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Thursday, October 13, 2016

हिन्दू विरोधी नहीं चाहते कि विजयी घोष ‘जयश्रीराम’ घोष भारत में गूंजे-हिन्दी लेख (AntiHindu has been Disturb "JayShriRam* Slogan-Hindi Article)


                            जयश्रीराम शब्द का उच्चारण  भारतीय जनमानस की आत्मा है जिनको उनका नाम पसंद नहीं है वह कथित विदेशी धर्मों के राजनीतिक के विस्तार करने वाले हैं। जब हम खुश होते हैं तो ‘जयश्रीराम’ बोलते हैं, जब परेशानी हो तो आर्तभाव ‘हे राम’ कहकर बोझ हल्का करते हैं। दरअसल निरपेक्ष लोग चाहते हैं कि बस यहां भारतीय जनमानस आर्त भाव से ‘हेराम’ बोलता रहे। वह कभी दैहिक, शारीरिक तथा मानसिक रूप से मजबूत होकर ‘जयश्रीराम’ का उद्घोष न करे ताकि गरीब कल्याण का उनका व्यापार चलता रहे।
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                           यह भारत है जहां प्रधानमंत्री कह ही सकता है कि सैन्य विषय का राजनीतिकण न करो। नवाज शरीफ की तरह प्रतिबंध तो नहीं लगा सकता। उनके राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं को लगता है कि निरपेक्षों को इस प्रचार से चुनौती दे सकते हैं तो उन्हें रोकने के लिये उनका पासपोट तो भारत में जब्त नहीं हो सकता। अलबत्ता निरपेक्ष समूह के बुद्धिमानों की हालत देखते ही बनती है।
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             ऐसा लगता है कि कश्मीर सीमा पर जमकर आतंकवादियों की सफाई हो रही है। पाकिस्तान में कोहराम न मच जाये इस वजह से वह बता नहीं रहा। तंगधार में जिस तरह सेना ने आतंकवादियों की घूसपैठ रोकी है उससे यह साफ हो रहा है कि आतंकवादियों के सफाये किये बिना वह रुकेगी नहीं।
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                               रक्षामंत्री मनोहर पार्रिकर के बयान से निरपेक्ष विचारक यह सोचकर हतप्रभ हैं कि एक न एक राष्ट्रवादी प्रतिदिन उनके पाकिस्तान प्रेम की दुखती रग पर  हाथ रख ही देता है। पाकिस्तान प्रेमी निरपेक्ष विचारकों को रक्षामंत्री पार्रिकर का बयान अगर े चिढ़ाता है तो वह अच्छा जरूर लगेगा।
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                                    तीन तलाक पर टाईम्स नाउ पर बहस चल रही है। धर्मनिरपेक्षवादियों ने यहां अपने ही वाद का मजाक बना दिया है।  धर्मनिरपेक्षता का अर्थ केवल पूजा पद्धति के अधिकार तक ही है जो घर या दरबार की दीवारों की सीमा तक ही हो सकती है। सड़क पर तो संविधान का लिखा ही चलेगा चाहे पवित्र ग्रंथों में कुछ भी लिखा हो।  दूसरी बात यह कि संविधान लोगों को पूजा पद्धति तक ही अधिकार देता है पवित्र ग्रंथों के सम्मान की बात वह नहीं करता क्योंकि यह उसके क्षेत्र का विषय नहीं है। हमारा तो यह तक मानना है कि धर्म के नाम पर घर या दरबार  के बाहर जूलूसों और खानपान से अगर किसी दूसरे को तकलीफ होती है तो उसे संविधान रोकेगा चाहे भले ही पवित्र ग्रंथ में कुछ भी लिखा हो।
धर्मनिरपेक्षता में पूजा पद्धति मानने तक ही अधिकार है।  इससे आगे एक देश एक कानून लागू करना ही होगा।
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Saturday, January 3, 2015

सफल राज्य व्यवस्था से ही धर्म की रक्षा संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(safal rajya vyavastha se hi dharm ki raksha sambhav-hindi thought article)


