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Sunday, May 3, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-दुष्ट धनवान राज्य के लिये अग्नि के समान

आस्रावयेदुपचितान् साधु दुष्टऽव्रणनि।
आमुक्तास्ते च वतैरन् वह्मविव महीपती।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट व्रणों की तरह पके हुए धन से संपन्न असाधु पुरुष को निचोड़ लेना ही ठीक है वरना वह दुष्ट स्वभाव वाले अग्नि के समान राज्य के साथ व्यवहार कर उसे त्रस्त करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-धन कमाने के दो ही मार्ग है-एक प्राकृतिक व्यापार से और दूसरा अप्राकृतिक व्यापार। जिन लोगों के पास अप्राकृतिक व्यापार से धन आता है वह न केवल स्वयं दुष्ट प्रवृत्ति के होते हैं बल्कि दूसरों को भी अपराध करने के लिये उकसाते हैं। वह अवैध रूप से धन कमाने के लिये राज्य का ध्यान भटकाने के उद्देश्य से ऐसे अपराधियों को साथ रखते हैं जो उनकी इस काम में सहायता करें। अधिक धन से पके हुए ऐसे दुष्ट पुरुष राज्य के लिये आग के समान होते हैं भले ही वह प्रत्यक्ष रूप से समाज का हितैषी होने का दावा करते हैं पर अप्रत्यक्ष रूप से वह असामजिक तत्वों और अपराधियों की सहायता कर पूरे राज्य में कष्ट पैदा करते हैं। वैसे आजकल तो प्राकृतिक व्यापार और अप्राकृतिक व्यापार का अंतर ही नहीं दिखाई देता क्योंकि लोग दिखावे के लिये सफेद धंधा करते हैं पर उनको काला धंधा ही शक्ति प्रदान करता है। राज्य को चाहिये कि ऐसे लोगों पर दृष्टि रखते हुए उनको निचोड़ ले।
भले राज्य के प्रसंग में बात कही गयी है पर एक आम व्यक्ति के रूप में भी ऐसे धनिकों से सतर्क रहना चाहिये जो अप्राकृतिक और काला व्यापार करते हैं। ऐसे लोग धन कमाकर अहंकार के भाव को प्राप्त हो जाते हैं। इनसे संपर्क रखना मतलब आपने लिये आफत मोल लेना है। वह अपना उद्देश्य से कभी भी उपयोग कर किसी भी व्यक्ति को संकट में डाल सकते हैं। इतना ही नहीं संबंध होने पर अगर किसी काम के लिये मना किया जाये तो वह उग्र होकर बदला भी लेते हैं। उनके लिये स्त्री हो या पुरुष पर काम निकालते हुए वह उसे केवल एक वस्तु या हथियार ही समझते हैं। अपना काम न करने पर पूरे परिवार के लिये अग्नि के समान व्यवहार करते हैं। धन देकर काम लेकर ही यह संतुष्ट नहीं होते बल्कि आदमी को अपना गुलाम समझकर उसे त्रास भी देते हैं।
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Tuesday, April 28, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-अपमान की क्रोधाग्नि में जल रही सेना युद्ध योग्य नहीं होती

अमानितं हिं युध्येत कृतमानार्थसंग्रहम्।
न विमानितम्तर्थ प्रदीप्तक्रोपावकम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस सेना का अपमान हुआ हो वह सम्मान पाने के लिये युद्ध कर सकती है पर जो अपमान की क्रोधाग्नि में जल रही हो वह युद्ध के योग्य नहीं होती।
परिश्रान्तं हि युध्येत विश्रान्तं सुविधानतः।
दुरार्यार्तहतप्राणं न शस्त्रग्रहणमम्।।
हिंदी में भावार्थ-
बाध्यता हो तो थक गया आदमी भी युद्ध कर सकता है पर विश्राम करने के बाद उसकी क्षमता बढ़ जाती है और वह विधिपूर्वक युद्ध कर सकता है। बहुत लंबी दूरी तय कर आया व्यक्ति तो शस्त्र भी नहीं ग्रहण कर सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कौटिल्य का अर्थशास्त्र केवल भूमिपति राजाओं के लिये नहीं लिखा गया बल्कि घर परिवारों और व्यवसायों के राजाओं के लिये भी उसमें सीखने लायक है क्योंकि जहां तक आचरण, व्यवहार और नैतिकता की बात है तो हर प्रकार के स्वामी को आदर्श प्रस्तुत करना चाहिये। यहां राजाओं के लिये जहां यह संदेश है कि वह अपने सैनिकों की मनोदशा को समझें वही स्वामित्व धारण करने वाले सामान्य लोगों को भी यही समझाया जा रहा है कि वह अपने शासितों के प्रति सहानुभूति दिखायें।
कोई अनुचर अपना सम्मान बचाने के लिये स्वामी के कार्य को संपन्न करने का प्रयास कर सकता है अगर वह अपमान के कारण क्रोध में जल रहा है तो यह किसी भी कार्य को सही ढंग से संपन्न नहीं कर सकता। अगर अधिकारी ने अपने अधीनस्थ का अपमान उसे नकारा बताकर किया है तो फिर उसे यह आशा नहीं करना चाहिये कि वह ठीक ढंग से अंजाम देगा। अगर फिर भी उसे कार्य करने के बाध्य किया गया तो वह उसे उल्टा पुल्टा कर सकता है। उसी तरह अगर अधीनस्थ को विश्राम देकर काम करने दें तो वह बेहतर ढंग से उस कार्य को कर सकता है। कार्य पर तत्काल उपस्थित हुए अधीनस्थ को पहले सांस लेने दें फिर उसे काम सौंपे। वैसे देखा जाये तो यह कुशल प्रबंधन का एक तरीका है।
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Sunday, November 16, 2008

