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Sunday, February 9, 2014

शाही ताश में हुक्म का इक्के-हिन्दी व्यंग्य कविता(shahi tasha mein hukam ka ikke-hindi vyangya kavita)



साधु कभी राजा नहीं बनता, राजा कभी साधु न बने,
पद  का मद ही गहना है साधुता में चबाने होते लोहे के चने।
कहें दीपक बापू कहीं तख्त बदले कहीे ताज पहनने वाले सिर,
हुकुमतों के लिये  कत्लेआम हुए कोई चढा़ तख्त कोई गया गिर,
गरीबों ने हमेशा ढूंढा आसरा मिला कभी न कोई सरताज,
बने कहार बहुत बादशाहों के जो फिर झपटे उन पर बनकर बाज,
ढोये मेहनतकशों ने  सड़क से तख्त तक बोझ मानकर जिनको सिद्ध,
शाही ताश में हुक्म के इक्के की तरह रहे साथ लाये मांसखोर गिद्ध।
बेबस के आसरे की उम्मीद हमेशा कफन में लिपटती रही
दौलतमंद और ताकतवर लोगों की रही बात आगे जो उन्होंने कहीं।
मजबूरों के लिये नारे लगाती भीड़ नीचे ऊपर बेईमानों के शमियाने तने,
  राजप्रसाद से भाग चाहें वह लोग बेईमानी से जिनके हाथ कुछ कम सने।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, February 1, 2014

आम इंसान का इन्द्रियों पर नियंत्रण सहजता से नहीं होता-हिंदू आध्यात्मिक चिंत्तन लेख(aam insan ka indriyon par niyantran sahajta se nahin hota-hindu adhyatmik chinttan lekh)



      आजकल हमारे देश में अनेक कथित बाबाओं के यौन अपराधों पर प्रचार माध्यम सनसनी खबरें पर प्रस्तुत कर अपना जनहित धर्म निभाते हुए फूले नहीं समाते। जब यह खबरें प्रसारित होती हैं तो संवाददाता और उद्घोषक बाबाओं के बारे में यह कहते हुए नहीं थकते थे कि समाज में अनेक पाखंडी धर्म के ठेकेदार हैं। यह नहीं  जानते हैं कि धर्म एक अलग विषय है और उसके नाम पर प्रचार का व्यवसाय करना कभी किसी के धार्मिक होने का प्रमाण पत्र नहीं हो जाता।  दूसरी बात यह है कि धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के रूप में चार अलग अलग प्रकियायें हैं जिनका आपस में प्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं होता।  हां, इतना अवश्य है कि प्रातः धर्म निर्वाह के बाद अन्य प्रक्रियाओं में सात्विकता का भाव स्वतः आ जाता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान न होने के कारण पश्चिमी शिक्षा से ओतप्रोत इन प्रचार माध्यमों में कार्यरत बुद्धिमान लोगों से तो यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह धर्म को काम से न जोड़ें बल्कि उनके दर्शकों में बहुत कम लोग इस बात को समझ पाते हैं कि काम की अग्नि धर्म के कच्चे खिलाड़ी को ही नहीं वरन् परिपक्व मनुष्य को भी पथ से भ्रष्ट कर देती है।

महाराज भर्तृहरि कहते हैं कि

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विश्वामित्रपराशरप्रभृत्यो वाताम्बुपर्णाशनास्तेऽपि स्त्रीमुखपङ्कजं सुललित। दृष्ट्वैव मोहं गताः।।

शाल्पन्नं सघृतं पयोदधियुतं भुञ्जन्ति ये मानवा।स्तेपामिन्द्रियनिग्रहो यदि भवेत् विन्ध्यस्तरेत् सागरे।।

      हिन्दी में भावार्थ-विश्वमित्र और पाराशर ऋषि पत्ते और जल का सेवन कर तप करते थे वह भी काम की अग्नि का वेग सहन नहीं कर सके तो फिर अन्न, घी, दूध तथा दही का सेवन करने वाले मनुष्य काम पर नियंत्रण कर लें तो समझ लो समुद्र में विंध्याचल तैर रहा है।

      जब सतयुग में कुछ ऋषि अपनी तपस्या में कामदेव को विध्न डालने से नहीं रोक सके तो आज के व्यवसायिक धर्मगुरुओं से यह आशा करना कि वह कामाग्नि से बच पायेंगे मूर्खता है।  हमारे देश में अनेक गुरु हैं जो अपने आसपास शिष्याओं का जमावड़ा इसलिये दिखाते हैं ताकि भक्त अधिक से अधिक उनके पास आयें।  अगर हम भारतीय अध्यात्मिक पात्रो का अध्ययन करें तो कहीं भी किसी नारी का गुरु पुरुष नहीं होता।  जब भगवान श्रीराम वनवास को गये थे तब श्रीसीता के साथ अनेक ऋषियों के आश्रम में गये। वहां भगवान श्रीराम उन ऋषियों से चर्चा करते थे गुंरु पत्नियां ही श्रीसीता को ज्ञान देती थीं।  आजकल जब नारी और पुरुष समान का नारा लगा है तब धर्मगुरुओं ने उसका लाभ जमकर उठाया है।  अनेक धर्मगुरु तो प्रवचन के समय अपनी निकटस्थ शिष्याओं को मंच पर ही बिठा देते हैं ताकि आकर्षण बना रहे।
      इधर जब से यौन अपराधों पर नया कानून आया है तब अनेक गुरुओं पर मामले दर्ज हो चुके हैं।  कभी कभी तो कुछ लोगों को  यह लगता है कि अपने भारतीय धर्म की बदनामी प्रायोजित ढंग से की जा रही है। इस तरह का संदेह करने वाले लोग कहते हैं कि दूसरे धर्म की कोई चर्चा नहीं करता।  हमारा मानना है कि हमारे देश में भारतीय धर्मावलंबियों को बहुमत है इसलिये उनकी घटनायें अधिक सामने आती हैं।  दूसरी बात यह कि अन्य धर्मों में कहीं पैसे तो पहलवानी के दम पर ऐसी घटनाओं को आने से रोका जाता है जबकि भारतीय धर्म में ऐसा नहीं हो पाता। जहां तक विश्व के सभी धर्मों के ठेकेदारों का सवाल है वह चाहे लाख पाखंड करें पर जिनके पास महिला शिष्यों का अधिक जमावड़ा है वहां पूरी तरह से मर्यादित व्यवहार की आशा कम ही हो जाती है। यह अलग बात है कि कुछ स्वयं नियंत्रित कर लेते हैं पर कुछ कामाग्नि में जल ही जाते हैं। कुछ का अपराध सामने आ जाता है जिनका दुष्कर्म अप्रकट है वह साधु ही बने रहते हैं।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, January 25, 2014

मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख-पश्चाताप से पाप नष्ट होता है(pashchatap se paap nashta hota hai-hindu thought based on manu smriti)



            जिनकी प्रवृत्ति अपराधिक है उनसे तो यह भी अपेक्षा की ही नहीं जा सकती कि पर कभी कभी सामान्य मनुष्य भी अपराध कर बैठत है और फिर परेशान होता है। इससे बचने का एक ही उपाय है अपने अपराध की सार्वजनिक रूप से हृदय से स्वीकृत्ति की जाये। यह बात सामान्य मनुष्य के लिये कही जा रही है जो जघन्य अपराध नहीं करते वरन् ऐसे कर्म कर बैठते हैं जो नैतिक रूप से अनुचित होते हैं। झूठ बोलना, परनिंदा तथा धोखा देने जैसे पाप शायद ही कोई ऐसा सामान्य मनुष्य हो जो कभी नहीं करता है। फिर उसे पीड़ा भी बहुत होती है। अनेक लोग तो ऐसे है जिन्हें कर्म करते समय उसके पापपूर्ण होने का अहसास नहीं होता पर बाद में वह पछताते हैं पर वह उसके प्रायश्चित का उपाय नहीं करते। 
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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ख्यायनेनानुतायेन तपसाऽध्ययनेन च।

पापकृन्मुच्यते पापतथा दानेन चापदि।।

            हिन्दी में भावार्थ-पापी व्यक्ति अपने दुष्कर्म का सत्य लोगों को बताकर, पश्चाताप कर, तप तथा स्वाध्याय कर मुक्ति पा सकता है। संकट की घड़ी में तप तथा स्वध्याय न करे तो दान करने से भी वह शुद्ध हो जाता है।

यथा यथा नरोऽधर्म स्वयं कृत्याऽनुभाषते।

तथा तथा त्वचेवाहिस्तेनाधर्मेण मुच्यते।।

            हिन्दी में भावार्थ-अपने अपराध की स्वीकृति दूसरों के सामने करने पर आदमी पाप से मुक्त हो जाता है।
            अनेक भावुक लोग तो छोटी गलती कर ही मन ही मन पछताते हैं। इतना कि अपना पूरा जीवन ही तनावपूर्ण बना डालते हैं। इससे बचने का एक उपाय है तो यह है कि किसी दूसरे के सामने अतिशीघ्र अपनी गलती का बखान कर मन हलका करें अथवा हृदय में पछतावा करने के साथ ही यह बात भी तय करना चाहिये कि ऐसी गलती दोबारा नहीं करनी है।  दूसरा यह कि कहीं ध्यान लगाकर परमात्मा का स्मरण कर उसे अपनी गलती समर्पित करें अथवा धार्मिक ग्रंथ का अध्ययन कर अपना मन मजबूत करें। इसका अवसर न मिले तो फिर किसी सुपात्र को कोई वस्तु या धन देकर मन की शुद्धि करें।


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Sunday, January 19, 2014

तुलसीदास दर्शन-आदमी बिना सोचे विषयों में लिप्त रहता है(tulsidas darshan-aadmi bina soche vishayon mein lipt rahata hai)



            पूरे विश्व में उपभोग संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है। धार्मिक गुरु तथा समाज चिंत्तक भले ही अपने समाजों के सांस्कृतिक, धार्मिक तथा श्रेष्ठ होने का दावा भले करें पर सच यह है कि अध्यात्मिक दृष्टि से लोगों की चेतना का एक तरह से हरण हो गया है।  स्थिति यह हो गयाी है कि विषयों में  अधिक लोग इस तरह लिप्त हो गये हैं कि उनकी वजह से जो दैहिक, मानसिक तथा शारीरिक विकार पैदा हो रहे हैं उनका आंकलन कोई नहीं कर रहा।  अनेक लोगों के पास ढेर सारा धन है पर उनका पाचन क्रिया तंत्र ध्वस्त हो गया है।  महंगी दवाईयां उनकी सहायक बन रही हैं। दूसरी बात यह है कि जिसके पास धन है वह स्वतः कभी किसी अभियान पर दैहिक तथा मानसिक बीमारी के कारण समाज का सहयोग नहीं कर सकता। उसके पास देने के लिये बस धन होता है। जहां समाज को शारीरिक तथा मानसिक सहायता की आवश्यकता होती है वह मध्यम तथा निम्न वर्ग का आदमी ही काम आ सकता है।
            अनेक लोग धन के मद में ऐसे वस्त्र पहनते हैं जो उनकी छवि के अनुरूप नहीं होते। उसी तरह औषधियों का निरंतर सेवन करने से  उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता का हृास हो जाता है। यहां तक कि अनेक लोगों को सामान्य जल भी बैरी हो जाता है। अनेक बीमारियों में चिकित्सक कम पानी पीने की सलाह देते हैं।  अधिक दवाईयों का सेवन भी उनके लिये एक तरह से दुर्योग बन जाता है।    
संत तुलसीदास कहते हैं कि
---------------
ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग, लखहिं सुलच्छन लोग।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-ग्रह, वेशभूषा, पानी, वायु तथा औषधि समय अनुसार दुर्योग तथा संयोग बनाते हैं।
जो जो जेहि जेहि रस मगन, तहं सो मुदित मन मानि
रसगुन दोष बिचारियो, रसिक रीति पहिचानि।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार संसार के विषयों के रस में मग्न रहता है। उसे उसके रस के दोषों के प्रभाव को नहीं जानते। इसके विपरीत ज्ञानी लोग रसों के गुण दोष को पहचानते हुए ही आनंद उठाते है। एक तरह से ज्ञानी ही सच्चे रसिक होते हैं।
            जिन लोगों की भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में रुचि है वह जानते हैं कि हर विषय के उपभोग की सीमा होती है।  अति हमेंशा वर्जित मानी जाती है। योग और ज्ञान साधना का नियमित अभ्यास करने वाले जानते हैं कि सांसरिक विषयों में जब अमृत का आभास होता है तो बाद में परिवर्तित होकर विष बन जाते हैं जिसे योग तथा ज्ञान साधना से ही नष्ट किया जा सकता है। यही कारण है कि जब विश्व में उपभोग संस्कृति से जो दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक विकारों का प्रभाव बढ़ा है तब भारतीय योग साधना तथा श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा हो रही है क्योंकि अमृत से विष बने सांसरिक विषयों के रस को जला देने की कला इन्हीं में वर्णित है।


