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Sunday, August 11, 2013

संत कबीर दास का दर्शन-दूसरों को ज्ञान देने वाला तीतर स्वयं पिंजरे में रहता है (doosron ko gyan dene wala teetar swuam pinjremein rahata hai-sant kabir das ka darshan)



      हमारे देश में जैसे जैसे भौतिक समृद्धि के कारण जैसे जैसे विलासिता बढ़ रही है लोगों के शरीर टूट रहे हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  आलस्य, विलास तथा प्रमाद के भाव की समाज में प्रधानता हो तो लोगों के मानसिक रूप से समृद्ध होने की कल्पना करना ही निरर्थक है। स्थिति यह है कि लोगों के पास धन और विलासिता के ढेर सारे साधन है पर हार्दिक प्रसन्नता उनसे कोसों दूर रहती है। ऐसे में उनका मन उनको मनोरंजन के लिये इधर उधर दौड़ता है जिसका लाभ भारतीय धार्मिक ग्रंथों के वाचकों ने खूब उठाया है।
           वैसे तो हमारे यहां कथा और सत्संग की परंपरा अत्यंत पुरानी है पर भौतिक युग में पेशेवर धार्मिक वाचकों ने उसे मनोरंजन स्वरूप दे दिया है।  वह स्वयं ज्ञान पढ़कर दूसरों को सुनाते हैं।  मनोरंजन से ऊबे लोग उसे ही अध्यात्म का मार्ग समझते हुए  भीड़ की भेड़  बनकर ऐसे उपदेशकों को अपना गुरु बना लेते हैं।  स्थिति यह है कि लोगों को त्याग, दया और दान की प्रेरणा देने वाले यह उपदेशक अपनी कथाओं के प्रायोजन के लिये सौदेबाजी करते हैं।  यह स्वाभाविक भी है क्योंकि इन उपदेशकों को अपनी कथााओं के लिये अपने साथ ऐसे दल की व्यवस्था करनी होती है जैसे कि नाटक निर्देशक  करते हैं।  अपने साथ संगीत और नृत्य  कलाकार लेकर अपनी कथाओं के पात्रों का मंच पर नाटक की तरह प्रस्तुत कर  यह कथा वाचक खर्च भी करते हैं।  ऐसे में उनको अपने कार्यक्रमों के लिये व्यवसायिक प्रबंध कौशल का परिचय देना होता है।  देखा जाये तो अध्यात्म साधना एकांत का विषय है पर गीत संगीत तथा नृत्य के माध्यम से शोर मचाकर यह लोगों का मन वैसे ही हरते हैं जैसे कि मनोरंजन करना ही अध्यात्म हो।
संत प्रवर कबीर दास जी कहते हैं कि
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पण्डित और मसालची, दोनों सूझत नाहिं।
औरन को करै चांदना, आप अंधेरे माहिं।।
         सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पण्डित और मशाल दिखाने वाले दूसरों को प्रकाश दिखाते हैं, पर स्वयं अंधेरे में रहते हैं।
पण्डित केरी पोथियां, ज्यों तीतर का ज्ञान।
और सगुन बतावहीं, आपन फंद न जान।।
        सामान्य हिन्दी में भावार्थ-पण्डित पोथियों पढ़कर ज्ञानोपदेश करत हैं। उनका ज्ञान तीतर की तरह ही है जो दूसरे पक्षियों को ज्ञान देता पर स्वयं पिंजरे में रहता है।     
         हमारा अध्यात्म अत्यंत समृद्ध है। देखा जाये तो हमारे अध्यात्म का सार श्रीमद्भागवत गीता में पूर्ण रूप से समाहित है। इस छोटे पर महान ग्रंथ का अध्ययन करने पर यह साफ लगता है कि उसमें वर्णित सदेशों से  प्रथक अन्य कोई सत्य हो ही नहीं सकता। कहा भी जाता है कि जिसने श्रीगीता का अध्ययन कर लिया उसे फिर अन्य किसी ग्रंथ से कोई प्रयोजन नहीं रह जाता है। हैरानी की बात है कि अपने आपको श्रीगीता सिद्ध बताने वाले उसके संदेश भी इतने विस्तार से बताते हैं कि सामान्य भक्तों के सिर के ऊपर से निकल जाते हैं।  उससे भी ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि लोग श्रीगीता के प्रवचन के समय ही प्रमाद कर अपनी बात से भक्तों को हंसाते हुए समझाते हैं।  प्रमाद राजसी कर्म का परिचायक है और स्वयं को सात्विक कहने वाले इन उपदेशकों को इससे बचना चाहिये।
      जिन लोगों को अधिक पुस्तकों से माथा पच्ची न करनी हो वह प्रातःकाल एक दो श्लोक ही गीता का पढ़ लिया करें।  उसका शाब्दिक अर्थ लेकर मन ही मन उसका चिंत्तन कर भावार्थ समझने का प्रयास करें।  आजकल सिद्ध गुरु मिलना कठिन है। कथित गुरु अपने आश्रमों के विस्तार और भक्तों के संग्रह को ही अपना लक्ष्य बनाते हें।  अतः भगवान श्रीकृष्ण को अपना गुरु मानते हुए श्रीगीता का अध्ययन करें तो यकीन मानिए स्वतः ही अध्यात्म का ऐसा ज्ञान प्राप्त होगा जो कथित बड़े संतों के लिये भी दुर्लभ है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, March 23, 2013

यजुर्वेद के आधार पर चिंत्तन-अनेकता के भाव पर व्यक्ति नष्ट हो जाता है (anekta ke bhaav se vyakti nasht hota hai-yajurved ke adhar par chittan)

        इस धरती पर अधिकतर जीव समूह बनाकर चलते हैं।  समूह बनाकर चलने की प्रवृत्ति अपनाने से  मन में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। मनुष्य का जिस तरह का दैहिक जीवन है उसमें तो उसे हमेशा ही समूह बनाकर चलना ही चाहिये।  जिन व्यक्तियों में थोड़ा भी ज्ञान है वह जानते हैं कि मनुष्य को समूह में ही सुरक्षा मिलती है।  जब इस धरती पर मनुष्य सीमित में संख्या थे तब वह अन्य जीवों से अपनी प्राण रक्षा के लिये हमेशा ही समूह बनाकर रहते भी थे। जैसे जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ी वैसे अहंकार के भाव ने भी अपने पांव पसार दिये।  अब हालत यह है कि राष्ट्र, भाषा, जाति, धर्म और वर्णों के नाम पर अनेक समूह बन गये हैं।  उनमें भी ढेर सारे उप समूह हैं।  इन समूहों का नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में है वह अपने स्वार्थ के लिये सामान्य सदस्यों का उपयोग करते हैं।  आधुनिक युग में भी अनेक मानवीय समूह  नस्ल, जाति, देश, भाषा, धर्म के नाम पर बने तो हैं पर उनमें संघभाव कतई नहीं है।  संसार का हर व्यक्ति  समूहों का उपयोग तो करना चाहता है पर उसके लिये त्याग कोई नहीं करता। यही कारण है कि पूरे विश्व में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में भारी तनाव व्याप्त है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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सम्भूर्ति च विनाशं च यस्तद्वेदोभयथ्सह।
विनोशेन मृतययुं तीत्वी सम्भूत्यामृत मश्नुते।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो संघभाव को जानता है वह विनाश एवं मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत जो उसे नहीं जानता वह हमेशा ही संकट को आमंत्रित करता है।

वाचमस्तमें नि यच्छदेवायुवम्।
      हिन्दी में भावार्थ-हम ऐसी वाणी का उपयोग करें जिससे सभी लोगों का एकत्रित हों।
              हृदय में संयुक्त या संघभाव धारण करने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम अपनी समूह के सदस्यों से सहयोग या त्याग की आशा करें पर समय पड़ने पर उनका साथ छोड़ दें।  हमारे देश में संयुक्त परिवारों की वजह से सामाजिक एकता का भाव पहले तो था पर अब सीमित परिवार, भौतिकता के प्रति अधिक झुकाव तथा स्वयं के पूजित होने के भाव ने एकता की भावना को कमजोर कर दिया है।  हमने उस पाश्चात्य संस्कृति और व्यवस्था को प्रमाणिक मान लिया है जो प्रकृति के विपरीत चलती है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के क्रम में चलता जबकि पश्चिम में राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के क्रम पर आधारित है।  हालांकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन यह भी मानता है कि जब व्यक्ति स्वयं अपने को संभालकर बाद  समाज के हित के लिये भी काम करे तो वही वास्तविक धर्म है।  कहने का अभिप्राय है कि हमें अपनी खुशी के साथ ही अपने साथ जुड़े लोगों के हित के लिये भी काम करना चाहिये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, March 10, 2013