मनुस्मृति:निर्धारित वजन से कम वस्तुएं न बेचें

नान्यदन्येन संसृष्टरूपं विक्रयमर्हति
न चासारं न च न्यून न दूरेण तिरोहितम्

हिंदी में आशय -मनुष्य किसी विशेष वस्तु के बदले किसी दूसरी वस्तु, सड़ी गली, निर्धारित वजन से कम, केवल दूर से ठीक दिखने वाली तथा ढकी हुई वस्तु न बेचे। विक्रेता को चाहिये कि वह ग्राहक को अपनी वस्तु की स्थिति ठीक बता दे।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-ऐसा लगता है कि आजकल धर्म के प्रति लोग इसलिये भी अधिक आकर्षित हो रहे हैं क्योंकि उनके नित्य कर्म में अशुद्धता का बोध उन्हें त्रस्त कर देता है। वह न केवल अपने ही कर्मों से असंतुष्ट हैं बल्कि दूसरे के अपने प्रति किया गया व्यवहार भी उन्हें खिन्न कर देता हैं। अब यह तो संभव नहीं है कि हम स्वयं बेईमानी का व्यवहार करते हुए दूसरों से ईमानदारी की आशा करें। नौकरी और व्यापार में कहीं न कहीं झूठ और बेईमानी करनी ही पड़ती है-यह सोचना अपने आपको धोखा देना है। दूसरे की बेेईमानी तो सभी को दिखती है अपना कर्म किसी ज्ञानी को ही दिखाई देता है। धन तो सभी के पास आता जाता है पर कुछ लोगों को धन का लोभ अनियंत्रित होकर उन्हें बेईमानी के रास्ते पर ले जाता है।

त्यौहारों के अवसर पर जब बाजार में मांग बढ़ती है तब दूध में मिलावट की बात तो होती थी पर अब तो सिंथेटिक दूध बिकने लगा है कि जिसका एक अंश भी शरीर के लिये सुपाच्य नहीं है अर्थात जो पेट में जाकर बैठता है तो फिर वहां पर बीमारी पैदा किये बिना नहीं रहता। तय बात है कि आदमी को डाक्टर के पास जाना है। दूध ऐसा जिसे दूध नहीं कहा जा सकता है मगर बेचने वाले बेच रहे है। कई जगह बड़े व्यापारी जानते हुए भी उसे खरीदकर खोवा बना रहे हैं। हलवाई मिठाई बनाकर बेचे रहे है। फिर जब दीपावली का दिन आता है तो भगवान श्रीनारायण और लक्ष्मी की मूर्तियां सजाकर अपने व्यवसायिक स्थानों की पूजा कर अपने धर्म का निर्वाह भी करते हैं। एसा पाखंड केवल इसी देश में ही संभव है। नकली दूध तथा अन्य वस्तुऐं बेचने वाले व्यापारी रौरव नरक के भागी बनते हैं यह बात मनुस्मृति में स्पष्ट की गयी है। मनु द्वारा स्थापित धर्म को मानने वाले उनकी पूजा भी करते हैं पर उनके ज्ञान को धारण नहीं करते।

धर्म का आशय यही है कि हमारे आचार, विचार और व्यवहार में शुद्धता होना चाहिये। यह भ्रम नहीं रखना चाहिये कि ईमानदारी से इस संसार में काम नहीं चलता। नकली और विषैली वस्तुयें बेचना पाप है यही सोचकर अपना व्यापार करना चाहिये।
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Thursday, October 23, 2008

संत कबीर सन्देश:अपने निज कर्मों को ही धर्म समझना भ्रम

‘कबीर’ मन फूल्या फिरै, करता हूं मैं ध्रंम
कोटि क्रम सिरि ले चल्या, चेत न देखै भ्रम

संत शिरोमणि कबीर दास जी कहते हैं कि आदमी अपने सिर पर कर्मकांडों का बोझ ढोते हुए फूलता है कि वह धर्म का निर्वाह कर रहा है। वह कभी अपने विवेक का उपयोग करते हुए इस बात का विचार नहीं करता कि यह उसका एक भ्रम है।
त्रिज्ञणा सींची ना बुझै, दिन दिन बधती जाइ
जवासा के रूष ज्यूं, घण मेहां कुमिलाइ