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Sunday, January 12, 2014

तुलसीदास दर्शन-यहां हर आदमी अपने स्वभाव के अनुसार रसों में मग्न है(tuslidas darshan-yahan har aadmi apne swbhav ke anusar ras mein magna hai)



            पूरे विश्व में उपभोग संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है। धार्मिक गुरु तथा समाज चिंत्तक भले ही अपने समाजों के सांस्कृतिक, धार्मिक तथा श्रेष्ठ होने का दावा भले करें पर सच यह है कि अध्यात्मिक दृष्टि से लोगों की चेतना का एक तरह से हरण हो गया है।  स्थिति यह हो गयाी है कि विषयों में  अधिक लोग इस तरह लिप्त हो गये हैं कि उनकी वजह से जो दैहिक, मानसिक तथा शारीरिक विकार पैदा हो रहे हैं उनका आंकलन कोई नहीं कर रहा।  अनेक लोगों के पास ढेर सारा धन है पर उनका पाचन क्रिया तंत्र ध्वस्त हो गया है।  महंगी दवाईयां उनकी सहायक बन रही हैं। दूसरी बात यह है कि जिसके पास धन है वह स्वतः कभी किसी अभियान पर दैहिक तथा मानसिक बीमारी के कारण समाज का सहयोग नहीं कर सकता। उसके पास देने के लिये बस धन होता है। जहां समाज को शारीरिक तथा मानसिक सहायता की आवश्यकता होती है वह मध्यम तथा निम्न वर्ग का आदमी ही काम आ सकता है।
            अनेक लोग धन के मद में ऐसे वस्त्र पहनते हैं जो उनकी छवि के अनुरूप नहीं होते। उसी तरह औषधियों का निरंतर सेवन करने से  उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता का हृास हो जाता है। यहां तक कि अनेक लोगों को सामान्य जल भी बैरी हो जाता है। अनेक बीमारियों में चिकित्सक कम पानी पीने की सलाह देते हैं।  अधिक दवाईयों का सेवन भी उनके लिये एक तरह से दुर्योग बन जाता है।    
संत तुलसीदास कहते हैं कि
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ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग, लखहिं सुलच्छन लोग।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-ग्रह, वेशभूषा, पानी, वायु तथा औषधि समय अनुसार दुर्योग तथा संयोग बनाते हैं।
जो जो जेहि जेहि रस मगन, तहं सो मुदित मन मानि
रसगुन दोष बिचारियो, रसिक रीति पहिचानि।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार संसार के विषयों के रस में मग्न रहता है। उसे उसके रस के दोषों के प्रभाव को नहीं जानते। इसके विपरीत ज्ञानी लोग रसों के गुण दोष को पहचानते हुए ही आनंद उठाते है। एक तरह से ज्ञानी ही सच्चे रसिक होते हैं।
            जिन लोगों की भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में रुचि है वह जानते हैं कि हर विषय के उपभोग की सीमा होती है।  अति हमेंशा वर्जित मानी जाती है। योग और ज्ञान साधना का नियमित अभ्यास करने वाले जानते हैं कि सांसरिक विषयों में जब अमृत का आभास होता है तो बाद में परिवर्तित होकर विष बन जाते हैं जिसे योग तथा ज्ञान साधना से ही नष्ट किया जा सकता है। यही कारण है कि जब विश्व में उपभोग संस्कृति से जो दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक विकारों का प्रभाव बढ़ा है तब भारतीय योग साधना तथा श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा हो रही है क्योंकि अमृत से विष बने सांसरिक विषयों के रस को जला देने की कला इन्हीं में वर्णित है।


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Sunday, December 29, 2013

दूसरे लोगों की पापपूर्ण तरक्की देखकर दुःखी न हों-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(doosron ki paappoorn tarkki dekhkar dukhi n hon-hindi thought aritcle based on manu smriti)



                        विश्व के अधिकतर देशों में जो राजनीतक, आर्थिक और सामाजिक व्यवस्थायें हैं उनमें सादगी, सदाचार तथा सिद्धांतों के साथ विकास करते हुए उच्चत्तम शिखर पर कोई सामान्य मनुष्य नहीं पहुंच सकता।  अंग्रेज विद्वान जार्ज बर्नाड शॉ का मानना था कि कोई भी व्यक्ति ईमानदारी से अमीर नहीं बन सकता। अंग्रेजों  ने अनेक देशों में राज्य किया।  वहां से हटने से पूर्व  अपने तरह की व्यवस्थायें निर्माण करने के बाद ही किसी देश को आजाद किया।  यही कारण है सभी देशों में आधुनिक राज्यीय, सामाजिक, आर्थिक तथा प्रशासनिक व्यवस्थाओं के शिखर पर अब सहजता से कोई नहीं पहुंच पाता।  यही कारण है कि उच्च शिखर पर वही पहुंचते हैं जो साम, दाम, दण्ड और भेद सभी प्रकार की नीतियां अपनाने की कला जानते हैं। याद रहे यह नीतियां केवल राजसी पुरुष की पहचान है। सात्विक लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह उस राह पर चलें। वैसे भी शिखर वाली जगहों पर राजसी वृत्ति से काम चलता है। ऐसे में उच्च स्थान पर पहुंचने वालों से यह आशा करना व्यर्थ है कि वह निष्काम भाव से कर्म तथा निष्प्रयोजन दया करें। 
मनु स्मृति में  कहा गया है कि

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अधर्मेणैधते तावत्ततो भद्राणि पश्यति।