अथर्ववेद के आधार पर चिंत्तन लेख-आपस में फूट डालने वाले तत्वों से बचें (atharva ved ke aadhar par sandesh-aapas mein foot dalne walon se bachen)


               हम जब भारतीय राजनीतिक इतिहास का बात करते हैं तो यह देखकर दुःख होता है को हमारे देश में विदेशी आक्रान्ताओं को  यहीं के लोगों ने आक्रमण के लिये आमंत्रण दिया। इसका कारण यह है कि राजनीति, समाज, अर्थ, और धर्म के शिखर पर बैठे लोगों अपने अहंकाशवश  यहां हमेशा ही आम इंसान को तुच्छ समझा। यही कारण है कि विदेशी आक्रांताओं ने यहां जब इन्हीं लोगों का राज्य, समूह, तथा संगठन ध्वस्त कर उनके प्राणों का हरण किया तब भी समाज का समर्थन  कभी उनको नहीं मिला।  ऐसे शिखर पुरुषों को भले ही आज भी सम्मान से याद किया जाता है पर इतिहास ने कभी तत्कालीन हालातों को दर्ज करते हुए यह नहीं बताया  कि क्या वाकई तत्कालीन  समाज इनसे हमदर्दी रखता था।
अथर्ववेद मे कहा गया है कि
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अदारसृद भवतु
                          हिन्दी में भावार्थ-आपस में कोई फूट डालने वाला न हो।
ब्राह्म्ण स्पतेऽन्मि राष्ट्र वर्घव।
                                 हिन्दी में भावार्थ-सभी ज्ञानी मिलकर राष्ट्र का उत्थान करें।
             सच बात तो यह है कि धर्म, अर्थ, राज्य तथा समाज के सिर पर बैठै लोगों ने आमजन को पांव की जुती समझा। भौतिकता से संपन्न होने पर विपन्न को कीड़ा मकौड़ा समझा यही कारण है कि यहां के आमजनों ने विदेशी आक्रांताओं के हाथों से उनके कुचले जाने पर भी हमदर्दी नहीं दिखाई।  इतिहास से सबक लेना चाहिए पर लगता नहीं है कि हमारे देश में  सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक तथा आर्थिक शिखरों पर वर्चस्व के लिये अपास में द्वेरथ  करा  रहे लोगों ने ऐसा किया है।  धन, बल और पद को जहां शक्ति का पर्याय मान लिया गया है वहां ज्ञानियों की हैसियत केवल लिपिक या अनुवादक जितनी बन गयी है। यही कारण है कि ज्ञानी लोग मौन होकर सब देखते हैं।  हालांकि होना तो यह चाहिए कि सभी ज्ञान मिलकर देश के लिये काम करें पर इसके लिये आमजन को भी अपनी प्रतिबद्धता दिखानी होगी।
दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Sunday, February 24, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-विपत्ति का अनुमान पहले ही करें (kautilya ka athshastra-vipatti ka anuman pahale hi karen)

              अंग्रेजी शिक्षा पद्धति तथा आधुनिक प्रचार साधनों में-फिल्म, टीवी और इंटरनेट पर-शीघ्र अमीर और प्रसिद्ध होने के नुस्खे खूब बताये जाते हैं। सत्य तो यह है कि आधुनिक शिक्षा वैसे ही आदमी में चिंत्तन क्षमता निर्माण नहीं करती तो वही प्रचार माध्यम उसमें अधीरता के भाव का निर्माण करते हैं जिससे विश्व समाज असमंजस वातावरण में सांस ले रहा है।   फिल्मों में नायकों के पात्रों का सृजन कर लोगों का मनोरंजन किया जाता है पर उनकी पटकथायें हमेशा ही हिंसा से बेहतर परिणामों को प्रदर्शित करती है।  सभी नायक अपने सामने आने वाले खलनायकों को बल से मारते हैं। कहीं नीति से किसी खलनायक का पतन होते नहीं दिखाया जाता है।
     भारत ही नहीं विश्व के अधिकांश देशों की व्यवस्थायें आधुनिक समय में विफल साबित हो रही हैं।  जनाक्रोश बढ़ रहा है और इसका लाभ फिल्म वाले उठाते हैं।  हाल ही में भारत के एक प्रसिद्ध शायर ने कहा था कि भारत के एक अभिनेता की ‘‘नाखुश युवा’’ की छवि फिल्म के पटकथाकारों ने बनाई थी।  दरअसल उनका कहना था कि भारत में भेजा गया एक कुख्यात आतंकवादी इसी तरह का एक युवा था जिसे देश के दुश्मनों ने वास्तविक हमले की पटकथा का सृजन कर  भेजा अतः उसे भेजने वाले लोगों को भी कड़ी सजा देने या दिलाने का प्रयास करना चाहिए।  देश के कुछ बुद्धिमानों ने इस की  आपत्ति की कि एक महानायक की एक आतंकवादी से तुलना क्यों की गयी? जबकि उन महान शायर का आशय यह था कि जिस तरह पटकथाकार किसी कल्पित पात्र का सृजन करता है उसी पर कोई अभिनेता अपनी नायक की भूमिका निभाता है।  उसी तरह उस आतंकवादी को भारत के दुश्मनों ने ऐसे ही वास्तविक हमले की पटकथा रचकर यहां अपराध करने के लिये उकसाया।  दरअसल विश्व में हिंसा फैलाकर अपना मतलब साधने वाले ऐसे ही युवकों का उपयोग कर रहे हैं। आदमी आधुनिक रूप से शिक्षित हो या अशिक्षित कोई अंतर नहीं रह गया क्योंकि आध्यात्म्कि ज्ञान से सभी दूर हैं।  पूरे विश्व की सभी भाषाओं की फिल्मों में हिंसा दिखाई जाती है। कहा तो यह जाता है कि यह सब समाज में चल रहा है इसलिये दिखा रहे हैं पर यह भी सच यह है कि इससे हिंसक घटनायें बढ़ जाती हैं।  अगर आप न्यूयार्क में हुई हिंसक घटना को ऐसी फिल्म में दिखायेंगे जो सारे विश्व में दिखती है तो यह बात तय है कि उसकी पुनरावृत्ति करने के लिये अनेक अनीतिवान और अपराधी तत्व तैयार हो जायेंगे। यह अलग बात है कि ऐसे लोग एक दो बार ही ऐसे अपराध करते हैं बाद में स्वयं भी काल कलवित हो ही जाते हैं।
आशिक्षितनयः सिंहो हन्तीमं केवलं बलात्।
तच्च धीरो नरस्तेषां शातानि जातिमाञ्जायेत्।।
          हिन्दी में भावार्थ- अशिक्षित सिंह ने कोई नीति नहीं सीखी होती, वह केवल अपने बल से ही  नष्ट कर डालता है जबकि ज्ञानी और धीर पुरुष अपनी नीति से सैंकड़ों को मारता है।
         पश्चयद्भिर्दूरतोऽपायान्सूपायप्रतिपत्तिभिः।
          भवन्ति हि फलायव विद्वाद्भश्वन्तिताः क्रियाः।।
                    हिन्दी में भावार्थ-जो विद्वान पुरुष दूर से ही आती विपत्ति को देखकर उसके प्रतिकार का विचार करता है वह अपना बचाव करने में सक्षम होता है।
         जो लोग नीति और धीरज के साथ जीवन में रहते हैं उनकी शक्ति बहुत ज्यादा होती है।  महर्षि विवेकानंद ने अपने अल्प जीवन में पूरे विश्व में  भारतीय ज्ञान का प्रकाश फैलाया। उसी तरह भारतीय क्रिकेट के दो महान खिलाड़ियों  कपिल देव और धोनी ने अपनी कप्तानी में विश्व कप जितवाया। धोनी तो पहले बीस ओवर और अब पचास दो विश्व कप जितवा चुके हैं। अगर आदमी में धीरज और ज्ञान हो तो वह अपने सामर्थ्य से सारे समाज को प्रसन्न करने के साथ ही उसका मार्गदर्शन भी करता है।  इसलिये किसी भी प्रचार में आकर जल्दबाजी में सफलता हासिल करने की बजाय धीरज के साथ ही योजना बनाकर लक्ष्य प्राप्त करना चाहिये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

