्ग में रुके रथ के हरसे की टेढ़ी-मेढ़ी छाया को अशुभ कहा करते थे वही लोग उसी हरसी की छाया में बैठ कर अपने को धूप से बचाते हैं।

सर सूखै पंछी उड़ै, औरे सरन समाहि
दीन मीन बिन पंख के, कहु रहीम कहं जाहिं


कविवर रहीम कहते हैं कि तालाब का पानी सूखते ही पक्षी उड़कर दूसरे तालाब में चले जाते हैं पर उसमें रहने वाली मछली का क्या? वह तो असमर्थ होकर वहीं पड़ी रहती है। परमात्मा का ही उसे आसरा होता है।

साधु सराहै साधुता, जती जोखिता जान
रहिमन सांचे सूर को, बैरी करे बखान


सज्जन लोग ही सज्जनता की सराहना करते हैं दुष्ट नहीं। जो योगी हैं वही ज्ञान और ध्यान की सराहना करते है जबकि सामान्य जन उससे परे रहते हैं। पर जो शूरवीर हैं उनकी वीरता की प्रशंसा सभी करते हैं।

Monday, July 14, 2008

रहीम के दोहे: जब तक मिले मान, तभी तक रहो मेहमान

रहिमन जा डर निसि परै, ता दिन डर सब कोय
पल पल करके लागते, देखु कहां धौ होय

कविवर रहीम कहते हैं भारी संकट झेलने वाला व्यक्ति न तो रात को चैन से सो पाता है और न दिन में जाग पाता है। उसके हर अपने सामने संकट आता दिखता है। तमाम तरह की आशंकायें और भय उसके मन में समा जाते हैं।
रहिमन ठठरी धूर की, रही पवन ते पूरि
,गांठ युक्ति की खुलि गई, अन्त धूरि की धूरि

कविवर रहीम कहते हैं कि यह देह एक धूल की भरी हुई गठरी है जिसमें पांचो तत्व समाहित है। जब वह सब बिखर कर अलग हो जाते हैं तब यह अस्थि पंजर पड़ा रहता है और उसी धूल में मिल जाता है जहां से उत्पन्न हुआ था।

रहिमन तब लगि ठहरिये, दान, मान, सम्मान
घटत मान देखिए जबहि, तुरतहि करिय पयान

कविवर रहीम कहते हैं कि किसी भी स्थान पर तब तक ठहरिये आपको मान और सम्मान के साथ कुछ मिलता है। जब अपना मान सम्मान वहां कम होते देखें तो वहां से पलायन कर जाईये।

Tuesday, June 24, 2008

चाणक्य नीतिःस्त्री में होता है पुरुष से छह गुना अधिक साहस

1.कोयल की मधुर वाणी उसका रूप है। वह भी कौए की तरह काली और कुरूप होती है पर उसका कर्णप्रिय स्वर मनुष्य को अपनी ओर आकर्षित करता है लोग उसके कुरूप होने का दुर्गुण भूल जाते हैं। वह उसके काले और भद्दे होने की उपेक्षा कर उससे प्रेम करने लगते हैं।
2.नारी में पुरुष से दोगुना भोजन करने की क्षमता होती है जबकि लज्जा चार गुना अधिक होती है। साहस छह गुना अधिक होता है।
3.नदी के तेज बहाव के कारण उसके किनारे खडे पेड़ पौधे जिस तरह नष्ट हो जाते हैं उसी तरह दूसरे के घर में रहने वाली स्त्री भी लांछित हो जाती है क्योंकि उसके लिये अपनी रक्षा करना अत्यंत कठिन होता है।
4.किसी भी पुरुष का घर स्त्री के कारण ही बसता है इसलिये नारी में कुल गुण और सहृदयता का होना आवश्यक है। जहां उसका पति के प्रति अनुराग नहीं होगा वहां जीवन की गाड़ी नहीं चल पायेगी। इसलिये स्त्री मन और वचन से सत्य बोलने, सदुव्यवहार करने और श्रेष्ठ गुणों वाली होना आवश्यक है।
5.धरती से निकलने वाला जल, पवित्र व शुद्ध होता है उसी तरह पतिव्रता नारी सदैव शुद्ध और पवित्र होती है। प्रजा के हित के संलिप्त रहने वाला राज तथा संतोष करने वाला विद्वान हमेशा पवित्र होता है।

