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Saturday, January 14, 2012

वेदान्त दर्शन से-शब्द को परब्रह्म मानना गलत नहीं (vedand darshan se-shabd ko parbrahm manna galat nahin)

              मनुष्य में पराशक्ति के प्रति हमेशा ऐसा आकर्षण है की वह अपने अंदर मौजूद शक्तियों का ज्ञान नहीं कर पाता। कुछ मनुष्य स्वयं को सिद्ध प्रमाणित  कर उसका कोई न कोई रूप प्रचारित कर देते हैं। उनका उद्देश्य पवित्र होता है। वह सोचते हैं कि इससे आम मनुष्य को बुरी राह से हटा कर धर्म मार्ग पर रखा जाये। व्यवहार में उल्टा होता है। लोग अपने अपने इष्ट के रूपों को लेकर आपस में विवाद करते हैं।
      विश्व में अनेक धर्म हैं। इनसे जुड़े धर्म समुदायों में भी विभाजन हो चुका है। विदेशों में प्रवर्तित धर्म और उसके समुदाय को वर्तमान में अध्ययन करें तो पायेंगे कि वह दो तीन तो कहीं चार भागों में बंट गये हैं। उनके धर्मगुरु अपने अनुयायियों को दूसरे धर्म के लोगों का भय दिखाकर भले ही अपने पाले में रखते हैं पर फिर भी उनके आपसी हिंसक संघर्ष होते रहते हैं। एक ही धर्म का एक समुदाय अपने को असली एवं शुद्ध बताता है तो दूसरे समुदाय को दुष्ट कहता है। इसके विपरीत भारतीय धर्मों में विभिन्न समुदाय होने के बावजूद कहीं आपसी संघर्ष का इतिहास नहीं है। सभी धर्म और उनके प्रवर्तक यह मानते हैं कि परमात्मा अनंत है। उसको साकार रूप से भले ही न देखा जाये पर ध्यान, योग तथा भक्ति के माध्यम से उसकी उपस्थिति की अनुभूति अपने हृदय में की जा सकती है। यह बात सही है कि लोग अपनी सुविधा के अनुसार साकार तथा निराकार भक्ति करते हैं पर एक दूसरे के प्रति उनमें आदरभाव रहता है। यहां तक कि एक ही परिवार में अनेक सदस्यों का अलग अलग इष्ट देव होता है पर मूल रूप से यह सभी मानते हैं कि परमात्मा एक है। इस पर कहीं कोई विवाद न होता है न होना चाहिए।
हमारे वेदांत दर्शन में कहा गया है कि
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साक्षादष्विरोधं जैमिनि।
            ‘‘शब्द को साक्षात् परब्रह्म मानने में भी कोई विरोध नहीं है ऐसा जैमिनि आचार्य मानते हैं।
अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः।
              ‘‘देश विशेष में ब्रह्म का प्रकट रूप होता है इसलिये इसमें कोई विरोध नहीं है।’’
‘‘अनुस्मृतेर्बादरिः।
             ‘‘ऐसा बादरि नामक आचार्य मानते हैं।
         कहने का अभिप्राय यह है कि भक्ति के स्वरूप या परमात्मा के अस्तित्व को लेकर भले ही आपस में मतभेद हों पर मनभेद नहीं होना चाहिए। इसके अलावा किसी की भक्ति की प्रक्रिया और परमात्मा के रूप पर भी प्रतिकूल टिप्पणियां न करना ही उचित है। हमारा अध्यात्मिक दर्शन मानव मन की व्यापकता का चिंतन करते हुए नित नये सिद्धांतों का प्रतिपादन करता है। हमारे यहां समय समय पर ऐसे महापुरुष भी इस धरती पर प्रकट होते हैं जो भले ही किसी धर्म या समुदाय के हों पर उनको सारा देश बाद में देवत्व का दर्जा प्रदान करता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Sunday, March 6, 2011

