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Thursday, June 11, 2009

विदुर नीति:मौन रहने से सत्य बोलना ठीक रहता है

  1. बोलने से न बोलना अच्छा बताया गया है, किन्तु सत्य बोलना भी एक गुण है। चुप या मौन रहने से सत्य बोलना दो गुना लाभप्रद है। सत्य मीठी वाणी में बोलना तीसरा गुण है और धर्म के अनुसार बोला जाये यह उसका चौथा गुण है।
  2. मनुष्य जैसे लोगों के साथ रहता है और जिन लोगों की सेवा में रहता है और जैसी उसकी कामनाएं होतीं है वैसा ही वह हो भी जाता है।
  3. मनुष्य जिन विषयों से मन हटाता है उससे उसकी मुक्ति हो जाती है। इस प्रकार यदि सब और से निवृत हो जाये तो उसे कभी भी दुख प्राप्त नहीं होगा।
  4. जो न तो स्वयं किसी से जीता जाता है न दूसरों को जीतने के इच्छा करता है न किसी से बैर करता और न दूसरे को हानि पहुंचाता है और अपनी निंदा और प्रशंसा में भी सहज रहता है वह दुख और सुख के भाव से परे हो जाता है।

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Sunday, March 29, 2009

चाणक्य नीतिः अपने धर्म, समुदाय, विश्वास और वर्ग को बदलें नहीं

आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।

कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में मेें कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है।
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Friday, March 20, 2009

भर्तृहरि शतकः हंसों के मूल गुण को विधाता भी नहीं छीन सकता

अम्भोजिनी वनविहार विलासमेव हंसस्य हंति नितरां कुपितो विधाता।
न त्वस्य दुग्धवाभेदविधौ प्रसिद्धां वेंदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौं समर्थः

हिंदी में भावार्थ- अगर परमात्मा नाराज हो जाये तो वह हंसों का वनों में विहार करने से रोक सकता है लेकिन उनमें पानी और दूध को अलग अलग करने का जो स्वाभाविक गुण है उसे नष्ट नहीं कर सकता।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- श्रीगीता के संदेश के अनुसार भी जीव का जन्म परमात्मा की इच्छा से ही होता है पर पंच तत्वों से बनी देह में मन, अहंकार और बुद्धि से संचालन वह स्वयं करते हुए अपने कर्मों के फल के लिये दायी होता है। अधिकतर धर्मों के गुरु अपने भक्तों के सामने यह भ्रम पैदा करते हैं कि उनके कर्म और फल के लिये परमात्मा ही जिम्मेदार है, इसलिये वह केवल उसकी भक्ति करें। सच बात तो यह है कि इस तरह वह सांसरिक कर्मों से लोगों को विमुख करने का प्रयास करते हैंं पर साथ ही फिर अपनी दान दक्षिण के नाम उन्हें धन संग्रह के लिये भी प्रेरित करते हैं। व्यक्ति को नैतिकता, अंिहंसा और परोपकार का उपदेश तो सभी गुरु देते हैं पर उसके लिये प्रेरित करने का उनके पास कोई उपाय नहीं होता। बस प्रवचनों में उनकी बात सुनो फिर भूल जाओ फिर सुनने आओ-यह क्रम चलता रहता है।

जब कोई व्यक्ति अपना दुःख लेकर ऐसे गुरुओं के पास पहुंचता है तो यही कहते हैं कि ‘जैसी परमात्मा की मर्जी। हमें तो बस यह संसार देखना है।’ आदमी अपने गुणों और अवगुणों का अध्ययन कर अपने कर्म का निर्णय करे ऐसा उपाय कोई नहीं बताता। अगर यह देह है तो आदमी अपने स्वाभाविक गुणों के वशीभूत कर कोई न कोई कर्म करेगा पर ज्ञानी परिणाम और स्थिति देखकर कदम बढ़ाते है जबकि सामान्य आदमी बिना सोचे समझे कर्मफल पर दृष्टि रखते हुए आगे बढ़ता है और फिर परेशान होता है। आत्म मंथन किये बिना मनुष्य जब आगे बढ़ता है तो उसे सफलता मिलना कठिन हो जाती है। आत्म मंथन से आशय यह है कि अपने अंदर मौजूद गुणों और अवगुणों का अवलोकन करते हुए अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिये। परमात्मा ने हमें कर्म करने की सारी शक्ति दी है इसलिये अपने कर्म की प्रेरणा के लिये उसकी तरफ ताकने की बजाय अपने गुणों के आधार पर लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिये। सच बात तो यह है कि परमात्मा ने जिन गुणों को स्वाभाविक रूप से हमें सौंपा है उन्हें वह चाहकर भी वापस नहीं ले सकता क्योंकि वह फल को प्रदान तो करता है पर कर्र्म का निर्धारण जीव को स्वयं ही करना है।
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