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हिंदी मित्र पत्रिका

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Saturday, February 5, 2011

संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों की कमी नहीं है-हिन्दी चिंत्तन आलेख

जैसे जैसे मनुष्य का अध्यात्मिक ज्ञान बढ़ता जाता है वैसे वैसे उसे इस संसार के भोग विलास की वास्तविकता समझ में आती है। उपभोग की प्रवृत्ति किस तरह मनुष्य को पशु बनाकर अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के लिये इस संसार में बांधे रहती है इसका आभास तत्वज्ञानी को हो जाता है। ‘दिल मांगे मोर’ का नारा बाज़ार में प्रचार के माध्यम से इसलिये उछाला जाता है कि लोग विज्ञापित वस्तु का क्रय करने के लिये लालायित हों।
समाज में बाज़ार तथा उसके परचार माध्यमों से उपभोग कि प्रवृति बढ़ाई जा रही है रोज देखा जा सकता है।
  एक विज्ञापन में तो भारतीय फिल्मों का एक अभिनेता साफ कहता है कि ‘आदमी को कभी संतुष्ट नहीं होना चाहिए। जो लोग संतुष्ट होते हैं वह जिंदगी में कुछ नहीं कर पाते।’
कहने का अभिप्राय यह है कि मनुष्य की लालच का कोई अंत नहीं है। अक्सर समाचारों में यह चर्चा आती है कि भारत के उच्च वर्ग का बहुत सारा काला धन विदेशी बैंकों में जमा है। यह उच्च वर्ग ऐसा है जो यहां भारत में रहकर आदर्शवाद, नैतिकतावाद तथा कल्याण वाद की राह पर चलने का दावा करते हुए समाज पर नियंत्रण रखता है मगर उसकी पैसे की हवस मिटती नहीं। अनेक राजकीय अधिकारी पकड़े गये हैं जिन्होंने इतना धन अर्जित किया कि उनकी आगे की दस पीढ़ियां भी नहीं खा सकती। इतने सारे आवास बना लिये कि उनकी पचास पीढ़ियों के वंशज भी उसमें रह जायें तो कम लगें। यह केवल उच्च वर्ग ही नहीं सामान्य वर्ग पर भी लागू है। लोगों में अध्यात्मिक ज्ञान के प्रति रुझान ही नहीं रहा। समाज में भौतिकवाद का इतना बोलाबाला है कि अगर तत्वज्ञानी उनमें बैठकर ज्ञानचर्चा करे तो उसे पागल समझा जाता है। जिनके पास अध्यात्मिक ज्ञान है वह सांसरिक विषय में चर्चा करने में रुचि नहीं लेते तो उनको अज्ञानी मान लिया जाता है।
पुण्यैर्मूलफलैस्तथा प्रणयिनीं वृत्तिं कुरुष्वाधुना
भूश्ययां नवपल्लवैरकृपणैरुत्तिष्ठ यावो वनम्।
क्षधद्राणामविवेकमूढ़मनसां यन्नश्वाराणां सदा
वित्तव्याधिविकार विह्व्लगिरां नामापि न श्रूयते।।
"भर्तृहरि महाराज अपने प्रजाजनों से कहते हैं कि अब तुम लोग पवित्र फल फूलों खाकर जीवन यापन करो। सजे हुए बिस्तर छोड़कर प्रकृति की बनाई शय्या यानि धरती पर ही शयन करो। वृक्ष की छाल को ही वस्त्र बना लो लो। अब यहां से चले चलो क्योंकि वहां उन मूर्ख और संकीर्ण मानसिकता वाले लोगों का नाम भी सुनाई नहीं देगा जो अपनी वाणी और संपत्ति से रोगी होने के कारण अपने वश में नहीं है।"
ऐसे में ज्ञानियों के लिये मौन ही अच्छा है। अपने नियमित कर्मं करने के साथ ही ज्ञानियों के लिये यह भी जरूरी है कि वह भौतिकवादी लोगों के बाहुल्य वाले समाज में अर्थ, प्रतिष्ठा या उच्च पद के अभाव में सम्मान या इनाम की आशा न करें। वह तो दृष्टा की तरह इस संसार को देखें और अपना काम करते जायें।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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Sunday, January 30, 2011

सभी गृहस्थ यज्ञ नहीं करते- हिन्दी चिंत्तन लेख (grahastha aur yagya-hindi chintan lekh)

