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Saturday, May 25, 2013

ऋग्वेद के आधार पर चिंत्तन-मन में पवित्र संकल्प धारण करें (rigved ke adhar par chinttan-man mein pavitra sankalp dharan karen)

      इस संसार में जो सफल तथा  व्यक्ति प्रसिद्ध हुए हैं उन्होंने अपने लक्ष्य का निर्माण बाल्यकाल में ही कर लिया था। कुछ ने युवा होने पर संकल्प धारण किया पर उनके प्रयास निष्काम होने के साथ ही दृढ़ संकल्प के साथ जुड़े हुए थे। इसलिये वह सफल व्यक्ति कहलाये।  सच बात तो यह है कि अनेक लोग अपने लक्ष्य तथा संकल्प बदलते रहते है। परिणामस्वरूप उनके हाथ कुछ नहीं आता।  इसके अलावा जो लोग  अपने लक्ष्य के साथ कामनाओं की संभावना अधिक ही मन में  रखते हैं, वह भी अधिकतर नाकाम ही होते हैं।  अधिकतर लोग किसी कार्य को पेट पालने या कमाने का लक्ष्य रखकर प्रारंभ करते हैं।  उनके लिये कमाना ही फल है।  ऐसे में उनकी बुद्धि संकीर्ण हो जाती है जिससे व्यापक रूप से कार्य करना संभव नहीं हो पाता।  पहले तो यह समझना चाहिये कि सबका दाता परमात्मा है।  दाने दाने पर लिखा है खाने वाले का नाम!  मनुष्य को अपना काम यह सोचकर करना चाहिये कि वह तो उसे करना ही है।  बिना काम किये शरीर जर्जर हो ंजाता है।  उस काम से जो उसे भौतिक उपलब्धि होती है वह कोई फल नहीं होता क्योंकि वह तो आगे के काम में व्यय हो जाती है।  नौकरी में वेतन मिले या व्यापार में लाभ हो वह कोई साथ नहीं रखता बल्कि परिवार और अपने पर खर्च करता है। यह उपलब्धि कर्म का विस्तार करती है न कि वह फल है। इसलिये काम अपने हृदय को संतोष देने के लिये करना चाहिये।
 ऋग्वेद में कहा गया है कि
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आकृतिः सत्या मनसो में असतु।
           हिन्दी में भावार्थ-मन के संकल्प और प्रार्थना सत्य हो।
समाना व आकृतिः  आकूतिः समाना हृदयान वः।
समानमस्तु वो मनो यथा वः सुसह्यसति।।
            हिन्दी में भावार्थ-मनुष्यों  के संकल्प एक समान रहें और हृदय भी एक समान हों जिससे संगठित होने पर कार्य संपन्न होता है। जब संकल्प, मन और विचार का मेल होता है तब एकता स्वतः हो जाती है।
         दूसरी बात यह कि अपना मेल उन लोगों से करना चाहिये जिनका संकल्प, विचार तथा लक्ष्य समान हो। विपरीत यह प्रथक चाल चलन वाले से संबंध रखने से कोई लाभ नहीं होता।  समान विचाराधारा वाले के साथ चलने पर संगठन बनता है और कोई लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।  जीवन में संकल्प का अत्यंत महत्व है। जिस तरह का संकल्प हम करते हैं वैसा ही वातावरण हमारे सामने आता है।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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Thursday, May 23, 2013

विदुर नीति के आधार पर चिंत्तन-कष्ट से पाया धन व्यर्थ (vidur neeti darshan-kasht se prapat dhan vyarth)



