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Wednesday, March 23, 2011

व्यसनों में लिप्त होने की इच्छा पतन का कारण-हिन्दी धार्मिक चिंत्तन (vyasan ki iccha patan ka karan-hindi dharmik chittan)

हमारे देश में बढ़ते आर्थिक विकास के साथ ही व्यसनों की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। कितनी हैरानी की बात है कि हम दावा करते हैं कि देश में शिक्षा का विकास हुआ है पर यह नहीं दिखाई देता कि लोगों की की ज्ञान तथा चिंतन क्षमता का भी बुरी तरह ह्रास  हुआ है। सिगरेट के पैकेट पर लिखा रहता है कि ‘सिगरेट पीना स्वास्थ्य के लिये हानिकारक है’, लोग इसे पहले तो पढ़ते नहीं और पढ़ते हैं तो उसे धूंऐं की तरह अपने दिमाग से उड़ा देते हैं। शराब की बोतल पर लिखा मिलता है कि ‘शराब पीना स्वास्थ्य के लिये खतरनाक है’, पर दिन प्रतिदिन उसका सेवन बढ़ता जा रहा है। शादी जैसे सामाजिक कार्यक्रमों के साथ ही त्यौहार के अवसर पर शराब का व्यसन अब फैशन बन गया है। कहां तो पहले यह स्थिति थी कि लोग शराब पीने वाले से ही नहीं बल्कि सिनेमा देखने वाले लड़के के साथ अपनी बेटी का ब्याह करना पसंद नहीं करते थे और कहां अब यह स्थिति अब पूरा समाज ही इसे फैशन मानकर मद में लिप्त हो रहा है।
इस विषय पर कौटिल्य महाराज कहते हैं कि
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स्निग्धदीपशिखालोकविलेभितक्लिोचनः।
मृत्युमृच्छत्य सन्देहात् पतंगः सहसा पतन्।।
"दीपक की स्निग्ध शिखा के दर्शन से जिस पतंगे के नेत्र ललचा जाते हैं और वह उसमें जलकर जान देता है। यह रूप का विषय है इसमें संदेह नहीं है।"
गन्धलुब्धो मधुकरो दानासवपिपासया।
अभ्येत्य सुखसंजवारां गजकर्णझनज्झनाम्
"गंध की वजह से लोभी हो चुका मद रूपी आसव पीने की इच्छा करने वाला भंवरा सुख का अनुभव कराने वाली झनझन ध्वनि हाथी के कान के समीप जाकर मरने के लिये ही करता है।"

हैरानी इस बात की है कि हमारे देश में समाज पर नैतिक तथा धार्मिक रूप से नियंत्रण करने वाले शिखर पुरुष स्वयं ही ऐसे कामों में लिप्त हो जाते हैं जो पारंपरिक रूप से वर्जित हैं। उनकी देखा देखी छोटे लोग भी उसका अनुसरण करते हैं। शराब, जुआ, परस्त्रीमगन तथा सट्टे की प्रवृत्ति के दुष्परिणाम होते हैं पर देश में जिन लोगों को धन पचाने की शक्ति नहीं है वह व्यसनों की तरफ चले जाते हैं। धन का मजा व्यसन से जुड़ने पर ही होता है-ऐसा उनका मानना है। यही कारण है कि धन चूक जाने पर ऐसे व्यसनी अपरहण तथा हत्या जैसे कुत्सित कार्य में लिप्त हो जाते हैं। जिनको अवसर नहीं मिलता वह आत्महत्या कर लेते है। कहने को हम लोग रौशनी में पतंगे के जल मरने या मौत आने पर गीदड़ के शहर में घुसने की बातें करते हैं पर सच यह है कि यह इंसानों को समझाने के लिये ही कही गयी हैं।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Saturday, July 25, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-कार्य के होते हैं तीन व्यसन (kautilya ka arthshastra-karya ke teen vyasan)

