समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Showing posts with label kabir sandesh. Show all posts
Showing posts with label kabir sandesh. Show all posts

Thursday, October 30, 2008

संत कबीर संदेशः भक्ति कभी निष्फल नहीं जाती

भक्ति बीज पलटै नहीं जो जुग जाय अनन्त
ऊंच नीच घर अवतरै, हो संत का अन्त


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य द्वारा की गयी निष्काम भक्ति कभी व्यर्थ नहीं जाती। भक्त चाहे जिस जाति या वर्ण को हो और लोग उनमें भी ऊंच नीच का भेद भले ही करें पर परमात्मा का हर सच्चा भक्त तो संत ही होता है।

भक्ति भाव भादौं नदी, सबै चली घहराय
सरिता सोई सराहिये, जेठ मास ठहराय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो लोग भादों में बहने वाली नदी की तरह केवल विशेष समय पर ही भक्ति करते हैं उनको भक्त नहीं माना जा सकता। जो लोग हर समय भक्ति में लीन रहते हैं वही सच्चे भक्त है क्योंकि वह उसी नदी की तरह पूज्यनीय हैं जो जेठ माह में जल प्रदान करती है जब प्रथ्वी पर जल की कमी हो जाती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-कई लोग ऐसे हैं जो अपनी मनोकामनायें लेकर धार्मिक स्थलों पर जाते हैं। वह यह प्रण करते हैं कि अमुक काम होने पर वह फिर आयेंगे। या फिर घर बैठे ही तय करते हैं कि यह इच्छा पूरी हो जाये तो अमुक धार्मिक स्थान पर जाकर दर्शन करेंगे। यह भक्ति नहीं बल्कि अपने आपको ही धोखा देना है। इस मायावी संसार में अगर मनुष्य ने जन्म लिया है तो उसे अनेक काम तो स्वतः ही पूरे हो जाते हैं क्योंकि करतार तो कोई और है पर मनुष्य अपने होने का भ्रम पाल लेता है। ऐसी कामनायें और इच्छा पूरी होने पर वह दर्शन करने ऐसे जाता है जैसे कि वह परमात्मा को फल दे रहा हो। ऐसी भक्ति केवल नाटक बाजी तो आजकल अधिक देखने को मिलती है। यह भक्ति नहीं है क्योंकि कामनाओं का क्या? एक पूरी होती है तो दूसरे जन्म लेती है। भक्ति तो निष्काम होती है और आदमी का समय अच्छा या बुरा हो वह उसे नहीं छोड़ता।
उसी तरह मनुष्य भले ही जात पांत या धर्म का भेद करता है पर जो भी परमात्मा की निष्काम भक्ति करता है वह संत है।
----------------------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.शब्दलेख सारथि
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Tuesday, October 7, 2008

संत कबीर संदेशः भक्ति की कसौटी पर कच्चे लोग खरे नहीं उतरते

संत कबीरदास जी के अनुसार
------------------------------
खरी कसौटी राम की, काचा टिकै न कोय
राम कसौटी जे सहै, जीवत मिरतक होय

भगवान श्री राम की भक्ति ही एक कसौटी है जिस पर कोई कच्चा आदमी नहीं टिक सकता। जो भगवान श्रीराम की भक्ति पर कसौटी पर खरा उतरता है वह व्यक्ति इस देह के अहंकार से परे हो जाता है अर्थात जीवन धारण करते हुए भी मृतक समान हो जाता है।

कांच कथीर अधीर नर, ताहि न उपजै प्रेम
कहैं कबीर कसनी सहै, कै हीरा कै हेम


कंकड़ के समान कठोर हृदय वाले व्यक्ति के मन में कभी प्रेम नहीं उपजता है। कसनी तो हीरा या सोना सहता है अर्थात प्रेम की कसौटी पर तो सच्चे भक्त ही ठहर पाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वैसे तो कबीरदास जी के समय भी इस समाज में पाखंड कम नहीं था पर आज तो भक्ति और आस्था के नाम पर इसका विकृत रूप सामने आता जा रहा है। लोग भगवान का नाम भजनों में ऐसे लेते हैं जैसे कि उनकी उसमें बहुत श्रद्धा है पर हकीकत में केवल सभी भक्ति के नाम पर व्यापार या मनोरंजन करते हैंं। भगवान के नाम पर तमाम तरह के प्रदर्शन का आयोजन करने के लिये भक्तों से चंदा वसूला जाता है। भगवान के नाम पर अनेक आयोजन कर अपने आपको भक्त साबित करने वाले लोगों की कमी नहीं है। अनेक जगह भगवान के विभिन्न स्वरूपों की मूर्तियां स्थापित कर उनको भजने के लिये जो शोर मचाया जाता है वह सब दिखावा है। भक्ति एक तरह से व्यापार,प्रदर्शन और मनोरंजन के रूप में दिखाई देने लगी है।
सच्चा भक्त न तो अपनी भक्ति का प्रदर्शन करता है और न प्रचार। भक्ति साधना तो एकांत का विषय है। जो लोग दिखाते हैं उनकी कोई आस्था नहीं रह जाती। अपने मन की मुराद पूरी करने के लिये कभी किसी मंदिर की पूजा करते हैं तो दूसरी ओर किसी सिद्ध के यहां भी मत्था टेकते हैं। अनेक ढोंगी गुरुओं के यहां मत्था टेककर यह आशा करते हैं कि वह भगवान के दर्शन करा देंगे। इस तरह के लोग भक्ति की कसौटी पर नाकाम सिद्ध होते हैं। जिनके मन में सच्ची भक्ति का भाव है वह कभी दिखावा नहीं करते बल्कि एकांत में ही नाम का स्मरण कर अपने कर्तव्य का निर्वाह करते हैं।
------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथि’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग शब्दलेख सारथि
1.दीपक भारतदीप की शब्द लेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

विशिष्ट पत्रिकायें