          मनुष्य जीवन को धारण करने वालों के मन मस्तिष्क में  यह भ्रम रहता कि वह केवल धनर्जान करने के लिये ही पैदा हुए हैं।   संसार के अधिकतर मनुष्य  धन को ही सत्य मानते हैं।  धन कमाने के बाद  उसके व्यय का प्रदर्शन कर समाज में अपनी श्रेष्ठता साबित करने का मोह कोई नहीं छोड़ पाता। हमारे देश में धर्म तथा  समाज के नाम पर ऐसी परम्पराएं  बनायीं गयी हैं जिनका निर्वाह बिना धन के संभव नहीं हो सकता।  पुत्र  के लिये व्यवसाय तथा पुत्री के लिये वर ढूंढते हुए हमारे देश के अधिकतर लोगों का जीवन ही निकल जाता है।  हमारे देश के लोगों में धन संचय की प्रवृत्ति इतनी गहरी है कि आधुनिक समय में चालाक बुद्धिमानों के लिये उनके साथ  ठगी करना आसान हो गया है। 
         देश भर में अनेक चिटफंड कंपनियां यह काम इस तरह कर रही है कि लोग अपनी सारी जमा पूंजी उनके पास जमा कर आते हैं।  अधिक व्याज का लोभ लोगो के लिये संकट का कारण तब बनता है जब उनका मूल धन भी हाथ से निकल जाता है।  पीड़ित लोग अधिकतर अपने पृत्र के व्यवसाय या नौकरी तथा बेटी की शादी के लिये धन जमा करने की बात कहते है।  हमारे यहां विवाह तथा मृत्यु के अवसर पर जितनी नाटकबाजी होती है वह धन से ही संभव है।  यही कारण है कि भारत में लोग बच्चों के भविष्य के लिये अधिक से अधिक संचय करते हैं। इतना ही नहीं अपने बुजुर्गों की मृत्यु पर उनके दाह संस्कार के बाद भोज के प्रबंध का जिम्मा भी उन पर रहता है।  समाज में अपनी कथित छवि बचाये रखने के लिये भारत के लिये हर आम आमदी जूझता रहता है।  हमारे देश में सीध सच्चे धंधे में अधिक धनवान होने के अवसर करीब करीब बंद कर दिये गये हैं, जिसका परिणाम यह हुआ है कि अपने पास मौजूद धन की वृद्धि के लिये ऐसे ठगों के जाल में आमजन  आसान से फंस जाते हैं।
                      विदुरनीति में कहा गया है कि
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            अतिक्लेशेन येऽर्याः स्युर्धर्मस्यातिक्रमेश वा।
            अरेवां प्रणपातेन मा स्म तेषु मनकृथाः।।
        हिंदी  में भावार्थ-जिस धन को अर्जित करने में मन तथा शरीर को अत्यंत क्लेश हो, धर्म का उल्लंघन  करना पड़े या फिर शत्रु के सामने अपना सिर झुकाने की बाध्यता उपस्थित हो, उसे प्राप्त  करने का विचार ही त्याग देना श्रेयस्कर है।
                          
            सहस्त्राणिऽपि जीवन्ति जीवन्ति शतिनानथा।
            धृतराष्ट्र निमुंचेच्छां न कथंचिन्न जीव्यते।
       हिन्दी में भावार्थ-जिनके पास हजार है वह जिंदा रहते हैं पर जिनके पास सौ वह भी जिंदा  रहते हैं। धन का लोभ छोड़ने वाले लोग भी हर हालत में अपना जीवन धारण किये रहते ही  हैं।
        हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार  जिस जीव में परमात्मा ने प्राणवायु प्रवाहित की है माया उसकी सेवा करने के लिये बाध्य है। कहा भी जाता है कि जिसने पेट दिया है वह दाना भी देगा।  परमात्मा की दासी माया है न कि उसकी स्वामिनी।  यह भी कहा जाता है कि जिसके भाग्य में माया का जितना भाग आना लिखा है उतना ही मिलेगा। इसके बावजूद धर्मभीरुता का दावा करने वाले हमारे भारतीय समाज के अधिकांश लोगों  को इस पर विश्वास नहीं है। श्रीमद्भागवत गीता से कथित रूप से कर्मप्रेरणा मिलने का दावा करने वाले यहां अनेक लोग मिल जायेंगे पर यह कोई नहीं समझ पाया कि उसमें निष्कर्म की बात कही गयी है न कि सकाम कर्म का सिद्धांत स्थापित किया गया है।  स्थिति यह है कि लोग धन के लिये देह तथा मन को भारी संताप देने के लिये तैयार हो जाते हैं। अपने ही धन के शत्रुओं की चिकनी चुकडी बातों में आकर उसे सौंप देते हैं।  परिणाम यह है कि बाद में जब धोखा मिलता है तो सिवाय आर्तनाद करने के अलावा उनके पास कोई दूसरा विकल्प् नहीं रहता। 
         अतः अपने नियमित स्वाभाविक कर्म करते हुए परमात्मा का स्मरण ही करते रहना चाहिये।  संसार के विषयों का चक्र माया की कृपा से चलता ही रहता है।  उसमें एक दृष्टा की तरह शामिल होना चाहिये। समय आने पर सारे काम हो जाते हैं यह विश्वास धारण कर जीवान आनंद से बिताना चाहिये।   