Thursday, June 19, 2008

विदुर नीति:रोगमुक्त हुआ व्यक्ति चिकित्सक का तिरस्कार करता है

1.निरोग रहना, ऋणी न होना, विदेश में रहना, अच्छे लोगों के साथ मेल होना, अपनी वृत्ति से जीविका चलाना और निर्भय होना ये किसी मनुष्य के लिए लिये इस लोक में छह सुख हैं।
2. ईष्र्या करने वाला, घृणा करने वाला, मन में असंतोष रखने वाला, क्रोधी, सदैव संशय में रहने वाला और दूसरों के भाग्य पर जीवन पर निर्भर रहने वाला छह लोग सदा दुखी रहते है।
3. शिक्षा समाप्त कर चुका शिष्य अपने गुरु का, विवाहित पुत्र अपनी मां का, काम भावना शांत होने पर पुरुष स्त्री का, कार्य संपन्न होने पर मनुष्य अपने सहायक का, नदी की धारा पार कर लेने वाला पुरुष नाव का तथा रोग मुक्त हुआ रोगी अपने चिकित्सक का सदा अपने अनादर करते हैं
4.स्त्रियों के विषय में आसक्त रहना, जुआ, शिकार, मद्यपान, कठोर वाणी बोलना, अत्यंत कठोर दंड देना और अपने धन का दुरुपयोग करना यह सात दुर्गुण त्याग देना में ही भलाई है।

Sunday, May 25, 2008

भृतहरि शतक:कामदेव की है विचित्र लीला

कृशः काणः खञ्ज श्रवणरहितः पुच्छविकलो
व्रणी पूयक्लिनः कृमिकुलशतैरावुततनु
क्षुधाक्षामो जीर्णः पिठरककापालार्पिततगलः
शनीमन्वेति श्वा हतमपि निहन्त्येव मदनः

हिंदी में भावार्थ-देह से दुर्बल, खुजली वाला, बहरा काना, पुंछ विहीन, फोड़ों से भरा, पीव और कीट कृमियों से लिपटा, भूख से व्याकुल, बूढ़ा मिट्टी के घड़े में फंसी हुई गर्दन वाला कुत्ता भी नई तथा युवा कुतिया के पीछे पीछे दुम हिलाता हुआ फिरता है। यह कामदेव की लीला है कि वह मरे हुए में भी काम भावना लाकर उसे गहरी खाई में ढकेल कर मार देते हैं।

Tuesday, May 20, 2008

भृतहरि शतक:सज्जन की मित्रता पूर्वान्ह की छाया की तरह धीरे-धीरे बढ़ती है

दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर

इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी तो साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।

आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्



जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उतराद्र्ध में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उतराद्र्ध में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है।

Thursday, May 1, 2008

रहीम के दोहे:यह जीवन फिर नहीं मिलता

रीति प्रीति सबसों भली, बैर न हित मित गोत
रहिमन याही जनम की, बहुरि न संगति होत

कविवर रहीम कहते है कि इस जीवन में सबसे प्रेम से पेश आओ। न किसी से बैर करो न अपने मित्र और गौत्र से हित की चाह करो। यह मनुष्य जीवन फिर मिलेगा कि नहीं कहना कठिन है।

वर्तमान संदर्भ मे व्याख्या-आप देखेंगे कई ऐसे पेशेवर प्रवचनकर्ता हैं जो लोगों को सकाम भक्ति की तरह प्रेरित कर दावा करते हैं कि अगले जन्म में भी मनुष्य योनि प्राप्त होगी। यह उनका ढोंग है। सच तो यह है कि यह जीवन अनंत रहस्यों से भरा पड़ा है और इसका पूरा ज्ञान किसी को नहींं। अगला जन्म होता है भी कि नहीं या अगली योनि में कौन क्या बनता है इसका आभास किसी को नहीं हो सकता चाहे कोई कितना बड़ा तत्वज्ञानी होने का दावा क्यों न करे। जो तत्वज्ञानी है वह जीवन जीने के बेहतर तरीके तो बताते हैं पर उसके बाद का अनुमान तो वह भी नहीं कर पाये। इसलिये बेहतर यही है कि हमें अपने जीवन में सबसे प्रेम का बर्ताव करना चाहिए और इस स्वार्थ से भरे संसार में अपने मित्रों और रिश्तेदारों से कोई आशा न कर निष्काम भाव से अपना कर्म करना चाहिए। हम अगर दूसरे को सुख देते हैं तो हमें सुख मिलेगा, और अगर दूसरे को दुख देंगे तो हमें चैन से रहने की आशा भी नहीं करना चाहिए। अपने विवेक का इस्तेमाल करते हुए अपने दैनिक कार्यों के साथ भगवान की भक्ति भी करना चाहिए। इसके साथ ही जो अगले जन्म में मनुष्य योनि दिलाने का दावा करते हैं ऐसे कथित लोगों की बातों को अनदेखा कर देना चाहिए।