ततः सपत्नाञ्जयति समूलस्तु विनश्यति।।



            हिन्दी में भावार्थ-अधर्मी व्यक्ति अपने अधार्मिक कर्मों के कारण भले ही उन्नति करने के साथ ही अपने शत्रुओं पर विजय प्राप्त करता दिखे पर अंततः वह जड़ मूल समेत नष्ट हो जाता है।
            राजसी पुरुषों का आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा अन्य क्षेत्रों में जो तेजी से विकास होता है उसे देखकर सात्विक प्रवृत्ति के लोग भी दांतों तले उंगली दबा लेते हैं। खासतौर से युवा वर्ग को शिखर पुरुषों का जीवन इस तरह का तेजी से विकास की तरफ बढ़ता देखकर उनके आकर्षण का शिकार हो जाते हैं।  जिनकी प्रकृति सात्विक है वह तो अधिक देर तक इस पर विचार नहीं करते पर जिनकी राजसी प्रवृत्ति है वह अपना लक्ष्य ही यह बना लेते हैं कि वह अपने क्षेत्र में उच्च शिखर पर पहुंचे। न पहुंचे तो  कम से कम किसी बड़े आदमी की चाटुकारिता उसके नाम का लाभ उठायें।  यह प्रयास सभी को फलदायी नहीं होता। सच बात तो यह है कि कर्म और और उसके फल का नियम यही है कि जो जैसा करेगा वैसा भरेगा। देखा यह भी जाता है कि उच्च शिखर पर येन केन प्रकरेण पर पहुंचते हैं उनका पतन भी बुरा होता है।  इतना ही नहीं भले ही बाह्य रूप से प्रसन्न दिखें आंतरिक रूप से भय का तनाव पाले रहते हैं।  अतः दूसरों का कथित विकास देखकर कभी उन्हें अपना आदर्श पुरुष नहीं मानना चाहिये।
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Tuesday, December 24, 2013

विषयों में आसक्त लोगों को ज्ञान देने से लाभ नहीं-मनुस्मुति के आधार हिन्दी चिंत्तन लेख(vishayon mein asakt logon ko gyan dene se labh nahin-hindi thought aritcle based on manu smriti)



                        हमारे देश में धर्म के विषय पर कहीं चर्चा हो तो अनेक लोग बातें सुनने और कहने के लिये लालायित हो उठते हैं। हैरानी की बात है कि जितना धर्म के विषय में हमारे पौराणिक ग्रंथों में लिखा गया उससे अधिक अन्यत्र कहीं सामग्री नहीं मिलती।  यही कारण है कि हमारे देश में उससे पढ़कर रटने वाले धर्म संदेशों के प्रचार को एक व्यवसाय बना लेते हैं।  दूसरी बात यह भी है कि हमारे देश में लोगों का व्यवसाय कृषि, लघु एवं कुटीर उद्योग के साथ ही वस्तुओं का विक्रय कर अपना पेट पालना रहा है।  पुराने समय में लोगों को बाज़ार के छोटे होने के कारण  अपने धंधे आदि से फुर्सत अधिक रहती थी और यही कारण है कि उनके हृदय में संसार के विषयों के पश्चात् अज्ञात शक्ति की आराधना करने का समय निकल आता है। इसी कारण उनके अंदर धर्म के प्रति आस्थाओं का जन्म हुआ। सीधी बात कहें तो उनका अध्यात्म उन्हें अपनी तरफ आकर्षित करता था। संसार की अज्ञात शक्ति के प्रति जिज्ञासा का कथित धर्म प्रचारकों ने खूब लाभ उठाया  औद्योगिक रूप से हमारा देश अभी शैशवकाल में ही है। ऐसे में छोटे शहरों और गांवों में लोगों के पास धर्म के प्रति रुचि अभी भी बरकरार है।  यह अलग बात है कि उनको ज्ञान देने वाले कथित गुरु उनकी जिज्ञासा शांत करने की बजाय अपनी चालाकी से कथायें सुनाकर या भजन गाकर मनोरंजन के माध्यम से उनके मन को प्रसन्न करते हैं। जहां तक ब्रह्मज्ञान का प्रश्न है उसके बारे में भ्रांत धारणाऐं प्रचलित हैं। कौन त्यागी, कौन सन्यासी और कौन तत्वाज्ञानी इसके बारे में आम लोगों अपने अपने गुरुओं के मतानुसार विचार करते हैं। 
         अनेक कथित ब्रह्मज्ञानी तो ऐसे हैं जो केवल संपत्ति संग्रह और शिष्यों के समूह का संचय कर प्रचार में प्रसिद्धि पाते हैं। इतना ही नहीं बाज़ार तथा प्रचार समूहों के लिये जो उपयोगी हैं वह सिद्ध है और जो नहीं है उसे कोई पूछता तक नहीं है। सच बात तो यह है कि त्यागी ही सच्चा सन्यासी होता है।  सन्यास का यह अर्थ कदापि नहीं है कि आदमी अपनी सांसरिक जिम्मेदारी से भागकर गेरुऐ वस्त्र पहन ले। गेरुए वस्त्र पहनकर भी जो कामनायें करता है वह सन्यासी नहीं है। इच्छाओं का त्याग करे वही ब्रह्मज्ञानी है और जो इच्छाओं की पूर्ति में ही लगा रहे उससे तो न ज्ञान लेना चाहिये और न उसे देना चाहिये।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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न जातु कामा कामानामुपभोगेन शाम्यति।

हविषा कृष्णवर्त्मेव भूव एवाभिवर्धते।।

                        हिन्दी में भावार्थ-जिस तरह आग में घी डालने से अग्नि प्रज्जवलित होती है उसी तरह एक इच्छा पूरी होने पर दूसरी स्वतः जाग्रत हो जाती है।

अर्थकामेष्वसक्तानां धर्मज्ञानं विधीयते।

धर्म जिज्ञासमानानां प्रमाणं परमं श्रुतिः।।

                        हिन्दी में भावार्थ-अर्थ और काम में आसक्त लोगों के लिये धर्म का ज्ञान देने का कोई विधान नहीं है। धर्म के विषय में जिज्ञासा रखने वालों के लिये वेद ही सर्वोच्च प्रमाण हैं।
                        भारत में हिन्दू धर्म में साकार तथा निराकार दो प्रकार की भक्ति की धारा प्रचलित है पर अब तो यहां अहंकार की भक्ति की धारा भी बह रही है। अनेक गुरु स्वयं को भगवान का अवतार बताकर लोगों में अपने शिष्य बनाते हैं।  इतना ही नहीं जो उनसे व्यवसायिक लाभ उठाना चाहते हैं या वेतन पाते हैं वह हृदय से अपने स्वामी को भगवान नहीं मानते पर शिष्यों को प्रभावित करने के लिये वह इसी तरह का प्रचार करते हैं। अनेक बार तो ऐसा भी होता है कि धर्म व्यवसाय में लगे लोग एक दूसरे पर आरोप प्रत्यारोप करने का प्रयास करते हुए समाज में वैमनस्य फैलाते नज़र आते हैं।  यह सब देखते हुए धर्म के प्रति जिज्ञासा रखने वाले लोग हमेशा ही ंसशय में रहते हैं।
                        इस संशय के निवारण के लिये लोगों को अपने ही धर्म ग्रंथों का अध्ययन करते रहना चाहिये।  यही  ग्रंथ धर्म का प्रमाण हैं और अगर इनका ध्यान से अध्ययन किया जाये तो धर्म के साथ ही तत्वज्ञान की अनुभूति स्वतः होने लगती है।  सबसे बड़ी बात यह कि हमारे धर्मग्रंथ मानते हैं कि कामनाओं का त्याग करना ही सन्यास है और ग्रहस्थ होते हुए भी सन्यासी हुआ जा सकता हैं।  अतः भ्रम में आकर किसी को न तो गुरु बनाना चाहिये न गुरु में ईश्वर का रूप देखने की कामना करना चाहिये।