अधर्म का धन होली पर्व पर चुराई गयी लकड़ी की तरह शीघ्र नष्ट होता है-रहीम के दोहे (adharm ka dhan holi ke parva ki lakdi ki tarah-rahim ke dohe)

अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि‘आजकल समय खराब हो गया है और नयी पीढ़ी व्यसनों का शिकार हो रही है।’
हम समाज के नैतिक और अध्यात्मिक पतन के लिये बढ़ते हुए भौतिकतावद को दोष देते हैं। यह सही है पर इसके लिये मनुष्य के की शारीरिक सुख सुविधा तथा मनोरंजन के लिये बनी वस्तुओं का उपभोग नहीं बल्कि उनको खरीदने की लिये धन का वह स्वरूप है जो अधर्म पर आधारित होता है। सच तो यह है कि जब पहले देश में जब कृषि आधारित व्यवस्था में श्रम की प्रधानता थी तब लोग ईमानदारी और परिश्रम के मार्ग से अपना भौतिक विकास करते थे। यह मार्ग लंबा होता था पर लोग सहजता से जीवन व्यतीत करते थे। विश्व में आर्थिक उदारीकरण की लहर के बाद देश की सामान्य कार्यप्रणाली में परिवर्तन आया है। अब जिसे देखो नौकरी के पीछे भाग रहा है। जिनके पास शिक्षा की उपाधि है उनमें कोई भी व्यवसाय या कृषि को अपना लक्ष्य नहीं बनाता। जल्दी जल्दी धन कमाने के लिये अनेक व्यक्ति अधर्म तथा अपराध का काम करने लगते हैं। ऐसे में उनकी उपभोग की प्रवृत्ति भी वैसी होती जा रही है। शराब, जुआ तथा सट्टा जैसे व्यसनों का प्रकोप बड़ रहा है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार।
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार।।
‘‘पाप के धन को नष्ट होने में अधिक समय नहीं लगता। ठीक उसी तरह जैसे होली के अवसर पर कुछ लोग लकड़ी चुराकर लाते हैं और वह जलकर जल्दी नष्ट हो जाती है।’’
पाप का धन होली के लिये चुराई गयी लकड़ी की तरह ही नष्ट होता है। जिन लोगों के पास अधर्म की कमाई है उनका पैसा भी वैसे ही खर्च होता है। किसी को स्वयं ही शराब, जुआ, तथा सट्टे की आदत लग जाती है या फिर उनके परिवार के सदस्य इसका शिकार होते हैं। यह भी नहीं हुआ तो बीमारी अपना रौद्र रूप प्रकट कर पैसा बाहर निकलवाती है। इसलिये जहां तक संभव हो धर्म की कमाई करें क्योंकि शरीर के अच्छ स्वास्थ्य और मन की प्रसन्नता का यही एक उपाय है।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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Wednesday, January 26, 2011

योग्य आदमी कभी अपनी प्रतिभा का दावा नहीं करते-हिन्दी धार्मिक लेख (yogyata aur pratibha-hindi dharmik lekh)

