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Sunday, December 29, 2013

दूसरे लोगों की पापपूर्ण तरक्की देखकर दुःखी न हों-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(doosron ki paappoorn tarkki dekhkar dukhi n hon-hindi thought aritcle based on manu smriti)



                        विश्व के अधिकतर देशों में जो राजनीतक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थायें हैं उनमें सादगी, सदाचार तथा सिद्धांतों के साथ विकास करते हुए उच्चत्तम शिखर पर कोई सामान्य मनुष्य नहीं पहुंच सकता।  अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ का मानना था कि कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से अमीर नहीं बन सकता। अंग्रेजों  ने अनेक देशों में राज्य किया।  वहां से हटने से पूर्व  अपने तरह की व्यवस्थायें निर्माण करने के बाद ही किसी देश को आजाद किया।  यही कारण है सभी देशों में आधुनिक राज्यीय, सामाजिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं के शिखर पर अब सहजता से कोई नहीं पहुंच पाता।  यही कारण है कि उच्च शिखर पर वही पहुंचते हैं जो साम, दाम, दण्ड और भेद सभी प्रकार की नीतियां अपनाने की कला जानते हैं। याद रहे यह नीतियां केवल राजसी पुरुष की पहचान है। सात्विक लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह उस राह पर चलें। वैसे भी शिखर वाली जगहों पर राजसी वृत्ति से काम चलता है। ऐसे में उच्च स्थान पर पहुंचने वालों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह निष्काम भाव से कर्म तथा निष्प्रयोजन दया करें। 
मनु स्मृति में  कहा गया है कि

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अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति।

ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति।।



            हिन्दी में भावार्थ-अधर्मी व्यक्ति अपने अधार्मिक कर्मों के कारण भले ही उन्नति करने के साथ ही अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता दिखे पर अंततः वह जड़ मूल समेत नष्ट हो जाता है।
            राजसी पुरुषों का आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा अन्य क्षेत्रों में जो तेजी से विकास होता है उसे देखकर सात्विक प्रवृत्ति के लोग भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। खासतौर से युवा वर्ग को शिखर पुरुषों का जीवन इस तरह का तेजी से विकास की तरफ बढ़ता देखकर उनके आकर्षण का शिकार हो जाते हैं।  जिनकी प्रकृति सात्विक है वह तो अधिक देर तक इस पर विचार नहीं करते पर जिनकी राजसी प्रवृत्ति है वह अपना लक्ष्य ही यह बना लेते हैं कि वह अपने क्षेत्र में उच्च शिखर पर पहुंचे। न पहुंचे तो  कम से कम किसी बड़े आदमी की चाटुकारिता उसके नाम का लाभ उठायें।  यह प्रयास सभी को फलदायी नहीं होता। सच बात तो यह है कि कर्म और और उसके फल का नियम यही है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। देखा यह भी जाता है कि उच्च शिखर पर येन केन प्रकरेण पर पहुंचते हैं उनका पतन भी बुरा होता है।  इतना ही नहीं भले ही बाह्य रूप से प्रसन्न दिखें आंतरिक रूप से भय का तनाव पाले रहते हैं।  अतः दूसरों का कथित विकास देखकर कभी उन्हें अपना आदर्श पुरुष नहीं मानना चाहिये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, March 23, 2013

यजुर्वेद के आधार पर चिंत्तन-अनेकता के भाव पर व्यक्ति नष्ट हो जाता है (anekta ke bhaav se vyakti nasht hota hai-yajurved ke adhar par chittan)