Tuesday, April 15, 2008

रहीम के दोहे:जहाँ शील और सदाचार न हो वह स्थान त्याग दें

रहिमन रहिबो वा भलो जो लौं सील समूच
सील ढील जब देखिए, तुरत कीजिए कूच


कविवर रहीम कहते हैं कि वही रहना ठीम है जहां लोगों में शील और सदाचार का भाव है। जहां इसमें कमी दिखाई दे वहां से हट जाना चाहिए।

रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागे बार
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार


कविवर रहीम कहते हैं कि अधर्म से प्राप्त धन को नष्ट हाने में समय नहीं लगता। होली के अवसर पर लोग चोरी की लकड़ी लाते हैं पर उसको जलकर रख होने में क्षण भी नहीं लगता।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-वैसे तो देखा जाय बुरे लोग तो रहीम जी के समय में ही रहे हैं इसलिये तो उन्होंने ऐसी बातें कहीं हैं जो आज भी प्रासंगिक लगतीं हैं। एक बात जरूर है कि उस समय आवागमन के साधन इतना तीव्र नहीं थे इसलिये आदमी अधिकतर अपने सीमित क्षेत्र में ही जीवन व्यतीत करता था। वर्तमान में कई कारणों से अपने मूल स्थान से दूर जाना पड़ता है और ऐसे में भले और बुरे दोनों प्रकार के लोगों का कार्यक्षेत्र भी विस्तृत हुआ है अतः दुष्ट लोग अपराध कर अपने क्षेत्र आसानी से बदलने लगते हैं ताकि दूसरी जगह उनकी पहचान न हो पाये। कई जगह तो उनकी बहुतायत हो जाती है और उससे लगता है कि इस दुनियां में भलाई और सदाचार नाम की कोई चीज नहीं है। यह हमारा एक भ्रम है। अगर इस दुनिया से बुराई को लोप नहंी हुआ है तो भलाई का भी नहीं हुआ है। हम अगर ऐसी जगह पहुंच जाते हैं जहां दुष्ट और निंदक प्रवृत्ति के लोगों का जमघट है तो हमें वहां से निकल जाना चाहिए। अगर वहां रहेंगे तो हमारे विचारों में दुष्टता का भाव और अधर्म से पैसा कमाने की प्रवृत्ति उत्पन्न होगी। अधर्म को धन वैसे भी अधिक देर नहीं ठहर जाता और कभी कभी तो वह अपने स्वामी को भी नष्ट कर देता है। अतः कुविचारों की बहुतायत वाले स्थान को त्यागने के साथ अधर्म से धन प्राप्त करने को मोह त्याग देना चाहिए।

Tuesday, April 1, 2008

संत कबीर वाणी:माया वृक्ष की छाया की भांति अस्थिर

तीन गुनन की बादरी, ज्यों तरुवर की छांहि
बाहर रहै सो ऊबरै, भींजै मन्दिर मांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं तीनों वाली माया रूपी बदली ऐसे ही जैसै वृक्ष की छाया स्थिर नहीं रहती। जो इस माया के जंजाल से परे रहता है। उसी का उद्धार होता है।

सूम सदा ही उद्धरै, दाता जाय नरवक
कहैं कबीर यह साखि सुनि, मति कोय जाव सरक्क


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपने वीर्य को कंजूसी से व्यय करने वाला तो स्वर्ग में जा सकता है पर जो कामी इसका दान करता है नरक में ही जायेगा। इस साखी को जो लोग सुनकर सरकें नहीं बल्कि विचार करें।

व्याख्या-कबीरदास जी व्यंजना विधा में अपनी बात कहने के सिद्ध थे इसलिये कई जगह उनकी बात का अर्थ समझना पड़ता है और उपरोक्त साखी में कबीरदास जी ने जो बात कही है उसका आशय यही है कि अपनी ऊर्जा पर नियंत्रण रखकर ही अपना उद्धार हो सकता है।

Monday, March 31, 2008

संत कबीर वाणी:शराब और तमाखू का सेवन करने वालों से दूरी भली

सुरापान अचवन करैं, पिवै तमाखू भंग
कहैं कबीरा राम जन, ताको करो न संग


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते है कि जो लोग शराब और तंबाकु का सेवन करते हैं उनकी तो कभी संगत नहीं करना चाहिए।

