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Saturday, June 25, 2011

चाणक्य नीति-आचरण में ज्ञान न दिखे वह निरर्थक (acharan aur gyan-chankya neeti)


       आजकल देश में धन की अधिकता के कारण धार्मिक कार्यक्रम अधिक ही होते हैं। इन कार्यक्रमों पर काला या सफेद चाहे जो भी धन खर्च होता है इस पर हम टिप्पणी नहीं करेंगे पर इनकी तादाद देखते हुए तो यह लगता है कि हमारा देश विश्व में एक आदर्श होना चाहिए पर बढ़ते अपराध, भ्रष्टाचार, व्याभिचार तथा अहंकार को देखते हुए यह नहीं लगता कि किसी को हमसे नैतिकता का उपदेश लेना चाहिए। इसका सीधा मतलब है कि लोग ज्ञान चर्चा करते हैं तो केवल यह दिखाने के लिये कि उनकी मनुष्य देह के अंदर भी एक मनुष्य है। धार्मिक सत्संग वाणी विलास तथा मनोरंजन के रूप में होते हैं। गीत संगीत और काव्य से सजे सत्संग मजा जरूर देते हैं पर उनसे ज्ञान प्राप्त नहीं होता। गीत और भजन में अब कोई अंतर नहीं दिखता। लोग यह दिखाने के लिये अधिक प्रयत्नशील हैं कि वह धर्मभीरु हैं पर आचरण पर उनके ज्ञान की छाया नहीं दिखती।
       इस विषय पर महर्षि चाणक्य अपनी नीति में कहते हैं कि
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           हतं ज्ञानं क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नरः।
         हतं निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष्टा ह्यभर्तृकाः।।
       ‘‘अगर मनुष्य के पास ज्ञान है पर उसे आचरण में नहीं लाता तो वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष का जीवन निरर्थक है। अज्ञानी पुरुष हमेशा असफल रहता है। उसी तरह सेनापति रहित सेना और स्वामीरहित स्त्रियां नष्ट हो जाती हैं।"
           विकास के नाम पर विनाशलीला अपना रूप दिखा रही है। अपराधों के समाचारों को देखते हुए तो ऐसा लगता है कि जिस हम संस्कृति की बात करते हैं वह कभी की लुप्त हो गयी है। सामाजिक और पारिवारिक रिश्ते नाम के लिये हो गये हैं। धन हैं तो वह भी निभा लो नहीं तो भूल जाओ। पाश्चात्य सभ्यता को विकास का पर्याय माने लेने के बाद हमें भारतीय सस्कृति के प्रति मोह है पर अपनी स्वार्थ पूर्ति तक ही वह रहता है। कहने का अभिप्राय यह है कि ज्ञान हमारे पास खूब है पर आचरण में नहीं है इसलिये ही समाज अब टूटता जा रहा है। ऐसे में समूचे समाज को संबोधित कर उसे सुधरने का उपदेश देने से अच्छा है हम स्वयं आत्ममंथन करें और अपने आचरण सुधारे।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',ग्वालियर
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Saturday, June 5, 2010

अपने सदगुरु स्वयं बने-विश्व पर्यावरण दिवस पर विशेष लेख (apne sadguru svyan bane-paryavaran par lekh)

