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Saturday, October 31, 2009

मनु स्मृतिः धर्मोपदेशक का नाटक करना एक तरह से ठगी है (manu smruti)

धर्मघ्वजी सदा लुब्धश्छाùि लोकदम्भका।
बैडालवृत्तिका ज्ञेयो हिंस्त्रः सर्वाभिसंधकः।।

लोगों में अपना प्रभाव जमाने के लिये स्वयं आचरण न करते हुए केवल धर्म की ध्वजा पताका फहराने का नाटक करना, दूसरे का धन को छीनने की इच्छा करना, हिंसक स्वभाव होना तथा दूसरों भड़काकर झगड़ा कराना बैडाल वृत्ति का परिचायक है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय- पूरी दुनियां में अनेक धर्मों के ध्वजवाहक दिखने को मिल जायेंगे पर उनके धर्मों के आड़ में ही हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ रही है। इससे प्रमाणित होता है कि पूरी दुनियां में बैडाल प्रवृत्ति के कथित ज्ञानियों की संख्या बढ़ रही है। मनु स्मृति के अनुसार धर्म के नाम पर ठगी करना भी बैडाल या ठगी की प्रवृत्ति है।
यत्र तत्र सर्वत्र पूरी दुनियां में कथित ज्ञानी विद्वान अपने श्रीमुख से सामान्य लोगों को धर्मोपदेश देते घूम रहे हैं। कहते हैं कि ‘हिंसा मत करो’, परोपकार करो, सादगी से रहो, और ‘सबसे प्रेम करो’। एक तरह से उन लोगों ने नारों को ही उपदेश बना लिया है। अपने नारों को मजबूत करने के लिये वह कुछ मनोरंजक कहानियां सुनाने लगते हैं। कुछ धर्मोपदेश अपने धर्मग्रंथों में वर्णित चमत्कारी घटनाओं का प्रचार कर लोगों को कर्मविमुख करते हैं। उनका बस यही कहना होता है कि ‘बस हाथ उठाकर आसमान में स्थित भगवान से अपने लिये सुख मांगते रहो।’
यह धर्मोदेशक इस तरह अपने लिये भोगविलास की सामग्रियां जुटाते हैं। उनकी वृति केवल भक्त के धन को अपनी जेब में खीचने की होती है। इतना ही नहीं समय पड़ जाये तो यह अपने समुदाय के हिंसक लोगों को प्रश्रय देते हैं। उससे भी बात न बने तो आम लोगों को हिंसा के लिये प्रेरित करते हैं। ऐसे लोगों को पहचान करते हुए उनकी उपेक्षा करना चाहिये।
वैसे हम कहते हैं कि जमाना अब खराब हुआ है पर मनुमहाराज का यह संदेश देखें तो धर्म की ध्वजपताका फहराने वाले ढोंगी उस समय भी थे इसलिये ही तो उन्होंने उनकी चर्चा की ताकि लोग उनसे दूर रहें।
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dharm, hindi sahitya, hindu, manu, manu smruti, अध्यात्म, धर्म, संदेश, हिंदी साहित्य, हिंदू

Monday, July 27, 2009

मनु स्मृति-किसी जीव की हत्या से मांस प्राप्त किया जा सकता है, स्वर्ग नहीं (manu smruti in hindi)

नाऽकृत्वा प्राणिनां हिंसां मांसमुत्यद्यते क्वचित्।
न च प्राणिवधः स्वग्र्यस्तस्मान्मांसं विवर्जयेत्।।

हिंदी में भावार्थ-किसी भी जीव की हत्या कर ही मांस प्राप्त किया जाता है लेकिन उससे स्वर्ग नहीं मिल सकता इसलिये सुख तथा स्वर्ग को प्राप्त करने की इच्छा करने वालो को मांस के उपभोग का त्याग कर देना चाहिये।
यद्ध्यायति यत्कुरुते धृतिं बध्नाति यत्र च।
तद्वाघ्नोत्ययत्नेन यो हिनस्तिन किंचन।।