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Monday, December 9, 2013

राजकोष के अपराधियों की संपत्ति जब्त करना चाहिए-हिंदी चिंत्तन लेख(rajkhos ke apradhiyon ki sampatti jabta karana chahie-hindi thought article,hindu religion article)



                        हम कहते हैं कि देश में राजकीय क्षेत्र में बहुत भ्रष्टाचार व्याप्त है। कुछ लोग तो अपने देश इस प्रकार के भ्रष्टाचार से इतने निराश होते हैं कि वह देश के पिछड़ेपन को इसके लिये जिम्मेदार मानते हैं। इतना ही नहीं  कुछ लोग तो दूसरे देशों में ईमानदारी होने को लेकर आत्ममुग्ध तक हो जाते हैं।  उन्हें शायद यह पता नहीं कि कथित रूप से पश्चिमी देशों में बहुत सारा भ्रष्टाचार तो कानूनी रूप से मान्यता प्राप्त है इसलिये उसकी गिनती नहीं  की जाती वरना भ्रष्टाचार तो वहां भी बहुत है।  हमारा अध्यात्मिक दर्शन मानता है कि जिन लोगों के पास राज्यकर्म करने का जिम्मा है उनमें भी सामान्य मनुष्यों की तरह अधिक धन कमाने की प्रवृत्ति होती है और राजकीय अधिकार होने से वह उसका गलत इस्तेमाल करने लगते हैं। यह स्वाभाविक है पर राज्य प्रमुख को इसके प्रति सजग रहना चाहिये।  उसका यह कर्तव्य है कि वह अपने कर्मचारियों की गुप्त जांच कराता रहे और उनको दंड देने के साथ ही अन्य कर्मचारियों को अपना काम ईमानदारी से काम करने के लिये प्रेरित करे। 
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादायिनः शठाः।

भृत्याः भवन्ति प्रायेण तेभ्योरक्षेदिमाः प्रजाः।।

                        हिन्दी में भावार्थ-प्रजा के लिये राज्य कर्मचारी अधिकतर अपने वेतन के अलावा भी कमाई क्रने के इच्छुक रहते हैं अर्थात उनमें दूसरे का माल हड़पने की प्रवृत्ति होती है। ऐसे राज्य कर्मचारियों से प्रजा की रक्षा के लिये राज्य प्रमुख को तत्पर रहना चाहिये।

ये कार्यिकेभ्योऽर्थमेव गृह्यीयु: पापचेतसः।

तेषां सर्वस्वामदाय राजा कुर्यात्प्रवासनम्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-प्रजा से किसी कार्य के लिये अनाधिकार धन लेने वाले राज्य कर्मचारियों को घर से निकाल देना चाहिये।  उनकी सारी संपत्ति छीनकर उन्हें देश से निकाल देना चाहिये।
                        हम आज के युग में जिस लोकतांत्रिक व्यवस्था को देख रहे हैं उसमें राज्यप्रमुख स्थाई रूप पद पर नहीं रहता। उसका कार्यकाल पांच या छह वर्ष से अधिक नही होता।  ऐसे में पद पर आने पर उसके पास राजकाज को समझने में एक दो वर्ष तो वैसे ही निकल जाते हैं फिर बाकी समय उसे यह प्रयास करना होता है कि वह स्वयं एक बेहतर राज्य प्रमुख कहलाये।  दूसरी बात यह भी है कि राज्य कर्मचारियेां के विरुद्ध कार्यवाही सहज नहीं रही। हालांकि छोटे कर्मचारियों के  विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है पर राज्य के उच्च पदों पर बैठे अधिकारियों  को स्वयं भी तो ईमानदार होना चाहिये।  उच्च पदों पर बैठे राज्य कर्मचारियों की शक्ति इतनी होती है कि वह राज्य प्रमुख को भी नियंत्रित करते हैं। राज्य प्रमुख अस्थाई होता है जबकि उच्च पदों पर बैठे अधिकारी स्थाई होते हैं। स्थिति यह है कि अनेक देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के रहते वहां के बुद्धिजीवी  इन्हीं स्थाई उच्च अधिकारियों को आज का स्थाई राजा मानते हैं।  राज्य प्रमुख बदलते हैं  पर ऐसे उच्च अधिकारी स्थाई रहते हैं। कार्य का अनुभव होने से वह राज्य प्रमुख के पद का पर्दे के पीछे से संचालन करते हैं।
                        एक स्थिति यह भी है कि आज के लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव की प्रक्रिया अपनायी जाती है। जिसमें विजय प्राप्त करने वाला ही राज्य प्रमुख बनता है।  चुनाव जीतने वालों में राजनीति शास्त्र का ज्ञान हो यह अनिवार्य नहीं है।  यही कारण है कि येनकेन प्रकरेण सत्ता सुख लेने की चाहत वाले लोग राजनीति क्षेत्र में आ जाते हैं। इनमें से कई लोग बड़े पद पर बैठकर भी अपनी इच्छा का काम नहीं कर पाते। आधुनिक लोकतंत्र में राजकीय अधिकारी का पद सुरक्षित है जबकि चुनाव के माध्यम से चुने गये लोकतांत्रिक प्रतिनिधि की वर्ष सीमा तय होती है।  इस कारण कुछ ही लोकतांत्रिक प्रतिनिधि ऐसे होते हैं जो मुखर होकर काम करते हैं जबकि सामान्यतः तो केवल अपने पद पर बने रहने से ही संतुष्ट रहते हैं।  इस स्थिति ने उन राज्यकर्मियों को आत्मविश्वास दिया है कि वह चाहे जो करें।  अनेक राज्यकर्मी तो प्रजा को काम न कर चाहे जो करने की धमकी तक देते हैं।  यही कारण है कि अनेक देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्था के होते भी उस प्रश्नचिन्ह लगाया जाता है।
                        हमारे देश में अध्यात्मिक दर्शन राजस कर्म की मर्यादा और शक्ति बखान करता है।  मनुष्य स्वयं सात्विक भले हो पर अगर उसके जिम्मे राजस कर्म है तो वह उसे भी दृढ़ता पूर्व निभाये यही बात हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन को शायद इसलिये ही शैक्षणिक पाठ्यक्रम से दूर रखा गया है क्योंकि उसके अपराधियों के साथ ही भ्रष्टाचार के विरुद्ध भी कड़े दंड का प्रावधान किया गया।  हालांकि अब देश में चेतना आ रही है और अनेक जगह भ्रष्ट राज्यकर्मियों के विरुद्ध कार्यवाही होने लगी है। अनेक जगह तो भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों की संपत्ति जब्त की जाने लगी है पर अभी भी देश में भ्रष्टाचार के विरुद्ध एक बड़े अभियान की आवश्यकता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, November 30, 2013

