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Saturday, January 3, 2015

सफल राज्य व्यवस्था से ही धर्म की रक्षा संभव-हिन्दी चिंत्तन लेख(safal rajya vyavastha se hi dharm ki raksha sambhav-hindi thought article)


             25 दिसम्बर 2014 श्री अटल बिहारी वाजपेयी का जन्म दिन सुशासन दिवस में रूप में मनाया जाता  है। हमारे देश में आज राज्य व्यवस्थाओं में राम राज्य की कल्पना के साकार प्रकट होने की अपेक्षा की जाती है। यह तो पता नहीं कि हमारे देश के धाार्मिक, राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक विषयों के विशेषज्ञ सुशासन के स्वरूप और महत्व से क्या आशय लेते हैं, पर हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार शासन की व्यवस्था ही सतयुग और कलियुग की स्थिति  परिभाषित करती है।  हमारे महान विद्वान चाणक्य जी का कहना है कि राज्य के अच्छे बुरे प्रबंध से  ही प्रजा में सतयुग और कलियुग का भाव निर्मित होता है। हमारा देश बौद्धिक रूप से तत्वज्ञान के भंडार की वजह से विश्व का अध्यात्मिक गुरु माना जाता है और उसके अनुसार भी मनुष्य की दैनिक आवश्यकतायें भी कम महत्वपूर्ण नहीं होती इसलिये राजधर्म में स्थित लोगोें  यह दायित्व होता है कि वह प्रजा के प्रति हमेशा सजग रहें।  हमारे यहां धर्म से आशय अच्छे व्यवहार तथा अपने कर्म का निर्वाह करने से ही है।
            हमारे यहां भगवान विष्णु के अनेक अवतार माने जाते हैं उनमें भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण की चर्चा सबसे अधिक होती है।  इसका कारण यह है कि उन्होंने न केवल अध्यात्मिक रूप से समाज को संदेश दिया वरन् सांसरिक विषयों मेें भी नैतिक सिद्धांतों से कार्य करने की प्रेरणा दी।  दोनों ने ही राजधर्म का निर्वाह किया। भगवान विष्णु भी पालनहार होने की वजह से भारतीय समाज में सक्रिय इष्ट का सम्मान पाते हैं।  कहने का अभिप्राय यह है कि हमारा अध्यात्मिक दर्शन केवल भगवान की आराधना के लिये ही प्रेरित नहीं करता वरन् सांसरिक विषयों में भी सिद्धांतों के पालन की बात कहता है।  हमारे यहां कर्म ही धर्म माना जाता है। यही कारण है कि राज धर्म का महत्व अत्यंत बढ़ जाता है।
            हमारे यहां अभी धर्मांतरण पर बहस चल रही है।  एक प्रश्न आता है कि हमारे यहां इतने लोग धर्मांतरण क्यों कर गये? इतिहास बताता है कि मध्य युग में हमारे यहां के राजा अपने कर्तव्य से विमुख हो गये। उनके परस्पर संबंध कटु रहे।  प्रजा के प्रति उनके असंतोष का परिणाम ही रहा है कि लोग विदेशी शासकों के प्रति भी सद्भावना दिखाते रहे। हमने देखा होगा कि अनेक पुराने लोग आज भी कहते हैं कि अंग्रेजों का राज्य आज की अपेक्षा अच्छा था।  हमारे यहां विदेशी विचाराधारा और शासन के प्रति यह मोह अपने राज्य प्रबंधकों के कुशासन से उत्पन्न निराशा की वजह से विद्रोह के रूप में परिवर्तित होता रहा।  यह विद्रोह की प्रवृत्ति इतनी रही कि राज्य प्रबंधक के इष्ट और पूजा पद्धति से प्रथक जाकर समाज में अलग पहचान दिखने की प्रेरक बन गयी।
            अध्यात्मिक ज्ञान के अभ्यास से हमारी समझ तो यह बनी है कि संसार में जितने भी कथित संज्ञाधारी धर्म बने हैं वह राज्य के प्रेरणा से बने हैं।  दरअसल ऐसे संज्ञाधारी धर्म भ्रम फैलाने के लिये ही प्रकट किये गये हैं ताकि पूजा पद्धति के माध्यम से लोगों में आपसी संघर्ष कराकर राज्य प्रबंध की नाकामियों से उनका ध्यान हटाया जाये।  हमारे देश में धर्म से आशय कर्म तथा व्यवहार से है। किसी भी प्राचीन ग्रंथ में धर्म का कोई नाम नहीं है।  अच्छा राजा भगवान का दूसरा  रूप माना गया है। इसके विपरीत विदेशी विचारधाराओं के शीर्ष पुरुषं पूजा पद्धतियों से नये लोग जोड़कर अपने समाज को यह जताते रहे है कि वह अपने कथित धर्म को ही श्रेष्ठ माने। यही कारण है कि आज विदेशों में धर्म के नाम पर संघर्ष आज भी जारी है।
            हमारे यहां राजधर्म बृहद धर्म का ही एक उपभाग माना जाता है।  राजधर्म में स्थित लोग अगर अपने कर्म का निर्वाह उचित रूप से करें तो प्रजा में उनकी छवि अच्छी बन सकती है।  धर्म की रक्षा में मध्यम वर्ग की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है पर हम देख रहे हैं कि वह अपने अस्तित्व के लिये संघर्ष कर रहा है। धनिक वर्ग अपनी प्रभुता के मोह तथा अहकार में तल्लीन है।  निम्म वर्ग के लिये भी हर पल संकट मुंह बायें रहता है। हमारा मानना है कि हमारे यहां इस समय संकट इसलिये अधिक क्योंकि समाज को स्थिर रखने वाला मध्यम वर्ग स्वयं ही अस्थिर हो गया है।  हमारा यह भी मानना है कि राज्य प्रबंध सुशासन का रूप ले तो हमारे देश में विदेशी विचारधाराओं के साथ उनके प्रवाह के लिये लालायित लोगों का प्रभाव स्वतः कम हो जायेगा तब किसी अन्य प्रयास की आवश्यकता नहीं होगी। अगर इस प्रयास में कमी रहेगी तो बाकी अन्य प्रयास न केवल विवाद खड़े करेंगे बल्कि मजाक भी बनेगा।
            माननीय श्री अटल बिहारी वाजपेयी को उनके जन्म दिन पर बधाई।

दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Friday, December 26, 2014

समाधि के बारे में भ्रम न पालें-हिंदू चिन्तन लेख(samadhi ke bare mein bhram palen-hindu chinttan lekh)



            पतंजलि योग साहित्य के अनुसार सात भागों से गुजरने के बाद आठवां और अंतिम भाग समाधि है। योग के विषय के व्यापक संदर्भों में पतंजलि योग साहित्य ही एकमात्र प्रमाणिक सामग्री प्रदान करता है।  हमने कथित रूप से अनेक लोगों से सुना है कि अमुक गुरु समाधि में प्रवीण थे या अमुक संत को इस विषय में विशेषज्ञता प्राप्त है।  अनेक लोग तो कहते हैं कि हिमालय की कंदराओं में कई ऐसे योगी है जो समाधि में दक्ष हैं।  जब हम पतंजलि योग साहित्य का अध्ययन करते हैं तो लगता है कि इस तरह की बातें केवल प्रमाणिक नहीं है।  समाधि योग का चरम शिखर है।  एक तरह से योग साधना की आहुति समाधि ही है।
            ऐसे में अनेक प्रश्न दिमाग में आते हैं। हम जिन लोगों की समाधि विषयक योग्यता के बारे में सुना है उनकी बाकी सात भागों में सक्रियता की चर्चा नहीं होती।  आसन और प्राणायाम का भाग अत्यंत महत्वपूर्ण है।  वैसे हम आसनों की बात करें तो अब अनेक प्रकार के व्यायाम भी इनके साथ वैज्ञानिक ढंग से इसलिये जोड़े गये हैं क्योंकि पहले समाज श्रम आधारित था पर अब सुविधा भोगी हो गया जिससे लोगों को दैहिक शुद्ध करायी जा सके।  यह व्यायाम रूपी आसान इसलिये वैज्ञानिक हैं क्योंकि इस दौरान सांसो के उतार चढ़ाव का-जिसे प्राणायाम भी कहा जाता है- अभ्यास भी कराया जाता है।  एक तरह से आसन और प्राणायाम का संयुक्त रूप बनाया गया है। पतंजलि योग में प्राणायाम में प्राण रोकने और छोड़ने का अभ्यास ही एक रूप माना गया है। आसन से आशय भी सुखासन, पद्मासन या वज्रासन पर बैठना है। बहुत सहज दिखने वाली आसन और प्राणायाम की प्रक्रिया तब बहुत कठिन हो जाती है जब मनुष्य के मन और देह पर भोग प्रभावी होते हैं। योगाभ्यास के  दौरान देह से पसीना निकलता ही जिससे देह के विकार बाहर आते हैं पर सवाल यह है कि इसे करते कितने लोग हैं? जिनके बारे में समाधि लगाने का दावा किया जाता है वह पतंजलि योग के कितने जानकार होते हैं यह पता ही नहीं लगता।
            यहां हम बता दें कि भक्ति के चरम को छूने वाले अनेक संतों ने तो योग साधना को भी बेकार की कवायद बताया है।  इसमें कोई संदेह नहीं है कि उन संतों ने भक्ति का शिखर अपने तप से पाया पर सच यह है कि वह भक्ति भी उसी तरह सभी के लिये कठिन है जैसे कि योग साधना।  दूसरी बात यह है कि इन महापुरुषों ने योग साहित्य का अध्ययन न कर केवल तत्कालीन समाज में ऐसे योगियों को देखा था जिनका स्वयं का ज्ञान अल्प था।  अगर इन महापुरुषों ने योग साधना का अध्ययन किया होता तो वह जान पाते कि जिस भक्ति के शिखर को उन्होंने पाया है वह समाधि का ही रूप है और कहीं न कहीं उन्होंने अनजाने में ही योग के आठों भागों को पार किया था।  योग साहित्य से इन महापुरुषों की अनभिज्ञता का प्रमाण यह है कि वह योग को तीव्र या धीमी गति से प्राणवायु को ग्रहण या त्यागने की प्रक्रिया  ही मानते थे जो कि योग साधना का केवल एक अंशमात्र है।  यह अलग बात है कि इन महापुरुषों के  कथनों को भक्ति की सर्वोपरिता बताने वाले आज के पेशेवर संत उन भक्तों के सामने दोहराकर वाहवाही लूटते हैं जो देह मन और बुद्धि के विकारों से ग्रसित हैं। कहा जाता है कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन रहता है।  जब वात, पित और कफ के कुपित से पीड़ित समाज का एक बहुत बड़ा वर्ग हो तब हार्दिक भक्ति करने वाले मिल जायेंगे यह सोचना भी व्यर्थ है।
            हमने ऐसे लोग भी देखें हैं जो योग साधना प्रारंभ करते हैं तो कथित धार्मिक गुरू उन्हें ऐसा करने से रोक देते हैं।  अनेक गुरु तो यह कहते हैं कि योग साधना से कुछ नहीं होता। बीमारी दवा से जाती है और भगवान भक्ति से मिलते हैं।  यह प्रचार भयभीत और कमजोर लोगों के दिमाग की देन है।  मूलतः सभी जानते हैं योग साधना से व्यक्ति में एक नयी स्फूर्ति आने के साथ ही उसके मन मस्तिष्क में आत्मविश्वास पैदा होता है जिससे वह किसी दूसरे पर निर्भर नहीं रहता। इसलिये कायर और कमजोर लोग आलस्यवश न केवल स्वयं योग साधना से दूर रहते हैं बल्कि दूसरों में भी नकारात्मक भाव पैदा करते हैं।
            योग साधना की बातें सभी करते हैं पर महर्षि पतंजलि योग के सूत्रों का पढ़ने और समझने की समझ किसमें कितनी है यह तो विद्वान लोग ही बता सकते हैं।  हमारा एक अनुभव है कि जो नित्य योग साधना करते हैं उन्हें इसका अध्ययन अवश्य करना चाहिये। जिस तरह आसना के समय सांसों के अभ्यास से दोनों काम होते हैं उसी तरह योग सूत्र पढ़ने पर हम उनसे होने वाले लाभों को पढ़कर अधिक ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सबसे बड़ी बात यह कि समाधि विषयक भ्रम दूर हो जाते हैं।


दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
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Saturday, November 1, 2014

राज्य प्रबंधक धूर्त कर्मचारियों को दंडित करते रहें-मनुस्मृति के आधार पर चिंत्तन लेख(rajya prabandhak dhurt karamchariyon ko dandit karen-A Hindu hindi reiligion thought based on manu smriti)

      हमारे देश में लोकतांत्रिक प्रणाली अवश्य है पर यहां की राज्य प्रबंध व्यवस्था वही है जो अंग्रेजों ने प्रजा को गुलाम बनाये रखने की भावना से अपनायी थी। उन्होंने इस व्यवस्था को इस सिद्धांत पर अपनाया था कि राज्य कर्मीं ईमानदार होते हैं और प्रजा को दबाये रखने के लिये उन्हें निरंकुश व्यवहार करना ही  चाहिये।  राजनीतिक रूप से देश स्वतंत्र अवश्य हो गया पर जिस तरह की व्यवस्था रही उससे देश में राज्य प्रबंध को लेकर हमेशा ही एक निराशा का भाव व्याप्त  दिखता रहा है।  इसी भाव के कारण  देश में अनेक ऐसे आंदोलन चलते रहे हैं जिनके शीर्ष पुरुष देश में पूर्ण स्वाधीनताा न मिलने की शिकायत करतेे है।

मनुस्मृति में कहा गया है कि

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शरीकर्षात्प्राणाः क्षीयन्ते प्राणिनां यथा।

तथा राज्ञामपि प्राणाः क्षीयन्ते राष्ट्रकर्षणात्।।

     हिन्दी में भावार्थ-जिस प्रकर शरीर का अधिक शोषण करने से प्राणशक्ति कम होती उसी तरह जिस राज्य में प्रजा का अधिक शोषण होने वहां अशांति फैलती है।

राज्ञो हि रक्षाधिकृताः परस्वादयिनः शठाः।

भृत्याः भवन्ति प्रायेण तेभ्योरक्षेदियाः प्रजाः।।

     हिन्दी में भावार्थ-प्रजा के लिये नियुक्त कर्मचारियों में स्वाभाविक रूप से धूर्तता का भाव आ ही जाता है। उनसे निपटने का उपाय राज्य प्रमुख को करना ही चाहिए।
      देश की अर्थव्यवस्था को लेकर अनेक विवाद दिखाई देते हैं।  यहां ढेर सारे कर लगाये जाते हैं।  इतना ही नहीं करों की दरें जिस कथित समाजवादी सिद्धांत के आधार पर तय होती है वह कर चोरी को ही प्रोत्साहित करती है।  इसके साथ ही  कर जमा करने तथा उसका विवरण देते समय करदाता  इस तरह  अनुभव करते हैं जैसे कि उत्पादक नागरिक होना जैसे एक अपराध है।  देश के कमजोर, गरीब तथा अनुत्पादक लोगों की सहायता या कल्याण करने का सरकार को करना चाहिये पर इसका यह आशय कतई नहीं है कि उत्पादक नागरिकों पर बोझ डालकर उन्हें करचोरी के लिये प्रोत्साहित किया जाये।      यह हैरानी की बात है कि कल्याणकारी राज्य के नाम करसिद्धांत अपनाये गये कि गरीब लोगों की भर्लाइै के लिये उत्पादक नागरिकों पर इतना बोझ डाला जाये कि वह अमीर न हों पर इसका परिणाम विपरीत दिखाई दिया जिसके अनुसार  पुराने पूंजीपति जहां अधिक अमीर होते गये वहीं मध्यम और निम्न आय का व्यक्ति आय की दृष्टि से नीचे गिरता गया।  इतना ही नहीं  ऐसे नियम बने जिससे निजी व्यवसाय या लघु उद्यमों की स्थापना कठिन होती गयी।
            हालांकि अब अनेक विद्वान यह अनुभव करते हैं कि राज्य प्रबंध की नीति में बदलाव लाया जाये। इस पर अनेक बहसें होती हैं पर कोई निर्णायक कदम इस तरह उठाया नहीं जाता दिख रहा है जैसी कि अपेक्षा होती है।  हालांकि भविष्य में इसकी तरफ कदम उठायेंगे इसकी संभावना अब बढ़ने लगी है।  एक बात तय है कि कोई भी राज्य तभी श्रेष्ठ माना जाता है जहां प्रजा के अधिकतर वर्ग खुश रहते हैं।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Thursday, October 23, 2014