             25 दिसम्बर 2014 श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म दिन सुशासन दिवस में रूप में मनाया जाता  है। हमारे देश में आज राज्य व्यवस्थाओं में राम राज्य की कल्पना के साकार प्रकट होने की अपेक्षा की जाती है। यह तो पता नहीं कि हमारे देश के धाार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषयों के विशेषज्ञ सुशासन के स्वरूप और महत्व से क्या आशय लेते हैं, पर हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार शासन की व्यवस्था ही सतयुग और कलियुग की स्थिति  परिभाषित करती है।  हमारे महान विद्वान चाणक्य जी का कहना है कि राज्य के अच्छे बुरे प्रबंध से  ही प्रजा में सतयुग और कलियुग का भाव निर्मित होता है। हमारा देश बौद्धिक रूप से तत्वज्ञान के भंडार की वजह से विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है और उसके अनुसार भी मनुष्य की दैनिक आवश्यकतायें भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती इसलिये राजधर्म में स्थित लोगोें  यह दायित्व होता है कि वह प्रजा के प्रति हमेशा सजग रहें।  हमारे यहां धर्म से आशय अच्छे व्यवहार तथा अपने कर्म का निर्वाह करने से ही है।
            हमारे यहां भगवान विष्णु के अनेक अवतार माने जाते हैं उनमें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की चर्चा सबसे अधिक होती है।  इसका कारण यह है कि उन्होंने न केवल अध्यात्मिक रूप से समाज को संदेश दिया वरन् सांसरिक विषयों मेें भी नैतिक सिद्धांतों से कार्य करने की प्रेरणा दी।  दोनों ने ही राजधर्म का निर्वाह किया। भगवान विष्णु भी पालनहार होने की वजह से भारतीय समाज में सक्रिय इष्ट का सम्मान पाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन केवल भगवान की आराधना के लिये ही प्रेरित नहीं करता वरन् सांसरिक विषयों में भी सिद्धांतों के पालन की बात कहता है।  हमारे यहां कर्म ही धर्म माना जाता है। यही कारण है कि राज धर्म का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है।
            हमारे यहां अभी धर्मांतरण पर बहस चल रही है।  एक प्रश्न आता है कि हमारे यहां इतने लोग धर्मांतरण क्यों कर गये? इतिहास बताता है कि मध्य युग में हमारे यहां के राजा अपने कर्तव्य से विमुख हो गये। उनके परस्पर संबंध कटु रहे।  प्रजा के प्रति उनके असंतोष का परिणाम ही रहा है कि लोग विदेशी शासकों के प्रति भी सद्भावना दिखाते रहे। हमने देखा होगा कि अनेक पुराने लोग आज भी कहते हैं कि अंग्रेजों का राज्य आज की अपेक्षा अच्छा था।  हमारे यहां विदेशी विचाराधारा और शासन के प्रति यह मोह अपने राज्य प्रबंधकों के कुशासन से उत्पन्न निराशा की वजह से विद्रोह के रूप में परिवर्तित होता रहा।  यह विद्रोह की प्रवृत्ति इतनी रही कि राज्य प्रबंधक के इष्ट और पूजा पद्धति से प्रथक जाकर समाज में अलग पहचान दिखने की प्रेरक बन गयी।
            अध्यात्मिक ज्ञान के अभ्यास से हमारी समझ तो यह बनी है कि संसार में जितने भी कथित संज्ञाधारी धर्म बने हैं वह राज्य के प्रेरणा से बने हैं।  दरअसल ऐसे संज्ञाधारी धर्म भ्रम फैलाने के लिये ही प्रकट किये गये हैं ताकि पूजा पद्धति के माध्यम से लोगों में आपसी संघर्ष कराकर राज्य प्रबंध की नाकामियों से उनका ध्यान हटाया जाये।  हमारे देश में धर्म से आशय कर्म तथा व्यवहार से है। किसी भी प्राचीन ग्रंथ में धर्म का कोई नाम नहीं है।  अच्छा राजा भगवान का दूसरा  रूप माना गया है। इसके विपरीत विदेशी विचारधाराओं के शीर्ष पुरुषं पूजा पद्धतियों से नये लोग जोड़कर अपने समाज को यह जताते रहे है कि वह अपने कथित धर्म को ही श्रेष्ठ माने। यही कारण है कि आज विदेशों में धर्म के नाम पर संघर्ष आज भी जारी है।
            हमारे यहां राजधर्म बृहद धर्म का ही एक उपभाग माना जाता है।  राजधर्म में स्थित लोग अगर अपने कर्म का निर्वाह उचित रूप से करें तो प्रजा में उनकी छवि अच्छी बन सकती है।  धर्म की रक्षा में मध्यम वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है पर हम देख रहे हैं कि वह अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है। धनिक वर्ग अपनी प्रभुता के मोह तथा अहकार में तल्लीन है।  निम्म वर्ग के लिये भी हर पल संकट मुंह बायें रहता है। हमारा मानना है कि हमारे यहां इस समय संकट इसलिये अधिक क्योंकि समाज को स्थिर रखने वाला मध्यम वर्ग स्वयं ही अस्थिर हो गया है।  हमारा यह भी मानना है कि राज्य प्रबंध सुशासन का रूप ले तो हमारे देश में विदेशी विचारधाराओं के साथ उनके प्रवाह के लिये लालायित लोगों का प्रभाव स्वतः कम हो जायेगा तब किसी अन्य प्रयास की आवश्यकता नहीं होगी। अगर इस प्रयास में कमी रहेगी तो बाकी अन्य प्रयास न केवल विवाद खड़े करेंगे बल्कि मजाक भी बनेगा।
            माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके जन्म दिन पर बधाई।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
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Friday, December 26, 2014