आंखों से अधिक रस लेने की न सोचें-हिन्दी चिंत्तन लेख(aankhon ke ras mein adhik n dooben-hindi thought article)



                                    हमारी इंद्रियां हमेशा बाहर ही सक्रिय रहने को लालायित रहती है।  विशेष रूप से हमारी आंखें हमेशा ही दृश्य देखने को उत्साहित रहती है।  हम जिन दृश्यों को देखते हैं वह दरअसल प्रकृति में विचर रहे विभिन्न जीवों की लीला है।  जिनकी उत्पति भोग तथा मुक्ति के लिये होती है। कुंछ लोग अपने भोग करने के साथ ही उसके लिये साधन प्राप्त करने का उपक्रम करते हैं तो उनकी यह सक्रियता दूसरे मनुष्य के लिये दृश्य उपस्थिति करती है।  कुछ लोग मुक्ति के लिये योग साधन आदि करते हैं तो भी वह दृश्य दिखता है।  मुख्य विषय यह है कि हम किस प्रकार के दृश्य देखते हैं और उनका हमारे मानस पटल पर  क्या प्रभाव पड़ता है इस पर विचार करना चाहिये।
                        हम कहीं खिलते हुए फूल देखते हैं तो हमारा मन खिल उठता है। कहंी हम सड़क पर रक्त फैला देख लें तो एक प्रकार से तनाव पैदा होता है। यह दोनों ही स्थितियां भले ही विभिन्न भाव उत्पन्न करती हैं पर योग साधक के लिये समान ही होती है।  वह जानता है कि ऐसे दृश्य प्रकृति का ही भाग हैं। 
                        हम देख रहे हैं कि मनोरंजन व्यवसायी कभी सुंदर कभी वीभत्य तो कभी हास्य के भाव उत्पन्न करते हैं। वह एक चक्र बनाये रखना चाहते हैं जिसे आम इंसान उनका ग्राहक बना रहे। पर्दे पर फिल्म चलती है उसमें कुछ लोग  अभिनय कर रहे हैं।  वहां एक कहानी है पर उसे देखने वाले  व्यक्ति के हृदय में पर्दे पर चल रहे दृश्यों के साथ भिन्न भिन्न भाव आते जाते हैं। यह भाव इस तरह आते हैं कि जैसे वह कोई सत्य दृश्य देख रहा है।  ज्ञानियों के लिये पर्दे के नहीं वरन् जमीन पर चल रहे दृश्य भी उसके मन पर प्रभाव नहीं डालते।  वह जानता है कि जो घटना था वह तय था और जो तय है वह घटना ही है।  सांसरिक विषयों के जितने प्रकार के  रस हैं उतने ही मनुष्य तथा उसकी सक्रियता से उत्पन्न दृश्यों के रंग हैं।            

पतंजलि योग शास्त्र में कहा गया है कि

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प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थ दृश्यम

                        हिन्दी में भावार्थ-प्रकाश, क्रिया तथा स्थिति जिनका स्वभाव है भूत वह  इंद्रियां जिसका प्रकट स्वरूप है और  भोग और मुक्ति का संपादन करना ही जिसका लक्ष्य है ऐसा दृश्य है।

                        हम दृश्यों के चयन का समय या स्थान नहीं तय कर सकते पर इतना तय जरूर कर सकते हैं कि किस दृश्य का प्रभाव अपने दिमाग पर पड़ने दें या नहीं।  जिन दृश्यों से मानसिकता कलुषित हो उनकी उपेक्षा कर देनी चाहिये। हृदय विदारक दृश्य कोई शरीर का रक्त नहीं बढ़ाते।  हमें समाचारों में ऐसे दृश्य दिखाने का प्रयास होता है। आजकल सनसनी ऐसे दृश्यों से फैलती है हो हृदय विदारक होती हैं। लोग उसे पर्दे पर देखकर आहें भरते हैं।  अखबारों में ऐसी खबरे पढ़कर  मन ही मन व्यग्रता का भाव लाते हैं।  अगर आदमी ज्ञानी नहीं है तो वह यंत्रवत् हो जाता है। मनोरंजन व्यवसायी तय करते हैं कि इस यंत्रवत खिलौने में कभी श्रृंगार, तो कभी हास्य कभी वीभत्स भाव पैदा कर किस तरह संचालित किया जाये।  आनंद वह उठाते हैं यंत्रवत् आदमी सोचता है कि मैने आनंद उठाया। इस भ्रम में उम्र निकल जाती है। चालाक लोग कभी स्वयं इन रसों में नहीं डूबते। ठीक ऐसे ही जैसे हलवाई कभी अपनी मिठाई नहीं खाता। फिल्म और धारावाहिकों में अनेक पात्र मारे गये पर उनके अभिनेता हमेशा जीवित मिलते हैं मगर उनके अभिनय का रस लोगों में बना रहता है।  संसार के विषयों और दृश्यों  में रस है पर ज्ञानी उनमें डूबते नहीं यही उनके प्रतिदिन के मोक्ष की साधना होती है।