मस्तिष्क की स्मृतियां ही संस्कार होती हैं-पतंजलि योग विज्ञान(mastishk ki smritiyan hi sanskar-patanjali yoga vigyan)




            आमतौर से सामान्य भाषा में स्मृति तथा संस्कार एकरूप नहीं होते।  स्मृतियों को पुराने विषय, व्यक्ति, दृश्य अथवा अनुभूतियों के स्मरण का भंडार माना जाता है जबकि संस्कार मस्तिष्क में स्थापित मानवीय व्यवहार के स्थापित सिद्धांतों के रूप में समझा जाता है। पतंजलि योग का अध्ययन करें तो लगता है कि संस्कार स्मृति का ही एक भाग है।  जीवन व्यवहार के सिद्धांत अंततः स्मृति समूह का ही वह भाग है जो मानव मस्तिष्क को प्रभावित करते हैं।

पतंजलि  योग सूत्र  में कहा गया है

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जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानष्यानन्तर्य स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्।।


     हिन्दी में भावार्थ-पतंजलि योग सूत्र के अनुसार जाति, देश काल इन तीनों से संपर्क टूटने पर भी स्वाभाविक कर्म संस्कारों में बाधा नहीं आती क्योंकि स्मृति और संस्कारों का एक ही रूप होता है।

     हम इस श्लोक में योग के संस्कारिक रूप को समझ सकते हैं। जब मनुष्य बच्चा होता है तब उसके अपने घर परिवार, रिश्तेदारी, विद्यालय तथा पड़ौस के लोगों से स्वाभाविक संपर्क बनते हैं। वह उनसे संसार की अनेक बातें ऐसी सीखता है जो उसके लिये नयी होती हैं। वह अपने मन और बुद्धि के तत्वों में उन्हें स्वाभाविक रूप से इस तरह स्थापित करता है जीवन भर वह उसकी स्मृतियों में बनी जाती हैं। कहा भी जाता है कि बचपन में जो संस्कार मनुष्य में आ गये फिर उनसे पीछा नहीं छूटता और न छोड़ना चाहिए क्योंकि वह कष्टकर होता है।
      यही कारण है कि माता पिता तथा गुरुओं से यह अपेक्षा की जाती है कि वह अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दें। संभव है बाल्यकाल में अनेक बच्चे उनकी शिक्षा पर ध्यान न दें पर कालांतर में जब वह उनकी स्थाई स्मृति बनती है तब वह उनका मार्ग प्रशस्त करती है। इसलिये बच्चों के लालन पालन में मां की भूमिका सदैव महत्वपूर्ण मानी गयी है क्योंकि बाल्यकाल में वही अपने बच्चे के समक्ष सबसे अधिक रहती है और इसका परिणाम यह होता है कि कोई भी मनुष्य ऐसा नहीं है जो अपनी मां को भूल सके।
      इसलिये हमारे अध्यात्मिक संदेशों में अच्छी संगत के साथ ही अच्छे वातावरण में भी निवास बनाने की बात कहीं जाती है। अक्सर लोग कहते हैं कि पास पड़ौस का प्रभाव मनुष्य पर नहीं पड़ता पर यह गलत है। अनेक बच्चे तो इसलिये ही बिगड़ जाते हैं क्योंकि उनके बच्चे आसपास के गलत वातावरण को अपने अंदर स्थापित कर लेते हैं।
      यही नहीं आज के अनेक माता पिता बाहर जाकर कार्य करते हैं और सोचते हैं कि उनका बच्चा उनकी तरह ही अच्छा निकलेगा तो यह भ्रम भी उनको नहीं पालना चाहिये क्योंकि किसी भी मनुष्य की प्रथम गुरु माता की कम संगत बच्चों को अनेक प्रकार के संस्कारों से वंचित कर देती है। ऐसे लोग सोचते हैं कि उनका बच्चा बड़ा होकर ठीक हो जायेगा या हम उसे संभाल लेंगे तो यह भी भ्रामक है क्योंकि जो संस्कार कच्चे दिमाग में स्मृति के रूप में स्थापित करने का है वह अगर निकल गया तो फिर अपेक्षायें करना निरर्थक है। युवा होने पर दिमाग पक्का हो जाता है और सभी जानते हैं कि पक्की मिट्टी के खिलोने नहीं बन सकते-वह तो जैसे बन गये वैसे बन गये। दरअसल हम जिससे संस्कार कहते हैं वह प्रारम्भिक काल में स्थापित स्मृतियों का विस्तार ही हैं इसलिये अगर हम अपेक्षा करते हैं कि हमारे बच्चे आगे चलकर वह काम करें जो हम स्वयं चाहते हैं तो उसकी शिक्षा पहले ही देना चाहिए। यह स्मृतियां इस तरह की होती हैं कि देश, काल तथा जाति से कम संपर्क रहने न बिल्कुल न होने पर भी बनी रहती हैं और मनुष्य अपने संस्कारों से भ्रष्ट नहीं होता है अगर किसी लोभवश वह अपना पथ छोड़ता भी है तो उसे भारी कष्ट उठाना पड़ता है और फिर अपने स्थान पर वापस आता है।
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, September 6, 2014

शुद्ध भाव होने पर ही सत्संग से लाभ संभव-रहीम दर्शन के आधार पर चिंत्तन(shuddha bhaw hone par he satsang se labh sambhav-a Hindu hindu religion thought based on rahim darshan)