यह मानवीय स्वभाव है कि वह चाहता है कि उसका व्यक्तित्व दूसरे लोगों को आकर्षक लगे। दूसरों से मान पाने की भावना मनुष्य में तीव्रतर होती है मगर इसके लिये यह जरूरी है कि मनुष्य अपने हाथ से परोपकार के काम करे तथा अपने अच्छे आचरण का उदाहरण समाज के सामने प्रस्तुत करे। इसके लिये यह आवश्यक है कि कुछ कर्म निष्काम भाव से करने के साथ ही उद्देश्य हीन दया की जाये। यह सभी के लिये संभव नहीं है पर भला दिखने की चाहत होने के कारण मनुष्य आत्मप्रवंचना करता है। वह ऐसे कामों को अपने खाते में दिखाता है जो उसने किये ही नहीं-वरन् वह तो हुए भी नहीं।
सारा मनुष्य समुदाय अपना पूरा जीवन अपने तथा परिवार की स्वार्थपूर्ति में लगा देता है पर जहां अवसर मिले वहां अपने को बुद्धिमान तथा परोपकारी साबित करने के साथ ही दयालु होने का दावा करता है। विरले ही ज्ञानी तथा संत प्रवृत्ति के लोग होते हैं जो स्वार्थों की लीक से हटकर समाज के लिये निष्काम भाव से करने के साथ ही निष्प्रयोजन दया करते हैं। ऐसे लोग कभी दावे कर गाते नहीं है।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि
.......................................................
बड़ा बड़ाई ना करै, बड़ा न बोले बोल।
हीरा मुख से ना कहै, लाख टका मेरी मोल।
‘‘जो आदमी अपने अंदर बड़प्पन का भाव लेकर जीता है वह बड़ी बातें नहीं करता जिस तरह हीरा कभी अपने मुख से अपनी लाख टके कीमत होने की बात नहीं कहता।’’
आदमी के अंदर अगर योग्यता, प्रतिभा तथा ज्ञान है तो उसके आचरण तथा कर्म से प्रकट होता है। इसलिये ही ज्ञानी लोग अपने जीवन में नियमित कर्म के साथ ही ज्ञान संग्रह का काम भी करते हैं। समय मिलने पर सत्संग तथा हृदय से भगवान की भक्ति करते हैं। उनकी साधना, तप और ज्ञान का प्रकाश स्वयं ही सभी के सामने फैलता है। वह कभी दावा नहीं करते कि वह श्रेष्ठ व्यक्ति हैं। इसके विपरीत जिनके पास न ज्ञान है न साधना और तप करने की प्रवृत्ति वह खाली पीली अपनी डींगें मारते हैं। उनको कोई सामने कहता नहीं क्योंकि उनकी संगत भी तो ऐसे ही लोगों से होती है।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Saturday, August 21, 2010

श्री गुरवाणी-मांगने वाले गुरु के चरण स्पर्श न करें (mangne vale ke charan sparsh na karen-shri gurvani in hindi)jsa