यह ब्लाग/पत्रिका विश्व में आठवीं वरीयता प्राप्त ब्लाग पत्रिका ‘अनंत शब्दयोग’ का सहयोगी ब्लाग/पत्रिका है। ‘अनंत शब्दयोग’ को यह वरीयता 12 जुलाई 2009 को प्राप्त हुई थी। किसी हिंदी ब्लाग को इतनी गौरवपूर्ण उपलब्धि पहली बार मिली थी। ------------------------

Thursday, December 27, 2012

चाणक्य नीति-सम्मान और दंड में दक्ष व्यक्ति ही लोकप्रिय होता है

                कहा जाता है कि फिट है वही हिट है। दरअसल भौतिक उपलब्धियों के लिये जुटा इंसान न तो अपनी देह को स्वस्थ रखने के लिये प्रयास करता है और न ही अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त कर आत्मबली हो पाता है। जीवन में एक बार ऐसा समय अवश्य ही आता है जब वह थक जाता है। यह थकावट उसे वृद्धावस्था में ही पहुंचा देती है। ऐसे में शारीरिक तथा आत्मिक रूप से क्षीण होकर मनुष्य के पास आर्तनाद करने के अलावा कोई मार्ग शेष नहीं रह जाता। हमारे देश में व्यायाम आदि को कभी आदत की तरह नहीं अपनाया गया। अपनी ही योग कला को केवल सिद्धों तथा नकारा लोगों के लिये आवश्यक माना गया है। यही कारण है कि आजकल हम अपने आसपास शारीरिक तथा दिमागी रूप से विकारग्रस्त लोगों का से भरा समाज देख रहे हैं।
                       महान नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि
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                        यस्मिन् रुष्टे भयं नास्ति तुष्टे नैंव धनऽऽगमः।
                       निग्रहोऽनुग्रहो नास्ति स रुष्टः किं करिष्यति।।
            ‘‘जिसके नाराज होने पर किसी प्रकार का भय नहीं हो और नही प्रसन्न होने पर किसी फल की आशा है और जो दण्ड देने का सामर्थ्य भी नहीं रखता वह गुस्सा होकर कर भी क्या लेगा?’’
                  पश्चिमी आधार पर किये गया व्यायाम भी बुरा नहीं है अगर नियमित रूप से किया जाये मगर हमारे देश में लोगों ने जीवन शैली तो ब्रिटेन और अमेरिका जैसी अपना ली है पर वहां जो कसरत करने का नियम है उसका पालन नहीं करते। सुविधाओं ने इतना विलासी बना दिया है कि हमारे यहां अस्वस्थ लोगों की संख्या बढ़ रही है। हमारे यहां की योग कला तो न केवल शारीरिक रूप से शक्तिशाली बनाती है वरन मानसिक रूप से दृढ़ भी बनाती है। आज के समय में जब भौतिकवाद के चलते आदमी अकेला होता जा रहा है तब यह आवश्यक है कि अपने बल को बनाये रखे। यह सभी जानते हैं कि जब तक हमारी देह में सामर्थ्य है तभी तक सारा संसार हमारे साथ है और असमर्थ होने पर अपने भी त्याग देते हैं। इसके बावजूद अगर कोई अपने स्वास्थ्य पर ध्यान नहीं देता तो उसे अज्ञानी ही माना जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, November 15, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-धन का नहीं परमात्मा का ध्यान करें (dhan ka nahin bhagwan shiv ka dhyan karn-hindu dharma darshan)

         हमारे देश में श्रीमद्भागवत गीता की चर्चा एक पवित्र ग्रंथ की तरह होती है।  अनेक संत और साधु इसके ज्ञान का प्रचार भी करते हैं पर फिर भी लगता है कि बहुत कम लोग इस समझ पाये हैं।  इसका कारण यह है कि भले ही गीता का अध्ययन कर उसका ज्ञान रट लिया जाये पर जब तक हृदय में वह स्थापित नहीं होगा किसी आचरण मे दृष्टिगोचर न हो वह गीता सिद्ध नहीं माना जा सकता।  दरअसल गीता का नाम लेकर कोई राजयोग का प्रचार करता है तो कोई सहज योग की धारणा व्यक्त करता है। इससे आम भक्तों में यह भाव आता है कि योग केवल सिद्ध लोग ही कर सकते हैं अथवा योग एक कठिन विषय है।
      लोगों ने गीता ज्ञान में सिद्ध हैं या उसकी साधना करत हैं उनको यह बात समझ में तो आ जाती है कि योग एक महत्वपूर्ण विधा है पर उनमें भी बहुत कम लोग बाह्य स्थितियों पर चिंतन या मनन कर यह जान पाते हैं कि योग तो हर आदमी चाहे अनचाहे कर रहा है।  योग का सीधा मतलब यह है कि अपनी इंद्रियों को परमात्मा से जोड़ा जाये।  यह योग ज्ञान होने पर ही किया जा सकता है।  अगर ज्ञान न हो तो आदमी दुर्योग को प्राप्त होता है। मनुष्य की इंद्रियां वह चाहे या न चाहे संसार के विषयों से जुड़ती हैं अंतर यह है कि जो ज्ञानी या साधक हैं वह स्वविवेक से सहजता पूर्वक योग करता है पर अज्ञानी आदमी जहां उसके मन जोड़ दे वहीं बैठ जाता है।  ज्ञानी या साधक परमात्मा का स्मरण करते हुए अपनी इंद्रियों को सांसरिक विषयों से स्वयं जुड़ते हुए सहज स्थिति में ही रहता है जबकि अज्ञानी कभी अपने मन तो कभी दूसरे की राय पर अपने सारे काम करने के कारण क्षणिक सुख प्राप्त करने के बाद दुःख की स्थिति में होता है।
महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि
......................................
क्षान्तं न क्षमया गृहोचितसुखं त्यक्तं न संतोषत।
सोढो दुस्सहशीतापपवनक्लेशो न तप्तं पदं।।
ध्यातं वित्तमहर्निश नियमितप्राणैर्न शंभौः पदं।
     हिन्दी में भावार्थ-हमने दान तो किया किन्तु धर्मपूर्वक नहीं, हमने सुख का त्याग किया पर संतुष्ट होकर
नहीं, कष्ट सहन किये पर तप के लिये नहीं, ध्यान तो किया पर अपने प्राण भगवान शंकर की बजाय धन में फंसाये। यही कारण है कि मुनियों की तरह काम करने पर भी फल उन जैसा नहीं मिला।
               हम अगर पतंजलि योग   विज्ञान के साथ ही श्रीमद्भागवत गीता भी  अध्ययन करें तो यह पायेंगे कि ज्ञानी और ज्ञान साधक सहज योग करते हैं पर जिन लोगों के पास अध्यात्मिक ज्ञान नहीं है वह असहज योग को प्राप्त होते हैं।  इंद्रियों अच्छे विषय से भी जुड़ती है तो हमारा कभी उनको दुःखद स्थितियों की तरफ धकेल देता है।  ऐसे में अच्छे विषयों से जुड़ने पर भी अज्ञानी को वह सुख नहीं मिलता तो जो ज्ञानी को मिलता है।  दुःख के साथ  सुख तो जीवन में आते हैं पर ज्ञानी और अज्ञानी  अपने विवेक के अनुसार उसे अलग अलग दृष्टिकोण से देखते हैं।   ज्ञानी सहजयोग करते है जबकि अज्ञानी असहज योग में फंसा रहता है।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Writer-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhya Pradesh

संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, April 13, 2012

पलटू महाराज का दर्शन-दूसरों की नहीं अपनी चिंता करें

              वर्तमान युग के बाज़ार और प्रचारतंत्र के शक्तिशाली हथियारों के आगे आम आदमी लाचार और बेबस होता जा रहा है। टीवी, अखबार, मोबाइल, कंप्यूटर और फिल्मों का प्रभाव समाज में इस तरह हो गया है कि आम इंसान के अंदर स्वचिंत्तन का अभाव हो गया है। वह प्रचार के माध्यम से थोपे जा रहे विषयों को ही सबकुछ मानकर उसमें लिप्त होकर अपने मस्तिष्क में तनाव ला रहा है जिस कारण अनेक रोग पैदा हो रहे हैं। इधर भोग विलासिता की वस्तुओं में नित नित नये मॉडल आ जाते हैं तो एक माह पहले ही खरीदे गये सामान प्राचीन युग के प्रतीत होते है। इस कारण लोग विषयों के पीछे भागते जा रहे हैं। ऐसे में अपने चरित्र पर विचार करने का किसी के पास समय नहीं है पर समाज में सम्मान पाने का मोह सभी को है। इसका उपाय लोगों ने यह ढूंढ लिया है कि दूसरे की निंदा कर अपने को बड़ा साबित करो। यह निहायत घटिया प्रयास है जिसे करते हुए हम लोगों को देख सकते हैं। आत्म मंथन करें तो अपने अंदर भी यह दोष दिखाई देगा।
             पलटू महाराज कहते हैं कि
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           ‘पलटू’ यह सांची कहैं, अपने मन को फेर।
            तुझे पराई क्या परी, अपनी ओर निबेर।।
           ‘‘सच बात तो यह है कि मनुष्य अपने मन का विचार करे। पराई बातों में रुचि लेने से कोई लाभ नहीं बल्कि अपने गुण दोष पर दृष्टिपात करना ही ठीक है।
             सरबरि कबहूं न कीजिये, सबसे रहिये हार।
            ‘पलटू’ ऐसे दास सों, डरिये बारबार।।
         ‘‘सबसे बराबरी करने का विचार छोड़कर हार मान लेना ही बेहतर हैं। जो ऐसा करता है व्यक्ति से डरना चाहिए क्योंकि दूसरों के घर की रौशनी देखकर अपना घर न चलाने वाला ही मानसिक रूप से शक्तिशाली होता है।’’
           चाणक्य महाराज का कहना है कि अगर किसी व्यक्ति को लोकप्रिय होना है तो वह निंदा करना छोड़ दे। हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि दूसरों के सुख को ईर्ष्या न करें। जो लोग ज्ञानी हैं वह सादगी से जीवन जीते हैं उनको कमजोर या गरीब मानने वालों की आज के समाज में कमीनहीं है पर सच यह है कि ऐसे त्यागी और ज्ञानी आम इंसान से अधिक शक्तिशाली होते है। विषयों में आसाक्ति मनुष्य को मानसिक रूप से कमजोर बनाती है पर निष्काम भाव से हृदय में साहस का भाव आता है। अतः उनका सम्मान करना चाहिए। एक बात याद रखें उपभोग प्रवृत्ति कभी शक्ति और स्वास्थ्य का प्रमाण नहीं होती।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Sunday, February 26, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-भोजन के लिये आत्मसम्मान गंवाना ठीक नहीं (bharathari neeti shatak-bhojan ke liye atmasamman ganwana theek nahin)

             दुनियां में हर जीव के लिये भोजन अनिवार्य है पर इसका आशय यह कतई नहीं है किसी भूखे की दीनता देखकर उसके प्रति उदार भाव दिखाया जाये। कहा भी जाता है कि सबका दाता राम है और जिसने पेट दिया है उसने भोजन का इंतजाम भी पहले कर दिया है। यह भी कहा जाता है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम! इन सब बातों के उल्लेख करने का तात्पर्य यह है कि दैहिक जीवन धारण करने के लिये भोजन अनिवार्य है पर इसका यह मतलब भी नहीं है कि सब कुछ यही भोजन है और कहीं भी किसी प्रकार भी ग्रहण किया जाये। हमेशा सुपाच्य भोजन करने के साथ ही इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि वह शुद्ध माध्यमो से अर्जित किया गया हो। ऐसे लोगों की संगत करना चाहिए जो पवित्र विचार और कर्म वाले हों। अगर कहीं भोजन के लिये दूसरे पर निर्भर हों तो यह भी देखना चाहिए कि वह आदमी किस प्रवृत्ति का है और उसके आय के साधन कैसे हैं?
                      भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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             लाङ्गल चालनभधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदर दर्शनं च।
           श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुश्तैश्च भुङ्वते।।
                  ‘‘जब कोई मनुष्य कुत्ते के सामने भोजन डालता है तो वह पूंछ हिलाकर अपनी दीनता का प्रदर्शन करता है पर जब कोई हाथ के सामने भोजन रखता है तो वह बड़ी गंभीरता से उसे देखते हुए कई बार मनाने पर ही उसे ग्रहण करता है।"
                   हमें भोजन देने वाले का आभार व्यक्त करना चाहिए पर इसक अर्थ यह कदापि नहीं है कि उसके इतने कृतज्ञ हो जायें कि उसके कहने पर अपवित्र काम करने लगें। कहीं भोजन मिले तो उस तत्काल नहीं टूटना चाहिए बल्कि सम्मान से आग्रह करने पर ही अपना हाथ बढ़ाना चाहिए। अगर हमें भूख है तो इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि कहीं भोजन बना हुआ है जिससे हम अपना मन तृप्त कर सकते हैं। उसी तरह दूसरे को भोजन कराते समय अपने अंदर अहंकार का भाव भी नहीं रखना चाहिए। यह प्रकृत्ति प्रदत्त है भले ही निमित्त कोई इंसान बनता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Tuesday, January 3, 2012

यजुर्वेद से संदेश-परमात्मा से सद्बुद्धि और शक्ति की याचना करें (yajurved se sandesh-parmatma se sadbuddhi aur shakti ki yachna karen)

           मंदिर या घर में पूजा करते हुए अधिकतर लोग भगवान से अपनी अभीष्ट वस्तु प्रदान करने या फिर कोई अन्य सांसरिक होने की इच्छा मन में करते हैं। यह मनुष्य का अज्ञान ही है कि वह अपने सांसरिक उद्देश्य के लिये पराशक्ति की तरफ अपना मुख ताकता है जबकि परमात्मा ने उसे अपना काम करने के लिये हाथ, चलने के लिये पांव, देखने के लिये आंख, सूंघने के लिये नाक तथा सुनने के लिये कान दिये हैं। अपना लक्ष्य तय करने तथा योजना बनाने के लिये बुद्धि दी है। फिर भी अधिकतर लोग याचक बनकर जीने की आदी होते हैं। वैसे हमारे अध्यात्मिक ज्ञान के अनुसार भक्त चार प्रकार के होते हैं-आर्ती, अर्थार्थी, जिज्ञासु तथा ज्ञानी। इनमें सबसे अधिक संख्या अर्थार्थी लोगो की है जो सकाम भक्ति मे विश्वास करते है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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मसि त्यांदिन्द्रियं बृहन्मयि दक्षो मयि क्रतुः।
              ‘‘मेरे अंदर महान् शक्ति का निर्माण हो। कार्य दक्षता और कर्तव्यनिष्ठा बढ़े। हम इंद्रियों को वश में करके महाशक्तिशाली बने।’’
मनसः कांममाकूतिं वाचः सत्यमशीप।
             ‘‘मननशील, अंतःकरण की इच्छा और अभिप्राय जानने की शक्ति करने के साथ सत्य भाषण करने का भाव बना रहे।’’
दुते छंह या। ज्याक्ते संदृशि जीव्यासं ज्योक्तो सदृशि जीष्यासम।।
            ‘‘हे शक्तिशाली परमात्मा मुझे बलवान बनाओ। सब मुझे मित्र दृष्टि से और मैं सब को मित्र दृष्टि से देखूं।’’
                हमारे अध्यात्म ग्रंथों के अनुसार नाम स्मरण करते समय ऐसी प्रार्थना करना चाहिए कि हमारे अंदर ही मन और बुद्धि की शुद्धि हो। अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठ बढ़े। कहने का अभिप्राय यह है कि जब हम मानसिक रूप से स्वस्थ तथा गतिशील होंगे तो सांसरिक कार्य वैसे ही सिद्ध होंगे। इसके विपरीत मन में कलुषिता और स्वार्थ का भाव रखने पर हम चाहे कितनी भी परमात्मा से याचना करें हमारा कोई भी काम सिद्ध नहीं हो सकता। हमें नाम स्मरण करते समय परमात्मा से काम में सफलता नही बल्कि उसे संपन्न करने के लिये बल और बुद्धि की याचना करना चाहिए। वैसे ज्ञानी लोग तो निष्काम भाव से ही भगवान का स्मरण यह जानते हुए करते हैं कि संसार चलाने वाला भी वही है इसलिये यहां होने वाले समस्त काम उसकी इच्छा के अनुरूप स्वयं ही सिद्ध होते हैं। कुछ ज्ञानी तो भारी प्रयास के बावजूद अपना काम सिद्ध न होने पर यह मानते हैं कि उसमें भी कोई अच्छाई होगी।
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Friday, December 30, 2011