        इस धरती पर अधिकतर जीव समूह बनाकर चलते हैं।  समूह बनाकर चलने की प्रवृत्ति अपनाने से  मन में सुरक्षा का भाव पैदा होता है। मनुष्य का जिस तरह का दैहिक जीवन है उसमें तो उसे हमेशा ही समूह बनाकर चलना ही चाहिये।  जिन व्यक्तियों में थोड़ा भी ज्ञान है वह जानते हैं कि मनुष्य को समूह में ही सुरक्षा मिलती है।  जब इस धरती पर मनुष्य सीमित में संख्या थे तब वह अन्य जीवों से अपनी प्राण रक्षा के लिये हमेशा ही समूह बनाकर रहते भी थे। जैसे जैसे मनुष्यों की संख्या बढ़ी वैसे अहंकार के भाव ने भी अपने पांव पसार दिये।  अब हालत यह है कि राष्ट्र, भाषा, जाति, धर्म और वर्णों के नाम पर अनेक समूह बन गये हैं।  उनमें भी ढेर सारे उप समूह हैं।  इन समूहों का नेतृत्व जिन लोगों के हाथ में है वह अपने स्वार्थ के लिये सामान्य सदस्यों का उपयोग करते हैं।  आधुनिक युग में भी अनेक मानवीय समूह  नस्ल, जाति, देश, भाषा, धर्म के नाम पर बने तो हैं पर उनमें संघभाव कतई नहीं है।  संसार का हर व्यक्ति  समूहों का उपयोग तो करना चाहता है पर उसके लिये त्याग कोई नहीं करता। यही कारण है कि पूरे विश्व में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक तथा धार्मिक क्षेत्रों में भारी तनाव व्याप्त है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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सम्भूर्ति च विनाशं च यस्तद्वेदोभयथ्सह।
विनोशेन मृतययुं तीत्वी सम्भूत्यामृत मश्नुते।।
     हिन्दी में भावार्थ-जो संघभाव को जानता है वह विनाश एवं मृत्यु के भय से मुक्त हो जाता है। इसके विपरीत जो उसे नहीं जानता वह हमेशा ही संकट को आमंत्रित करता है।

वाचमस्तमें नि यच्छदेवायुवम्।
      हिन्दी में भावार्थ-हम ऐसी वाणी का उपयोग करें जिससे सभी लोगों का एकत्रित हों।
              हृदय में संयुक्त या संघभाव धारण करने का यह मतलब कतई नहीं है कि हम अपनी समूह के सदस्यों से सहयोग या त्याग की आशा करें पर समय पड़ने पर उनका साथ छोड़ दें।  हमारे देश में संयुक्त परिवारों की वजह से सामाजिक एकता का भाव पहले तो था पर अब सीमित परिवार, भौतिकता के प्रति अधिक झुकाव तथा स्वयं के पूजित होने के भाव ने एकता की भावना को कमजोर कर दिया है।  हमने उस पाश्चात्य संस्कृति और व्यवस्था को प्रमाणिक मान लिया है जो प्रकृति के विपरीत चलती है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र के क्रम में चलता जबकि पश्चिम में राष्ट्र, समाज, परिवार और व्यक्ति के क्रम पर आधारित है।  हालांकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन यह भी मानता है कि जब व्यक्ति स्वयं अपने को संभालकर बाद  समाज के हित के लिये भी काम करे तो वही वास्तविक धर्म है।  कहने का अभिप्राय है कि हमें अपनी खुशी के साथ ही अपने साथ जुड़े लोगों के हित के लिये भी काम करना चाहिये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, February 24, 2013

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-विपत्ति का अनुमान पहले ही करें (kautilya ka athshastra-vipatti ka anuman pahale hi karen)