‘पर का बुरा न राखहु चीत।
तम कउ दुखु नहीं भाई मीत।
हिन्दी में भावार्थ-
दूसरे के अहित का विचार मन में भी नहीं रखना चाहिये। दूसरे के हित का भाव रखने वाले मनुष्य के पास कभी दुःख नहीं फटकता।
‘गुरु पीरु सदाए मंगण जाइ।
त के मूलि न लगीअै पाई।।’
हिन्दी में भावार्थ-
श्री गुरुग्रंथ साहिब की वाणी के अनुसार कुछ लोग अपने को गुरु और पीर कहते हुए अपने भक्तों से धन आदि की याचना करते हैं ऐसे लोगों के पांव कभी नहीं छूना चाहिये।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- महान संत भगवान श्री गुरुनानक देव जी ने अपने समय में देश में व्याप्त अंधविश्वास और रूढ़िवादिता पर जमकर प्रहार कर केवल अध्यात्मिक ज्ञान की स्थापना का प्रयास किया। उनके समकालीन तथा उनके बाद भी अनेक संत और कवियों ने धर्म के नाम पर पाखंड का जमकर प्रतिकार किया पर दुर्भाग्यवश इसके बावजूद भी हमारे देश में अंधविश्वास का अब भी बोलाबाला है। इतना ही अनेक संत कथित रूप से गुरु या पीर बनकर अपने भक्तों का दोहन करते हैं। हैरानी की बात यह है कि आजकल उनके जाल में अनपढ़ या ग्रामीण परिवेश के काम बल्कि शिक्षित लोग अधिक फंसते हैं। आज से सौ वर्ष पूर्व तक तो अंधविश्वास तथा रूढ़िवादिता के लिये देश की अशिक्षा तथा गरीबी को बताया जाता था मगर आजकल तो धनी और शिक्षित वर्ग अधिक जाल में फंसता है और हम जिनको अनपढ़, अनगढ़ और गंवार कहते हैं वही समझदार दिखते हैं।
आधुनिक शिक्षा में अध्यात्मिक ज्ञान को स्थान नहीं मिलता। लोग तकनीकी तथा उच्च शिक्षा को सर्वोपरि मानते हैं पर मन की शांति और अध्यात्मिक ज्ञान के लिये वह ऐसे अनेक ढोंगियों महात्माओं और संतों के जाल में फंस जाते हैं जो खुलेआम पैसा मांगने के साथ ही धर्म का खुलेआम व्यापार करते हैं। आश्चर्य तब होता है जब उच्च शिक्षा प्राप्त और धनीवर्ग उनके चरण स्पर्श करने के लिये भागता नज़र आता है।
जीवन में खुश रहने का सबसे अच्छा तरीका यह है कि सबके हित की कामना करें। किसी के लिये बुरा विचार मन में न लायें। कभी कभी तो यह भी होता है कि जैसा अब दूसरे के लिये बुरा सोचते हैं वैसा ही अपने साथ ही हो जाता है। अतः सभी के लिये अच्छा सोचा जाये ताकि अपने साथ भी अच्छा हो।
आजकल अनेक ऐसे गुरु हैं जो खुलेआम अपने शिष्यों से आर्थिक भेंट मांगते हैं। इनमें कुछ तो ऐसे हैं जो धन से ही धर्म की रक्षा का नारा देकर भक्तों के अंदर दान की भावना पैदा कर उसका दोहन करते हैं। सच बात तो यह है कि आदमी धर्म की रक्षा तभी कर सकता है जब उसके पास ज्ञान हो और उसके लिये जरूरी है कि स्वयं ही धार्मिक पुस्तको का एकांत में चिंतन कर ज्ञान प्राप्त किया किये जाये। भेंट या दक्षिण मांगने वाले गुरु कुछ देर तक हृदय में मनारंजन का भाव पैदा कर सकते हैं पर उससे मनुष्य के मन में स्थिरता नहीं आती।
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Saturday, May 29, 2010

संत कबीर के दोहे-मनुष्य माया रूपी दीपक के इर्द गिर पतंगे कि तरह चक्कर काटता है

संत कबीरदास जी के अनुसार
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माया दीपक नर पतंग, भ्रमि भ्रमि इवैं पड़ंत
कह कबीर गुरु ग्यान तैं, एक आध उमरन्त

इसका आशय यह है कि मनुष्य एक पंतगे की तरह माया रूपी दीपक के प्रति आकर्षण में भ्रमित रहता है। वह अपना जीवन उसी के इर्द गिर्द चक्कर काटते हुए नष्ट कर देता है। कोई एकाध मनुष्य ही है जिसे योग्य गुरु का सानिध्य मिलता है और वह इस माया के भ्रम से बच पाता है।
गयान प्रकास्या गुरु मिल्या, से जिनि बीसरि जाई
जब गोबिन्द कृपा करी, तब गुरु मिलिया आई