वस्तुध्वशक्येषु समुद्यनश्चेच्छक्येषु मोहादसमुद्यश्मश्च।
शक्येषु कालेन समुद्यनश्व त्रिघैव कार्यव्यसनं वदंति।।
हिंदी में भावार्थ-
शक्ति से परे वस्तु को प्राप्त करने का प्रयास करना, प्राप्त होने योग्य वस्तु के लिये उद्यम न करना , और तथा शक्ति होते हुए भी शक्य वस्तु की प्राप्ति के लिये समय निकल जाने पर प्रयास करना-यह कार्य के व्यसन हैं।
द्रोहो भयं शश्वदुपक्षणंव शीतोष्णवर्षाप्रसहिष्णुता च।
एतानि करले समुपहितानि कुर्वन्त्यवश्यं खलु सिद्धिविघ्नम्
हिंदी में भावार्थ-
द्रोह, डर, उपेक्षा, सर्दी,गमी, तथा वषा का अधिक होना कार्यसिद्धि समय पर होने मेें बाधा अवश्य उत्पन्न करते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जब भी हम अपने जीवन में कोई लक्ष्य निर्धारित करते हैं तो उस समय अपनी शक्ति का पूर्वानुमान करना चाहिये। उसी तरह कोई योजना बनाकर कोई वस्तु प्राप्त करते हैं तो उस समय अपने आर्थिक, सामाजिक, तथा पारिवारिक स्त्रोतों की सीमा पर भी विचार कना चाहिये। अपने सामथ्र्य से अधिक वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति का प्रयास एक तरह का व्यसन ही है।
उसी तरह किसी वस्तु या लक्ष्य का अवसर पास आने पर उसकी उपेक्षा कर मूंह फेर लेना भी एक तरह का व्यसन है। अगर कोई कार्य हमारी शक्ति की परिधि में है तो उसे अवश्य करना चाहिये। जीवन में सतत सक्रिय रहना ही मनुष्य जीवन को आनंद प्रदान करता है। अगर किसी उपयोगी वस्तु या लक्ष्य की प्राप्ति का अवसर आता है तो उसमें लग जाना चाहिये।
कोई वस्तु हमारी शक्ति के कारण प्राप्त हो सकती है पर हम उसकी यह सोचकर उपेक्षा कर देते हैं कि यह हमारे किस काम की! बाद में पता लगता है कि उसका हमारे लिये महत्व है और उसे पाने का प्रयास करते हैं। यह भी एक तरह का व्यसन है। हमें अपने जीवन में उपयोग और निरुपयोगी वस्तुओं और लक्ष्यों का ज्ञान होना चाहिये। कई बार कोई चीज हमें उपलब्ध होती है पर धीरे धीरे उसकी मात्रा काम होती है। उसका संग्रह का उपस्थित होने पर उसका विचार नहीं करते-यह सोचकर कि वह तो भंडार में है पर बाद में पता लगता है कि यह अनुमान गलत था। यह वैचारिक आलस्य का परिणाम जीवन में कष्टकारक होता है।
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Sunday, July 5, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-जीवन में कभी आलस्य न करें (kautilya ka arthshastra)