समाधि के बारे में भ्रम न पालें-हिंदू चिन्तन लेख(samadhi ke bare mein bhram palen-hindu chinttan lekh)



            पतंजलि योग साहित्य के अनुसार सात भागों से गुजरने के बाद आठवां और अंतिम भाग समाधि है। योग के विषय के व्यापक संदर्भों में पतंजलि योग साहित्य ही एकमात्र प्रमाणिक सामग्री प्रदान करता है।  हमने कथित रूप से अनेक लोगों से सुना है कि अमुक गुरु समाधि में प्रवीण थे या अमुक संत को इस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त है।  अनेक लोग तो कहते हैं कि हिमालय की कंदराओं में कई ऐसे योगी है जो समाधि में दक्ष हैं।  जब हम पतंजलि योग साहित्य का अध्ययन करते हैं तो लगता है कि इस तरह की बातें केवल प्रमाणिक नहीं है।  समाधि योग का चरम शिखर है।  एक तरह से योग साधना की आहुति समाधि ही है।
            ऐसे में अनेक प्रश्न दिमाग में आते हैं। हम जिन लोगों की समाधि विषयक योग्यता के बारे में सुना है उनकी बाकी सात भागों में सक्रियता की चर्चा नहीं होती।  आसन और प्राणायाम का भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है।  वैसे हम आसनों की बात करें तो अब अनेक प्रकार के व्यायाम भी इनके साथ वैज्ञानिक ढंग से इसलिये जोड़े गये हैं क्योंकि पहले समाज श्रम आधारित था पर अब सुविधा भोगी हो गया जिससे लोगों को दैहिक शुद्ध करायी जा सके।  यह व्यायाम रूपी आसान इसलिये वैज्ञानिक हैं क्योंकि इस दौरान सांसो के उतार चढ़ाव का-जिसे प्राणायाम भी कहा जाता है- अभ्यास भी कराया जाता है।  एक तरह से आसन और प्राणायाम का संयुक्त रूप बनाया गया है। पतंजलि योग में प्राणायाम में प्राण रोकने और छोड़ने का अभ्यास ही एक रूप माना गया है। आसन से आशय भी सुखासन, पद्मासन या वज्रासन पर बैठना है। बहुत सहज दिखने वाली आसन और प्राणायाम की प्रक्रिया तब बहुत कठिन हो जाती है जब मनुष्य के मन और देह पर भोग प्रभावी होते हैं। योगाभ्यास के  दौरान देह से पसीना निकलता ही जिससे देह के विकार बाहर आते हैं पर सवाल यह है कि इसे करते कितने लोग हैं? जिनके बारे में समाधि लगाने का दावा किया जाता है वह पतंजलि योग के कितने जानकार होते हैं यह पता ही नहीं लगता।
            यहां हम बता दें कि भक्ति के चरम को छूने वाले अनेक संतों ने तो योग साधना को भी बेकार की कवायद बताया है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन संतों ने भक्ति का शिखर अपने तप से पाया पर सच यह है कि वह भक्ति भी उसी तरह सभी के लिये कठिन है जैसे कि योग साधना।  दूसरी बात यह है कि इन महापुरुषों ने योग साहित्य का अध्ययन न कर केवल तत्कालीन समाज में ऐसे योगियों को देखा था जिनका स्वयं का ज्ञान अल्प था।  अगर इन महापुरुषों ने योग साधना का अध्ययन किया होता तो वह जान पाते कि जिस भक्ति के शिखर को उन्होंने पाया है वह समाधि का ही रूप है और कहीं न कहीं उन्होंने अनजाने में ही योग के आठों भागों को पार किया था।  योग साहित्य से इन महापुरुषों की अनभिज्ञता का प्रमाण यह है कि वह योग को तीव्र या धीमी गति से प्राणवायु को ग्रहण या त्यागने की प्रक्रिया  ही मानते थे जो कि योग साधना का केवल एक अंशमात्र है।  