हिंदी में भावार्थ-जो मनुष्य किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं करता, वह जिस विषय पर एकाग्रता के साथ विचार और कर्म करता है वह अपना लक्ष्य शीघ्र और बिना विशेष प्रयत्न के प्राप्त कर लेता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के चलने के दो ही मार्ग हैं-एक सत्य और परमार्थ और दूसरा असत्य और हिंसा। यदि मनुष्य का मन लोभ, लालच और अहंकार से ग्रस्त हो गया तो वह नकारात्मक मार्ग पर चलेगा और उसमें सहृदयता का भाव है तो वह सकारात्मक मार्ग पर चलता है। श्रीगीता के संदेशों का सार यह है कि जैसा मनुष्य अन्न जल ग्रहण करता है तो वैसा ही उसका स्वभाव हो जाता है तब वह उसी के अनुसार ही कर्म करता हुआ फल भोगता है।
वैसे पश्चिम के वैज्ञानिक भी अपने अनुसंधान से यह बात प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन और मांसाहारी भोजन करने वालों के स्वभाव में अंतर होता है। वह यह भी प्रमाणित कर चुके हैं कि शाकाहारी भोजन करने वालों के विचार और चिंतन में सकारात्मक पक्ष अधिक रहता है जबकि मांसाहारी लोगों का स्वभाव इसके विपरीत होता है। अतः जितना संभव हो सके भोजन में मांसाहार से परहेज करना चाहिये।
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Wednesday, July 1, 2009

मनु स्मृति-खीर, रबड़ी और मालपुआ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक

आरण्यानां च सर्वेषां मृगानणां माहिषां बिना।
स्त्रीक्षीरं चैव वन्र्यानि सर्वशक्तुनि चैव हि।।
हिंदी में भावार्थ-
भैंस के अतिरिक्त सभी वनैले पशुओं तथा स्त्री का दूध पीने योग्य नहीं होता। सभी सड़े गले या बहुत खट्टे पदार्थ खाने योग्य नहीं होते। इस सभी के सेवन से बचना चाहिये।

वृथाकृसरसंयावं पायसायूपमेव च।
अनुपाकृतमासानि देवान्नानि हर्वषि च।।
हिंदी में भावार्थ
-तिल, चावल की दूध में बनी खीर,दूध की रबड़ी,मालपुआ आदि स्वास्थ्य के हानिकाकाकर हैं अतः उनके सेवन से बचना चाहिये।
दधिभक्ष्यं च शुक्तेषु सर्वे च दधिसम्भवम्।
यानि चैवाभियूशयन्ते पुष्पमूलफलैः शुभैः।।
हिंदी में भावार्थ-
शुक्तों में दही तथा उससे बनने वाले पदार्थ-मट्ठा तथा छाछ आदि-तथा शुभ नशा न करने वाले फूल, जड़ तथा फल से निर्मित पदार्थ-अचार,चटनी तथा मुरब्बा आदि-भक्षण करने योग्य है।
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Sunday, June 28, 2009

मनुस्मृति-बिना प्रयोजन कौतुहल नहीं करें

न नृत्येन्नैव गायेन वादित्राणि वादयेत्।
नास्फीट च क्ष्वेडेन्न च रक्तो विरोधयेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि नाचना गाना, वाद्य यंत्र बजाना ताल ठोंकना, दांत पीसकर बोलना ठीक नहीं और भावावेश में आकर गधे जैसा शब्द नहीं बोलना चाहिये।

न कुर्वीत वृथा चेष्टां न वार्य´्जलिना पिबेत्।
नौत्संगे भक्षयेद् भक्ष्यानां जातु स्यात्कुतूहली।।
हिंदी में भावार्थ-
मनुमहाराज कहते हैं कि जिस कार्य को करने से अच्छा फल नहीं मिलता हो उसे करने का प्रयास व्यर्थ है। अंजली में भरकर पानी और गोद में रखकर भोजन करना ठीक नहीं नहीं है। बिना प्रयोजन का कौतूहल नहीं करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब आदमी तनाव रहित होता है तब वह कई ऐसे काम करता है जो उसकी देह और मन के लिये हितकर नहीं होते। लोग अपने उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने-चलने और बोलने-हंसने पर ध्यान नहीं देते जबकि मनुमहाराज हमेशा सतर्क रहने का संदेश देते हैं। अक्सर लोग अपनी अंजली से पानी पीते हैं और बातचीत करते हुए खाना गोद में रख लेते हैं-यह गलत है।
जब से फिल्मों का अविष्कार हुआ है लोगों का न केवल काल्पनिक कुतूहल की तरफ रुझान बढ़ा है बल्कि वह उन पर चर्चा ऐसे करते हैं जैसे कि कोई सत्य घटना हो। फिल्मों की वजह से संगीत के नाम पर शोर के प्रति लोग आकर्षित होते हैं।
मनुमहाराज इनसे बचने का जो संदेश देते है उनके अनुसार नाचना, गाना, वाद्य यंत्र बजाना तथा गधे की आवाज जैसे शब्द बोलना अच्छा नहीं है। फिल्में देखना बुरा नहीं है पर उनकी कहानियों, अभिनेताओं, अभिनेत्रियों को देखकर कौतूहल का भाव पालन व्यर्थ है इससे आदमी का दिमाग जीवन की सच्चाईयों को सहने योग्य नहीं रह जाता।

