समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Showing posts with label hasya aalekh. Show all posts
Showing posts with label hasya aalekh. Show all posts

Wednesday, February 27, 2008

संत कबीर वाणी:पुत्र से श्रेष्ठ होता है शिष्य

कबीर समुझा कहत है, पानी थाह बताय
ताकूँ सतगुरु का करे, जो औघट डूबे जाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की किसी मनुष्य को अपने अनुभव के अनुसार पानी की थाह बताई जाये और उसके बाद भी यदि आदमी घाट में गहरे अपनी में डूब मरे तो उसके लिए कोई उपाय नहीं है. इसी तरह गुरु का ज्ञान न मानने वाले का भी क्या उपाय है?

जो गुरु पूरा होय तो शीषहि ले निबाहि
शीष भाव सुत्त जानिए, सूत ते श्रेष्ठ शिष्य आहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं की ज्ञानवान गुरु मिल जाये तो शिष्य का निर्वाह उससे हो जाता है. शिष्य भाव भी पुत्र भाव है. पुत्र से श्रेष्ठ तो शिष्य होता है क्योंकि पुत्र सांसरिक स्वार्थवश है और शिष्य तो इस संसार में ज्ञान की वजह से मिलता है.

Thursday, November 8, 2007

दूध की नदी तो अब भी बह रही है

आज एक टीवी चैनल पर रसायनों से दूध बनाने के संबंध में एक रिपोर्ट प्रसारित की गयी जा रही थी। कपडे धोने की सोडा, नकली आयल तथा अन्य खतरनाक वस्तुएं नकली दूध बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहीं थीं। शरीर को भयानक हानि पहुँचाने का यह कार्यक्रम बाकायदा कैमरे में रिकार्ड किया और दुष्कर्म करने वाले अपने बयान इस तरह दे रहे थे जैसे उनके लिए आम बात हो।

वैसे सिंथेटिक दूध बनाकर बेचने की बात कोई नई नहीं है और उसके खतरनाक होने की बात भी कही जाती रही है पर अब यह एक संगठित उद्योग बन गया है। सबसे बड़ी बात यह है की यह अब उन गावों में खुलेआम होने लगा है जिन्हें भारतीय समाज का मुख्य आधार माना जाता है। वैसे दीपावली के आते कई कार्यक्रम ऐसे प्रसारित हुए हैं जो भयभीत तो करते हैं पर मन में चेतना भी लाते हैं। नकली खोये की भी चर्चा बहुत हो रही है और उसकी जगह अन्य स्वीट-जैसे छेने की मिठाई और फल आदि-के इस्तेमाल का सुझाव दिया जा रहा है। विशेषज्ञ शहरों में बिक रही खोये की मिठाई और वहाँ के दुग्ध उत्पादन की मात्रा के आंकडे देकर यही कह रहे हैं की बहुत बडे पैमाने पर नकली खोये की मिठाई बिक रही है। नकली और मिलावट वस्तुओं का मिलना कोई बड़ी बात नहीं थी पर अब उसका अनुपात इतना बढ गया है कि असल और शुद्ध का अस्तित्व ढूंढना कठिन हो गया है।

वैसे तो इस धरती पर धर्म के साथ अधर्म,सच के साथ झूठ और शुद्ध के साथ अशुद्ध, विष के साथ अमृत और असल के साथ नकल रहा है पर जब सहअस्तित्व के साथ। समाज में अच्छे के साथ बुरा भी होता है पर अब तो शुद्धता को जिस तरह अस्तित्व के संकट में डाल दिया गया है उससे भारी चिंता हो रही है।

महात्मा गांधी कहते थे की असल भारत तो गाँवों में रहता है-और टीवी पर प्रसारित कार्यक्रम में देखा जाये तो यह सब गाँवों में हो रहा है मतलब असल भारत जहाँ दूध की नदियाँ बह रहीं थीं वहाँ अब विष की नदियाँ बहने लगीं हैं। कहा जाता है की गाँवों में अभी शुद्ध वायु और खाने-पीने की सामग्री मिलती है रिपोर्ट उसका खंडन करती है। वैसे गाँवों में गरीबी बहुत है पर लगता है ऐसे कामों से वह दूर हो जायेगी। देश में आबादी बढ़ी है, कृषि योग्य और पशुओं के लिए चरनोई की जमीन कम होती जा रही है-और जहाँ है भी तो उसमें मेहनत अधिक और आय काम होती है- ऐसे में बिना पशुओं के और कम मेहनत के नकली दूध और खोवा बनाकर आय ज्यादा अर्जित करना बहुत आसान है।

याद रखने वाली बात यह है की यह दूध बाजार में बिकता है और लोग इसे पीते हैं। बच्चों को दूध पिलाकर उन्हें भविष्य के एक विजेता बनाने के सपने देखे जाते हैं, पर यह दूध तो उनके स्वास्थ्य के लिए ही बडा संकट है इसलिए ही आजकल छोटी उम्र में बड़ी बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। शीत पेय कंपनियों पर अपने उत्पाद में कीटाणु नाशक तय मात्र से अधिक डालने का आरोप लगा तो कई समझदार लोगों ने युवाओं को दूध पीने की सलाह दी थी पर ऐसी रिपोर्ट देखकर क्या सलाह देंगे? दूसरा सहारों में मिलावट और नकली सामान बेचने की जो बीमारी थी वह अब गावों में भी पहुंच गयी है-मतलब असल भारत के सामने अब नकली भारत भी चुनौती के रूप ने खडा है। आशय यह की नैतिकता और सदाशयता का भाव अब हमारे रक्त में कम होता जा रहा है। जब दूध में ऐसे विष होगा तो खून में क्या होगा यह आसानी से समझा जा सकता है। हमारे देश के बारे में कहा जाता था की यहाँ कभी दूध की नदियाँ बहती थीं-बह तो अब भी रही हैं पर असली नहीं नकली दूध की वह भी विष लिए हुए।

विशिष्ट पत्रिकायें