इसका आशय यह है कि जब सच्चे गुरु का सानिध्य मिलता है तो हृदय में ज्ञान का प्रकाश फैल जाता है। ऐसे गुरु को कभी नहीं भूलना चाहिये। जब भगवान की कृपा होती है तभी सच्चे गुरु मिल पाते हैं।
वर्तमान समय में संपादकीय व्याख्या-यह सब जानते हैं कि यह देह और संसार एक मिथ्या है। खासतौर से अपने देश में तो हर आदमी एक दार्शनिक है। हमारे महापुरुषों ने अपनी तपस्या से तत्व ज्ञान के रहस्य को जानकर उससे सभी को अवगत करा दिया है।
इसके बावजूद हम लोग सर्वाधिक अनेक पारकर के भ्रमों का शिकार हो जाते हैं। आज पूरा विश्व भारतीय बाजार की तरफ देख रहा है क्योंकि उससे अपने उत्पाद यहीं बिकने की संभावना दिखती है। अनेक तरह के जीवन की विलासिता से जुड़े साधनों के साथ लोग सुरक्षा की खातिर हथियारों के संग्रह में भी लगे हैं। एक से बढ़कर एक चलने के लिये वाहन चाहिये तो साथ ही अपनी सुरक्षा के लिये रिवाल्वर भी चाहिये। इतना बड़ा भ्रमित लोग शायद ही किसी अन्य देश में हों।
विश्व में भारत को अध्यात्म गुरु माना जाता है पर जैसे जैसे लोगों के पास धन की मात्रा बढ़ रही है वैसे उनकी मति भी भ्रष्ट हो रही है। कार आ गयी तो शराब पीकर उसका मजा उठाते हुए कितने लोगों ने सड़क पर मौत बिछा दी। कितने लोगों ने कर्जे में डूबकर अपनी जान दे दी। प्रतिदिन ऐसी घटनाओं का बढ़ना इस बात का प्रमाण है कि माया का भ्रमजाल बढ़ रहा है। धन, पद या शारीरिक शक्ति के अंधे घोड़े पर सवार लोग दौड़े जा रहे हैं। किसी से बात शुरू करो तो वह मोबाइल या गाडि़यों के माडलों पर ही बात करता है। कहीं सत्संग में जाओ तो वहां भी लोग मोबाइल से चिपके हुए है। इस मायाजाल से लोगों की मुक्ति कैसे संभव हैं क्योंकि उनके गुरु भी ऐसे ही हैं।
सच तो यह है कि भक्ति के बिना जीवन में मस्ती नहीं हो सकती। भौतिक साधनों का उपयोग बुरी बात नहीं है पर उनको अपने जीवन का आधार मानना मूर्खता है। एक समय ऐसा आता है जब उनके प्रति विरक्ति का भाव आता है तब कहीं अन्यत्र मन नहीं लग पाता। ऐसे में अगर भजन और भक्ति का अभ्यास न हो तो फिर तनाव बढ़ जाता है। यहां यह बात याद रखने लायक है कि भक्ति और भजन का अभ्यास युवावस्था में नहीं हुआ तो बुढ़ापे में तो बिल्कुल नहीं होता। उस समय लोग जबरन दिल लगाने का प्रयास करते हैं पर लगता नहीं हैं। इसलिये युवावस्था से अपने अंदर भक्ति के बीज अंकुरित कर लेना चाहिये। अगर योग्य गुरु न मिले तो स्वाध्याय भी इसमें सहायक होता है। स्वाध्याय से ही जीवन का तत्वज्ञान भी समझा जा सकता है।
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संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Thursday, May 20, 2010

भर्तृहरि नीति दर्शन-ज्ञान का अहंकार मनुष्य को मदांध बना देता है (gyan ka ahankar-hindu dharma sandesh)