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
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Sunday, May 19, 2013

अथर्ववेद से संदेश-देह और मन को शुद्ध रखने वाला मनुष्य पीड़ाओं से दूर रहता है (atharvaved se sandesh-shariri aur man ko shuddh rakhane wala peedaon se door rahataa hai

           इस संसार में प्रत्येक मनुष्य को संघर्ष करना ही पड़ता है।  इस  संघर्ष में जय पराजय का आधार मनुष्य के अंदर विद्यमान शारीरिक और मानसिक क्षमतायें होती हैं।  जिनका संकल्प दृढ़ होने के साथ हृदय  में कर्म करने से प्रतिबद्धता है वह व्यक्ति हमेशा ही सफल होता है।  यह बात कहने में अत्यंत सहज लगती है पर इसका व्यवहारिक पहलू यह है कि हमें अपने जीवन में ऐसी दिनचर्या अपनाना चाहिये जो शारीरिक तथा मानसिक शक्ति में वृद्धि करने में सहायक  हो।  जीवन में न केवल शारीरिक शक्ति का होना आवश्यक है बल्कि उसके साथ मनुष्य को मानसिक रूप से भी शक्तिशाली होना चाहिए।
            हमारे अध्यात्मिक दर्शन में ब्रह्म मुहूर्त में उठना जीवन के लिये सबसे ज्यादा उत्तम माना जाता है।  हमारे महान पूर्वजों ने जिस अध्यात्मिक ज्ञान का संचय किया है वह सभी प्रातःकाल उठने को ईश्वर की सबसे बड़ी आराधना माना जाता है। इससे तन और मन में शुद्धता रहती है।  प्रातःकाल का समय धर्म का माना जाता है और इस दौरान योगासन, ध्यान और मंत्रजाप कर स्वयं को अध्यात्मिक रूप से दृढ़ बनाया जाना आवश्यक है। 
अथर्ववेद  में कहा गया है कि 
व्यार्त्या पवमानो वि शक्रः पाप हत्यथा।।
           हिन्दी में भावार्थ- तन और मन में शुद्धता रखने वाला मनुष्य पीड़ाओं से दूर रहता तो पुरुषार्थी दुष्कर्म करने से बचता है।
ओर्पसूर्यमन्यातस्वापाव्युषं जागृततादहमिन्द्र इवारिष्टो अक्षितः।
             हिन्दी में भावार्थ- दूसरे लोग भले ही सूर्योदय तक सोते रहें पर शूरवीर सदृश नाश और क्षय रहित होकर समय पर जागे।
      जब देह और मन में शुद्धता होती तब आदमी स्वयं ही सत्यकर्म के लिये प्रेरित होता है।  पुरुषार्थी मनुष्यों को सबसे बड़ा लाभ यह होता है कि वह पाप कर्मों पर कभी नहीं विचार करते। आजकल हम समाज में जो अपराध की बढ़ती प्रवृत्ति देख रहे हैं उसके पीछे दो ही प्रकार के लोग जिम्मेदार दिखाई देते हैं। एक तो वह लोग जिनके पास कोई काम नहीं है यानि वह बेकार है दूसरे वह जिनको काम करने की आवश्यकता ही नहीं है यानि वह निकम्मे हैं।  यह बेकार और निकम्मे ही मिलकर अपराध करते हैं।  हम जब जब सभ्य समाज की बात करते हैं तो वह पुरुषार्थी लोगों के कंधों पर ही निर्भर करता है। हृदय में शुद्ध और देह में दृढ़ता होने पर कोई भी लक्ष्य आसानी से प्राप्त किया जा सकता है।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Sunday, August 19, 2012