                      हमारे देश में धर्म पर व्याख्यान करना भी एक तरह से पेशा रहा है। यह अलग बात है कि कथित धर्म प्रचारक कभी प्रत्यक्ष रूप से अपने परिश्रम का प्रतिफल शुल्क या मूल्य के रूप में नहीं लेते देखे गये  पर दान दक्षिणा के नाम पर उन्हें इतना मिल जाता है कि वह अपना घर चला ही लेते हैं। अब तो यह देखा जा रहा है कि धार्मिक संगठनों के प्रमुख किसी पूंजीपति  से कम नहीं रह गये।  दवा, कपड़े, खानेपीने का सामान तथा पूजा सामग्री बेचने के अलावा अनेक धार्मिक संगठन तीर्थयात्राओं का भी इंतजाम करने लगे हैं। अनेक धार्मिक प्रमुखों के आश्रम राजमहल की तरह हैं तो उनके शिष्यों के आवास भी होटल से कम नहीं होते।
                      हम जिस धर्म को आचरण में लाने पर प्रमाणिक मानते हैं वही वस्तुओं के विक्रय तथा अनेक सेवाओं के लिये एक विज्ञापन की छाप बन गया है। एक तरह से बाज़ार स्वामियों  का एक बहुत बड़ा भाग धर्म की आड़ लेकर व्यापार कर रहा है। यही कारण है कि ऐसा लगता है जैसे हमारा पूरा देश ही धर्ममय हो रहा है पर इधर यह भी दिखाई देता है कि समाज में  नैतिक आचरण भी निरंतर पतन की तरफ जा रहा है। आर्थिक विकास दृष्टि से हम जहां आगे जा रहा है वहीं मानसिक रूप से हमारा समाज पिछड़ रहा है।

कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन जो तुम कहत थे, संगति ही गुन होय।
बीच उखारी रसभरा, रस काहै न होय।।
                   सरल हिन्दी में व्याख्या-यह कहना गलत है कि सत्संग का असर मनुष्य पर सदैव अच्छा होता है।  ईख के खेत में उगन वाला रसभरा पौध कभी रस से नहीं होता है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि हम भौतिक विषयों पर किसी एक सूत्र के आधार पर निर्णय नहीं कर सकते क्योंकि मनुष्य देह जहां प्रत्यक्ष दिखती है वहीं उसमें बैठा मन कभी दिखाई नहीं देता जो कि बंदर की तरह नाचता और नचाता है। मनुष्य मन को धर्म के नाम पर सहजता से भरमाया जा सकता है। वह कब किसी तरह गुलाटी मारेगा इसका कोई तयशुदा सूत्र नहीं है। यही कारण है कि जहां हमारे देश के ऋषि मुनि समाज को हमेशा ही अन्धविश्वास  से दूर रहने की प्रेरणा देते रहे हैं वहीं चालाक लोगों का एक वर्ग कर्मकांडों से समाज को स्वर्ग दिलाने की आड़ में भ्रमित करता रहा है।  आधुनिक समय में पैसे का खेल इस कदर हो गया है कि अनेक प्रकार के आकर्षक धार्मिक स्थान बन गये हैं जो जहां लोग श्रद्धा से कम पर्यटन करने अधिक जाते हैं।  अनेक पर्यटन स्थल तो सर्वशक्तिमान की दरबारों की वजह से ही प्रसिद्ध हैं। वहां भारी भीड़ जुटती है। करोड़ों का चढ़ावा आता है।  आने वाले सभी लोगों को श्रद्धालू और दानी माने तो हमारा पूरा समाज देवत्व का प्रमाण माना जाना चाहिये पर ऐसा है नहीं। देश में व्याप्त भ्रष्टाचारशोषण, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, नशेबाजी और सट्टेबाजी को देखें तब लगता है कि यहां असुरों की संख्या भी कम नहीं है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि कथित रूप से धर्म की संगत करने का कोई लाभ तब तक नहीं होता जब तक अपनी नीयत साफ न हो। श्रद्धा के बिना सत्संग में जाने से मन में विचार स्वच्छ नहीं होते और इसके अभाव में मनुष्य का व्यवहार अच्छा नहीं होता।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Saturday, August 30, 2014

प्रभावशाली मनुष्य के दुश्मन भी बहुत होते हैं-कौटिल्य के अर्थशास्त्र के आधार पर चिंत्तन लेख(prabhawshali manushya ke shatru bhi bahut hute hain-A Hindu hindi religion thought based on economics of kautilya)



            जिस व्यक्ति के पास धन, प्रतिष्ठा और बाहुबल की कमी है उसके शत्रु अधिक नहीं होते। सीधी बात कहें तो इस सांसरिक जीवन में आम आदमी की बजाय खास आदमी के लिये खतरे बहुत होते हैं।  इस संसार में तीन प्रकार की प्रवृत्ति के लोग होते हैं-सात्विक, राजसी और तामसी-इनमें सबसे अधिक सक्रियता राजसी प्रकृत्ति के लोगों की होती है।  इसे यूं भी कहा जा सकता है कि जीवन में अपने कार्यक्षेत्र में अधिक से अधिक सक्रियता दिखाकर पैसा, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त करना ही राजसी प्रकृत्ति का प्रमाण हो सकता है।  जिन लोगों में लोभ, मद, मोह, क्रोध तथा कामनाओं का भंडार होता है वह निरंतर सक्रिय रहते हैं और इसी कारण उन्हें कड़ी प्रतिद्वंद्वता का सामना भी करना होता है। उनकी सफलताओं के कारण लोग उनसे ईर्ष्या तो करते ही हैं पर अतिसक्रियता के दोष से उनके शत्रु भी बन जाते हैं।  यही कारण है कि संतोष सदा सुखी होता है और लालची सदैव कष्ट उठाता है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया कि