नाचने गाने और वाद्य यंत्र बजाना या बजाते हुए सुनना अच्छा लगता है पर जब उनसे पृथक होते हैं तो उनका अभाव तनाव पैदा करता है। इसके अलावा अगर इस तरह का मनोरंजन जब व्यसन बन जाता है तब जीवन में अन्य आवश्यक कार्यों की तरफ आदमी का ध्यान नहीं जाता। लोग बातचीत में अक्सर अपना प्रभाव जमाने के लिये किसी अन्य का मजाक उड़ाते हुए बुरे स्वर में उसकी नकल करते हैं जो कि स्वयं उनकी छबि के लिये ठीक नहीं होता। कहने का तात्पर्य यह है कि उठने-बैठने और चलने फिरने के मामले में हमेशा स्वयं पर नियंत्रण करना चाहिए।
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Friday, May 8, 2009

मनुस्मृति: दूसरों के स्नानगृहों में नहाना नहीं चाहिए

परकीयनियानुषु न स्नायाद्धि कदाचन।
नियानकत्र्तुः स्नात्वा तु दुष्कृतांशेन लिप्यते।।
हिंदी में भावार्थ-
अन्य व्यक्तियों द्वारा बनवाये गये स्नान के लिये बनाये गये स्थानों-स्नानगृहों,सरोवरों और कुऐं आदि-पर नहाना नहीं चाहिए। वह स्नानगृह अगर पापों के धन से बनाये गये हैं तो उसमें नहाने वाला भी उसका भागी बनता है।
यानाश्य्यासनान्यस्य, कूपोद्यान ग्रह्यणि च।
अदत्तान्युपयु´्जानः एनसः स्वात्तुरीभाक्।।
हिंदी में भावार्थ-
वाहन, शैय्या, आसन, कुआं, उद्यान और भवन आदि का उपभोग कुछ दान कर ही करना लाभदायक होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-आजकल की व्यस्त एवं दीर्घसूत्रीय जिंदगी में यह देखना कठिन काम है कि हम कहीं बाहर जाकर रुक रहे हैं तो वहां का स्थान किस प्रकार के धन से बनाया गया है। वैसे भी आजकल बिना काले धन के यह कैसे संभव है कि समाज का भौतिक विकास इतनी तीव्र गति से हो। ऐसे में भ्रष्ट और अनैतिक रूप से कमाये गये धन से बने आवास और स्नानगृहों में रहने और नहाने का प्रतिबंध स्वीकार करना संभव नहीं लगता। बड़े बड़े शहरों में बड़े और आलीशान होटल बन गये हैं जिनमें स्वीमिंग पूल भी होते हैं। अब यह कैसे कहा जा सकता है कि वह भ्रष्ट या अनैतिक धन से बने हैं या सात्विक धन से। वैसे तो आजकल धर्नाजन के कई ऐसे óात पवित्र माने जाते हैं जिनको पहले अपवित्र माना जाता था। अतः इस बारे में अपने विवेक से विचार करना चाहिये।

मगर सच तो यह है कि जिस प्रकार हम अपने जीवन में जिस प्रकार के व्यक्ति या वस्तु के संपर्क में आते हैं उसके पाप पुण्य का प्रभाव हम पर होता है। कहा जाता है कि ‘जैसे खायें अन्न वैसा हो मन’। इसका आशय यह तो है ही कि जिस प्रकार की वस्तु का हम उपभोग करेंगे वैसे ही प्रभाव हमारी देह के साथ ही हमारे मन और विचारों पर होगा। साथ ही यह भी कि उसके आने का सात्विक मार्ग है या असात्विक इस बात का प्रभाव भी उसके उपभोग करने वाले पर होता है। तात्पर्य यह है कि अगर हमें लगता है कि कोई व्यक्ति या वस्तु-जिसके बारे में यह यकीन हो कि वह असात्विक प्रकृत्ति की है तो उससे अपने आपको दूर रखना चाहिये। यह ठीक है कि आजकल की भागम भाग जिंदगी में यह कहना कठिन है कि किसका धन एक नंबर का है या दो नंबर का पर थोड़ा विवेक का इस्तेमाल करें तो सभी समझ में आ जाता है। दूसरा सच यह भी कि हम किसी बड़े शहर में जाकर अपने लिये सस्ता और अच्छा स्थान रहने के लिये ढूंढते हैं पर तब यह देखने का न तो समय होता है न जरूरत कि वह किस प्रकार के धन से बना है। हालांकि अनजान रहने पर किसी वस्तु का उपभोग करने पर उसके पाप का भागी नहीं बनते यह भी हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है।
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Monday, May 4, 2009