राखें बरत एकादसी, करै अन्न को त्याग
भांग तमाखू न तजै, कहैं कबीर अभाग


संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि जो लोग एकादशी पर व्रत में अन्न का त्याग कर देते हैं पर तमाखू का त्याग नहीं कर पाते वह अभागे हैं।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-आजकल लोगों में शराब और तमाखू का सेवन बहुत बढ़ गया है। खासतौर से तमाखू का सेवन तो इतना हो गया है कि कई लोग बाजार से पाउच खरीद कर खा लेते और उससे होने वाली बीमारियों को शिकार होते जा रहे हैं। पहले सादा तमाखू का सेवन लोग इतना नहीं करते थे जितना आजकल सजीसजाई पन्नी में बिकते देख करने लगे हैं। इससे लोग शारीरिक और मनोरोग का शिकार हो रहे हैं। कई लड़कों को यह आदत तो केवल इसलिये लग जाती है क्योंकि वह अपने दोस्तों को देखकर स्वयं भी उसे लेने लगते हैं।

पहले सादा तमाखू का उपयोग भी अच्छा नहीं माना जाता था पर जबकि वह आज बिकने वाली तंबाकू से कम हानिकारक थी। आजकल उसमें तमाम रसायन डाले जाते हैं जो और अधिक हानिप्रद होते है। जिस तरह समाज में दुव्र्यसनों को परंपरा के तौर पर अपनाया गया उससे समाज का वातावरण भी विषाक्त हो गया है। उसे देखते हुए तो लगता है कि जो शराब और तमाखू को सेवन करते हैं उनसे दूर ही रहना चाहिए और अपने बच्चों को ऐसे लोगों की संगत नहीं करने देना चाहिए। व्यसन चाहे जो भी हो मनुष्य को शारीरिक और मानसिक हानि पहुंचाता है और जिसके दुष्परिणाम परिवार और समाज को बाद में भोगने पड़ते हैं।

Monday, March 17, 2008

संत कबीर वाणी:अपना ऊंचा आवास देख घमंड न करो

कबीर गर्व न कीजिए, ऊंचा देखि आवास
काल परौं भूईं लेटना, ऊपर जमसी घास


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की अपना शानदार मकान और शानशौकत देख कर अपने मन में अभिमान मत पालो जब देह से आत्मा निकल जाती हैं तो देह जमीन पर रख दी जाती है और ऊपर से घास रख दी जाती है।

आज के संदर्भ में व्याख्या-यह कोई नैराश्यवादी विचार नहीं है बल्कि एक सत्य दर्शन है। चाहे अमीर हो या गरीब उसका अंत एक जैसा ही है। अगर इसे समझ लिया जाये तो कभी न तो दिखावटी खुशी होगी न मानसिक संताप। सबमें आत्मा का स्वरूप एक जैसा है पर जो लोग जीवन के सत्य को समझ लेते हैं वह सबके साथ समान व्यवहार करते हैं। हम जब किसी अमीर को देखते हैं तो उसको चमत्कृत दृष्टि से देखते हैं और कोई गरीब हमारे सामने होता है तो उसे हेय दृष्टि से देखते हैं। यह हमारे अज्ञान का प्रतीक है। यह अज्ञान हमारे लिए कष्टकारक होता है। जब थोडा धन आता है तो मन में अंहकार आ जाता है और अगर नहीं होता तो निराशा में घिर जाते हैं और अपने अन्दर मौजूद आत्मा को नहीं जान पाते। यह आत्मा जब हमारी देह से निकल जाता है तो फिर कौन इस शरीर को पूछता है, यह अन्य लोगों की मृतक देह की स्थिति को देख सीख लेना चाहिऐ।

Tuesday, March 11, 2008

संत कबीर वाणी:स्वार्थी कभी भक्त नहीं होते

फल कारन सेवा करै, निशि-दिन जांचै राम
कहैं कबीर सेवक नहीं, चाहे चौगुन दाम


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो फल की इच्छा रख कर सेवा करता और दिन-रात भगवान का नाम इसलिए लेता है कि देखें हमारा काम बनता है कि नहीं-अर्थात राम जी कि परीक्षा लेता है-ऐसा सेवक और भक्त तो स्वार्थी है जो अपनी करनी का चारगुना फल चाहता है।