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न जातु गच्छेद्धिश्वासे सन्धितोऽपि हि बुद्धिमान।
अद्रोहसमयं कृत्यां वृत्रमिन्द्रः पुरात्त्वद्यीत्।।


     हिन्दी में भावार्थ-अगर किसी कारणवश किसी से संधि भी की जाये तो उस पर विश्वास नहीं करना चाहिए। मैं वैर नहीं करूंगायह कहकर भी इन्द्र ने वृत्रासुर को मार डाला था।

ज्यायांसं सिंहः साहसं यथं मध्नाति दन्तिनः।
तस्मार्तिह इवोदग्रमात्मानं वीक्ष्ण सम्पतेत्।।


     हिन्दी में भावार्थ-शक्तिशाली सेना को साथ लिए शत्रु को युद्ध में मारने पर राजा का प्रभाव बढ़ता है। इसी प्रताप के कारण सभी जगह उसके दूसरे शत्रु भी पैदा होते हैं।

      मनुष्य जीवन अद्भुत है और रहस्यमय भी। मनुष्य को अन्य जीवों से अधिक बुद्धि वरदान में मिली है और वही उसकी सबसे शत्रु और मित्र भी है। जहां पशु पक्षी तथा अन्य जीव मनुष्य के एक बार मित्र हो जाते हैं तो फिर शत्रुता नहीं करते मगर स्वयं मनुष्य ही एक विश्वसनीय जीव नहीं है। वह परिस्थितियों के अनुसार अपनी वफादारी बदलता रहता है। अतः यह कहना कठिन है कि कोई मित्र अपने संकट निवारण या स्वार्थ सिद्धि का अवसर आने पर विश्वासघात नहीं करेगा। ऐसे में किसी शत्रु से संधि हो या मित्र से नियमित व्यवहार की पक्रिया उसमें कभी स्थाई विश्वास की अपेक्षा नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा एक बात यह भी ध्यान रखना चाहिए कि दूसरे के प्रति कठोरता या हिंसा का व्यवहार न करें। अनेक बार मनुष्य अपने को प्रभावशाली सिद्ध करने के लिये अपने से हीन प्राणी पर अनाचार करता है या फिर हमला कर उसे मार डालता है। इससे अन्य मनुष्य डर अवश्य जाते हैं पर मन ही प्रभावशाली आदमी के प्रति शत्रुता का भाव भी पाल लेते हैं। समय आने पर प्रभावशाली आदमी जब संकट में फंसता है तो वह उनका मन प्रसन्न हो जाता है। इसलिये जहां तक हो सके क्रूर तथा हिंसक व्यवहार से बचना चाहिए।


संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Saturday, August 16, 2014

संत कबीर दर्शन-मनुष्य पैसा कमाते हुए नहीं थकता(sant kabir darshan-manusha paisa kamane mein nahin thakta)



            भौतिकतावाद के सिद्धांत में अध्यात्मिक दर्शन का कोई स्थान नहीं है।  आधुनिक अर्थशास्त्र में तो स्पष्टतः दार्शनिक सिद्धांतों पर चर्चा ही वर्जित है।  हम जब भारतीय अध्यात्मिक या दार्शनिक विचाराधारा पर का विचार करते हैं तो उसमें बिना अध्यात्मिक ज्ञान के आदमी आर्थिक विषय में भी दक्ष नहीं हो सकता।  भले ही कोई आदमी कितना भी पैसा कमा ले पर उसे मानसिक संतोष नहीं हो सकता।  वह सुख सुविधा के ढेर सारे सामान जुटा लेता है वह शांति अनुभव नहीं कर सकता। सुख या दुःख की अनुभव संवेदनाओं से है जो अंदर ही रहती हैं  जब तक अंदर दृढ़ता नहीं होगी बाहर आदमी का व्यवहार आत्मविश्वास से रहित हो जाता है।  पाश्चात्य संस्कृति तथ संस्कारों के प्रभाव में हमारा समाज अध्यात्मिक ज्ञान से दूर हो गया है।  वह उस भौतिकतावाद की तरफ मुड़ गया है हो अंतहीन है।

संत कबीर खाते हैं कि
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कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं|
तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं||
      हिंदी में भावार्थ-संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।