बगुले से भी सीख ली जा सकती है-चाणक्य नीति दर्शन (bagule se seekh-chankya neeti darshan)



      सामान्य मनुष्य हमेशा ही बहिर्मुखी रहता है। आंखों के सामने घटित दृश्य, कानों में गूंजते स्वर तथा नासिका से सुगंध दुंर्गंध का बोध करने में उसकी इंद्रियां इतनी व्यस्त रहती है कि उसकी बुद्धि मे चिंत्तन का कीड़ा कभी घूमता नज़र नहीं आता।  विरले लोग ही होते हैं जो आत्ममंथन करते हैं।  ऐसे ज्ञानी लोग न केवल सदैव प्रसन्न रहते हैं बल्कि हर स्थिति में सफलता उनके हिस्से ही आती है।  आमतौर से बगुले को धूर्तता का पर्याय माना जाता है पर उसे अगर चालाकी समझा जाये तो कुछ सीखा जा सकता है। वह अपनी इंद्रियों को वश में कर तालाब में मछलियों का शिकार करता है।  अगर मनुष्य उससे सीखकर अपने जीवन के लक्ष्यों को पूरा करने का प्रयास करे तो वह सुखी रह सकता है।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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इन्द्रियाणि च संयम्य बकवत् पण्डितो नरः।
देशकालबलं सर्वकार्याणि साधयेत्।।
                     हिन्दी भावार्थ-ज्ञानी व्यक्ति हमेशा ही बगुले की तरह इंद्रियों पर नियंत्रण कर देश और काल की समझ धारण कर अपने बल से ही सारे कार्यो को संपन्न करता है।’’
य एतान् विंशतिगुणानाचारिव्यति मानवः।
कार्याऽवस्थासु सर्वासु अजेयः स भविष्यति।।
                                                  हिन्दी में भावार्थ-जो व्यक्ति बीस गुणों का आचरण कर जीवन व्यतीत करेगा वह कायों को संपन्न करने के साथ हर अवस्था में विजयी होता है।’’
      हमें जब भी एकांत मिले आत्ममंथन अवश्य करना चाहिए। अपने गुणों तथा बल के साथ ही अपनी कमजोरियों पर भी विचार करना चाहिए। हमेशा बहिर्मुखी बने रहने से कोई लाभ नहीं जब तक हम अंतर्मुखी होकर विचार न करें। जीवन में सफलता का मूल मंत्र यही है कि अपने अंदर गुणों के संचय का प्रयास भी करें।
 
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
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Sunday, August 5, 2012

ऋग्वेद से संदेश-स्वच्छता से रोगों का नाश होता है (rigved se sandesh-cleani body and men)