भोक्तं पुरुषकारेण दृष्टसित्रयमिव वियम्।
व्यवसायं सदैवेच्छेन्न हि कलीववदाचरेत्।।
हिंदी में भावार्थ-
दुष्ट स्त्री के समान धन पाने की इच्छा यानि लक्ष्मी को पुरस्कार से भोगने के लिये सदा उद्योग करते रहें। कभी आलस्य न करें।
प्रयत्नप्रेर्यर्वमणेन महता चितहस्तिना।
रूढ़वैरिद्रु मोत्खतमकृत्देव कुतः सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
चित्त रूपी हाथी को अपने नियंत्रण में करने के प्रयास के साथ ही वैर रूपी वृक्ष को उखाउ़ फैंके बिना भला सुख कहां प्राप्त हो सकता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह सच है कि जीवन में मानसिक शांति के लिये अध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है पर दैहिक आवश्यकताओं की पूर्ति और सांसरिक दायित्वों के निर्वहन के लिये धन की आवश्यकता होती है। इसकी प्राप्ति के लिये भी उद्योग करना चाहिये। कभी जीवन में आलस्य न करें। भगवान श्री कृष्ण ने भी गीता में यही कहा है कि अपने सांसरिक कर्म करते हुए भक्ति करने के साथ ही ज्ञान प्राप्ति का प्रयास करें। निष्काम कर्म का श्रीगीता में आशय अक्सर गलत बताया जाता है। सच तो यह है उसमें धन की उपलिब्धयों को फल नहीं माना गया बल्कि उनसे तो सांसरिक कार्य का ही हिस्सा कहा जाता है। अपने परिश्रम से जो धन प्राप्त होता है उससे हम दूसरे दायित्वों का निर्वहन करते हैं। वह अपने साथ नहीं ले जाते इसलिये उसे फल नहीं मानना चाहिये। सांसरिक कार्य के लिये धन जरूरी है और उसी से ही दान और यज्ञ भी किये जाते हैं।

इसके अलावा अपने मन में दूसरे की भौतिक उपलब्धियां देखकर निराशा या बैर नहीं पालना चाहिये। हमारे मानसिक दुःख का कारण यही है कि हम दूसरों के प्रति अनावश्यक रूप से द्वेष और बैर पाल लेते हैं। उनसे अगर विरक्त हो जायें तो आधा दुःख तो वैसे ही दूर हो जाये।
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Tuesday, June 23, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उच्च पद पर बने रहने की चिंता आदमी को निम्नकोटि का बना देती है

उच्चेरुच्चस्तरामिच्छन्पदन्यायच्छतै महान्।
नवैनींचैस्तरां याति निपातभयशशकया।।
हिंदी में भावार्थ-
जीवन में ऊंचाई प्राप्त करने वाला व्यक्ति महान पद् पर तो विराजमान हो जाता है पर उससे नीचे गिरने की भय और आशंका से वह नैतिक आधार पर नीचे से नीचे गिरता जाता है।
प्रमाणश्चधिकश्यापि महत्सत्वमधष्ठितः।
पदं स दत्ते शिरसि करिणः केसरी यथा।।
हिंदी में भावार्थ-
प्रमाणित योग्यता से अधिक पद की इच्छा करने वाला व्यक्ति भी उस महापद पर विराजमान हो जाता है उसी प्रकार जैसे सिंह हाथी पर अधिष्ठित हो जाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-समाज के सभी क्षेत्रों में शिखर पर विराजमान पुरुषों से सामान्य पुरुष बहुत सारी अपेक्षायें करते हैं। वह उनसे अपेक्षा करते हैं कि आपात स्थिति में उनकी सहायता करें। ज्ञानी लोग ऐसी अपेक्षा नहीं करते क्योंकि वह जानते हैं कि शिखर पर आजकल कथित बड़े लोग कोई सत्य या योग्यता की सहायता से नहीं पहुंचते वरन कुछ तो तिकड़म से पहुंचते हैं तो कुछ धन शक्ति का उपयोग करते हुए। ऐसे लोग स्वयं ही इस चिंता से दीन अवस्था में रहते हैं कि पता नहीं कब उनको उस शिखर से नीचे ढकेल दिया जाये। चूंकि उच्च पद पर होते हैं इसलिये समाज कल्याण का ढकोसला करना उनको जरूरी लगता है पर वह इस बात का ध्यान रखते हैं कि उससे समाज का कोई अन्य व्यक्ति ज्ञानी या शक्तिशाली न हो जाये जिससे वह शिखर पर आकर उनको चुनौती दे सके। उच्च पद या शिखर पर बैठे लोग डरे रहते हैं और डर हमेशा क्रूरता को जन्म देता है। यही क्रूरता ऐसे शिखर पुरुषों को निम्न कोटि का बना देती है अतः उनमें दया या परोपकार का भाव ढूंढने का प्रयास नहीं करना चाहिए।
यही हाल उन लोगों का भी है जिनको योग्यता से अधिक सम्मान या पद मिल जाता है। मायावी चक्र में सम्मान और पद के भूखे लोगों से ज्ञानी होने की आशा करना व्यर्थ है। उनको तो बस यही दिखाना है कि वह जिस पद पर हैं वह अपनी योग्यता के दम पर हैं और इसलिये वह बंदरों वाली हरकतें करते हैं। अपनी अयोग्यता और अक्षमता उनको बहुत सताती है इसलिये वह बाहर कभी मूर्खतापूर्ण तो कभी क्रूरता पूर्ण हरकतें कर समाज को यह दिखाने का प्रयास करते हैं कि वह योग्य व्यक्ति हैं। ऐसे लोगों की योग्यता को अगर कोई चुनौती दे तो वह उसे अपने पद की शक्ति दिखाने लगते हैं। अपनी योग्यता से अधिक उपलब्धि पाने वाले ऐसे लोग समाज के विद्वानों, ज्ञानियों और सज्जन पुरुषों को त्रास देकर शक्ति का प्रदर्शन करते हैं। वह अपने मन में अपनी अयोग्यता और अक्षमता से उपजी कुंठा इसी तरह बाहर निकालते हैं। अतः जितना हो सके ऐसे लोगों से दूर रहा जाये। कहा भी जाता है कि घोड़े के पीछे और राजा के आगे नहीं चलना चाहिये।
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Friday, May 22, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मोहवश किये गये कार्य की नाकामी बनती है तनाव का कारण