              अंग्रेजी शिक्षा पद्धति तथा आधुनिक प्रचार साधनों में-फिल्म, टीवी और इंटरनेट पर-शीघ्र अमीर और प्रसिद्ध होने के नुस्खे खूब बताये जाते हैं। सत्य तो यह है कि आधुनिक शिक्षा वैसे ही आदमी में चिंत्तन क्षमता निर्माण नहीं करती तो वही प्रचार माध्यम उसमें अधीरता के भाव का निर्माण करते हैं जिससे विश्व समाज असमंजस वातावरण में सांस ले रहा है।   फिल्मों में नायकों के पात्रों का सृजन कर लोगों का मनोरंजन किया जाता है पर उनकी पटकथायें हमेशा ही हिंसा से बेहतर परिणामों को प्रदर्शित करती है।  सभी नायक अपने सामने आने वाले खलनायकों को बल से मारते हैं। कहीं नीति से किसी खलनायक का पतन होते नहीं दिखाया जाता है।
     भारत ही नहीं विश्व के अधिकांश देशों की व्यवस्थायें आधुनिक समय में विफल साबित हो रही हैं।  जनाक्रोश बढ़ रहा है और इसका लाभ फिल्म वाले उठाते हैं।  हाल ही में भारत के एक प्रसिद्ध शायर ने कहा था कि भारत के एक अभिनेता की ‘‘नाखुश युवा’’ की छवि फिल्म के पटकथाकारों ने बनाई थी।  दरअसल उनका कहना था कि भारत में भेजा गया एक कुख्यात आतंकवादी इसी तरह का एक युवा था जिसे देश के दुश्मनों ने वास्तविक हमले की पटकथा का सृजन कर  भेजा अतः उसे भेजने वाले लोगों को भी कड़ी सजा देने या दिलाने का प्रयास करना चाहिए।  देश के कुछ बुद्धिमानों ने इस की  आपत्ति की कि एक महानायक की एक आतंकवादी से तुलना क्यों की गयी? जबकि उन महान शायर का आशय यह था कि जिस तरह पटकथाकार किसी कल्पित पात्र का सृजन करता है उसी पर कोई अभिनेता अपनी नायक की भूमिका निभाता है।  उसी तरह उस आतंकवादी को भारत के दुश्मनों ने ऐसे ही वास्तविक हमले की पटकथा रचकर यहां अपराध करने के लिये उकसाया।  दरअसल विश्व में हिंसा फैलाकर अपना मतलब साधने वाले ऐसे ही युवकों का उपयोग कर रहे हैं। आदमी आधुनिक रूप से शिक्षित हो या अशिक्षित कोई अंतर नहीं रह गया क्योंकि आध्यात्म्कि ज्ञान से सभी दूर हैं।  पूरे विश्व की सभी भाषाओं की फिल्मों में हिंसा दिखाई जाती है। कहा तो यह जाता है कि यह सब समाज में चल रहा है इसलिये दिखा रहे हैं पर यह भी सच यह है कि इससे हिंसक घटनायें बढ़ जाती हैं।  अगर आप न्यूयार्क में हुई हिंसक घटना को ऐसी फिल्म में दिखायेंगे जो सारे विश्व में दिखती है तो यह बात तय है कि उसकी पुनरावृत्ति करने के लिये अनेक अनीतिवान और अपराधी तत्व तैयार हो जायेंगे। यह अलग बात है कि ऐसे लोग एक दो बार ही ऐसे अपराध करते हैं बाद में स्वयं भी काल कलवित हो ही जाते हैं।
आशिक्षितनयः सिंहो हन्तीमं केवलं बलात्।
तच्च धीरो नरस्तेषां शातानि जातिमाञ्जायेत्।।
          हिन्दी में भावार्थ- अशिक्षित सिंह ने कोई नीति नहीं सीखी होती, वह केवल अपने बल से ही  नष्ट कर डालता है जबकि ज्ञानी और धीर पुरुष अपनी नीति से सैंकड़ों को मारता है।
         पश्चयद्भिर्दूरतोऽपायान्सूपायप्रतिपत्तिभिः।
          भवन्ति हि फलायव विद्वाद्भश्वन्तिताः क्रियाः।।
                    हिन्दी में भावार्थ-जो विद्वान पुरुष दूर से ही आती विपत्ति को देखकर उसके प्रतिकार का विचार करता है वह अपना बचाव करने में सक्षम होता है।
         जो लोग नीति और धीरज के साथ जीवन में रहते हैं उनकी शक्ति बहुत ज्यादा होती है।  महर्षि विवेकानंद ने अपने अल्प जीवन में पूरे विश्व में  भारतीय ज्ञान का प्रकाश फैलाया। उसी तरह भारतीय क्रिकेट के दो महान खिलाड़ियों  कपिल देव और धोनी ने अपनी कप्तानी में विश्व कप जितवाया। धोनी तो पहले बीस ओवर और अब पचास दो विश्व कप जितवा चुके हैं। अगर आदमी में धीरज और ज्ञान हो तो वह अपने सामर्थ्य से सारे समाज को प्रसन्न करने के साथ ही उसका मार्गदर्शन भी करता है।  इसलिये किसी भी प्रचार में आकर जल्दबाजी में सफलता हासिल करने की बजाय धीरज के साथ ही योजना बनाकर लक्ष्य प्राप्त करना चाहिये।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

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Sunday, February 26, 2012

भर्तृहरि नीति शतक-भोजन के लिये आत्मसम्मान गंवाना ठीक नहीं (bharathari neeti shatak-bhojan ke liye atmasamman ganwana theek nahin)