     इस दुनिया में मनुष्य ही एक ऐसा जीवन जिसके पास बुद्धि में विवेक है इसलिये वह कुछ नया निर्माण कर सकता है। अपनी बुद्धि की वह से ही वह अच्छे और बुरे का निर्णय कर सकता है। सच तो यह कि परमात्मा ने उसे इस संसार पर राज्य करने के लिए ही बुद्धि दी है पर लालच और लोभ के वश में आदमी अपनी बुद्धि गुलाम रख देता है। वह कभी भी धन प्राप्ति के कार्य से थकता नहीं है। अगर हजार रुपये होता है तो दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख की चाहत करते हुए उसकी लालच का क्रम बढ़ जाता है। कई बार तो ऐसे लोग भी देखने में आ जाते है जिनके पेट में दर्द अपने खाने से नहीं दूसरे को खाते देखने से उठ खड़ा होता है।
            अनेक धनी लोग जिनको चिकित्सकों ने मधुमेह की वजह से खाने पर नियंत्रण रखने को कहा होता है वह गरीबों को खाता देख दुःखी होकर कहते भी हैंदेखो गरीब होकर खा कैसे रहा है। इतना ही नहीं कई जगह ऐसे अमीर हैं पर निर्धन लोगों की झग्गियों को उजाड़ कर वहां अपने महल खड़े करना चाहते हैं। आदमी एक तरह से विकास का गुलाम बन गया है। भक्ति भाव से पर आदमी बस माया के चक्कर लगाता है और वह परे होती चली जाती है। सौ रुपया पाया तो हजार का मोह आया, हजार से दस हजार, दस हजार से लाख और लाख से दस लाख के बढ़ते क्रम में आदमी चलता जाता है और कहता जाता है कि अभी मेरे पास कुछ नहीं है दूसरे के पास अधिक है। मतलब वह माया की सीढियां चढ़ता जाता है और वह दूर होती जाती है। इस तरह आदमी अपना पूरा जीवन नष्ट कर देता है।
            आजकल तो जिसे देखो उस पर विकास का भूत चढ़ा हुआ है। कहते हैं कि इस देश में शिक्षा की कमी है पर जिन्होने शिक्षा प्राप्त की है तो इसका मतलब यह कदापि नहीं है कि उन्होंने ज्ञान भी प्राप्त कर लिया है। इसलिये शिक्षित आदमी तो और भी माया के चक्कर में पड़ जाता है और उसे तो बस विकास की पड़ी होती है पर उसका स्वरूप उसे भी पता नहीं होता। लोगों ने केवल भौतिक उपलब्धियों को ही सबकुछ मान लिया है और अध्यात्म से दूर हो गये हैं उसी का परिणाम है कि सामाजिक वैमनस्य तथा मानसिक तनाव बढ़ रहा है। अत: जितना हो सके उतना ही अपनी पर नियंत्रण रख्नना चाहिये।
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Sunday, August 10, 2014

चाणक्य नीति-तत्वज्ञानियों का देव सभी जगह व्याप्त(chankya neeti-tatvagyaniyon ka dew sabhe jagah vyapt)



            जकल धर्म के नाम पर समाज में  कथित एकता स्थापित करने के लिये  यह नारा दिया जाता है कि ईश्वर एक है। वैसे तो  चाहे जिस स्वरूप की आराधना करें उसमें एक ही  ईश्वर के प्रति  ही आस्था का भाव स्वीकार किया जाना चाहिये। वैसे भारतीय अध्यात्म दर्शन में भी कुछ इस तरह ही कहा गया है पर अगर हम उसमें वर्णित संदेशों का अध्ययन करें तो पता चलता है कि ईश्वर अनंत है।  उसके स्वरूप, गुण, विचार, तथा क्रियाओं को प्रत्यक्ष देखना लगभग असंभव है।  वह एक भी हो सकता है और अनेक भी।  वह अदृश्य है इसलिये उसके बारे में निश्चित रूप से कहना ठीक नहीं हैं। अन्य धर्मों के विद्वानों की क्या कहें स्वयं भारतीय धर्म के अनेक विद्वान आपस में उलझ जाते हैं।  एक वर्ग कहता है कि ईश्वर एक है और उसकी जिस रूप में आराधना की जाये अच्छा है, दूसरा कहता है कि उसकी लीला अनंत और अपरंपार है जिसे जानने की बजाय उसकी निराकार भक्ति करना ही श्रेष्ठ है।
            इस तरह के विवादों पर कोई निष्कर्ष न निकलता है न आगे संभावना है पर एक बात तय है कि ज्ञानी और साधक इस तरह की बहसों में मौन रहकर अपनी योग्यता का ही प्रमाण देते हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में स्पष्ट रूप से भक्ति तथा भक्तों के चार रूप बताये गये हैं-आर्ती, अर्थाथी, जिज्ञासु और ज्ञानी।  इसका सीधा मतलब यही है कि इस संसार में चार प्रकार के भक्त मौजूद रहेंगे और किसी पर कटाक्ष करना या किसी की भक्ति में दोष देखना अज्ञान का ही प्रमाण है।

चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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अग्रिर्देवो द्विजातीनां मुनीनां हृदि दैवतम्।
प्रतिमा स्पल्पबुछीनां सर्वत्र समदिर्शनाम्।।
            हिन्दी में भावार्थ-द्विजाति के देव अग्नि, मुनियों का देव हृदय तथा अल्पबुद्धिमानों का देव मूर्तियों में निवास करता है पर तत्वज्ञानी समदर्शी होते हैं इसलिये उनका देव हर जगह बसता है।

            भारतीय धार्मिक परंपराओं में भी अनेक प्रकार की उपासना पद्धतियां प्रचलित हैं।  श्रीमद्भागवत गीता में भी भगवान श्रीकृष्ण ने हर उपासना पद्धति को मान्यता दी है पर यह भी माना है कि तत्वज्ञानी तो उनका ही स्वरूप है। कहने का अभिप्राय यह है कि जो वास्तव में तत्वज्ञानी है उसके लिये परमात्मा सभी जगह है।  वह किसी विशेष स्थान को सिद्ध मानकर वहां उपस्थिति देने की बाध्यता अनुभव नहीं करता यह अलग बात है कि जिज्ञासावश ज्ञानी ऐसे स्थानों पर जाते हैं। धाार्मिक बहसों में स्वयं को धार्मिक विद्वान साबित करना या जगह जगह ज्ञान बघारकर शिष्य संचय करना ज्ञानियों का स्वाभाविक कर्म कभी नहीं बन पाता।  न ही वह आश्रम बनाकर स्वयं को गुरु पद पर प्रतिष्ठत करते हैं। ज्ञानी तो श्रीमद्भागवत गीता के गुण तथा कर्म विभाग के सिद्धांतों को जानने के बाद सांसरिक विषयों में निर्लिप्त भाव से इस तरह व्यस्त होते हैं जैसे कीचड़ में कमल रहता है।