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उपेक्षासन कर आनंद लें (kautilya ka arthshastra-upekshasan ka anand-economics of kautilya)

               आज के युग में इस तरह के आसन का विशेष महत्व है। पहले तो छोटे राज्यों की वजह युद्ध आमतौर से होते थे पर आधुनिक लोकतंत्र प्रणाली से राज्यों स्वरूप बृहद बन जाने से युद्धों की आशंका समाप्त कर दी है। जब भौतिकवाद में डूबे विश्व समाज के लोग अहंकार और मद में एक दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हों और उनसे बहस करने का कोई परिणाम नहीं निकलता हो तब ज्ञानी आदमी के लिये उपेक्षासन एक तरह से ब्रह्मास्त्र की तरह काम कर सकता है। आपसी वार्तालाप में लोग भौतिक साधनों की चर्चा करते हुए अपनी उपलब्धियों का बखान करने से नहीं चूकते। टीवी चैनलों और समाचार पत्रों के साथ इंटरनेट में बाज़ार के विज्ञापनों से प्रेरित होकर उपभोग संस्कृति को बढ़ावा दिया जा रहा है। ऐसे में हमें अपने मन को ऐसी चर्चाओं से मन व्यथित करने की बजाय सात्विक विषयों की तरफ अपना ध्यान ले जाना चाहिए। यह अलग बात है कि इस तरह उपेक्षासन करने पर लोग आपको पौंगापंथी समझें पर सच बात यह है कि इससे आपको आराम मिलेगा। जिस तरह मोर नाचने के बाद अपने गंदे पांव देखकर रोता है उसी आजकल लोग नववर्ष, वैलंटाईन डे तथा अन्य पाश्चात्य पर्व आने पर नाच गाकर और गलत सलत खाकर एंजॉयमेंट यानि आंनद करने का पाखंड करते हैं पर उसके बाद फिर जिंदगी के तनाव उनको घेरकर अधिक दुख देते हैं। पैसा खर्च होने के साथ ही शरीर टूटता है सो अलग।
कौटिल्य के अर्थशास्त्र में कहा गया है कि
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आस्त प्रेक्ष्यारिमधिकमुपेक्षासनमुच्यते।
उपेक्षा कृतवानिन्द्र पारिजातग्रहं प्रति।।
              ‘‘जब कोई मनुक्ष्य अपने शत्रु या विरोधी को अपने से अधिक जानकर उसके प्रति उपेक्षा का भाव दिखाता है तब उसे उपेक्षासन कहा जाता है। जब भगवान श्रीकृष्ण ने सत्यभावा के लिये स्वर्ग से कल्पवृक्ष उठा लिया तो देवराज ने अपनी शक्ति को कम मानते हुए उसे युद्ध करने की बजाय उपेक्षासन किया था।"
उपेर्क्षितत्स चान्येस्तु कारणेनेह केन चित्त।
आसनं रुक्मिण इव तदुपेक्षासनं स्पुतम्।।
               ‘‘उसी तरह जिस समय रुक्मणी के भाई रुक्मी ने जब कृष्ण के साथ युद्ध में किसी ने सहायता की तो वह उपेक्षासन कर बैठ गया।’’
                 दरअसल आजकल हम चारों तरफ धन के सहारे फैल रहे आकर्षक वातावरण को देखकर अपने मन में अनेक तरह के सपने पाल लेते हैं। खासतौर से आजकल के मध्यम तथा निम्नवर्गीय युवा फिल्म, इंटरनेट तथा पत्रिकाओं में भौतिकतावाद के चलते आकर्षक संसार के उपभोग का जो सपना देखते हैं वह सभी के लिये साकार होना संभव नहीं है। जिनको विरासत में धन मिलता है वह तो चहकते हैं पर जिनको अपनी रोजी रोटी कमाने के लिये ही संघर्ष करना पड़ता है उनके लिये अपने अभावों का मानसिक तनाव झेलने के अलावा अन्य मार्ग नहीं रह जाता। ऐसे में कुछ युवा बहककर अपराध की तरफ बढ़ जाते हैं। उनके लिये बचने का तो बस यह एक ही मार्ग है कि वह भौतिक संसार के आकर्षण के प्रति उपेक्षासन कर जीवन का आनंद लें।
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Tuesday, December 27, 2011

चाणक्य नीति-दुष्ट व्यक्ति अपना अभद्र व्यवहार नहीं छोड़ता (chnakya neeti-dusht vyakti apna abhadra vyavhar nahin chhodta)

             ज्ञानी लोग न बहस करते हैं न समाज के सुधार के लिये कोई अभियान चलाते हैं। तत्वज्ञानी जानते हैं कि इस त्रिगुणमयी माया के बंधन में फंसे संसार का प्रत्येक जीव अपनी प्रवृत्ति के अनुसार व्यवहार करता है। वह अपनी प्रवृत्तियों की निवृति का उपाय नहीं जानता। प्रत्येक जीव अपने रहन सहन, खानपान तथा संगत के व्यवहार से प्रभावित होता है। उसकी इंद्रियां जिस प्रकार के बाह्य वातावरण के संपर्क में आती हैं वैसे ही गुण उनके हो जाते हैं। मनुष्य के लिये निरंतर सहज, सरल और परिश्रमी बने रहना संभव नहीं है। काम, क्रोध और लोभ का मार्ग बुरा है पर उसमें भौतिकता का आकर्षण है इसलिये लोगों को उस पर चलना सहज लगता हैं। लोगों को यह लगता है कि प्रेम से नहीं वरन् शक्ति से समाज पर नियंत्रण पाया जाता इसलिये वह क्रोध करते है। कोई ज्ञानी या योगी हो जाये तभी उसकी मानसिकता में परिवर्तन आ सकता है वरना तो बहुत कम ही लोग हैं जो इस संसार की माया के दुष्प्रभाव से बच पाते हैं वरना तो सारा संसार भ्रमित होकर जीना सहज समझता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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न दुर्जनः साधुदशामुपैति बहुप्रकारैरपि शिक्ष्यमाणः।
आमूलसिक्तः पयसा धृतेन न निम्बवृक्षो मधुरत्वमेति।।
           ‘‘दुष्ट व्यक्ति को कितना भी समझाओ वह अपना अभद्रता का व्यवहार नहीं छोड़ता जैसे नीम का वृक्ष भले ही दूध या धी से सींचा जाये पर वह मधुरता को प्राप्त नहीं कर सकता।
अंतर्गतमलो दृष्टस्तीर्थस्नानशतैरपिः
न शुध्यति यथा भापडं सुरत्या दाहितं च यत्।।
‘‘दुराचार तथा वासना में लिप्त व्यक्ति चाहे सैंकड़ें पर तीर्थ कर पर कभी पवित्र नहीं हो सकता जैसे मदिरा का पात्र तपाये जाने पर भी पवित्र नहीं होता।
        यही कारण है कि जिनमें दुष्टता, स्वार्थ तथा मोह का भाव जिन लोगों में आ जाता है उसमें परिवर्तन की आशा करना व्यर्थ है। उल्टे दूसरे को सुधारने के प्रयास में स्वयं के अंदर ही दुर्गुण आने की आशंका रहती है। इसलिये जहां तक हो सके दुष्ट, स्वार्थी तथा कामी आदमी से दूर रहा जाये। इसके बावजूद अगर वह सामने आकर अपनी औकात दिखाये तो उस पर ध्यान न दिया जाये। वह इस धरती पर नीम के वृक्ष की तरह होते हैं जिनको दूध या घी से भी सींचा जाये पर वह मधुरता का गुण ग्रहण नहीं कर सकते।
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Saturday, December 24, 2011

दादू दयाल के दोहे-निंदक दूसरे को स्वच्छ कर स्वयं गंदा होता है (dadu dayal ke dohe-nindak doosre so swachchh ka swyan ganda hota hai)