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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यदा किंचिज्ज्ञोऽहं द्विप इव मदान्धः समभवम्
तदा सर्वज्ञोऽस्मीत्यभवदवलिपतं मम मनः
यदा किञ्चित्किञ्चिद् बुधजनसकाशादवगतम्
तदा मूर्खोऽस्मीति जवन इव मदो में व्यपगतः
            हिंदी में भावार्थ -जब मुझे कुछ ज्ञान हुआ तो मैं हाथी की तरह मदांध होकर उस पर गर्व करने लगा और अपने को विद्वान समझने लगा पर जब विद्वानों की संगत में बैठा और यथार्थ का ज्ञान हुआ तो वह अहंकार ज्वर की तरह उतर गया तब अनुभव हुआ कि मेरे समान तो कोई मूर्ख ही नहीं है।
वरं पर्वतदुर्गेषु भ्रान्तं वनचरैः सह
न मूर्खजनसम्पर्कः सुरेन्द्रभवनेष्वपि
            हिंदी में भावार्थ - बियावान जंगल और पर्वतों के बीच खूंखार जानवरों के साथ रहना अच्छा है किंतु अगर मूर्ख के साथ इंद्र की सभा में भी बैठने का अवसर मिले तो भी उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
            वर्तमान सन्दर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पंच तत्वों से बनी इस देह में मन, बुद्धि तथा अहंकार स्वाभाविक रूप से रहते हैं। अच्छे से अच्छे ज्ञानी को कभी न कभी यह अहंकार आ जाता है कि उसके पास सारे संसार का अनुभव है। इस पर आजकल अंग्रेजी शिक्षा पद्धति लोग तो यह मानकर चलते हैं कि उनके पास हर क्षेत्र का अनुभव है जबकि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के बिना उनकी स्थिति अच्छी नहीं है। सच तो यह है कि आजकल जिन्हें गंवार समझा जाता है वह अधिक ज्ञानी लगते हैं क्योंकि वह प्रकृति से जुड़े हैं और आधुनिक शिक्षा प्राप्त आदमी तो एकदम अध्यात्मिक ज्ञान से परे हो गये हैं। इसका प्रमाण यह है कि आजकल हिंसा में लगे अधिकतर युवा आधुनिक शिक्षा से संपन्न हैं। इतना ही नहीं अब तो अपराध भी आधुनिक शिक्षा से संपन्न लोग कर रहे हैं।
      जिन लोगों के शिक्षा प्राप्त नहीं की या कम शिक्षित हैं वह अब अपराध करने की बजाय अपने काम में लगे हैं और जिन्होंने अंग्रेजी में शिक्षा प्राप्त की और इस कारण उनको आधुनिक उपकरणों का भी ज्ञान है वही बम विस्फोट और अन्य आतंकवादी वारदातों में लिप्त हैं। इससे समझा जा सकता है कि उनके अपने आधुनिक ज्ञान का अहंकार किस बड़े पैमाने पर मौजूद है।
      आदमी को अपने ज्ञान का अहंकार बहुत होता है पर जब वह आत्म मंथन करता है तब उसे पता लगता है कि वह तो अभी संपूर्ण ज्ञान से बहुत परे है। कई विषयों पर हमारे पास काम चलाऊ ज्ञान होता है और यह सोचकर इतराते हैं कि हम तो श्रेष्ठ हैं पर यह भ्रम तब टूट जाता है जब अपने से बड़ा ज्ञानी मिल जाता है। अपनी अज्ञानता के वश ही हम ऐसे अल्पज्ञानी या अज्ञानी लोगों की संगत करते हैं जिनके बारे में यह भ्रम हो जाता है वह सिद्ध हैं। ऐसे लोगों की संगत का परिणाम कभी दुखदाई भी होता है। क्योंकि वह अपने अज्ञान या अल्पज्ञान से हमें अपने मार्ग से भटका भी सकते हैं।
-------------------------------------------संकलक लेखक  एवं संपादक-दीपक भारतदीप
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Friday, May 14, 2010