                      हमारे वेदों में अनेक ऐसी बातें कही गयी हैं जिनका महत्व इस संसार में कभी महत्व नहीं होता।  इसका कारण यह है कि इस संसार में समय के साथ भौतिक स्वरूप के साथ ही लोगों के रहन सहन, चाल चलन तथा कार्य करने के तरीकों में बदलाव तो संभव है पर उसके अंदर की मूल प्रकृतियों का निवास स्थाई रूप से रहता है।  इन मूल प्रकृतियों तथा उनकी निवृति के ज्ञान का (जिसे हम अध्यात्मिक विज्ञान भी कह सकते हैं) जो वर्णन इन वेदों में वर्णित है।  उनकी विषय सामग्री का  अध्ययन चाहे जब किया जाये उनमें नवीनता बनी रहती है।
ऋग्वेद में कहा गया है कि
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ब्रह्माद्विषः अवजहि।
हिन्दी में अर्थ-‘‘ज्ञान से द्वेष करने वाले को मार।’’
अहः अहःशुन्ध्युः परिपदां।।’’
हिन्दी में अर्थ-‘‘नित्य स्वच्छता रखने वाला रोगों को दूर करता है।’’
             अधिकतर लोग धार्मिक कर्मकांडों को ही अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं पर आध्यात्मिक ज्ञान उनके लिये बुढ़ापे में जानने वाला विषय होता है जबकि इसका ज्ञान अगर बचपन से हो जाये तो जिंदगी आराम से बिताई जा सकती है। इसका कारण यह है कि सांसरिक विषयों से संबंध तो बचपन से ही हो जाता है और अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव आम मनुष्य उसमें इस तरह लिप्त हो जाता है कि उसके लिये सुख कम दुःख अधिक प्रकट होते हैं।  अधिकतर मनुष्यों के  अंदर अहंकार मोह तथा लोभ की  प्रकृतियां विद्यमान रहती हैं जो उसे ज्ञान से परे रखती है।  यह प्रकृतियां ज्ञान से द्वेष करती हैं।  ज्ञानी से चिढ़ाती हैं।
           अध्यात्मिक ज्ञान के अभाव में आदमी की न  केवल देह  बल्कि मन तथा विचारों में भी अस्वच्छता का वास हो जाता है।  इस तरह की समस्या से बचने का उपाय यही है कि  हम अपने अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन कर अपनी बुद्धि, विचार तथा मन को शुद्ध रखने का प्रयास करें।
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Saturday, October 22, 2011

मनुस्मृति-अतिथि सत्कार पवित्र मनुष्य को प्रदान करना चाहिए (atithi satkar pavitra manushya ka pradan karna chahiye-manu smriti)

       हमारे देश में संस्कार तथा संस्कृति के नाम पर भी कई नारे प्रचलित हो गये हैं। इनमें एक है ‘अतिथि देवो भव‘। इसको लेकर बहुत सारी बातें कही जाती हैं जबकि हमारा अध्यात्मिक दर्शन कहता है कि मेहमान की पात्रता तभी स्वीकार्य है जब वह पवित्र मनुष्य हो। ऐसा नहीं है कि हर किसी को घर के दरवाजे पर आने पर मेहमान का दर्जा देकर उसका स्वागत किया जाये। दरअसल इस तरह के नारे अध्यात्मिक ग्रंथों में वर्णित तत्वज्ञान के अभाव में ही समाज में प्रचलित हो गये हैं। कुछ लोग तो यह कहते हैं कि अतिथि सत्कार धर्म का सर्वोच्च रूप है और एक तरह से यज्ञ करने से अधिक श्रेष्ठ है। यह सत्य है कि अगर सुपात्र मनुष्य का अतिथि रूप में सत्कार करना एक तरह यज्ञ ही है पर इसमें पवित्रता का विचार भी होना चाहिए। ज्ञानी लोग हर क्रिया को यज्ञ की तरह मानते हैं। जिस तरह यज्ञ पवित्र स्थान पर पवित्र वस्तुओं से किया जाता है उसी तरह अतिथि सत्कार का धर्म भी पवित्र व्यक्ति को प्रदान किया जाना चाहिए।
मनुस्मृति में कहा गया है कि
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ज्ञानेनैवापरे विप्राः यजन्ते तैमंखेःसदा।
ज्ञानमूलां क्रियामेषां पश्चन्तो ज्ञानचक्षुषा।
            ‘‘तत्वाज्ञानी सभी क्रियाओं को अपने ज्ञान नेत्रों से देखते हुए उसके प्रेरक तत्वों को पहचानते हैं। इस तरह वह अपने ज्ञान से ही यज्ञानुष्ठान करना सबसे महत्वपूर्ण मानते है।
पाषण्डिनो विकर्मस्थान्बैडाव्रतिकांछठान्।
हैंतुकान्वकवृत्तश्चि वांड्मात्रेण्णापि नार्चयेत्।।
          ‘‘पांखडी, दृष्ट, ठग, दूसरों को दुःख पहुंचाने वाला तथा धर्म ग्रंथों में अरुचि रखने भले ही सज्जनता का व्यवहार करे पर उसे कभी मेहमान नहीं बनाना चाहिए। इतना ही नहीं उसका वाणी से भी कभी स्वागत नहीं करना चाहिए।’’
         हमारे देश में पहले शिक्षा के अभाव में लोगों को अध्यात्मिक ग्रंथों का ज्ञान नहीं था तो अब आधुनिक शिक्षा ने उनको एक तरह से विरक्त ही कर दिया गया है। इसलिये चालाक लोग दूसरों को अतिथि सत्कार का धर्म निभाने की राय देते हैं और स्वयं मजे करते हैं। इसलिये यह आवश्यक है कि तत्वज्ञान को समझा जाये। अपनी हर क्रिया को अपने ज्ञान चक्षुओं से देखते हुए यज्ञ होने की अनुभूति की जाये। जीवन में आनंद लेने का यह भी एक तरीका है।
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Friday, September 16, 2011