मनु स्मृतिः ज्ञान होने पर युवक का भी सम्मान होता है

न हायनैर्न पालितैर्न वित्तेन न बंधुभिः ।
ऋषयश्चक्रिरे धर्मयोऽनुचारः स नो महान्।।
हिंदी में भावार्थ-
आयु,सफेद बाल, धन तथा अच्छे कुल होने से ज्ञान और आचरण का अधिक महत्व है। धर्म के अनुसार चलने वाले को ही समाज में सम्मान प्राप्त होता है।
न तेन वृद्धो भवति वेनास्य पलितं शिरः।
यो वै युवाऽप्यधीयानस्तं देवाःस्थविरं विदुः।।
हिंदी में भावार्थ-
व्यक्ति के बाल सफेद होने से वह सम्मानीय नहीं हो जाता जबकि ज्ञान प्राप्त कर लेने के बाद युवा व्यक्ति भी समाज के सभी वर्गो में सम्मान पाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भौतिक पदार्थों और कथित रूप से समाज की परंपराओं का ज्ञान रखने वाले लोग केवल इस आधार पर सम्मान पाना चाहते हैं कि उनके बारे में वह सबसे अधिक जानते हैं। अनेक लोग आयु में बड़े, अधिक धन और अच्छे कुछ का होने के कारण सम्मान पाने का मोह पाल लेते हैं। दिखाने के लिये लोग उनका सम्मान करते भी हैं पर अध्यात्मिक ज्ञान और उसके अनुरूप आचरण न होने के कारण हृदय से उनका सम्मान कोई नहीं करता।
तात्पर्य यह है कि अगर समाज में लोगों के हृदय में अपने सम्मान का भाव स्थापित करना है तो अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने के साथ उसके अनुरूप आचरण करना आवश्यक है। वैसे तो परिवार में बड़ा, समाज में धनी और अनपढ़ों में शिक्षित होने से अनेक लोगों को लोग दिखावे के लिये मान देते हैं। सामने कोई नहीं कहता कि ‘आप में न तो अध्यात्मिक ज्ञान है न आचरण’, पर मन में सभी की सोच यही होती है। जो ज्ञान रटकर दूसरों को प्रभावित करते हैं वह भी फूलते हैं पर उनका आचरण उसके अनुरूप नहीं होता और लोग पीठ पीछे उनकी निंदा करते हैं या मजाक उड़ाते हैं। सम्मान तो वह है कि पीठ पीछे भी समाज के सभी वर्ग के लोग प्रशंसा करें। यह तभी संभव है जब अपने प्राचीन अध्यात्मिक ज्ञान होने के साथ उसके अनुरूप आचरण भी हो।
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Friday, April 24, 2009

मनुस्मृतिः इंद्रियों पर नियंत्रण करना आसान काम नहीं

न तथैंतानि शक्यन्ते सन्नियंतुमसेवया।
विषयेषु प्रजुष्टानि यथा ज्ञानेन नित्यशः

हिन्दी में भावार्थ-जब तक इंद्रियों और विषयों के बारे में जानकारी नहीं है तब तब उन पर निंयत्रण नहीं किया जा सका। इंद्रियों पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिये यह आवश्यक है कि विषयों की हानियों और दोषों पर विचार किया जाये
वशे कृत्वेन्दिियग्रामं संयम्य च मनस्तथा।
सर्वान्संसाधयेर्थानिक्षण्वन् योगतस्तनुम्।।

हिंदी में भावार्थ-मनुष्य के लिये यही श्रेयस्कर है कि वह अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखे जिससे धर्म,अर्थ,काम तथा मोक्ष चारों प्रकार का लक्ष्य प्राप्त किया जा सके।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इंद्रियों पर नियंत्रण और विषयों से परे रहने का संदेश देना आसान है पर स्वयं उस पर नियंत्रण करना कोई आसान काम नहीं है। आप चाहें तो पूरे देश में ऐसे धार्मिक मठाधीशों को देख सकते हैं जो श्रीगीता का ज्ञान देते हुए निष्काम भाव से कर्म करने का संदेश देते हैं पर वही अपने प्रवचन कार्यक्रमों के लिये धार्मिक लोगों से सौदेबाजी करते हैं। लोगों को सादगी का उपदेश देने वाले ऐसे धर्म विशेषज्ञ अपने फाइव स्टार आश्रमों से बाहर निकलते हैं तो वहां भी ऐसी ही सुविधायें मांगते हैं। देह को नष्ट और आत्मा को अमर बताने वाले ऐसे लोग स्वयं ही नहीं जानते कि इंद्रियों पर नियंत्रण करते हुए विषयों से परे कैसे रहा जाता है। उनके लिये धार्मिक संदेश नारों की तरह होते हैं जिसे वह लगाये जाते हैं।
दरअसल ऐसे लोगों से शास्त्रों से अपने स्वार्थ के अनुसार संदेश रट लिये हैं पर वह इंद्रियों और विषयों के मूलतत्वों को नहीं जानते। इंद्रियों पर नियंत्रण तभी किया जा सकता है जब विषयों से परे रहा जाये। यह तभी संभव है जब उसके दोषों को समझा जाये। वरना तो दूसरा कहता जाये और हम सुनते जायें। ढाक के तीन पात। सत्संग सुनने के बाद घूम फिरकर इस साँसससिक दुनियां में आकर फिर अज्ञानी होकर जीवन व्यतीत करें तो उससे क्या लाभ?
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Wednesday, March 18, 2009