यह अलग बात है कि इन महापुरुषों के  कथनों को भक्ति की सर्वोपरिता बताने वाले आज के पेशेवर संत उन भक्तों के सामने दोहराकर वाहवाही लूटते हैं जो देह मन और बुद्धि के विकारों से ग्रसित हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  जब वात, पित और कफ के कुपित से पीड़ित समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग हो तब हार्दिक भक्ति करने वाले मिल जायेंगे यह सोचना भी व्यर्थ है।
            हमने ऐसे लोग भी देखें हैं जो योग साधना प्रारंभ करते हैं तो कथित धार्मिक गुरू उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं।  अनेक गुरु तो यह कहते हैं कि योग साधना से कुछ नहीं होता। बीमारी दवा से जाती है और भगवान भक्ति से मिलते हैं।  यह प्रचार भयभीत और कमजोर लोगों के दिमाग की देन है।  मूलतः सभी जानते हैं योग साधना से व्यक्ति में एक नयी स्फूर्ति आने के साथ ही उसके मन मस्तिष्क में आत्मविश्वास पैदा होता है जिससे वह किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहता। इसलिये कायर और कमजोर लोग आलस्यवश न केवल स्वयं योग साधना से दूर रहते हैं बल्कि दूसरों में भी नकारात्मक भाव पैदा करते हैं।
            योग साधना की बातें सभी करते हैं पर महर्षि पतंजलि योग के सूत्रों का पढ़ने और समझने की समझ किसमें कितनी है यह तो विद्वान लोग ही बता सकते हैं।  हमारा एक अनुभव है कि जो नित्य योग साधना करते हैं उन्हें इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिये। जिस तरह आसना के समय सांसों के अभ्यास से दोनों काम होते हैं उसी तरह योग सूत्र पढ़ने पर हम उनसे होने वाले लाभों को पढ़कर अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि समाधि विषयक भ्रम दूर हो जाते हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Saturday, November 1, 2014

राज्य प्रबंधक धूर्त कर्मचारियों को दंडित करते रहें-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(rajya prabandhak dhurt karamchariyon ko dandit karen-A Hindu hindi reiligion thought based on manu smriti)

      हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली अवश्य है पर यहां की राज्य प्रबंध व्यवस्था वही है जो अंग्रेजों ने प्रजा को गुलाम बनाये रखने की भावना से अपनायी थी। उन्होंने इस व्यवस्था को इस सिद्धांत पर अपनाया था कि राज्य कर्मीं ईमानदार होते हैं और प्रजा को दबाये रखने के लिये उन्हें निरंकुश व्यवहार करना ही  चाहिये।  राजनीतिक रूप से देश स्वतंत्र अवश्य हो गया पर जिस तरह की व्यवस्था रही उससे देश में राज्य प्रबंध को लेकर हमेशा ही एक निराशा का भाव व्याप्त  दिखता रहा है।  इसी भाव के कारण  देश में अनेक ऐसे आंदोलन चलते रहे हैं जिनके शीर्ष पुरुष देश में पूर्ण स्वाधीनताा न मिलने की शिकायत करतेे है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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शरीकर्षात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा।

तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्।।

     हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकर शरीर का अधिक शोषण करने से प्राणशक्ति कम होती उसी तरह जिस राज्य में प्रजा का अधिक शोषण होने वहां अशांति फैलती है।

राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादयिनः शठाः।

भृत्याः भवन्ति प्रायेण तेभ्योरक्षेदियाः प्रजाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-प्रजा के लिये नियुक्त कर्मचारियों में स्वाभाविक रूप से धूर्तता का भाव आ ही जाता है। उनसे निपटने का उपाय राज्य प्रमुख को करना ही चाहिए।
      देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक विवाद दिखाई देते हैं।  यहां ढेर सारे कर लगाये जाते हैं।  इतना ही नहीं करों की दरें जिस कथित समाजवादी सिद्धांत के आधार पर तय होती है वह कर चोरी को ही प्रोत्साहित करती है।  इसके साथ ही  कर जमा करने तथा उसका विवरण देते समय करदाता  इस तरह  अनुभव करते हैं जैसे कि उत्पादक नागरिक होना जैसे एक अपराध है।  देश के कमजोर, गरीब तथा अनुत्पादक लोगों की सहायता या कल्याण करने का सरकार को करना चाहिये पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उत्पादक नागरिकों पर बोझ डालकर उन्हें करचोरी के लिये प्रोत्साहित किया जाये।      यह हैरानी की बात है कि कल्याणकारी राज्य के नाम करसिद्धांत अपनाये गये कि गरीब लोगों की भर्लाइै के लिये उत्पादक नागरिकों पर इतना बोझ डाला जाये कि वह अमीर न हों पर इसका परिणाम विपरीत दिखाई दिया जिसके अनुसार  पुराने पूंजीपति जहां अधिक अमीर होते गये वहीं मध्यम और निम्न आय का व्यक्ति आय की दृष्टि से नीचे गिरता गया।  इतना ही नहीं  ऐसे नियम बने जिससे निजी व्यवसाय या लघु उद्यमों की स्थापना कठिन होती गयी।
            हालांकि अब अनेक विद्वान यह अनुभव करते हैं कि राज्य प्रबंध की नीति में बदलाव लाया जाये। इस पर अनेक बहसें होती हैं पर कोई निर्णायक कदम इस तरह उठाया नहीं जाता दिख रहा है जैसी कि अपेक्षा होती है।  हालांकि भविष्य में इसकी तरफ कदम उठायेंगे इसकी संभावना अब बढ़ने लगी है।  एक बात तय है कि कोई भी राज्य तभी श्रेष्ठ माना जाता है जहां प्रजा के अधिकतर वर्ग खुश रहते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, October 23, 2014

मस्तिष्क की स्मृतियां ही संस्कार होती हैं-पतंजलि योग विज्ञान(mastishk ki smritiyan hi sanskar-patanjali yoga vigyan)




            आमतौर से सामान्य भाषा में स्मृति तथा संस्कार एकरूप नहीं होते।  स्मृतियों को पुराने विषय, व्यक्ति, दृश्य अथवा अनुभूतियों के स्मरण का भंडार माना जाता है जबकि संस्कार मस्तिष्क में स्थापित मानवीय व्यवहार के स्थापित सिद्धांतों के रूप में समझा जाता है। पतंजलि योग का अध्ययन करें तो लगता है कि संस्कार स्मृति का ही एक भाग है।  जीवन व्यवहार के सिद्धांत अंततः स्मृति समूह का ही वह भाग है जो मानव मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।

पतंजलि  योग सूत्र  में कहा गया है

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जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानष्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।।