         कभी कभी अपना अपने बाह्य व्यक्तित्व पर आत्ममंथन करना चाहिए। जब हम गुस्से या निराशा में आकर दूसरे की निंदा करते हैं तब शांत होने के बाद अपने ही शब्दों पर विचार करने से यह पता चलेगा कि हमने किसी अन्य पुरुष की निंदा कर उसके जिन दुर्गुणों का बखान किया था वह हमारे अंदर भी आ गये हैं। इतना ही नहीं जिसकी हम निंदा करते हैं कहीं न कहीं उसको लाभ यह होता है कि वह अपने उस दुर्गुण से मुक्त होकर जीवन में तरक्की करता जाता है। जबकि निंदा करने वाला अपने अंदर नये दुर्गुण की वजह से पिछड़ जाता है।
निंदा के विषय में कविवर दादू दयाल कहते हैं कि
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‘दादू’ निद्ना नांव न लीजिये, सुपिनै ही जिनि होइ।
ना हम कहैं न तुम सुणो, हम जिनि भाखै कोइ।।
         ‘‘कभी सपने में भी किसी व्यक्ति की निंदा नहीं करना चाहिए। न हमें किसी की निंदा सुनना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से दुर्गुण अपने अंदर नहीं लाना चाहिए।’’
‘दादू-निंदक बपुरा जिनि मरे, पर जपगारी सोइ।
हम कूं करत ऊजाना, अपाण मैल होइ।।
          ‘‘निंदक बिचारा तो दूसरों के दुर्गुणों का जप करता हुआ उनका अपने अंदर स्थापित करता है जबकि जिसकी निंदा वह करता है उसका मन उजला होता जाता है।’’
       अगर हम समाज में अपने ज्ञान चक्षुओं को खोलकर विचरण करें तो पायेंगे कि लोग एक दूसरे की निंदा कर अपने को श्रेष्ठ अनुभव करते है। इससे यह होता है कि एक दूसरे के दुर्गुण उनमें प्रविष्ट होकर अपना दुष्प्रभाव दिखाते हैं। यही कारण है कि हम कहते हैं कि आज कोई सुखी नहीं है। दूसरों की निंदा करने तथा सुनने की सहज आदत के कारण लोग आत्ममंथन नहीं करते जिससे उनको अपने व्यक्तित्व में निखार लाने का अवसर नहीं मिल पाता। लोग इतनी मर्यादा तक का पालन नहीं करते कि अपने बच्चों के सामने अपने ही बड़े लोगों के विरुद्ध विषवमन न करे जिसके कारण समाज और परिवार में रिश्तों में तनाव पनपता है।
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Thursday, December 22, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-विरक्ति भाव से भयमुक्त होना संभव है (bharathari neeti shatak-virakati bhav se bhee bhaymukt hona sanbhav)

             हमारे अध्यात्म ज्ञान में निष्काम भाव का महत्व प्रतिपादित किया गया है। दरअसल इसमें कर्मफल के प्रति विरक्ति दिखाने के लिये प्रेरित किया गया है। जबकि हमारे प्रवचनकर्ता इसका अर्थ इस तरह प्रतिपादित करते हैं जैसे कि संसार की वस्तुओं से ही पूरी तरह विरक्त हुआ जाये। अक्सर यह कहा जाता है कि मोह, लोभ, काम क्रोध तथा कामनायें ही मनुष्य की शत्रु होती हैं। आज तक लोगों को कोई यह समझा नहीं पाया कि कर्मफल है क्या? यही कारण है कि सामान्य जन कहते हैं कि फल की इच्छा के बिना कर्म करना संभव नहीं है। इसका मतलब यह है कि लोग सांसरिक क्रियाओं के कर्म का फल भौतिक पदार्थ की उपलब्धि ही समझते हैं। नौकरी, व्यवसाय या अपनी रोजमर्रा की गतिविधियों से मिलने वाले धन को आज भी फल समझना इस बात का प्रमाण है कि कथित भारतीय अध्यात्मिक गुरु समाज को निष्काम कर्म का यह अर्थ नहंीं समझा पाये जिसका आशय भक्ति, दया और दान और दान से है।
                मनुष्य अपनी दैहिक बाध्यताओं की वजह से प्रतिदिन कर्म करता है। नौकरी, व्यवसाय या मजदूरी से जिन लोगों को पैसा मिलता है वह उससे अपने घर परिवार का संचालन करते हैं। बच्चों की फीस, परिवार के लिये भोजन तथा अपनी जेब का खर्च करता हुआ कोई भी आदमी यह नहीं समझ पाता कि उसके पास आया धन फल नहीं है। इसका आशय यह है कि पैसा अपने हाथ में आना हमारे जीवन के ही कर्म का विस्तार है। वह पैसा हमारी जेब में नहीं रहता। अधिक है तो अल्मारी या बैंक में जमा रहता है। उस पैसे से खरीदा गया भोजन और वस्त्र भी फल नहीं है क्योंकि हम उसे अपनी देह का संचालन करते हैं। ऐसे सांसरिक कर्म हमेशा धन की चाह से किये जाते हैं और ऐसा जो न करे वह मूर्ख ही कहलायेगा। दरअसल उस धन का उपयोग जब किसी पर दया करने या दान देने के लिये किया जाता है तब उसे निष्काम कर्म कहा जा सकता है। जहां धन की वापसी की चाहत न हो वही निष्काम कर्म है। इस चाहत से विरक्ति ही त्याग है।
महाराज भर्तृहरि के नीति शतक में कहा गया है कि
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भोगे रोगभयं कुल च्युतिभयं वित्ते नृपालाद् भयं
मानं दैन्यभयं वाले रिपुभयं रूपे जरायाः भयमः।
शास्त्रे वादिभयं गुणे खलभयं कावे कृतान्ताद् भयं
सर्व वस्तु भयान्वितं भुवि नृणां वैराग्यमेवाभयम्।।
‘‘इस दैहिक जीवन में भोगों से रोग, उच्च परिवार में जन्म लेने पर निम्न आचरण में फंसने, अधिक धन होने पर राज्य, अधिक मौन रहने पर दीनता, शक्तिवान होने पर शत्रु, सौंदर्य से बुढ़ापे, ज्ञानी होने पर वाद विवाद में पराजय, विनम्रता से दुष्टों से आक्रमण और देह रहने पर मृत्यु का भय रहता है। एक मात्र विरक्त का भव ही भय से निरापद बना सकता है।
             जहां दैहिक और भौतिक जीवन को ही स्वीकार किया जाता है वहां भय की संभावना अधिक रहती है। यहां हर वस्तु पतनशील और नष्टप्रायः है। अगर हम अपने अध्यात्म दर्शन को समझें तो यह ज्ञान प्राप्त होगा कि सांसरिक उपलब्धियों का फल समझना ही भय का कारण है। यह ज्ञान होने पर आदमी भय से रहित हो जाता है।
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Thursday, December 15, 2011

मनुस्मृति-निर्धन और निम्न जाति का मजाक उड़ाना या अपमानित करना निंदनीय (garib aur nimna jati ka majak ya apaman na kareh-manu smruti in hindi)