             दुनियां में हर जीव के लिये भोजन अनिवार्य है पर इसका आशय यह कतई नहीं है किसी भूखे की दीनता देखकर उसके प्रति उदार भाव दिखाया जाये। कहा भी जाता है कि सबका दाता राम है और जिसने पेट दिया है उसने भोजन का इंतजाम भी पहले कर दिया है। यह भी कहा जाता है कि दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम! इन सब बातों के उल्लेख करने का तात्पर्य यह है कि दैहिक जीवन धारण करने के लिये भोजन अनिवार्य है पर इसका यह मतलब भी नहीं है कि सब कुछ यही भोजन है और कहीं भी किसी प्रकार भी ग्रहण किया जाये। हमेशा सुपाच्य भोजन करने के साथ ही इस बात पर भी ध्यान रखना चाहिए कि वह शुद्ध माध्यमो से अर्जित किया गया हो। ऐसे लोगों की संगत करना चाहिए जो पवित्र विचार और कर्म वाले हों। अगर कहीं भोजन के लिये दूसरे पर निर्भर हों तो यह भी देखना चाहिए कि वह आदमी किस प्रवृत्ति का है और उसके आय के साधन कैसे हैं?
                      भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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             लाङ्गल चालनभधश्चरणावपातं भूमौ निपत्य वदनोदर दर्शनं च।
           श्वा पिण्डदस्य कुरुते गजपुङ्गवस्तु धीरं विलोकयति चाटुश्तैश्च भुङ्वते।।
                  ‘‘जब कोई मनुष्य कुत्ते के सामने भोजन डालता है तो वह पूंछ हिलाकर अपनी दीनता का प्रदर्शन करता है पर जब कोई हाथ के सामने भोजन रखता है तो वह बड़ी गंभीरता से उसे देखते हुए कई बार मनाने पर ही उसे ग्रहण करता है।"
                   हमें भोजन देने वाले का आभार व्यक्त करना चाहिए पर इसक अर्थ यह कदापि नहीं है कि उसके इतने कृतज्ञ हो जायें कि उसके कहने पर अपवित्र काम करने लगें। कहीं भोजन मिले तो उस तत्काल नहीं टूटना चाहिए बल्कि सम्मान से आग्रह करने पर ही अपना हाथ बढ़ाना चाहिए। अगर हमें भूख है तो इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि कहीं भोजन बना हुआ है जिससे हम अपना मन तृप्त कर सकते हैं। उसी तरह दूसरे को भोजन कराते समय अपने अंदर अहंकार का भाव भी नहीं रखना चाहिए। यह प्रकृत्ति प्रदत्त है भले ही निमित्त कोई इंसान बनता है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
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Monday, January 30, 2012

अथर्ववेद-हमारे कान पवित्र विचार सुने (atharvved se sandesh-hamare kaan pavitra vichar sune)