मनु स्मृति: अध्यात्म में रूचि रखना चाहिए

अति वादांस्तितिक्षेत नावमन्येत कञ्चन
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्
न क्रुद्धयंन्तं प्रतिक्रुध्येदाक्रृष्टः कुशलं वदेत्
सप्तद्वाराऽवकीर्णां च न वाचमनृतां वदेत्


हिंदी में भावार्थ-दूसरे के कड़वे वचनों को सहना करना चाहिये। अभद्र शब्द (गाली)का उत्तर कभी वैसा ही नहीं देना चाहिये। न ही किसी का अपमान करना चाहिये। यह शरीर तो नश्वर है इसके लिये किसी से शत्रुता करना ठीक नहीं माना जा सकता।
अध्यात्मरतिरासीनो निरपेक्षो निरामिषः
आत्मनैव सहायेन सुखार्थी विचरेदिह

हिंदी में भावार्थ-अध्यात्म विषयों में अपनी रुचि रखते हुए सभी वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति निरपेक्ष भाव रखना चाहिये। इसके साथ ही शाकाहारी तथा इद्रियों से संंबंधित विषयो में निर्लिप्त भाव रखते हुए अपने अध्यात्म उत्थान के लिये अपने प्रयास करते रहना चाहिये। इससे मनुष्य सुखपूर्वक इस दुनियां में विचरण कर सकता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-खानपान और रहन सहन में आई आधुनिकता ने लोगों की सहनशीलता को कम कर दिया है। लोग जरा जरा सी बात पर उत्तेजित होकर झगड़ा करने पर आमादा है। स्वयं के पास कितना भी बड़ा पद,धन और वैभव हो पर दूसरे का सुख सहन नहीं कर पाते। गाली का जवाब गाली से देना के लिये सभी तत्पर हैं। अध्यात्म विषय के बारे में लोगों का कहना है कि उसमें तो वृद्धावस्था में ही जाकर दिलचस्पी रखना चाहिये। इस अज्ञानता का परिणामस्वरूप आदमी वृद्धावस्था में अधिक दुखी होता हैं। अगर बचपन से ही अध्यात्म में रुचि रखी जाये तो फिर बुढ़ापे में आदमी को अकेलापन नहीं सताता। जिसकी रुचि अध्यात्म में नहीं रही वह आदमी वृद्धावस्था में चिढ़चिढ़ा हो जाता है। ऐसे अनेक वृद्ध लोग हैं जो अपना जीवन शांतिपूर्वक व्यतीत करते हैं क्योंकि वह बचपन से मंदिर आदि में जाकर अपने मन की शुद्धि कर लेते हैंं और अध्यात्म विषयों पर चिंतन और मनन भी करते हैं।

बदले की भावना इंसान को पशु बना देती हैं और वह तमाम तरह के ऐसे अपराध करने लगता है जिससे समाज में उसे बदनामी मिलती है। कई लोग ऐसे हैं जो गाली के जवाब में गाली देकर अपने लिये शत्रुता बढ़ा लेते है। कुछ लोग ऐसे हैं जिनको अभद्र शब्द बोलने और लिखने में मजा आता है जबकि यह अंततः अपने लिये ही दुःखदायी होता है। अपने मस्तिष्क में अच्छी बात सोचने से रक्त में भी वैसे ही कीटाणु फैलते हैं और खराब सोचने से खराब। यह संसार वैसा ही जैसा हमारा संकल्प होता है। अतः अपनी वाणी और विचारों में शुद्धता रखना चाहिये। दूसरे के व्यवहार या शब्दों से प्रभावित होकर उनमें अशुद्धता लाना अपने आपको ही कष्ट देना है।
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