व्याख्या- इस दुनिया में बहुत कम लोग हैं जो निष्काम भाव से भक्ति करते हैं। सभी के मन में कुछ न कुछ इच्छा होती है। ऐसे में आध्यात्म के नाम पर ठगों की बन आती है। किसी के साथ कोई घरेलू, व्यावसायिक और स्वास्थ्य संबधी परेशानी हो तो वह इधर-उधर भटकते हैं। कोई किसी की भक्ति बताता है तो कोई किसी की। कोई मन्त्र बताता है को कोई तंत्र। इस देह के साथ जो संकट होते हैं वह सबके साथ आते हैं पर असली भक्त उनसे विचलित नहीं होते और कई लोग अपनी समस्या के हल के लिए अपने इष्ट तक बदलते रहते हैं। जिस गुरु के पास जाते हैं वह अपने इष्ट का स्मरण करने को कहता है। ऐसे स्वार्थवश भक्ति भाव करने वाले लोग जीवन भर कष्ट में रहते हैं।

Saturday, February 9, 2008

रहीम के दोहे:विपदा में ही होती है हितैषी की पहचान

रहिमन बिपदाहू भली, जो थोरे दिन होय
हित अनहित या जगत में, जनि परत सब कोय

कविवर रहीम कहते हैं की विपता का समय भी अच्छा है. वह भले ही काम समय के लिए आता है पर तब पता लगता है कि कौन अपना हितैषी है और कौन शत्रु है, यह भली भाँती समझ में आ जाता है.

रहिमन सुधि सबतें भली लगै जो बांरबार
बिछुरै मानुष फिरि मिलें, यही जान अवतार


कविवर रहीम कहते हैं कि स्मृति तो सबसे प्यारी है, जो बार-बार आती है. इसके द्वारा बिछुड़े मानवों का मिलन हो जाता है. यह बात सभी मनुष्यों को समझ लेना चाहिऐ.

Wednesday, January 23, 2008

रहीम के दोहे:पुरुषार्थ प्रकट करने से धन मिलता है

जो पुरुषार्थ ते कहूं, संपत्ति मिलत रहीम
पेट लागि वैराट कर तपत रसोई भीम
कविवर रहें कहते हैं की पुरुषार्थ करने से मनुष्य को धन-संपत्ति प्राप्त होती है. अज्ञातवास के समय विराट राजा के घर पांडव भीम पेट की खातिर रसोईये का कार्य करते रहे.
भावार्थ-कुछ लोग सोचते हैं कि उनको कितनी मेहनत करें पर उनको कोई लाभ नहीं होगा उनका यह सोचना गलत है. अगर हम अपने कार्य में नियमित रूप[ से लगे रहें अपने मन को इधर-उधर न भागने दें तो हमें सफलता अवश्य मिलेगी.
नोट-सहृदय सज्जनों मेरे ब्लागस्पाट के ब्लोगों का कंपोज मोड़ काम नहीं कर रहा इस में सीधे इंडिक टूल से लाकर पेस्ट कर रहा हूँ अत: पहले की तरह सजा कर नहीं पेश कर पा रहा हूँ.

Sunday, January 20, 2008

विदुर नीति:निरर्थक कलह करना मूर्खों का काम

१.निरर्थक कलह करना मूर्खों का काम है, बुद्धिमान पुरुष को इसका त्याग कर देना चाहिऐ .ऐसा करने से लोक में यश मिलता है और अनर्थ का सामना नहीं करना पड़ता.
२.जिसके प्रसन्न होने का कोई फल नही तथा जिसका क्रोध भी व्यर्थ होता है, ऐसे राजाको प्रजा नहीं चाहती.
३.बुद्धि से धन प्राप्त होता है और मूर्खता दरिद्रता का कारण है-ऐसा कोई नियम नहीं है. ससार-चक्र के वृतांत को केवल विद्वान पुरुष ही जानते हैं, दूसरे लोग नहीं.

Sunday, January 13, 2008

रहीम के दोहे:पाँसे अपने हाथ पर दांव नहीं

जेहि रहीम तन मन लियो, कियों हिए बिच भीन
तासों दुख सुख कहन की, रही बात अब कौन


कवि रहीम का कथन है कि जिस व्यक्ति ने तन मन पर अधिकार कर लिया है, उसने हृदय में स्थान बना लिया है, ऐसे प्रेमी से दुख, सुख कहने की अब कौन सी बात शेष रह गयी .

निज कर क्रिया रहीम कहीं, सुधि भावी के हाथ
पाँसे अपने हाथ में, दांव न अपने हाथ

कवि रहीम कहते हैं कि अपने हाथ में तो कर्म करना है परिणाम भविष्य के गर्भ में है जैसे जुआरी के हाथ में खेल के पाँसे कौडी तो अपने हाथ में होते हैं, परन्तु दाव अपने वश में नहीं होता.

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