संत कबीर दर्शन -प्रेम हमेशा बराबरी वालों में करना चाहिए

प्रीति ताहि सो कीजिये, जो आप समाना होय
कबहुक जो अवगुन पडै+, गुन ही लहै समोय
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रीति उसी से करना चाहिए, जो अपने समान ही हृदय में प्रेम धारण करने वाले हों। यह प्रेम इस तरह का होना चाहिए कि समय-असमय किसी से भूल हो जाये तो उसे प्रेमी क्षमा कर भूल जायें।
यह तत वह तत एक है, एक प्रान दुइ गात
अपने जिये से जानिये, मेरे जिय की बात
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी लोगों की देह में जीव तत्व एक ही है। आपस में प्रेम करने वालों में कोई भेद नहीं होता क्योंकि दोनो के प्राण एक ही होता है। इस गूढ रहस्य को वे ही जानते हैं जो वास्तव में प्रेमी होते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-प्रेम किया नहीं हो जाता है यह फिल्मों द्वारा संदेश इस देश में प्रचारित किया जाता है। सच तो यह है कि ऐसा प्रेम केवल देह में स्थित काम भावना की वजह से किया जाता है। प्रेम हमेशा उस व्यक्ति के साथ किया जाना चाहिए जो वैचारिक सांस्कारिक स्तर पर अपने समान हो। जिनका हृदय भगवान भक्ति में रहता है उनको सांसरिक विषयों की चर्चा करने वाले लोग विष के समान प्रतीत होते हैं। यहां दिन में अनेक लोग मिलते है पर सभी प्रेमी नहीं हो जाते। कुछ लोग छल कपट के भाव से मिलते हैं तो कुछ लोग स्वार्थ के भाव से अपना संपर्क बढ़ाते हैं। भावावेश  में आकर किसी को अपना सहृदय मानना ठीक नहीं है। जो भक्ति भाव में रहकर निष्काम से जीवन व्यतीत करता है उनसे संपर्क रखने से अपने आपको सुख की अनुभूति मिलती है।
वैसे बाज़ार तथा उसके प्रचार तंत्र ने प्रेम को केवल युवक युवती के इर्द गिर्द समेट कर रख दिया है जो कि केवल यौवन से उपजा एक भाव है।  कहीं न कहीं इसमें हवस का भाव रहता है। यही कारण है कि हमारे देश में आजकल कथित प्रेम में लिप्त प्रेमी और प्रेमियों के साथ ऐसे हादसे पेश आते हैं जिनसे उनकी जिंदगी तक समाप्त हो जाती है या फिर बदनामी का सामना करना पड़ता है। 
यौवन से उपजा यह आकर्षण प्रेम नहीं है पर अगर थोड़ी देर के लिये मान भी लिया जाये तो भी उसमें आर्थिक, सामाजिक तथा वैचारिक स्तर की समानता होना आवश्यक है वरना विवाह बाद जब आकर्षण कम होता है तब व्यक्तिगत विविधता तनाव का कारण बनती है।  कहते हैं कि बेटी हमेशा बड़े घर में देना चाहिये और बहु हमेशा छोटे घर से लाना चाहिये।  स्पष्टत इसके पीछे तर्क यही है कि विवाह बाद आर्थिक तथा सामाजिक सामंजस्य बना रहे।  अगर लड़की छोटे घर जायेगी तो तकलीफ उठायेगी। उसी तरह बहुत अगर अमीर घर से आयेगी तो उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति करना कठिन हो जायेगा। कहने का अभिप्राय यह है कि प्रेम क्षणिक पर जीवन व्यापक है इसलिये संबंध स्थापित करते समय सब तरह की बातों का ध्यान रखना चाहिये।
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Wednesday, April 28, 2010