                  हम लोग भले ही यह सोचते हैं कि यह संसार ईश्वर के अनुसार चलता है पर सच यह है कि हमारे संकल्पों के अनुसार ही हमारा जीवन क्रम निर्मित होता है। जैसे हमारा विचार या संकल्प है वैसा ही हमारे सामने दृश्य घटित होता है। अगर दृश्य हमारे प्रतिकूल है तो हम दूसरों को दोष देते हैं। कभी भाग्य तो कभी भगवान की मर्जी बताकर आत्ममंथन से बचने का प्रयास करते हैं। कभी मित्र, कभी रिश्तेदार तो कभी परिवार के सदस्यों पर दोषारोपण कर यह मानते हैं कि हम और हमारा संकल्प तो हमेशा ही पवित्र रहता है। यह अज्ञान का प्रमाण है। आत्ममंथन की प्रक्रिया से दूर अज्ञानी लोग इसी कारण ही अपने जीवन में भारी कष्ट उठाते हैं।
अथर्ववेद में कहा गया है कि
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सुश्रतौ कर्णो भद्रश्रतौ कर्णो भद्र श्लोकं श्रुयासम्।
‘‘हमारे दोनो कान उत्तम विचार सुने। कल्याणकारी वचन तथा कल्याणकारी प्रशंसा सुनने को मिले।’’
बृहसपतिर्म आत्मा तृमणा यनाम हृद्यः।।
‘‘हमारी आत्मा ज्ञान युक्त हो और मनुष्य में मनन करने वाला हृदय पवित्र हो।’’
                जब हम परमात्मा का स्मरण करते हैं तो उससे सांसरिक विषयों में सफलता की ही मांग करते हैं जबकि यह संसार कर्म और फल के सिद्धांत के आधार पर यंत्रवत चलता है। आम बोयेंगे तो आम पैदा होगा और बबूल बोने पर कांटों का झाड़ हमारे सामने खड़ा होगा। ज्ञानी लोग यह जानते हैं पर अज्ञानियों का झुंड इससे बेखबर होकर सुख में प्रसन्न हेता है और दुःख में विलाप करता है। अपने मुख से अच्छी वाणी बोलना चाहिए तो अपने कानों से ऐसी बातें सुनना चाहिए जो सुख देने के साथ ही मन स्वच्छ करने वाली हो। अपनी आंखों से किसी के संताप का दृश्य देखने की चाहत की बजाय प्रकृति और संसार के विषयों में विराजमान सौंदर्य की तरफ अपनी दृष्टि रखना चाहिए। दूसरों की निंदा या दोष का अध्ययन करने की बजाय सभी के गुण देखकर उसकी प्रशंसा करने से मन पवित्र होता है। कहने का अभिप्राय यह है कि जैसी कल्पना और हमारा विचार होता है वैसी ही हमारे सामने घटनायें होती हैं। इसलिये जहां तक हो सके अच्छा देखो, अच्छा खाओ और अच्छा सोचो।
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Wednesday, July 6, 2011

संत कबीर वाणी-पैसा हो तो पचास गुरु मिल जाते हैं(sant kabir wani-paisa aur guru)

                लोग एकदूसरे से पूछते हैं कि आज के गुरु भी भ्रष्ट और अज्ञानी हैं ऐसे में किससे ज्ञान प्राप्त किया जाये? देखा जाये तो ऐसे गुरुओं की उपस्थिति हर काल में रही है जो अध्यात्मिक दर्शन का व्यापार करते हैं। उनका लक्ष्य कोई धर्म का प्रचार करना नहीं होता बल्कि वह शिष्यों को ग्राहक बनाकर अपना रटा हुआ ज्ञान बेचते है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे देश में गुरु शिष्य की उच्च परंपरा रही है पर उसकी आड़ में ऐसे गुरुओं और शिष्यों की भरमार भी रही है जो पाखंड तथा ढोंग कर धर्म का दिखावा करते हैं। शिष्य जहां धर्म और अध्यात्म से इतर अपने अन्य लक्ष्यों की प्राप्ति के लिये गुरु बनाते हैं तो गुरु भी अपने निकट ऐसे ही शिष्यों को आने देते हैं जो उनके धर्म के व्यापार में दलाल की भूमिका निभा सके हैं।
         संत कबीर कहते हैं कि
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        गुरवा तो सस्ता भया, पैसा केर पचास।
       राम नाम धन बेचि के, शिष्य करन की आस।।
        ‘‘गुरु का पद तो सस्ता हो गया है। पैसा हो तो पचास गुरु बन जाते हैं। यह गुरु स्वयं राम नाम का धन बेचते हैं और शिष्य से अपनी उदरपूर्ति की आशा करते हैं।
       गुरु बिचारा क्या करे, शब्द न लागा अंग।
        कहें कबीर मैली गजी, केसे लागे रंग।।
      ‘‘कोई गुरु भी क्या करे कि उसके शब्दों का प्रभाव शिष्यों पर नहीं होता। उनके मन उसी तरह मैले हैं जिस तरह गंदा कपड़ा होता है जिस पर रंग चढ़ाना व्यर्थ हो जाता है।’’
              योग्य गुरु तथा शिष्य का संयोग बड़े भाग्य से बनता है। अगर कोई गुरु योग्य है तो उसके शिष्यों में मन में ज्ञान प्राप्त करने की बजाय दिखावे की प्रवृत्ति अधिक है। वह उसके ज्ञान को केवल मनोरंजन का विषय मानकर सुनते है। प्रवचन और सत्संग के बाद उनका घर जाकर जस की तरह आचरण हो जाता है। उसी तरह अगर कोई गुरु ज्ञानी है पर उसके पास अच्छे प्रबंधक और प्रचारक शिष्य नहीं है तो उसे कोई नहीं पूछता। यही स्थिति उन जिज्ञासु लोगों की भी है जो अपने लिये आध्यात्मिक गुरु ढूंढते हैं पर व्यवसायिक गुरुओं की बहुतायत होने के कारण वह निराश हो जाते हैं। हालांकि ऐसे में श्रीमद्भागवत गीता तथा अन्य धर्मग्रंथों का नियमित अध्ययन किया जाये तो ऐसे पावन ग्रंथ स्वतः गुरु बन जाते हैं। महर्षि चाणक्य कहते हैं कि प्रतिदिन एक पाठ और वह भी नहीं तो एक दोहे या श्लोक का अध्ययन कर भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। वह भी नहीं तो आधे श्लोक या दोहे का अध्ययन करें। गुरु का अर्थ यह कदापि नहीं है कि वह सदेह हा सामने हो एकलव्य का अभ्यास इस बात की पुष्टि भी करता है। मूल बात संकल्प की है और वह धारण कर लिया तो फिर ज्ञानमार्ग का द्वार स्वतः खुल जाता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Monday, March 1, 2010