पर्यावरण के लिये कार्य करने पर माननीय जग्गी सद्गुरु को सम्मानित किया जाना अच्छी बात है। जब कोई वास्तविक धर्मात्मा सम्मानित हो उस पर प्रसन्नता व्यक्त करना ही चाहिए वरना यही समझा जायेगा कि आप स्वार्थी हैं।
आज विश्व में पर्यावरण दिवस मनाया जा रहा है। दरअसल इस तरह के दिवस मनाना भारत में एक फैशन हो गया है जबकि सच यह है कि जिन खास विषयों के लिये पश्चिम को दिन चाहिये वह हमारी दिनचर्या का अटूट हिस्सा है मगर हमारी वर्तमान सभ्यता पश्चिम की राह पर चल पड़ी है तो इनमें से कई दिवस मनाये जाना ठीक भी लगता है।
पर्यावरण की बात करें तो भला किस देश में इतने बड़े पैमाने पर तुलसी के पौद्ये को प्रतिदिन पानी देने वाले होंगे जितना भारत में है। इसके अलावा भी हर दिन लोग धार्मिक भावनाओं की वजह से पेड़ों पौद्यों पर पानी डालते हैं और वह बड़ी संख्या में है। यह बात जरूर है कि प्राकृतिक संपदा की बहुलता ने इस देश के लोगों को बहुत समय तक उसके प्रति लापरवाह बना दिया था पर जब जंगल की कमियों की वजह से पूरे विश्व के साथ विश्व में गर्मी का प्रकोप बढ़ा तो विशेषज्ञों के सतत जागरुक प्रयासों ने लोगों में चेतना ला दी और अधिकतर नयी बनी कालोनी में अनेक लोग पेड़ पौद्ये लगाने का काम करने लगे हैं-यह अलग बात है कि इसके लिये वह सरकारी जमीन का ही अतिक्रमण करते हैं और नक्शे में अपने भूखंड में इसके लिये छोड़ी गयी जमीन पर अपना पक्का निर्माण करा लेते हैं। प्रकृति के साथ यह बेईमानी है पर इसके बावजूद अनेक जगह पेड़ पौद्यों का निवास बन रहा है।
एक बात सच है कि हमारे जीवन का आधार जल और वायु है और उनका संरक्षण करना हमारा सबसे बड़ा धर्म है। एक पेड़ दस वातानुकूलित यंत्रों के बराबर वायु विसर्जित करता है यही कारण है गर्मियों के समय गांवों में पेड़ों के नीचे लोगों का जमघट लगता है और रात में गर्मी की तपिश कम हो जाती है। इसके अलावा गर्मियों में शाम को उद्यानों में जाकर अपने शरीर को राहत भी दिलाई जा सकती है। कूलर और वाताकुलित यंत्र भले ही अच्छे लगते हैं पर प्राकृतिक हवा के बिना शरीर की गर्मी सहने की क्षमता नहीं बढ़ती है। उनकी ठंडी हवा से निकलने पर जब कहीं गर्मी से सामना हो जाये तो शरीर जलने लगता है।
इसलिये पेड़ पौद्यों का संरक्षण करना चाहिए। सच बात तो यह है कि पर्यावरण के लिये किसी सद्गुरु की प्रतीक्षा करने की बजाय स्वयं ही सद्गुरु बने। कोई भी महान धर्मात्मा सभी जगह पेड़ नहीं लगवा सकता पर उससे प्रेरणा लेना चाहिए और जहां हम पेड़ पौद्ये लगा सकते हैं या फिर जहां लगे हैं वहां उनका सरंक्ष कर सकते हैं तो करना चाहिए। दरअसल पेड़ पौद्यों को लगाना, उनमें खिलते हुए फूलों और लगते हुए फलों को देखने से मन में एक अजीब सी प्रसन्नता होती है और ऐसा मनोरंजन कहीं प्राप्त नहीं हो सकता। इसे एक ऐसा खेल समझें जिससे जीवन का दांव जीता जा सकता है।
प्रसंगवश एक बात कहना चाहिए कि पेड़ पौद्यों से उत्पन्न प्राणवायु का सेवन तो सभी करते हैं पर उनको धर्म के नाम स्त्रियां ही पानी देती हैं। अनेक महिलाऐं तुलसी के पौद्ये में पानी देते देखी जाती हैं। वैसे अनेक पुरुष भी यही करते हैं पर उनकी संख्या महिलाओं के अनुपात में कम देखी जाती है। इससे एक बात तो लगती है कि पेड़ पौद्यो तथा वन संरक्षण का काम हमारे लिये धर्म का हिस्सा है यह अलग बात है कि कितने लोग इसकी राह पर चल रहे हैं। आजकल उपभोक्तावादी युग में फिर भी कुछ सद्गुरु हैं जो यह धर्म निभा रहे हैं और जरूरत है उनके रास्ते पर चलकर स्वयं सद्गुरु बनने की, तभी इतने बड़े पैमाने पर हो रहे पर्यावरण प्रदूषण को रोका जा सकता है। 
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
http://teradipak.blogspot.com