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Wednesday, October 16, 2013

मनु स्मृति-रात को खाने के बात गीत सगीत सुनना बुरा नहीं (not bad listen of song and music after night dinner-manu smriti)



      आमतौर से लोग यह समझते हैं कि भारतीय अध्यात्म दर्शन इंद्रियों पर नियंत्रण करने के लिये हर विषय का त्याग करने की बात करता है। वह मनोरंजन तथा खेल आदि का विरोधी है।  यकीनन यह विचार किसी के भी अज्ञानी होने का ही प्रमाण है।  यह अलग बात है कि जहां भारतीय अध्यात्मिक दर्शन जहां भक्ति तथा ध्यान साधना को एकांत करने की बात कहता है वहीं वह सांसरिक विषयों के साथ निर्लिप्त भाव से  जुड़ने की राय भी देता है।  इस देह की सभी इंद्रियां हमेशा सक्रिय रहती हैं। इंद्रियों का यह स्वभाव है कि वह विभिन्न रसों में लिप्त होने के लिये हमेशा उत्सुक रहती हैं। एकरसता उनको उबा देती है। इसलिये समय और स्थिति के अनुसार इंद्रियों पथ बदलना चाहिये पर उनके विषयों से जुड़ने का भी एक समय होता है। हमेशा भक्ति और साधना नहीं हो सकती तो हमेशा मनोरंजन भी नहीं हो सकता।  हमारी देह है तो उसे सांसरिक विषयों से जोड़ना ही पड़ता हैं। प्रातःकाल योग साधना के दौरान आसन, ध्यान, मंत्र जाप तथा पूजा करने से जहां देह, मन और विचारों की शुद्धि होती है वहीं सांयकाल मनोरंजन के दौरान गीत संगीत सुनने से भी मनोविकार दूर होने के साथ ही थकान भी दूर होती है। आदमी की थकी देह में बैठा मन जब मयूर की तरह नाचता है उसमें वह दोपहर अर्थोपार्जन के दौरान एकत्रित विष का नाश होता है।
मनुस्मृति में कहा गया है कि

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तत्र भुजत्वा पुनः किञ्चित्तूर्वघोषैः प्रहर्षितः।

संविशेत्तु यथाकालमत्तिष्ठेच्य यतवलमः।।

                        हिन्दी में भावार्थ-भोजन करने के बाद कुछ समय हृदय को प्रसन्न करने के लिये गीत संगीत सुनने के बाद अपनी थकान दूर करने के लिये शयन करना चाहिये।
                        हमारे यहां भक्ति और साधना के साथ ही मनोरंजन का भी समय तय कर जीवन नहीं बिताया जाता।  प्रातःकाल गीत संगीत के साथ मनोंरजन के नाम पर भक्ति होती है तो सांयकाल भी कहीं भक्ति संगीत के नाम पर मनोरंजन कार्यक्रम होते हैं।  हैरानी तब होती है जब अनेक जगह भक्ति संध्या के नाम पर लगते हैं। भक्ति संध्या अर्थात यह  दो शब्द  ज्ञानसाधकों को हतप्रभ कर देते हैं। तब उनके मन में यह विचार भी आता है कि क्या संध्या को भी भक्ति होती है क्या? हां, इतना अवश्य है कि अनेक अध्यात्मिक ज्ञानी रात्रि शयन से पूर्व ध्यान कर सोने की सलाह देते हैं पर वास्तव में इससे निद्रा अच्छी आती है। ध्यान करने से दिन भर जो मन में एकत्रित विष  नष्ट हो जाता है।  शयन करते समय उन विषयों का विचार नहीं आता पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि भक्ति के नाम पर मनोरंजन कर उस स्थिति को पाया जा सकता है।
                        कहने का अभिप्राय है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन किसी विषय से जुड़ने पर प्रतिबंध लगाने की राय नहीं देता पर समय तथा सीमा के अनुसार काम करने की राय देता है।  प्रातःकाल जहां एकांत साधना जीवन में पवित्रता लाती है वहीं सांयकाल मनोरंजन करना भी मन को प्रसन्नता देता है। यह मनोरंजन भी एकांत में या सीमित समूह में होना चाहिये न कि उसके लिये भारी भीड़ एकत्रित की जाये।  भीड़ में मनोरंजन का लाभ वैसे ही कम होता है जैसे कि सार्वजनिक रूप से भक्ति करने पर मिलता है। किसी भी भाव की सुखद अनुभूति अंदर केवल एकांत में ही जा सकती है भीड़ में मचा शोर मनोरंजन कम तनाव का कारण अधिक होता है।

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Saturday, September 28, 2013

मनु स्मृति-धर्म के नाम पर ठगी करने वाले नर्क में गिरते हैं (dharam ke nam par thagi karne wale narak mein girte hain-relgion thougt based on manu smriti)