     हिन्दी में भावार्थ-पतंजलि योग सूत्र के अनुसार जाति, देश काल इन तीनों से संपर्क टूटने पर भी स्वाभाविक कर्म संस्कारों में बाधा नहीं आती क्योंकि स्मृति और संस्कारों का एक ही रूप होता है।

     हम इस श्लोक में योग के संस्कारिक रूप को समझ सकते हैं। जब मनुष्य बच्चा होता है तब उसके अपने घर परिवार, रिश्तेदारी, विद्यालय तथा पड़ौस के लोगों से स्वाभाविक संपर्क बनते हैं। वह उनसे संसार की अनेक बातें ऐसी सीखता है जो उसके लिये नयी होती हैं। वह अपने मन और बुद्धि के तत्वों में उन्हें स्वाभाविक रूप से इस तरह स्थापित करता है जीवन भर वह उसकी स्मृतियों में बनी जाती हैं। कहा भी जाता है कि बचपन में जो संस्कार मनुष्य में आ गये फिर उनसे पीछा नहीं छूटता और न छोड़ना चाहिए क्योंकि वह कष्टकर होता है।
      यही कारण है कि माता पिता तथा गुरुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। संभव है बाल्यकाल में अनेक बच्चे उनकी शिक्षा पर ध्यान न दें पर कालांतर में जब वह उनकी स्थाई स्मृति बनती है तब वह उनका मार्ग प्रशस्त करती है। इसलिये बच्चों के लालन पालन में मां की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण मानी गयी है क्योंकि बाल्यकाल में वही अपने बच्चे के समक्ष सबसे अधिक रहती है और इसका परिणाम यह होता है कि कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो अपनी मां को भूल सके।
      इसलिये हमारे अध्यात्मिक संदेशों में अच्छी संगत के साथ ही अच्छे वातावरण में भी निवास बनाने की बात कहीं जाती है। अक्सर लोग कहते हैं कि पास पड़ौस का प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता पर यह गलत है। अनेक बच्चे तो इसलिये ही बिगड़ जाते हैं क्योंकि उनके बच्चे आसपास के गलत वातावरण को अपने अंदर स्थापित कर लेते हैं।
      यही नहीं आज के अनेक माता पिता बाहर जाकर कार्य करते हैं और सोचते हैं कि उनका बच्चा उनकी तरह ही अच्छा निकलेगा तो यह भ्रम भी उनको नहीं पालना चाहिये क्योंकि किसी भी मनुष्य की प्रथम गुरु माता की कम संगत बच्चों को अनेक प्रकार के संस्कारों से वंचित कर देती है। ऐसे लोग सोचते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर ठीक हो जायेगा या हम उसे संभाल लेंगे तो यह भी भ्रामक है क्योंकि जो संस्कार कच्चे दिमाग में स्मृति के रूप में स्थापित करने का है वह अगर निकल गया तो फिर अपेक्षायें करना निरर्थक है। युवा होने पर दिमाग पक्का हो जाता है और सभी जानते हैं कि पक्की मिट्टी के खिलोने नहीं बन सकते-वह तो जैसे बन गये वैसे बन गये। दरअसल हम जिससे संस्कार कहते हैं वह प्रारम्भिक काल में स्थापित स्मृतियों का विस्तार ही हैं इसलिये अगर हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे बच्चे आगे चलकर वह काम करें जो हम स्वयं चाहते हैं तो उसकी शिक्षा पहले ही देना चाहिए। यह स्मृतियां इस तरह की होती हैं कि देश, काल तथा जाति से कम संपर्क रहने न बिल्कुल न होने पर भी बनी रहती हैं और मनुष्य अपने संस्कारों से भ्रष्ट नहीं होता है अगर किसी लोभवश वह अपना पथ छोड़ता भी है तो उसे भारी कष्ट उठाना पड़ता है और फिर अपने स्थान पर वापस आता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
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Saturday, February 16, 2013

ऋग्वेद के आधार पर चिंत्तन-जिस वस्तु में हृदय लगायें वह मिल ही जाती है (jis vastu mein dridya lagaa den vah mil hee jaatee hai-hindu thouhgt on besad the rigved )