विदुर दर्शन-दुस्साहसी की अनदेखी करने पर प्रजा नाराज होती है

साहसे वर्तमानं तु यो मर्षयति पार्थिवः।
सः विनाशं व्रजत्याशु विद्वेषं चाधिगच्छति।।
हिन्दी में भावार्थ-
यदि राज्य प्रमुख  दुस्साहस करने वाले व्यक्ति को क्षमा या उसे अनदेखा करता है तो उसका अतिशीघ्र विनाश हो जाता है क्योंकि तब प्रजा में उसके विद्वेष की भावना पैदा होती है।
न मित्रकारणाद्राजा विपुलाद्वाधनागमात्।
समुत्सुजोत्साहसिकान्सर्वभुतभयावहान्।।
हिन्दी में भावार्थ-
राज्य प्रमुख को चाहिये कि वह स्नेह या लालच मिलने पर भी प्रजा में भय उत्पन्न करने वाले अपराधियों को क्षमा न करे।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-क्षमा जीवन का मूलमंत्र है पर एक परिवार, समाज और राज्य के मुखिया को कहीं न कहीं अपने आश्रितों को बचाने के लिये दंड का उपयोग करना ही पड़ता है।  अगर वह इस दंड का उपयोग नहीं करेगा तो उसके आश्रित या प्रजाजन उसे कायर मानकर घृणा करने लगते हैं।  कहा जाता है कि योगियों को क्षमाक्षील होना चाहिये पर हमारी प्राचीन कथायें इस बात का प्रमाण हैं कि समय आने पर वही कोमल भाव वाले योगी अपने भक्तों और शिष्यों के लिये उग्र रूप धारण करते हुए अपराधियों को दंडित करते हैं। 
जिस परिवार, समाज या राज्य का मुखिया  अपराधियों और हिंसक तत्वों को क्षमा करता है या उनकी अनदेखी में भलाई समझता है वह शीघ्र नष्ट हो जाता है। उसके समूह या राज्य के विरोधी उसके आश्रित या प्रजा को लक्ष्य नहीं करते बल्कि उनका लक्ष्य मुखिया ही होता है।  फिर उसके विरोधी आंतरिक विरोधियों को सबसे पहले मैदान में उतारते हैं इसलिये समझदार मुखिया को चाहिये कि वह अंतर्विरोधियों का समूल नाश करे।
ऐसे आंतरिक शत्रु जो प्रजा में भय करते हुए विचरते हैं उनकी अनदेखी करना खतरे से खाली नहीं है।  जिस परिवार, समाज, या राज्य का प्रमुख अपने आंतरिक खतरों की अनदेखी करता है वह कायर मान लिया जाता है और उसके आश्रित प्रजाजन ही उसका सम्मान नहीं करते। अहिंसा का सिद्धात केवल अपने निजी जीवन में लागू किया जा सकता है पर जहां सार्वजनिक विषय हो वहां दंड का उपयोग करना चाहिये अन्यथा परिवार, समाज तथा राज्य में असंतोष का परिणाम मुखिया को भोगना पड़ता है। राज्य या परिवार में उत्पाती तत्वों से सख्ती से निपटना ही एक सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
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Monday, April 26, 2010

संत कबीर दर्शन-जैसे पदार्थ भक्षण करते हैं वैसे ही विचार हो जाते हैं

जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय
जैसा पानी पीजिये, तैसी वाणी होय
संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि जैसा भोजन करोगे, वैसा ही मन का निर्माण होगा और जैसा जल पियोगे वैसी ही वाणी होगी अर्थात शुद्ध-सात्विक आहार तथा पवित्र जल से मन और वाणी पवित्र होते हैं इसी प्रकार जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है।
साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं
धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं
कबीर दास जीं कहते हैं कि संतजन तो भाव के भूखे होते हैं, और धन का लोभ उनको नहीं होता । जो धन का भूखा बनकर घूमता है वह तो साधू हो ही नहीं सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रीमद्भागवत गीता के संदेश के अनुसार गुण ही गुणों में बरतते हैं। जिस तरह का मनुष्य भोजन ग्रहण करता है और जिस वातावरण में रहता है उसका प्रभाव उस पर पड़ता ही है। अगर हम यह मान लें कि हम तो आत्मा हैं और पंच तत्वों से बनी यह देह इस संसार के पदार्थों के अनुसार ही आचरण करती है तब इस बात को समझा जा सकता है। अनेक बार हम कोई ऐसा पदार्थ खा लेते हैं जो मनुष्य के लिये अभक्ष्य है तो उसके तत्व हमारे रक्त कणों में मिल जाते हैं और उसी के अनुसार व्यवहार हो जाता है।
आज जो हम समाज में तनाव और बीमारियों की बाहुलता देख रहे हैं वह सभी इसी खान पान के कारण उपजी हैं। कहते हैं कि स्वस्था शरीर में ही स्वस्थ मन निवास करता है, इसका आशय यही है कि सात्विक भोजन से जहां मन प्रसन्न रहता है वहीं तामस प्रकार का भोजन शरीर और मन के लिये कष्टकारक होता है।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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