                        हमारे देश में धर्म का स्वरूप कभी स्पष्ट रूप से न समझाया जाता है न समझने का प्रयास कोई करता है।  हमारे भारतीय दर्शन के अनुसार धर्म का निर्वहन दो प्रकार से होता है। एक तो अध्यात्मिक साधना जो एकांत में ही की जा सकती है। दूसरा यह कि उस साधना के सहारे देह, बुद्धि और मन की शुद्धता से सांसरिक विषयों में सक्रिय भूमिका निभाई जाती है।  हमारे भारतीय अध्यात्मक संदेशों के अनुसार दिन का समय चार भागों में बांटा गया है। प्रातःकाल का समय अध्यात्मिक साधना या धर्म का, दोपहर का अर्थ, सांयकाल का  काम तथा रात्रि का मोक्ष के लिये- जिसे निद्रा भी कहा जा सकता है- के लिये होता है। यहां हम सायंकाल का समय में काम के विषय को सीमित रूप नहीं ले सकते। काम का सीधा आशय यह है कि मनोरंजन या उस मस्ती करने से है जिससे मानवीय मर्यादा का उल्लंघन नहीं होता हो।  न ही उसमें व्यर्थ का हास्य वार्तालाप हो जिससे दूसरे मजाक बनता हो। इस समय विभाजन को कभी हमारे समाज ने व्यवाहारिक रूप से स्वीकार नहीं किया और स्थिति यह है कि अनेक जगह दोपहर को प्रवचन होते हैं तो सांयकाल को श्रीमद्भागवत गीता पर प्रवचन होते हैं। कहीं प्रातःकाल ही प्रमाद और मनोरंजन की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है।
                        दूसरी बात यह है कि हमारे देश के लोग धर्म  के नाम पर सक्रियता दिखाते हुए स्वयं को धर्मभीरु प्रमाणित करने का प्रयास करते हैं।  उनके इसी अहंकार के भाव का लाभ वह लोग लाभ उठाते हैं जो धर्म के नाम पर व्यापार करते हुए न केवल समाज में अपनी प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं वरन् उसके प्रभाव का लाभ उठाते हुए दूसरों की संपत्ति का हरण और जमीन पर अवैध कब्जों में लिप्त हो जाते है।  इतना ही नहीं उन पर युवक युवतियों के दैहिक शोषण का आरोप भी लगता है।  सबसे बड़ी बात यह कि ऐसे पेशेवर लोगों के पास श्रद्धालुओं और भक्तों का समूह सबसे अधिक होता है जिन्होंने अधिक से अधिक धन संपदा का संचय किया है।  जब उनके पाप का घड़ा फूटता है तो लोगों में भारी निराशा व्याप्त हो जाती है।
                        दरअसल हम अपने  धर्म की बात करें तो प्रातःकाल अध्यात्मिक साधना के बाद बाकी समय में सांसरिक विषयों में शुद्धता के साथ सक्रियता ही उसका रूप है।  प्रातःकाल योगसाधना या अन्य किसी रीति से धर्म का निर्वाह करने के बाद दिन के बाकी समय में उससे प्राप्त ज्ञान का परिचय देते हुए सक्रियता दिखाना चाहिये। कोई व्यक्ति धर्मभीरु है या नहीं इसका प्रमाण उसके ज्ञान संबंध वार्तालाप से अधिक सांसरिक विषयों में उसकी सक्रियता से ही लगता है। अनेक लोग ऐसे पेशेवर धर्माचार्यों पर विश्वास करते हैं पर उनके इर्दगिर्द घूमते है जिनके पास वाचन के लिये ढेर सारा ज्ञान होता है पर धारण उन्होंने स्वयं भी नहीं किया होता हैं। देखा जाये तो यह धार्मिक सक्रियता मनोरंजन का विकल्प तो हो सकती है पर उससे कोई अध्यात्मिक हित सिद्ध नहीं होता।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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धर्मध्वजी सा लुबधश्छाद्भिको लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिको ज्ञेयो हिंस्त्र सर्वाभिसन्धकः।।
                        हिन्दी में भावार्थ-समाज में अपनी प्रतिष्ठा पाने के लिये धर्म का पाखंड, दूसरों की धन संपदा हड़पने की कामना, स्वार्थ पूर्ति के लिये ढोंगे, हिंसक कर्म तथा  दूसरों को भड़काने का काम करने  वाला व्यक्ति बिडाल वृत्ति का कहलाता है।

अधोदृष्टिनैष्कृतिकः स्वार्थसाधनतत्परः।
शठो मिथ्याविनीततश्च बकव्रतचरौ द्विज।।
                        हिन्दी में भावार्थ-जो मनुष्य झूठा, नम्रता के गुण परे, दूसरे का धन इच्छा करने वाला तथा हमेशा बुरे कर्म करने के साथ ही न अपने कल्याण की सोचता है न दूसरे का भला करता है बक वृत्ति का मानता है।
ये बकव्रतिनो विप्राः य च मार्जारलिङ्गिनः।
ते पतन्त्यन्धतामिस्त्रे तेन पापेन कर्मणा।।
                        हिन्दी में भावार्थ-बिडाल तथा बक वृत्ति वाले ऐसे लोग अपने पाप कर्मों के कारण अततः अंधे नरक में गिरते हैं।
                        पेशेवर धर्म के व्यापारी गेरुए और धवल वस्त्रधारी पहनते हैं जबकि हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार धर्म के वस्त्रों का कोई एक रंग पहचान नहीं होता। हमारे देश के कबीर, रहीम, तुंलसी, मीरा,सूर तथा अन्य अनेक संत कवि हुए हैं पर उनमें से किसी ने खास रंब के  वस्त्र या स्थान विशेष को को अपनी पहचान नहीं बनाया। उनके नाम की पहचान उनकी भक्ति तथा वह ज्ञान है जिसे उन्होंने धारण भी किया। उनकी तुलना भगवान के रूप से भले न हो पर भक्त के रूप में उनकी पूजा इसलिये की जाती है क्योंकि भगवान ऐसे भक्तों को अपने ही स्वरूप जैसा मानते हैं। हम यहां यह स्पष्ट कर दें कि ज्ञान होना ही महत्वपूर्ण नहीं वरन् उसे धारण करना भी आवश्यक है। हमारा समाज अपने उन प्राचीन अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन से परे हो गया है जिनमें स्वर्ण तथा हीरे की अनुभूति देने वाले शब्दों का भंडार है। उनसे सुखानुभूति  पठन पाठन या श्रवण के माध्यम से ही होती है। यही कारण है कि पेशेवर धर्माचार्य उनका रट्टा लगाकर अपने श्रद्धालुओं और भक्तों को उसी तरह प्रभावित करते हैं जैसे किसी वस्तु का व्यापारी अपने ग्राहकों के साथ करता है।  सच बात तो यह है कि हमारे यहां धर्म एक सार्वजनिक विषय होने से बक तथा बिडाल प्रकृत्ति लोगों को ही सर्वाधिक भौतिक लाभ होता दिखता है।  दूसरी बात यह कि आदमी के मन को भटकाव के दौरान अध्यात्मिक दर्शन एक विषय की तरह लगता है इसलिये वह मनोरंजन के व्यवसायियों के जाल में सहजात से फंस जाता है।
                        अनेक अध्यात्मिक चिंत्तक लोग इन  पेशेवर धार्मिक आचार्यों के अपराधों में लिप्त होने से दुःखी होते है पर यह उनका अज्ञान ही है।  भले ही ऐसे लोग अपने पाखंड से संपत्ति संचय करते हैं पर वह भी एक आम धनिक की तरह चिंताओं में डूबे रहते हैं। अपने वैभव छिन जाने का भय उनको सताता है।  धर्म के पथ चलने वाले व्यक्ति कभी दुःखी नहीं होते। जो नहीं चलते उन्हें भारी कष्ट होता है पर जो धर्म के नाम पर पाखंड करते हैं उनकी सजा सबसे अधिक बड़ी हो्रती है।  यह अलग बात है कि किसी किसी को जल्दी किसी को देर सजा मिलती है।         

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