कुछ लोग प्रत्यक्ष रूप से भक्त तथा यज्ञ करते नहीं दिखते हैं और न ही भक्त होने का पाखंड रचते हैं जबकि समाज में ऐसे लोगों की संख्या अधिक है जो धर्म के नाम पर कर्मकांड अथवा यज्ञ करने के लिये दबाव बनाते हैं। अनेक लोग बिना किसी दिखावे के सात्विक जीवन जीते हैं पर चूंकि वह हवन तथा यज्ञ आदि नहीं करते तो लोग उनको नास्तिक होने का ताना देते हैं। सच बात तो यह है कि यज्ञ तथा हवन आदि करने से अधिक महत्वपूर्ण बात यह है कि मनुष्य हृदय में तत्व ज्ञान धारण करे। इसके लिये प्राचीन ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिए। नियमित अध्ययन करने से जिज्ञासा बढ़ती है और अभ्यास से तत्वज्ञान का अनुभव हो जाता है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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यथायथा हि पुरुषः शास्त्रं समधिगच्छति।
तथातथा विज्ञानाति विज्ञानं चास्य रोचते।।
‘‘जैसे जैसे कोई व्यक्ति शास्त्र का अभ्यास करता है वैसे ही उसे गूढ़ ज्ञान की प्राप्ति होती है और उसकी प्रवृत्ति और जिज्ञासा ज्ञान विज्ञान में बढ़ती जाती है।’’
एक बात निश्चित है कि हमारे पुराने ग्रंथों में ज्ञान के साथ विज्ञान भी अंतर्निहित है। कुछ लोग आज विज्ञान के युग में भारतीय अध्यात्मिक दर्शन को हेय मानते हैं पर उनको यह पता ही नहीं कि विज्ञान का आधार भी तत्वज्ञान है जिसके कारण हमारे प्राचीन अध्यात्मिक ग्रंथ विज्ञान के विषय में सामग्री से परिपूर्ण हैं।
कुछ लोग मंदिर न जाने या यज्ञों तथा हवनों में सक्रिय भागीदारी न करने वाले लोगों पर कटाक्ष करते हैं पर यह उनका ही अज्ञान है।
इस विषय पर मनुस्मृति में कहा गया है कि
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‘‘शास्त्रों के ज्ञाता कुछ गृहस्थ यज्ञादि नहीं करते पर अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण कर अपनी अध्यात्मिक शक्ति में वृद्धि करते हैं। उनके लिये लिये नाक, जीभ, त्वचा, तथा कान पर संयम रखना ही एक तरह से महायज्ञ है।
सच बात तो यह है कि धर्म तभी ही प्रशंसनीय है जब वह आचरण तथा कर्म में दृष्टिगोचर हो न कि केवल कर्मकांड और दिखावे में। कुछ लोग जो प्रतिदिन मंदिर जाते हैं वह दूसरों को अभक्त समझते हैं जो कि उनके अज्ञान का प्रमाण है। इतना ही नहीं कुछ तो लोग ऐसे हैं जो प्रतिदिन पूजा आदि करते हैं पर व्यवहार में ऐसा अहंकार दिखाते हैं जैसे कि वही भगवान के इकलौते भक्त हों। जो वास्तव में भक्त और ज्ञानी हैं वह दिखावे से अधिक आत्मनियंत्रण तथा आचरण से उसे प्रमाणित करते हैं।
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Saturday, January 29, 2011

अल्पचित्त वालों को बुढ़ापा जल्दी घेरता है-हिन्दी चिंत्तन आलेख (alpachitta vale aur budhape-hindi chittan aalekh)