            यह कहना कठिन है कि पूरी दुनियां में ही अहंकार के भाव का बोलबाला है या भारतीय समाज में ही यह विकट रूप में दिखाई देता है। अलबत्ता इतना अवश्य है कि भारतीय समाज में अपने अहंकार में आकर दूसरे को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति कुछ अधिक ही दिखाई देती है। हम जैसे चिंत्तक तो मानते हैं कि भारत का अध्यात्मिक दर्शन इसलिये ही अधिक समृद्ध हुआ है क्योंकि ऋषियों और मुनियों को अपने आसपास अज्ञान में लिपटा एक बृहद समाज मिला जिसे सुधारने के लिये उन्होंने तत्वज्ञान स्थापित किया। इसके लिये उनको एक सहज जमीन मिल गयी जहां वह अनुसंधान, चिंत्तन, मनन और अध्ययन से अध्यात्मिक ज्ञान का सृजन करने के साथ ही उसे सार्वजनिक रूप से व्यक्त भी कर सके। अगर सभी ज्ञानी होते तो आखिर वह किस पर अनुसंधान कर रहस्यों का पता लगाते। उनकी बात कौन सुनता? एक ज्ञानी के रूप में कौन उनको प्रतिष्ठत करता? एक टांग वाले को लंगड़ा, एक आंख वाले को काना, अक्षरज्ञान से रहित को गंवार और और काले रंग वाले को कुरूप कहकर उनका मजाक उड़ाना तो आम बात है। इसके अलावा हर आदमी अपनी जाति को श्रेष्ठ बताकर दूसरी जाति का मजाक उड़ाता है। कभी कभी तो अपने प्रथक जाति वाले को नीच बताकर उसका अपमान किया जाता है। सच बात तो यह है कि कोई जाति नीच नहीं होती अलबत्ता जिनके पास धन, पद और बाहुबल है वह दूसरे की जाति को नीच बताते हैं। यह एक दम अधर्म और अज्ञान का प्रमाण है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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हीनांगनतिरिक्तांगहीनाव्योऽधिकान्।
रूपद्रव्यविहीनांश्च जातिहीनांश्च नाक्षिपेत्।।
           ‘‘ऐसे व्यक्तियों का मजाक  उड़ाना या अपमानित करना निंदनीय है जो किसी अंग से हीन, अधिक अंग वाले, शिक्षा से रहित, आयु में बड़े, कुरूप, निर्धन तथा छोटी जाति या वर्ण के हों।’’
         वैसे मनुमहाराज पर भारतीय समाज में जाति पांति स्थापित करने का आरोप लगता है। ऐसा लगता है कि आधुनिक शिक्षा से ओतप्रोत समाज नहीं चाहता कि भारत की प्राचीन शिक्षा का यहां प्रचार प्रसार हो। यही कारण एक तो वह लोग हैं जो मनुस्मृति के चंद उदाहरण देकर देश में उसे जातिपाति का प्रवर्तक मानते हैं बिना पढ़े ही उनका प्रतिकार यह कहते हुए करते हैं कि भारतीय समाज कभी उनके संदेशों के मार्ग पर नहीं चला। यह हैरानी की बात है कि इन्हीं मनुमहाराज ने अंगहीन, अशिक्षित, बूढ़े, असुंदर तथा जाति के आधार पर किसी के मजाक उड़ाने या अपमानित करने को वर्जित बताया है। लार्ड मैकाले की शिक्षा में रचेबसे आधुनिक बुद्धिजीवी चाहे वह जिस विचारधारा के हों मनुस्मृति का पूर्ण अध्ययन किये बिना ही अपना बौद्धिक ज्ञान बघारते हैं।
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Monday, December 12, 2011

रहीम के दोहे-बड़े आदमी की अनुचित बात नहीं माननी चाहिए

             आधुनिक युग में भौतिकतवाद ने अनेक ऐसे प्रायोजित नायकों को स्थापित किया है जो धर्म, कला, साहित्य, समाज तथा आर्थिक जगत के शिखर पर पहुंचकर लोगों को सिखाने लगते हैं कि जीवन कैसे जिया जाये? वह वस्तुओं का विज्ञापन करते हैं तो समाज की व्यवस्था में भी अपना दखल इस तरह देते हैं कि जैसे उन जैसा महाज्ञानी कोई न हो। यह प्रायोजित नायक अगर वस्तुओं के उत्पादों का विज्ञापन करते हैं तो समाज पर नियंत्रण करने वाले ठेकेदारों के साथ खड़े होकर उनको लोगों पर नियंत्रण करने में भी सहायक बनते हैं। आकर्षण तथा विश्वास के जाल में फंसा आम जनमानस अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में अच्छे बुरे की पहचान नहीं कर पाता। यही कारण कि आजकल के युवा गीत, संगीत तथा नृत्य के जाल में फंसा है। अभी हाल ही में एक तमिल अंग्रेजी मिश्रित कोलेवरी डी को हिन्दी भाषी क्षेत्रों में भारी लोकप्रियता हासिल हुई। शब्द किसी के समझ में नहीं आते पर संगीत पर ही लोग थिरक रहे हैं। एक प्रेमिका से निराश प्रेमी के शब्दों को समझे बिना केवल संगीत की धुन पर थिरकना इस बात का प्रमाण है कि लोग आत्मज्ञान से इतने परे हैं कि उन्हें उछलकूद की जिंदगी जीकर मन बहलाना पड़ रहा है।
कविवर रहीम के अनुसार
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अनुचित वचन न मानिए, जदपि गुराइस गाढ़ि।
है ‘रहीम’ रघुनाथ तें, सुजस भरत को बाढ़ि।।
              ‘‘कितना भी बड़ा आदमी क्यों न हों उसकी गलत बात नहीं मानिए भले ही वह कितनी भी महत्वपूर्ण क्यों न हो। भगवान श्री राम ने अपने पिता की बात मानते हुए वनगमन किया पर फिर भी उनसे अधिक यश उस भरत को प्राप्त हुआ जिन्होंने मां की आज्ञा ठुकराकर राज्य त्याग दिया।’’
‘‘अब ‘रहीम’ मुश्किल बढ़ी, गाढ़े दोऊ काम।
सांचे से तो जग नहीं, झूठे मिलें न राम।।
‘‘दुनियां में दो महत्वपूर्ण काम एकसाथ करना अत्यंत कठिन है। सच का साथ लो तो जग नहीं मिलता और झूठ बोलो तो परमात्मा से साक्षात्कार नहीं हो पाता।
         आत्म ज्ञान के अभाव झूठ का इतना बोलबाला हो गया है कि लोग यह सोचकर चलते हैं कि भगवान उनके दुष्कर्मों को नहीं देख रहा है। धर्म और अध्यात्म का प्रचार करने वाले लोग पर्दे के पीछे विलासिता का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। स्वयं कभी परमात्मा का स्वरूप जो लोग समझ नहीं पाये वह दूसरों को समझा रहे हैं। जीवन की सच्चाई यह है कि अगर सत्य की राह चलो तो लोग साथ नहीं होते। जब लोग साथ होते हैं तो वह असत्य की राह पर चलने को विवश करते हैं ऐसे में शुद्ध भाव से भक्ति अत्यंत कठिन है। शुद्ध भाव से भक्ति न होने पर मन को शांति नहीं मिलती। यही कारण है कि आज आधुनिक साधनों से सुसज्तित आदमी के मन में भी शांति नहीं है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Sunday, December 4, 2011

संत दरिया के दोहे-बगुला और हंस का रंग एक पर प्रकृति अलग है (sant dariya ke dohe-bagula aur hans)

               वर्तमान युग भौतिकतावाद के चरम पर पहुंच गया है। धन संचय, संपदा सृजन और वस्तुओं के संग्रह के साथ ही आमजनों में अपने लिये सुविधाऐं पाने की अंधी दौड़ लगी हुई है। आदमी अपने हृदय में व्याप्त अंधेरे से भागता हुआ बाहर रौशनी ढूंढ रहा है। अज्ञानी लोग अपने मन के वश सांसरिक उपलब्धियों को पचा नहीं पा रहे। आदमी एक वस्तु पाने का लक्ष्य प्राप्त करता है तब भी उसकी बेचैनी खत्म नहीं होती। उससे जल्दी बोर हो जाता है फिर दूसरी के लिये भागता है। भक्ति, योग साधना और परमात्मा के नाम जाप को वृद्धावस्था की विषय समझा जाता है। परिणाम यह है कि समाज में तनाव और वैमनस्य बढ़ रहा है। तत्वज्ञान से परे होकर समाज ऐसा सुख ढूंढ रहा है जिसकी प्राप्ति संभव नहीं है।
संत दरिया कहते हैं कि
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बाट खुली जब जानिये, अंतर भया उजास।
जो कुछ थी सो ही बनीं, पूरी मन की आस।
‘‘हृदय में उजाला हो तभी मार्ग को खुला समझें। उसके बाद जब तत्वज्ञान होने पर संतोष का भाव आने से मनुष्य अपनी आवश्यकतायें और आशाऐं सीमित कर लेता है। इसलिये मन की सभी आशायें स्वतः पूरी हो जाती है।’’
‘‘दरिया’ बगुला ऊजला, उज्जवल ही होय हंस।
वे सरवर मोती चुगैं, वा के मुख में मंस।।
बगुला और हंस दोनों का रंग सफेद होता है परंतु प्रकृति दोनों की अलग है। हंस मोती खाता है जबकि बगुला मांस खाकर भूख मिटाता है।
              दौलत, शौहरत और बड़ा ओहदा पाने की होड़ ने मनुष्य को पशु से भी बदतर बना दिया है। कहने को सभी मनुष्य एक जैसे होते हैं पर ज्ञानी और अज्ञानी में अंतर उसके व्यवहार से दिखता है। ज्ञानी मनुष्य अपनी सीमित आवश्यकाओं के कारण शांति से रहते हैं। समय मिलने पर सत्संग और परमात्मा के गुणों की चर्चा कर मन का सुख प्राप्त करने की कला उनको आती है। जबकि अज्ञानी मनुष्य पूरी जिंदगी भौतिक उपलब्धि प्राप्त करते हुए गुजारता है और समय मिलने पर उनका उनके बखान में बबार्द करता है। कहने को हमारे देश में शिक्षित लोगों की संख्या बढ़ी है पर ज्ञानी तो नगण्य ही है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Friday, December 2, 2011