प्रारब्धानि यथाशास्त्रं कार्याण्यासनबुद्धिभिः।
बनानीय मनोहारि प्रयच्छन्त्यचिसत्फलम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जिस कार्य को शास्त्रों के अनुसार बुद्धिपूर्वक संपन्न करने का प्रयास किया जाता है वह शीघ्र फल दिलाने वाले होते हैं।
सम्यगारभ्यमानं हि कार्ये यद्यपि निष्फलम्।
न तत्तथा तापयपि यथा मोहसनीहितम्।।
हिंदी में भावार्थ-
भली प्रकार प्रारंभ किया कोई काम या अभियान निष्फल भी हो जाये तो उससे मन को कष्ट नहीं होता जैसा कि मोह या अभिमान के वशीभूत होकर करने से होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-अपने जीवन में कोई उद्देश्य निर्धारित करने से पहले उसका सही स्वरूप, अपने सामथ्र्य तथा उससे प्राप्त होने वाले फल पर विचार कर लेना चाहिए। कोई व्यक्तिगत कार्य बिना किसी उद्देश्य के केवल इसलिये नहीं प्रारंभ करना चाहिए कि उसके न करने से अपने परिवार, रिश्तेदार या मित्र समूह में प्रतिष्ठा खराब होगी। यह भ्रम हैं। अगर हमें कार नहीं चलाना आता तो केवल इसलिये दिखाने के लिये उसे चलाने का प्रयास नहीं करना चाहिए कि किसी व्यक्ति ने हमको चुनौती दी है या किसी के सामने अपनी कला का अनावश्यक प्रदर्शन करना है। अगर आप देश में दुर्घटनाओं का अवलोकन करें तो पायेंगे कि उसमें अधिकतर शिकार लोग अपने सामथ्र्य से अधिक कार्य करने के लिये प्रेरित होने के कारण कष्ट में आये।

तात्पर्य यह है कि अपना दिमागी संतुलन बनाये रखना चाहिए। किसी छोटे या बड़े काम को पूरी तरह से विचार कर प्रारंभ करना चाहिए। ऐसे काम में नाकाम होने पर भी दुःख नहीं होता। तब हमें इस बात का अफसोस नहीं होता कि हमने अपने कर्म में कोई कमी की। अगर बिना विचारे काम प्रारंभ किये जाते हैं तो उनमें शक्ति भी अधिक खर्च होती है और उनमें नाकामी मन को बहुत परेशान भी कर देती है।
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