कुछ पुरुषों का स्वभाव ही ऐसा होता है कि वह किसी स्त्री का चेहरा देखने के लिये व्यग्र रहते हैं। वैसे यह तो मानवीय स्वभाव है कि विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण रहता है पर कुछ पुरुष स्त्रियों को देखकर अपनी सुधबुध खो बैठते हैं। इतना ही नहीं कुछ तो ऐसे भी होते हैं जो वैसे बहुत खामोश रहते हैं पर स्त्री पास हो तो वाचाल हो उठते हैं। ऐसे पुरुष अल्पचित वाले होते हैं। उनके चित्त में दृढ़ता का अभाव होता है। परिणाम यह होता है कि युवावस्था बीत जाने पर उनकी दैहिक सक्रियता समाप्त हो जाती है और बुढ़ापे का रोग उनको घेर लेता है।
इस बारे में कौटिल्य महाराज अपने अर्थशास्त्र में कहते हैं कि
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स्त्रीमुखालोकतनया व्यग्राणामल्पचेतसां।
ईहितानि हि गच्छन्ति यौवनेन सह क्षयम्।।
‘‘जिन पुरुषों का चित्त का भाव अल्प है वह हमेशा किसी स्त्री का मुख देखने के लिये व्यग्र रहते हैें। उनकी सब चेष्टायें उनकी जवानी बीतने के साथ ही समाप्त हो जाती हैं।’’
हमारी फिल्मों ने युवा पीढ़ी में अतिशीघ्र बुढ़ापा लाने का काम बखूबी किया है। उन फिल्मों में कहानी के नाम पर तो पूरा केंद्र नायक रहता है और नायिका का पात्र केवल नाच गाने या रोने हंसने तक ही सीमित रह जाता है। कभी कभी तो ऐसी फिल्में भी बनायी जाती हैं जिनका उद्देश्य यही होता है कि स्त्री चेहरों की चमक दिखाकर युवा दर्शक से पैसा ऐंठा जाये। सच कहें तो फिल्में केवल युवाओं के मन में युवा स्त्री चेहरे देखने की व्यग्रता देखने की इच्छा का दोहन करने के लिये बनायी जाती हैं। यही कारण है कि कई फिल्मों में कहानियां तो नाम की होती हैं जो केवल इसलिये ही लिखी जाती हैं कि अच्छी अच्छी हीरोईनों का चेहरा किसी तरह दिखाकर युवाओं को भ्रमित किया जाये।
अविवाहित युवक अपने जीवन में ऐसी ही अभिनेत्रियों जैसी पत्नी की कामना करने लगते हैं जो कि संभव नहीं हो पाता। जब यथार्थ में जीवन संगिनी मिलती है शुरुआती दौर के बाद उससे युवाओं का मोह भंग हो जाता है। फिर शुरुआत होता है उदासीनता का दौर जो कहीं तनाव का कारण बनता है तो कहीं बुढ़ापे का। यह संभव नहीं है कि यथार्थ जीवनी में कोई स्त्री प्रतिदिन वैसा ही श्रृंगार करे जैसा कि फिल्मों में होता है।
सच बात तो यह है कि इन्हीं फिल्मों की वजह से ही हमारे देश की युवापीढ़ी अल्प चित वाली हो गयी है और इस वजह से लोग ही चिंतन, मनन तथा अध्यात्मिक अध्ययन से दूर होते जा रहे हैं।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Wednesday, January 26, 2011

योग्य आदमी कभी अपनी प्रतिभा का दावा नहीं करते-हिन्दी धार्मिक लेख (yogyata aur pratibha-hindi dharmik lekh)

यह मानवीय स्वभाव है कि वह चाहता है कि उसका व्यक्तित्व दूसरे लोगों को आकर्षक लगे। दूसरों से मान पाने की भावना मनुष्य में तीव्रतर होती है मगर इसके लिये यह जरूरी है कि मनुष्य अपने हाथ से परोपकार के काम करे तथा अपने अच्छे आचरण का उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत करे। इसके लिये यह आवश्यक है कि कुछ कर्म निष्काम भाव से करने के साथ ही उद्देश्य हीन दया की जाये। यह सभी के लिये संभव नहीं है पर भला दिखने की चाहत होने के कारण मनुष्य आत्मप्रवंचना करता है। वह ऐसे कामों को अपने खाते में दिखाता है जो उसने किये ही नहीं-वरन् वह तो हुए भी नहीं।
सारा मनुष्य समुदाय अपना पूरा जीवन अपने तथा परिवार की स्वार्थपूर्ति में लगा देता है पर जहां अवसर मिले वहां अपने को बुद्धिमान तथा परोपकारी साबित करने के साथ ही दयालु होने का दावा करता है। विरले ही ज्ञानी तथा संत प्रवृत्ति के लोग होते हैं जो स्वार्थों की लीक से हटकर समाज के लिये निष्काम भाव से करने के साथ ही निष्प्रयोजन दया करते हैं। ऐसे लोग कभी दावे कर गाते नहीं है।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
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बड़ा बड़ाई ना करै, बड़ा न बोले बोल।
हीरा मुख से ना कहै, लाख टका मेरी मोल।
‘‘जो आदमी अपने अंदर बड़प्पन का भाव लेकर जीता है वह बड़ी बातें नहीं करता जिस तरह हीरा कभी अपने मुख से अपनी लाख टके कीमत होने की बात नहीं कहता।’’
आदमी के अंदर अगर योग्यता, प्रतिभा तथा ज्ञान है तो उसके आचरण तथा कर्म से प्रकट होता है। इसलिये ही ज्ञानी लोग अपने जीवन में नियमित कर्म के साथ ही ज्ञान संग्रह का काम भी करते हैं। समय मिलने पर सत्संग तथा हृदय से भगवान की भक्ति करते हैं। उनकी साधना, तप और ज्ञान का प्रकाश स्वयं ही सभी के सामने फैलता है। वह कभी दावा नहीं करते कि वह श्रेष्ठ व्यक्ति हैं। इसके विपरीत जिनके पास न ज्ञान है न साधना और तप करने की प्रवृत्ति वह खाली पीली अपनी डींगें मारते हैं। उनको कोई सामने कहता नहीं क्योंकि उनकी संगत भी तो ऐसे ही लोगों से होती है।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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