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जुआ या सट्टा घृणित कृत्य (gambling is bed work-hindi sandesh)

प्रच्छन्नं वा प्रकाशं वा तन्निषेवेत यो नरः।
तस्य दण्डविकल्पः स्वाद्येेष्ठं नृपतेस्तथा।।
हिन्दी में भावार्थ-
अप्रत्यक्ष या प्रत्यक्ष रूप से जुआ खेलने वाले लोगों को राज्य द्वारा दंड दिया जाना चाहिये।
द्युतमेतत्पुराकल्ये दुष्टं वैरकरं महत्।
तस्माद्द्यूतं न सेवेत हास्यार्थमपि बुद्धिमान्।।
द्यूत वह घृणित कृत्य है जिसमें खेलने वालों के बीच आपस वैमनस्य पैदा होता है। अतः बुद्धिमान पुरुष को अपने मनोरंजन के लिए जुआ में भाग नहीं लेना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में अनेक ऐसे परिवार हैं जो जुआ या सट्टे के कारण बर्बाद हो गये हैं। अनेक ऐसे परिवार हैं जिनके पुरखे सात पीढ़ियों के लिये कमा गये पर उनकी दूसरी या तीसरी पीढ़ी ने पूरी कमाई सट्टे और जुआ में बर्बाद कर डाले हैं। जुआ जहां प्रत्यक्ष रूप से खेला जाता है वही सट्टा अप्रत्यक्ष रूप से जुआ का ही रूप है। आजकल तो हर बात पर सट्टा लगता है। चुनाव, क्रिकेट, फुटबाल, टेनिस तथा अन्य ऐसे क्षेत्र जहां अनिश्चताओं का खेल है वहां अब सट्टा खेला जाता है। नवधनाढ्य परिवारों के युवक युवतियां इसमें अपना धन बर्बाद करते हैं। जुआ या सट्टे का कृत्य इतना घृणित है कि समझदार लोग जुआ खेलने वालों पर कभी यकीन ही नहीं करते बल्कि उनसे घृण करते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि जुआ या सट्टा खेलने वालें मनोविकारों का शिकार हो जाते हैं। स्थिति यह हो जाती है कि उनकी जेबे खाली हो जाती हैं। कहंी से कुछ पैसा मिलता है तो जुआ और सट्टा खेलने वाले उसी में लगा जाते हैं। वह अपने आत्मीय जनों को भी ठगने लगते हैं।
जुआ और सट्टा खेलने वाले बाहरी रूप से भले ही सामाजिक संबंध निभाने वाले दिखते हों पर उनका अंतकरण केवल अपने व्यसन के प्रति ही आकर्षित रहता है। अपने ही परिजनों, मित्रों और परिचतों से वह धन ऐंठकर इसमें बर्बाद करते हैं। अतः बुद्धिमान लोगों को चाहिए कि वह कभी जुआ और सट्टा न खेलें। इतना ही नहीं उनके जो अपने लोग इस व्यसन में रत हैं उन पर कभी न यकीन करें न ही उनसे आत्मीय संबंध कायम करें।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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