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Wednesday, January 6, 2010

संत कबीर के दोहे-सम्मान की चाहत बनती दुःख कारण (sant kabir ke dohe-samman ki chahat buri)

मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।

संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।
मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday, December 31, 2009

भर्तृहरि शतक-सच्चे तेजस्वी लोग दूसरों से ईर्ष्या नहीं करते (hindi dharama sandesh-tejsavi log aur eershaya)

सन्त्यन्येऽपि बृहस्पतिप्रभृतयः सम्भाविताः पञ्चषास्तान्प्रत्येष विशेष विक्रमरुची राहुनं वैरायते।

द्वावेव ग्रसते दिवाकर निशा प्राणेश्वरी भास्वरौ भ्रातः! पर्यणि पश्च दानवपतिः शीर्षवशेषाकृतिः।।

हिन्दी में भावार्थ-
आसमान में विचरने वाले बृहस्पति सहित पांच छह तेजवान ग्रह है लेकिन अपने पराक्रम में रुचि रखने वाला राहु उनसे ईष्र्या या बैर नहीं रखता। वह पूर्णिमा तथा अमास्या के दिन सूर्य और चंद्रमा को ग्रसित करता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-किसी भी व्यक्ति के गुण, ज्ञान और शक्ति की पहचान उसके लक्ष्य से होती है।  जिन लोगों को अपना  ज्ञान अल्प होते हुए सम्मान पाने का मोह होता है वह पूर्णता प्राप्त किये बिना ही अपना अभियान प्रारंभ करते हैं।  कहीं सम्मान तो कहीं धन पाने का मोह होने के कारण उनकी रुचि अपने ज्ञान, शक्ति या गुण से दूसरे को लाभ देने की बजाय अपना हित साधना होता है।  अल्पज्ञानी, धैर्य से रहित तथा मोह में लिप्त ऐसे लोग समय पड़ने पर आत्मप्रंवचना से भी बाज नहीं आते। उनका लक्ष्य किसी तरह दूसरे आदमी को प्रभावित कर उसे अपने चक्कर में फांसना होता है।

आजकल तो मायावी नायकों को ही असली नायक की तरह प्रचारित किया जाता है। ऐसे लोगों को देवता बनाकर प्रस्तुत किया जाता है जिन्होंने समाज में किसी का कल्याण करने की बजाय अपने लिये संपत्ति ही जुटाई है।  लोग भ्रमित हो जाते हैं कि क्या वाकई उनमें ऐसी कोई असाधारण बात है जो उनमें नहीं है।

इस संसार में माया को पाने का मोह रखने वाले दूसरे के भ्रम से ही कमाते हैं इसलिये अपने अंदर ज्ञान का होना जरूरी है ताकि उनकी चालों से विचलित न हों। जो वास्तव में तत्वज्ञानी, शक्तिशाली और गुणी हैं वह प्रदर्शन करने के लिये नहीं निकलते क्योंकि उनके पास ज्ञान, शक्ति और गुण संग्रह से ही अवसर नहीं मिलता। वह स्वयं बाहर निकल शिष्य ढूंढकर गुरु की पदवी से सुशोभित होने का मोह नहीं पालते। अक्सर लोग यह सवाल कहते हैं कि ‘आजकल अच्छे गुरु मिलते ही कहां है? अगर हैं तो हम उसे कैसे ढूंढें।’

उनहें भर्तृहरि महाराज के संदेश से प्रेरणा लेना चाहिए। उन्हें ऐसे व्यक्ति की तलाश करना चाहिये जो दूसरों की उपलब्धि से द्वेष न करते हुए अपने ही सृजन कार्य में लिप्त रहता हो। सम्मान और धन पाने के लिये लालच का मोह उसकी आंखों में दृष्टिगोचर नहीं होता।  वह गुरु बनने के लिये प्रचार नहीं करता।  उसका लक्ष्य तो केवल अपना जीवन मस्ती में जीने के साथ ही ज्ञान, शक्ति और गुण प्राप्त करने के लिये नियमित अभ्यास तथा परीक्षण करना होता है।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Wednesday, December 30, 2009