भर्तृहरि नीति शतक-जितना धन भाग्य में है उससे ज्यादा नहीं मिलता (bhritrihari neeti shatak-bhagya aur dhan, luck and money)

            मनुष्य के जीवन में धन का होना अनिवार्य है पर उसके लिये उसे पागलों की तरह इधर उधर भागकर अपना समय बर्बाद करना व्यर्थ है। यह सही है कि मनुष्य को अपनी जीविका के लिये प्रयास करना चाहिए। त्रिगुणमयी माया उसे     इस बात के लिये बाध्य भी करती है कि वह सांसरिक कर्म में लिप्त होकर समय बिताये। सामान्य मनुष्य माया के जाल में फंसकर केवल उसे इर्दगिर्द चक्कर काटते हुए जीवन बर्बाद कर देते हैं। जिनके पास पैसा अधिक नहीं होता वह अधिक पाने के चक्कर में रहते हैं तो जिनके पास अधिक धन आ गया वह अपने कर्मफल का प्रतीक बताते हुए मदांध हो जाते हैं। खेलती माया है पर आदमी सोचता है कि मैं खेल रहा हूं।
भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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यद्धात्रा निजभालपट्ट लिखित स्तोकं महद्वा धनं तत्प्राप्तनोति मरुस्थलेऽपि नितरां मेरी ततोनाधिकम्।
तद्धीरो भव वित्तवत्सु कृपणां वृत्ति वुथा सा कृथाः कृपे पश्य पयोनिधावपि घटो गृह्णाति तुल्यं जलम्।।
            ‘परमात्मा ने जिस मनुष्य के हाथ में थोड़ा धन भी लिखा है तो वही प्राप्त होता है। उससे अधिक की प्राप्ति तो सोने के सुमेरु पर्वत पर जाने से भी नहीं होती। इसलिये जितना मिले उसी में संतोष करते हुए कभी धनिकों में सामने दीन नहीं बनना चाहिए। याद रखो कुंऐं में डालो अथवा समंदर में, जितना घड़ा होता है उतना ही पानी उसमें मिलता है।’’
             आदमी के पास जब धन अल्प मात्रा में होता है तो वह धनिकों के मुख की तरफ ताकता है। इतना ही नहीं कोई धनी कुछ देता हो या नहीं वह उसकी तरफ ऐसे देखता है जैसे कि वह समाज का मालिक हो और कभी न कभी उसका भला करेगा। सच बात तो यह है कि अल्प धनिक कभी यह बात नहीं सोचते कि जिन लोगों ने धन कमाया ही इसलिये है कि वह समाज पर राज्य कर सकें वह कभी स्वयं व्यय कर प्रतिष्ठा प्राप्त नहीं करते क्योंकि उनको लगता है कि धन कम होगा तो उनकी सम्मान कम होगा या फिर लोग उनको लाचार समझेंगे। जहां तक किसी का भला करने का सवाल है तो समय पर पड़ने पर कुछ लोग अनेपक्षित रूप से मदद कर जातेम हैं और जिनसे अपेक्षा होती है वह मुंह फेर कर चल देते हैं। परोपकार करना एक ऐसी प्रवृत्ति है जो अल्पधनिकों में अधिक पाई जाती है जिनसे समान वर्ग वाले लोग कभी अपेक्षा नहीं करते।
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