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मन में जो त्रृष्णा की अग्नि कभी बुझती नहीं है जैसे उस पर पानी डालो वैसे ही बढ़ती जाती है। जैसे जवासे का पौधा भारी वर्षा होने पर भी कुम्हला जाता है पर फिर हरा भरा हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-संत कबीरदास जी ने अपने समाज के अंधविश्वासों और कुरीतियों पर जमकर प्रहार किये हैं। कितने आश्चर्य की बात है कि अनेक संत और साधु उनके संदेशों को ग्रहण करने का उपदेश तो देते हैं पर समाज में फैले अंधविश्वास और कर्मकांडों पर खामोश रहते हैं। आदमी के जन्म से लेकर मृत्यु तक ढेर सारे ऐसे कर्मकांडों का प्रतिपादन किया गया है जिनका कोई वैज्ञानिक तथा तार्किक आधार नहीं है। इसके बावजूद बिना किसी तर्क के लोग उनका निर्वहन कर यह भ्रम पालते हैं कि वह धर्म का निर्वाह कर रहे हैं। किसी कर्मकांड को न करने पर अन्य लोग नरक का भय दिखाते हैं यह फिर धर्म भ्रष्ट घोषित कर देते हैं। इसीलिये कुछ आदमी अनचाहे तो कुछ लोग भ्रम में पड़कर ऐसा बोझा ढो रहे हैं जो उनके दैहिक जीवन को नरक बनाकर रख देता है। कोई भी स्वयं ज्ञान धारण नहीं करता बल्कि दूसरे की बात सुनकर अंधविश्वासों और रूढि़यों का भार अपने सिर पर सभी उसे ढोते जा रहे हैं। इस आर्थिक युग में कई लोग तो ऋण लेकर ऐसी परंपराओं को निभाते हैं और फिर उसके बोझ तले आजीवन परेशान रहते हैं। इससे तो अच्छा है कि हम अपने अंदर भगवान के प्रति भक्ति का भाव रखते हुए केवल उसी कार्य को करें जो आवश्यक हो। अपना जीवन अपने विवेक से ही जीना चाहिए।
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Tuesday, October 7, 2008

संत कबीर संदेशः भक्ति की कसौटी पर कच्चे लोग खरे नहीं उतरते

संत कबीरदास जी के अनुसार
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खरी कसौटी राम की, काचा टिकै न कोय
राम कसौटी जे सहै, जीवत मिरतक होय

भगवान श्री राम की भक्ति ही एक कसौटी है जिस पर कोई कच्चा आदमी नहीं टिक सकता। जो भगवान श्रीराम की भक्ति पर कसौटी पर खरा उतरता है वह व्यक्ति इस देह के अहंकार से परे हो जाता है अर्थात जीवन धारण करते हुए भी मृतक समान हो जाता है।

कांच कथीर अधीर नर, ताहि न उपजै प्रेम
कहैं कबीर कसनी सहै, कै हीरा कै हेम


कंकड़ के समान कठोर हृदय वाले व्यक्ति के मन में कभी प्रेम नहीं उपजता है। कसनी तो हीरा या सोना सहता है अर्थात प्रेम की कसौटी पर तो सच्चे भक्त ही ठहर पाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वैसे तो कबीरदास जी के समय भी इस समाज में पाखंड कम नहीं था पर आज तो भक्ति और आस्था के नाम पर इसका विकृत रूप सामने आता जा रहा है। लोग भगवान का नाम भजनों में ऐसे लेते हैं जैसे कि उनकी उसमें बहुत श्रद्धा है पर हकीकत में केवल सभी भक्ति के नाम पर व्यापार या मनोरंजन करते हैंं। भगवान के नाम पर तमाम तरह के प्रदर्शन का आयोजन करने के लिये भक्तों से चंदा वसूला जाता है। भगवान के नाम पर अनेक आयोजन कर अपने आपको भक्त साबित करने वाले लोगों की कमी नहीं है। अनेक जगह भगवान के विभिन्न स्वरूपों की मूर्तियां स्थापित कर उनको भजने के लिये जो शोर मचाया जाता है वह सब दिखावा है। भक्ति एक तरह से व्यापार,प्रदर्शन और मनोरंजन के रूप में दिखाई देने लगी है।
सच्चा भक्त न तो अपनी भक्ति का प्रदर्शन करता है और न प्रचार। भक्ति साधना तो एकांत का विषय है। जो लोग दिखाते हैं उनकी कोई आस्था नहीं रह जाती। अपने मन की मुराद पूरी करने के लिये कभी किसी मंदिर की पूजा करते हैं तो दूसरी ओर किसी सिद्ध के यहां भी मत्था टेकते हैं। अनेक ढोंगी गुरुओं के यहां मत्था टेककर यह आशा करते हैं कि वह भगवान के दर्शन करा देंगे। इस तरह के लोग भक्ति की कसौटी पर नाकाम सिद्ध होते हैं। जिनके मन में सच्ची भक्ति का भाव है वह कभी दिखावा नहीं करते बल्कि एकांत में ही नाम का स्मरण कर अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं।
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