मनुस्मृति-धन और काम में आसक्ति से परे हो, वही सच्चा धार्मिक उपदेशक (sachcha sant-manu smriti in hindi)

अर्थकामेष्वसक्तनां धर्मज्ञानं विधीयते।
धर्म जिज्ञासमानाना प्रमाणं परमं श्रुतिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
महाराज मनु के अनुसार धर्म का उपदेश और प्रचार का काम केवल उन्हीं लोगों को करना चाहिए जो काम और अर्थ के विषय में आसक्त नहीं है। जिनकी काम और अर्थ में आसक्ति है उनकी धर्म में अधिक रुचि नहीं रहती। इसके अलावा उनको धर्म के उपदेश स्वयं ही समझ में नहीं आता इसलिये उनके वचन प्रमाणिक नहीं होते।
श्रुतिद्वेघं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मवुभोस्मृतौ।
उभावपि हि तौ धर्मो सम्यगुक्तौ मनाीषिभिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
वेदों में जहां किसी विषय पर आपस में विरोधी संदेश हों वहां पर संभव है कि संदर्भ के कारण अलग अलग अर्थ दिखते हैं पर ज्ञानी लोग इस बात समझते हैं और उनसे इस विषय में परामर्श करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनु महाराज का स्पष्ट मानना है कि जो धर्मोपदेश या प्रवचन आदि करते हैं उनको काम और अर्थ में रुचि नहीं दिखाना चाहिये। आजकल ऐसी संत परंपरा प्रचलन में आई है कि जिसमें मठाधीश स्वयं ही धन की उगाही कर कथित रूप से धर्मार्थ काम कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि एक संत को चाहिये कि वह जीवन रहस्यों से संबंधित विषयों पर ही अपनी बात अपने श्रोताओं के सामने रखे न कि उनकी सांसरिक समस्याओं को हल करे। बीमारी, गरीबी तथा अन्य घरेलू संकट आदमी के भौतिक परेशानी है और अगर उसका मन और शरीर स्वस्थ हो वह उनका सामना स्वयं ही कर सकता है। इसके लिये यह जरूरी है कि वह योग साधना तथा ध्यान से अपने मन, शरीर और विचारों के विकार निकाले तथा तत्व ज्ञान को धारण करे। वह वही खाये जो पचा सके और इसके लिये उसे किसी सलाह की आवश्यकता नही पड़े अगर वह प्रतिदिन योग आसन कर उसका निरीक्षण करे।
कहने की आवश्यकता है कि व्यक्ति निर्माण सांसरिक विषयों पर चर्चा कर नहीं किया जा सकता है बल्कि उसके लिये अध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है। इसके विपरीत अनेक कथित गुरु प्राचीन ग्रंथों की कथायें पर लोगों का मनोरंजन करते हैं पर दावा यह कि वह तो धर्म का काम रहे हैं। वह धन संचय के लिये अपने भक्तों के सामने झोली फैलाते हैं और दिखाने के लिये गरीबों की सेवा करने के साथ ही बीमारों के इलाव की व्यवस्था करते हैं। यह ढोंग है। कई संत तो ऐसे भी हैं जो यह दावा करते हैं कि वह तो जमीन पर सोते हैं भले ही उनके आश्रम पंचसितारा सुविधाओं से सुसज्जित है। अब यह कौन देख पाता है कि उनका अंदर रहन सहन कैसा है? इतना ही नहीं कुछ संत यह चाणक्य महाराज का यह कथन दोहराते हैं कि ‘धर्म निर्वाह के लिये धन का होना आवश्यक है’। दरअसल चाणक्य महाराज ने यह बात सामान्य गृहस्थ को सन्यासी जीवन से विरक्त करने के लिये लिखी है न कि कथित सन्यासियों के धन संग्रह की प्रवृत्ति जगाने के लिये ऐसा कहा है।
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Wednesday, June 10, 2009