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Thursday, July 31, 2014

भर्तृहरि नीति शतक-भक्ति के अलावा कल्याण का अन्य मार्ग नहीं(bhakti ke alawa kalyan ka anya marg nahin-bhartrihari neeti shatak)



           क बात तय है कि जिनके पास धन, पद और बाहुबल है उनसे यह विनम्रता की आशा करना व्यर्थ ही है। खासतौर से उन लोगों को जिन्हें बिना परिश्रम के ही इस संसार में भौतिक उपलब्धि प्राप्त हो जाती है।विश्व के सभी देशों में करीब करीब राजतंत्र समाप्त हो चुका है।  कहीं पूर्ण लोकतंत्र है जहां वास्तव में जनता के बीच से प्रतिनिधि चुने जाते हैं तो कहीं तानाशाही है वहां भी लोकतांत्रिक प्रणाली होने का दावा जरूर किया जाता है। जहां लोकतंत्र हैं वहां भी जनप्रतिनिधि कालांतर में राजा की तरह व्यवहार करते हैं तो जहां तानाशाही है वहां भी कथित राजप्रमुख राजा की तरह स्थाई रूप से गद्दी पर विराजमान रहते हैं। आम आदमी की जिंदगी हमेशा ही कठिन होती है पर आजकल के समय में तो लगभग दुरूह हो गयी है। बढ़ती महंगाई, हिंसा, तथा भ्रष्टाचार ने आम आदमी को त्रस्त कर दिया है। ऐसे में हर आम इंसान सोचता है कि वह बड़े आदमी की चमचागिरी कर जीवन में शायद  कोई उपलब्धि प्राप्त कर ले। इस भ्रम में अनेक लोग बड़े लोगों की चाटुकारिता लगते हैं, मगर फायदा उसी को होता है जो दौलतमंदों के तलवे चाटने की हद तक जा सकता है। सच तो यह है कि कोई आदमी कितना भी दौलत, शौहरत या पद की ऊंचाई पर पहुंच जाये पर उसकी मानसिकता छोटी रहती है। ऐसे में उनकी चमचागिरी से सभी को कुछ हासिल नहीं होता इसलिये जहां तक हो सके अपने अंदर आत्मविश्वास लाकर जीवन में संघर्ष करना चाहिए।

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि

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दुरारध्याश्चामी तुरचलचित्ताः क्षितिभुजो वयं
तु स्थूलेच्छाः सुमहति बद्धमनसः।

जरा देहं मृत्युरति दयितं जीवितमिदं
सखे नानयच्छ्रेयो जगति विदुषेऽन्यत्र तपसः।।

      हिंदी में भावार्थ- जिन राजाओं का मन घोड़े की तरह दौड़ता है उनको कोई कब तक प्रसन्न रख सकता है। हमारी अभिलाषायें और आकांक्षायें की तो कोई सीमा ही नहीं है। सभी के मन में बड़ा पद पाने की लालसा है। इधर शरीर बुढ़ापे की तरह बढ़ रहा होता है। मृत्यु पीछे पड़ी हुई है। इन सभी को देखते हुए तो यही कहा जा सकता है कि भक्ति और तप के अलावा को अन्य मार्ग ऐसा नहीं है जो हमारा कल्याण कर सके।

      लोगों के मन में धन पाने की लालसा बहुत होती है और इसलिये वह धनिकों, उच्च पदस्थ एवं बाहुबली लोगों की और ताकते रहते हैं और उनकी चमचागिरी करने के लिये तैयार रहते हैं। उनकी चाटुकारिता में कोई कमी नहीं करते। चाटुकार लोगों  को यह आशा रहती है कि कथित ऊंचा आदमी उन पर रहम कर उनका कल्याण करेगा। यह केवल भ्रम है। जिनके पास वैभव है उनका मन भी हमारी तरह चंचल है और वह अपना काम निकालकर भूल जाते हैं या अगर कुछ देते हैं तो केवल चाटुकारिता  के कारण नहीं बल्कि कोई सेवा करा कर। वह भी जो प्रतिफल देते हैं तो वह भी न के बराबर। इस संसार में बहुत कम ऐसे लोग हैं जो धन, पद और प्रतिष्ठा प्राप्त कर उसके मद में डूबने से बच पाते हैं।  अधिकतर लोग तो अपनी शक्ति के अहंकार में अपने से छोटे आदमी को कीड़े मकौड़े जैसा समझने लगते हैं और उनकी चमचागिरी करने पर भी कोई लाभ नहीं होता।  अगर ऐसे लोगों की निंरतर सेवा की जाये तो भी सामान्य से कम प्रतिफल मिलता है।
      सच तो यह है कि आदमी का जीवन इसी तरह गुलामी करते हुए व्यर्थ चला जाता हैं। जो धनी है वह अहंकार में है और जो गरीब है वह केवल बड़े लोगों की ओर ताकता हुआ जीवन गुंजारता है। जिन लोगों का इस बात का ज्ञान है वह भक्ति और तप के पथ पर चलते हैं क्योंकि वही कल्याण का मार्ग है।इस संसार में प्रसन्नता से जीने का एक ही उपाय है कि अपने स्वाभिमान की रक्षा करते हुए ही जीवन भर चलते रहें।  अपने से बड़े आदमी की चाटुकारिता से लाभ की आशा करना अपने लिये निराशा पैदा करना है।
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