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Sunday, November 1, 2009

चाणक्य नीति-स्नेह करना दु:ख का मूल कारण (sneh dukh ka karan-chankya niti in hindi

यस्य स्नेहो भयं तस्य स्नेहो दुःखस्य भाजनम्।
स्नेहमूलानि दुःखानि तानि त्यक्तवा वसेत्सुखम्।।
हिंदी में भावार्थ-
जहां स्नेह हैं वही दुःख है। स्नेह ही दुःख की उत्पत्ति का कारण है। स्नेह ही दुःख का मूल है। जिसने स्नेह को त्याग दिया वही सुखी रहता है।
सत्यं माता पिता ज्ञानं धर्मो भ्राता दया स्वसा।
शांतिः पत्नी क्षमा पुत्रः षडेते मम बान्धवाः।।
हिंदी में भावार्थ-
इस जीवन में सत्य माता, ज्ञान पिता, धर्म भाई और दया बहिन समान है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान जीवन के सत्य को प्रवाहित करने वाला स्त्रोत है जिसमें आत्मा को सर्वोपरि बताया गया है। समूचे जीवों से प्रेम करना धर्म है और कमजोर और निरीह पर दया करना सबसे बड़ा पुण्य है। मगर अनेक कथित साधु संतों समाज में अपना प्रभाव बनाये रखने के लिये मनुष्य को रिश्तों में बंधे रहकर केवल उनके निर्वाह के लिये प्रेरित करते है ताकि उनकी छबि समाज सुधारक के रूप में बनी रहे।
नीति विशारद चाणक्य स्पष्ट कहते हैं कि सत्य ही माता के समान है और ज्ञान ही पिता तुल्य है। भाई के समान धर्म और बहिन के समान दया है। मन की शांति पत्नी और क्षमा पुत्र समान है। अर्थात आध्यात्मिक ज्ञान के लिये हमेशा प्रयत्नशील रहना चाहिए। अपने रिश्तों के साथ निर्वाह करना ठीक है पर उनके प्रति अधिक मोह पालना ठीक नहीं है। यह मोह न केवल आध्यात्मिक ज्ञान प्राप्ति में बाधा पहुंचाता है बल्कि सांसरिक गतिविधियों में इस तरह लिप्त करता है कि उससे मन और देह में केवल विकार और अशांति ही पैदा होती है। तथाकथित विद्वानों और संतों ने ऐसे अनेक कर्मकांडों को धर्म का हिस्सा बना दिया है जो केवल आदमी के मोह को बढ़ाते हैं और उन पर धन खर्च होता है। इसी कारण आम भारतीय धन संचय में अपनी पूरी जिंदगी बर्बाद कर देता है और सिवाय दुःख के उसके हाथ कुछ नहीं आता।

हालत यह है कि आध्यात्मिक ज्ञान की बात तो सभी करते हैं पर धारण उसे नहीं करता। पंचतत्वों से बनी इस देह को नष्ट होना है और आत्मा अमर है इसलिये मृत देह के अंतिम संस्कार और श्राद्ध जैसी परंपराओं को निभाने की प्रेरणा देना उचित नहीं है। इस देह को लेकर को नाटकबाजी करना ही अज्ञान का प्रमाण है। यहां तक कहा जा सकता है कि जन्मतिथि और पुण्य तिथि मनाना ही एक तरह से देहाभिमान का परिणाम है। जब आत्मा अमर है तो पैदा कौन हुआ मरा कौन-इस पर विचार कर देखें तो पायेंगे कि हम अनेक प्रकार के भ्रमों में जी रहे हैं। इनसे मुक्त होकर जीवन व्यतीत करें तो शायद मानसिक संताप और वेदना स्वतः कम हो जाये।
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