भर्तृहरि शतकः बड़े भूभाग के राजा नहीं बल्कि कुछ ग्रामों के स्वामी इतराते हैं

भर्तृहरि नीति शतक  में कहा गया है कि
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पुलहृदयैरीशैतज्जगनतं पुरा विधृततमपरैर्दत्तं चान्यैर्विजित्य तृणं यथा।
इह हि भुवनान्यन्यै धीराश्चतुर्दशभुंजते कतिपयपुरस्वाम्ये पुंसां क एष मदज्वर:||

     हिंदी में भावार्थ-अनेक लोगों ने इस पृथ्वी का उपभोग किया तो कुछ उदार प्रवृति के  लोगों ने इसे जीतकर दूसरों को दान में दे दिया। आज भी कई शक्तिशाली लोग बड़े भूभाग के स्वामी है पर उनमें अहंकार का भाव तनिक भी नहीं दिखाई देता परंतु कुछ ऐसे हैं जो कुछ ग्रामों (जमीन के लघु टुकड़े) के स्वामी होने के कारण उसके मद में लिप्त हो जाते हैं।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह प्रथ्वी करोड़ों वर्षों से अपनी जगह पर स्थित है। अनेक महापुरुष यहां आये जिन्होंने इसका उपयोग किया। कुछ ने युद्ध में विजय प्राप्त कर जीती हुई जमीन दूसरों को दान में दी। अनेक धनी मानी लोगों ने बड़े बड़े दान किये और लोगों की सुविधा के लिये इमारतें बनवायीं। उन्होंने कभी भी अपने धन का अहंकार नहीं दिखाया पर आजकल जिसे थोड़ा भी धन आ जाता है वह अहंकार में लिप्त हो जाता है। देखा जाये तो इसी अहंकार की प्रवृति ने समाज में गरीब और अमीर के बीच एक ऐसा तनाव पैदा किया है जिससे अपराध बढ़ रहे हैं। दरअसल अल्प धनिकों में अपनी गरीबी के कारण क्रोध या निराशा नहीं आती बल्कि धनिकों की उपेक्षा और क्रूरता उनको विद्रोह के लिये प्रेरित करती है।

      समाज के बुद्धिमान लोगों ने मान लिया है कि समाज का कल्याण केवल सरकार का जिम्मा है और इसलिये वह धनपतियों को समाज के गरीब, पिछड़े और असहाय तबके की सहायता  के लिये प्रेरित नहीं करते। इसके अलावा जिनके पास धन शक्ति प्रचुर मात्रा है वह केवल उसके अस्तित्व से संतुष्ट नहीं है बल्कि दूसरे लोग उसकी शक्ति देखकर प्रभावित हों अथवा उनकी प्रशंसा करें  इसके लिये वह उसका प्रदर्शन करना चाहते हैं। वह धन से विचार, संस्कार, आस्था और धर्म की शक्ति को कमतर साबित करना चाहते हैं। सादा जीवन और उच्च विचार से परे होकर धनिक लोग-जिनमें नवधनाढ्य अधिक शामिल हैं-गरीब पर अपनी शक्ति का प्रतिकूल प्रयोग कर उसमें भय उत्पन्न करना  चाहते हैं। परिणामतः गरीब और असहाय में विद्रोह की भावना बलवती होती है।
      आज के सामाजिक तनाव की मुख्य वजह इसी धन का अहंकारपूर्ण उपयोग ही है। धन के असमान वितरण की खाई चौड़ी हो गयी है इस कारण अमीर गरीब रिश्तेदार में भी बहुत अंतर है इसके कारण सम्बन्धों  भावनात्मक लगाव में कमी होती जाती है। धन की शक्ति बहुत है पर सब कुछ नहीं है यह भाव धारण करने वाले ही लोग समाज में सम्मान पाते हैं और जो इससे परे होकर चलते हैं उनको कभी कभी न कभी विद्रोह का सामना करना पड़ता है।
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