              एक बात निश्चित है कि अगर आदमी किसी वस्तु या विषय में अपना संकल्प दृढ़ कर ले तो वह उसे प्राप्त कर ही लेता है। इसके लिये आवश्यकता है परिश्रम तथा ईमानदारी का भाव धारण करने की।आशा निराशा जीवन में आती जाती रहती हैं।  मुख्य बात यह है कि आदमी खुशी में अधिक आनंद होकर चुप नहीं बैठ सकता तो गम उसे खामोश कर देते हैं।  अपने जीवन की सफलता के लिये आदमी अपनी शक्ति और पराक्रम को श्रेय देता है तो असफलता के लिये दूसरों को जिम्मेदार ठहराता है। सच बात तो यह है कि हर आदमी अपने कर्म का स्वयं ही जिम्मेदार होता है।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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यादृश्मिन्धपि तमपस्याया विदद् यऽस्वयं कहते सो अरे करत्

                    हिन्दी में भावार्थ- मनुष्य का हृदय जिस वस्तु में लगा रहता है वह उसे प्राप्त कर ही  लेता है। परिश्रम करने सारे पदार्थ प्राप्त किये जा सकते हैं।
अत्रा ना हार्दि क्रवणस्य रेजते यत्र मकतिर्विद्यते पूतबन्धीन।
हिन्दी में भावार्थ-जहां पवित्र बुद्धि का वास है वह हृदय के मनोरथ कभी व्यर्थ नहीं जाते।
         जब आदमी किसी विषय विशेष में हृदय लगाकर काम करता है तो उसे सफलता मिल ही जाती है। कुछ लोग अच्छे काम में भी अपना मन पवित्र नहीं रखते तब उनका परेशानी का सामना करना पड़ता है।  यह जीवन संकल्पों का खेल है इसलिये जब तक हम अपना हृदय, लक्ष्य तथा साधन पवित्र रखकर कार्य नहीं करेंगे तब तक सफलता नहीं मिलेगी।  सफलता का मूल मंत्र पवित्र तथा विचार की शुद्धता है। हमारे वेद शास्त्र इसी बात का संदेश देते हैं। जब भी कोई परिश्रम, ईमानदारी तथा पवित्रता से किया जाता है तो उसमें सफलता अवश्य मिलती है।  उसमें देर हो सकती है पर नाकामी मिलने की संभावना नहीं रहती।
लेखक-दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 


Wednesday, February 16, 2011

आदमी अपने आपको धोखा देता है-हिन्दी चिंत्तन आलेख (aadmi swyan ko dhokha deta hai-hindi chintan aalekh)

