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Saturday, November 8, 2008

भृतहरि शतकः कामनाओं की अग्नि सदगुणों को जला देती है

तावन्महत्तवं पाण्डित्यं कुलीनत्वं विवेकता
यावज्जवलति नांगेषु हतः पञ्वेषु पावकः


हिंदी में भावार्थ-हृदय में विद्वता, कुलीनता और विवेक का प्रभाव तब तक ही रहता है जब तक ही जब तक कामना, वासना और इच्छा की अग्नि प्रज्जवलित नहीं हो उठती है। मन में लोभ और लालच का भाव आते ही सब सदगुण नष्ट हो जाते है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में मनुष्य के जीवन व्यतीत करने के दो ही मार्ग हैं-एक है ज्ञान मार्ग और दूसरा मोहमाया का मार्ग। मनुष्य तो अपने मन का दास है जैसे वह कहता है उसकी पांव वही चलते जाते है। यह उसका भ्रम है कि वह स्वयं चल रहा है। कुछ मनुष्य अपना जीवन ज्ञान के साथ व्यतीत करते हैं। वह सासंरिक कार्य करते हुए भी धन और मित्र के संग्रह में लोभ नहीं करते। जितना धन मिल गया उसी में संतुष्ट हो जाते हैं पर कुछ लोगों की लालच और लोभ का अंत ही नहीं है। वह धन और मित्र संग्रह से कभी संतुष्ट नहीं होते हैं और मोहमाया के मार्ग पर चलते जाते हैं।

हां, कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अधिक अवसर न मिल पाने की वजह से धन और मित्र संग्रह सीमित मात्रा में कर पाते हैं। वह तब खूब ज्ञान की बातें सुनते और करते हैं। उनकी बातों ये यह भ्रम भी हो जाता है कि वह संत या साधु प्रवृत्ति के हैं पर ऐसे लोगों को जब धन और मित्र बनाने के अधिक अवसर अचानक प्राप्त होते हैं तब वह सारा ज्ञान भूलकर उसका लाभ उठा लेते है।। तब उनका सारा ज्ञान एक तरह से बह जाता है। फिर वह पूरी तरह से धन संपदा और अपने निजी संबंधों के विस्तार पर अपना ध्यान केंद्रित कर देते हैं और उनके लिये पहले अर्जित ज्ञान निरर्थक हो जाता है।


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Thursday, September 11, 2008

संत कबीर वाणीः हृदय को भाने वाला दूर होते हुए भी निकट होता है

जल में बसै कमोदिनी, चंदा बसै अकास
जो है जाका भावता, सो ताही के पास

                         संत शिरोमणि कबीरदास जी के अनुसार जल में कमलिनी का निवास है पर उसका प्रेमी चंद्रमा उससे बहुत दूर होता है। जो हृदय को पसंद हैं वही वास्तव में पास होते हैं।

आगि आंचि सहना सुगम, सुगम खड़ग की धार
नेह निबाहन एक रस, महा कठिन ब्यौहार

                       संत शिरोमणि कबीरदास जी की मान्यता है कि आग की आंच को सहना सरल है। तलवार की धार का प्रहार भी झेला जा सकता है पर प्रेम रस के वशीभूत होकर कोई संबंध बना लिया तो उसे निभाना अत्यंत कठिन होता है।

                   संक्षिप्त संपादकीय व्याख्या-मनुष्य जब किसी प्रेम से करता है तो उस पर अपनी जान न्यौछावर करता है। उसका लगाव सब जगह जाहिर होता है। जो लोग केवल दिखावे का प्रेम करते है अपने व्यवहार से यह प्रकट कर देते हैं कि उनका प्यार नकली है। स्वार्थ के वशीभूत होकर प्रेम करने वाले अपना काम निकलते ही संबंध तोड़ देते हैं पर जो वास्तव में प्रेम करते हैं वह कभी अपने स्वार्थ की पूर्ति के लिये आग्रह नहीं करते।
कई कारणों वश लोग स्वार्थों की वजह से पास जरूर आते हैं पर वह प्रेमी नहीं हो जाते। प्रेम तो हृदय में जलने वाला ज्योति पुंज है जो दूर होने पर ही प्रकाश देता है। कमलिनी चंद्रमा से प्रेम करती है पर वह उससे कितना दूर है। उसी तरह मनुष्य भी जब किसी से प्रेम करता है तो उसके दूर और पास होने की परवाह नहीं करता।
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