रहीम के दोहे-इस संसार में संपत्ति के सगे बहुत हैं (rahim ke dohe-is sansar mein sanpatti ke sage bahut hain)

           इस संसार का सबसे बड़ा सत्य यही है कि मूलतः हर सामान्य आदमी अपने स्वार्थ की वजह से दूसरों के साथ संबंध बनाता है। वह उन्हीं से संबंध निभाता है जिससे उसे अपनी अपेक्षायें पूरी होने की संभावना रहती है। यह सभी जानते हैं पर अज्ञानी लोग समाज के स्वार्थी होने का रोना होते हुए अपनी मतलबपरस्ती को जायज ठहराते हैं जबकि ज्ञानी मनुष्य निष्काम भाव से दूसरों की सहायता के लिये तत्पर रहते हैं क्योंकि उनके मन में अपने कर्म का फल पाने की आशा नहीं रहती। धर्म, अध्यात्म और संस्कृति के नाम पर हम भले ही परिवार और समाज क एकरूप होने का भ्रम पाल लें पर सत्य यही है कि स्वार्थ ही सभी प्रकार के संबंधों का आधार होता है।
इस संसार में जिसके पास संपत्ति, वैभव, पद, प्रतिष्ठा और शक्ति है उससे संबंध रखने के लिये सभी आतुर होते हैं। निरीह, अल्प धनवान, सादगी पसंद और सत्य मार्ग का अनुसरण करने वाले लोगों के मित्र अत्यंत कम होते हैं। यह अलग बात है कि जिन लोगों के पास धन, पद, प्रतिष्ठा और आकर्षण है उनको यह भ्रम रहता है कि उनके चाहने वाले बहुत हैं। वह यह सच नहीं जानते कि इस संसार में पाखंड का बोलबाला है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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कहि ‘रहीम संपत्ति सगे, बनत बहुत बहुत रीत।
बिपत्ति कसौटी ज कसे, ते ही सांचे मीत।।
         ‘‘इस संसार में सभी लोग उसके सगे हैं जिसके पास संपत्ति है। धनवान आदमी के सभी मित्र बनते हैं मगर आपातकाल में जो काम आये वही सच्चा मित्र कहलाता है।
काहु ‘‘रहीम’ कैसे बनै, अनहोनी ह्वै जाय।
मिला रहै औ ना मिलै, तासो कहा बसाय।।
       ‘‘अनहोनी होने पर बात नहीं बन सकती। किसी व्यक्ति के पास होने पर भी अगर उससे आत्मीयता का भाव नहीं रहता तो उसे संबंध कैसे निभाया जा सकता है।
           इस सत्य को जानकर दूसरे मनुष्यो के साथ अपने संबंध अत्यंत सतर्कता बरतते हुए बनाना चाहिए। यह भी देखना चाहिए कि हमारे साथ दोस्ती और रिश्ते का दंभ भरने वालों के साथ हमारी वैचारिक, स्वाभाविक तथा आचरण के आधार पर समानता है कि नहीं। आमतौर से विपरीत व्यक्तित्व के लोगों के बीच आपसी संबंध अधिक समय तक नहीं चलता। निष्काम भाव से काम करने वाले मनुष्य बुरा अवसर आने पर पर निभाते हैं पर कामनाओं से भरपूर आदमी उस समय मुंह फेर जाता है। अतः जिनसे मानसिक रूप से समानता के आधार पर संबंध निर्मित न हो सके उनसे दूर रहना ही श्रेयस्कर है। यह अलग बात है कि उनको इस बात का आभास नहीं होने देना चाहिए।
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Wednesday, November 23, 2011

तुलसीदास के दोहे-दुर्जन लोग काम पड़ने पर सज्जन की तरह पेश आते हैं (sant mahakavi tulsidas ke dohe-dusht aur sanp ka vyavhar ek jaisa)

                सारे विश्व में जिस भी प्रसिद्ध आदमी को देखो वह समाज सेवा के दावे करता दिख रहा है। अब तो स्थिति यह है कि मनुष्य का आर्थिक, मानसिक तथा शरीरिक शोषण कर धन के साथ प्रसिद्धि अर्जित कर चुके अनेक कथित महान लोग समाज सेवा के लिये अपने संगठन खड़े करते हैं। अनेक जगह संस्थाओं तथा कथित समाज सेवकों को दान देते हैं। यह सब प्रचार में देखकर उनके अनेक लोग प्रशंसक भी हो जाते हैं, मगर बहुत लोग इस बात को जानते हैं कि यह सब ढोंग है। उनके व्यवसायिक प्रचारक उनको देवता सिद्ध करते हैं जिससे केवल पैसा ही कमाया जाता है। अपनी छत्रछाया के नीचे रहने वालों का शोषण कर धन जुटाने वाले या मनोरंजन के माध्यम से लोगों के मानस में कल्पित नायक की तरह स्थापित लोग कभी भी हृदय में सेवा भाव धारण नहीं कर सकते क्योंकि उन्होंने अपना लक्ष्य ही इस भौतिक संसार पर राज्य करना रहा होता है। सेवा का भाव तो बचपन में ही माता पिता के संस्कारों तथा अध्यात्मिक दर्शन के अध्ययन के माध्यम से मनुष्य में स्थापित हो जाता है और पचपन में तो केवल आदमी अपनी प्रतिष्ठा पाने की दृष्टि से समाज सेवा करता है। धन, प्रतिष्ठा और पद के साथ बरसों तक जुड़े लोग अपनी बोरियत दूर करने क्रे लिये समाज सेवा का काम हाथ लेते हैं उसमें भी इस बात का ध्यान रखते हैं कि उनका धन इस तरह उपयोग में आये कि उसका व्यय तो हो पर आय भी हो जाये। कई धनिक लोग तो ऐसे होते हैं जो समाज सेवकों को दान लेकर उनका उपयोग अपने प्रचार के साथ ही सामाजिक संस्थाओं पर अपना नियंत्रण करने के लिये करते हैं।
कविवर संत तुलसीदास कहते हैं कि
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‘तुलसी’ जग जीबन अहित, कतहुं कोउ हित जानि।
सोषक भानु कृसानु महि, पवन एक घन दानि।।
          ‘‘इस संसार में दूसरों को दुःख देने वाले बहुत हैं जबकि सुख देने वाले विरले ही होते हैं। जिस तरह सूर्य, अग्नि, वायु और पृथ्वी जल को सुखाने वाले हैं पर जल देने वाला बादल तो एक ही है।’’
मिलै जो सरलहि सरल ह्वै, कुटिल न सहज बिहाइ।
सो सहेतु ज्यों बक्र गति, ब्याल न बिलहिं समाइ।।
           ‘‘दुष्ट लोग अपना काम करने पही सज्जनता का इस तरह ढोंग करते हैं जैसे कि टेढ़ीमेड़ी चाल चलने वाला सांप सीधी चाल से अपने बिल में प्रवेश करता है।’’
        हम महान कवि और संत तुलसी दास के दर्शन को माने तो इस संसार में कल्याण करने वाले अत्यंत कम होते हैं। अधिकतर लोग तो केवल दूसरे के शोषण की योजना बनाते हुए अपना स्वार्थ सिद्ध करना चाहते है। यही कारण है कि आजकल हमारे देश में हजारों समाज सेवी संस्थायें खुल गयी हैं। इनके साथ अनेक सामान्य लोग जुड़ते हैं पर बाद में उनको पता चलता है कि यह सेवा केवल एक ढोंग है। दूसरी बात यह कि समूह में कभी सेवा नहीं होती क्योंकि यह संभव ही नहीं है कि कहीं सत्य में सेवा भाव रखने वाले लोगों का कोई समूह बन जाये। समाज सेवा करने वाले विरले ही होते हैं और उनका समूह बन जाये यह संभव नहीं है।
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