भ्रष्ट और बेईमान लोगों की सक्रियता अधिक होने से उनका वैभव चारों तरफ फैला दिखता है तो ऐसा अनुभव होता है कि जैसे पूरा समाज ही बेईमान है। यह बात नहीं है क्योंकि हम अगर आंखें खुली रखकर अपने मस्तिष्क के चिंतन को व्यापक दृष्टिकोण से देखें तो आज भी मेहतनकश तथा गरीब लोगों की संख्या अधिक है। पाप की कमाई से लोगों ने ऊंची इमारतें बना लीं और अपनी असलियत छिपाने के लिये समाज सेवा का चोगा ओढ़कर वह प्रचार में अपने विज्ञापनों के कारण प्रसिद्ध भी हो रहे हैं पर जहां पर आत्मिक सुख की बात आती है तो वह केवल सत्य पथ पर चलने वाले लोगों के भाग्य में ही आता है।
भर्तृहरि महाराज कहते हैं कि
हिंसाशून्यमयल्लयमशनं धांत्रा मरुत्कल्पितं व्यालानां पशवस्तणांकुरभुजस्तुष्टः स्थलीशायिनः।
संसारार्णवलंधनक्षमर्थियां वृत्तिः कृता सा नृणां तामन्वेषयतां प्रयांति संततं सर्वे समाप्ति गुणाः।।
‘‘विधाता ने सापों के लिये भोजन के रूप में हवा का निर्माण किया जो उनको बिना किसी हिंसा के प्राप्त हो जाती है। पशुओं के लिये घास बनाई और सोने के लिये धरती का बिछौना बनाया। परंतु मनुष्य बुद्धिबल से ही भोजन प्राप्त कर सकता है इसलिये उसका पूरा जीवन केवल उसी में ही लग जाता है।’’
मनुष्य का पेट भी रोटी से भर जाता है पर उसका मन फिर भी नहीं मानता। उसकी बुद्धि लोभ, लालच और मोह में इस तरह फंस जाती है कि हमेशा ही वह पैसा, पद और प्रतिष्ठा पाने के लिये इधर उधर भटकता है। अनेक लोग तो ऐसे हैं जो अच्छा खासा कमाते हैं पर कहते हैं कि ईमानदारी से उनका घर नहीं चल सकता। जबकि इस समाज में ऐसे भी लोग भी है जो केवल वेतन या थोड़ी कमाई के भी अपना जीवन यापन कर शांति से जीवन बिताते हैं। दरअसल हर जीव का दाता तो भगवान है पर जो लोग बेईमानी से धन कमाते हैं वह परिवार की जरूरतों को पूरा करने का ढोंग भले ही कर कर्ता बनने की खुशी पाते हैं पर वह उनका वहम है। अगर यह बेईमान देह त्याग भी दें तो भी उनका परिवार जिंदा रहेगा और उसके सदस्य अपने जीवन यापन के लिये कोई दूसरा मार्ग ढूंढ लेगा। ऐसे में उनकी परिवार की मज़बूरी केवल स्वयं को धोखा देने के लिये है।
कहने का अभिप्राय यह है कि सभी का दाता परमात्मा है और बेईमानी और भ्रष्टाचार के लोग अपनी बाध्यताओं का दिखावा करें ऐसा करके वह स्वयं को धोखा देते हैं।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Saturday, August 14, 2010

मनुस्मृति-त्रिदंडी मनुष्य ही सिद्ध कहलाता है (tri dandi manushya hi siddha-manu smriti in hindi)

वाग्उण्डोऽडःकायादण्डस्तथैव च।
वसयैते निहिता बुद्धौ त्रिडण्डीति स उच्यते
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य सोच विचार कर वाणी का प्रयोग करते हुए देह और मन पर अपना नियंत्रण बनाये रखते हैं उसे त्रिदंडी कह जाता है।
त्रिदण्डमेतिन्निक्षप्य सर्वभूतेषु मानवः।
कामक्रोधी तु संयभ्य ततः सिद्धिं नियच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
जो मनुष्य सभी जीवों के साथ मन, शरीर वह वाणी तीनों प्रकार के दंडों का पालन करते हुए व्यवहार करता है वह किसी को पीड़ा नहीं देता। उसका काम व क्रोध के साथ ही अपने आचरण पर भी संयम रहता है जिसके कारण वह सिद्ध कहलाता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य अपने कर्मों से मन, शरीर और वाणी के द्वारा बंधा रहता है। जिस तरह का कोई कर्म करता है वैसा ही उसे परिणाम प्राप्त होता है। सिद्ध व्यक्ति वही है जो दृष्टा की तरह अपने मन, शरीर और वाणी को अभिव्यक्त होते देखता है। इसलिये वह उन पर नियंत्रण करता है। दृष्टा होने के कारण मनुष्य के किसी भी कर्म के प्रति अकर्ता का भाव पैदा होता है जिससे उसके अंतर्मन में विद्यमान अहंकार की भावना प्रायः समाप्त हो जाती है।
ऐसा निरंकार मनुष्य मन, वचन और शरीर से संयम पूर्वक जीवन व्यतीत करता है और इससे न केवल वह अपना बल्कि दूसरे लोगों के जीवन का भी उद्धार करता है। इससे दूसरे लोग भी प्रसन्न होते हैं और उसका सिद्ध की उपाधि प्रदान करते हैं। जिन मनुष्यों के पास तत्व ज्ञान है वह अपने मुख से आत्मप्रचार कर अपने व्यवहार और आचरण से ही अपनी सिद्धि को प्रमाण करते है। जिनको ऐसा सिद्ध बनना है उनको चाहिये कि वह मन, वचन और देह के दंडों पर अभ्यास से नियंत्रण करें।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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