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Saturday, December 26, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-तत्वज्ञान से बुद्धि में दृढ़ता आती है (kautilya ka arthshastra-tatvagyan aur buddhi)

सूक्ष्मा सत्तवप्रयत्नाभ्यां दृढ़ा बुद्धिरधिष्ठिता।

प्रसूते हि फलं श्रीमदरणीय हुताशनम्।।

हिन्दी में भावार्थ-
जो बुद्धि सूक्ष्म तत्त्वगुण का ज्ञान होने से दृढ़ स्थिति में है वह धन रूपी फल को उत्पन्न करती है जिस प्रकार अरणी काष्ट अग्नि को प्रकट करता है।

धातोश्चामीकरमिव सर्पिनिर्मथनादिव।

बुद्धिप्रयत्नोपगताध्यवसायाद्ध्रवं फलम्।।

हिन्दी में भावार्थ-
जिस तरह अनेक धातुओं में मिला होने पर भी गलाने से प्रकट होता है तथा दही मथने से घृत प्रगट होता है वैसे बुद्धि और उद्योग से के संयुक्त उद्यम से फल की प्राप्ति भी होती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-श्रीगीता में वर्णित ज्ञान की लोग यह सोचकर उपेक्षा करते हैं कि वह तो सांसरिक कार्य से विरक्ति की ओर प्रेरित कर सन्यास मार्ग की ओर ले जाता है। यह अल्पज्ञान का प्रंमाण है। सच तो यह है कि उसमें वर्णित तत्व ज्ञान को जिसने भी धारण कर लिया उसकी बुद्धि दृढ़ मार्ग पर चल देती है। वह छोटी मोटी बातों पर न ध्यान देता है न उसे मान अपमान की चिंता रहती है। जिनसे मनुष्य को विचलित किया जा सकता है वह मायावी प्रयास उसे अपने मार्ग से डिगा नहीं सकते।  यही कारण है कि अपने बौद्धिक संतुलन और एकाग्रता से अन्य के मुकाबले तत्वज्ञानी  अधिक सफल रहता है।  निष्काम भाव से उद्योग करने का आशय यह कतई नहीं है कि सारे संसार के काम को तिलांजलि देकर बैठा जाये बल्कि उपलब्धि प्राप्त होने पर हर्षित होकर चुप न बैठें और न नाकामी होने पर हताश हों, यही उसका आशय है। 

तत्वज्ञान का आशय यह भी है कि जीवन पथ पर उत्साह के साथ बढ़ें। समय के साथ मनुष्य को भी बदलना पड़ता है। अच्छे, बुरे, मूर्ख और चतुर व्यक्तियों से उसका संपर्क होता है, उनसे व्यवहार करने का तरीका केवल तत्वज्ञानी ही जानते हैं। तत्व ज्ञान से जो बुद्धि में स्थिरता आती है उससे दूसरे लोग अपने छल, चालाकियों तथा मिथ्या ज्ञान से विचलित नहीं कर सकते।  वर्तमान में हम देखें तो विश्व आर्थिक शिखर पर बैठे लोगों का  सारा ढांचा ही मिथ्या ज्ञान तथा काल्पनिक स्वर्ग बेचने पर आधारित है। अगर लोगों में तत्व ज्ञान हो तो शायद ऐसे दृश्य देखने को मिलें जिसमें लोगों को जीते जी जमीन पर मरने पर आसमान में स्वर्ग खरीदते हुए अपना धन तथा समय बरबाद करते हैं।

संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Monday, December 21, 2009

चाणक्य नीति-नयी पीढ़ी को पवित्र काम की शिक्षा देना जरूरी (santan ko shiksha-hindu dharm sandesh)

पुत्राश्च विविधेः शीलैर्नियोज्याः संततं बुधैः।
नीतिज्ञा शीलसम्पनना भवन्ति कुलपजिताः।।
हिन्दी में भावार्थ-
बुद्धिमान व्यक्ति अपने बच्चों को पवित्र कामों में लगने की प्रेरणा देते हैं क्यों श्रद्धावान, चरित्रवान तथा नीतिज्ञ पुरुष ही विश्व में पूजे जाते हैं।
माता शत्रुः पिता वैरी येन बालो न पाठितः।
न शोभते सभामध्ये हंसमध्ये बको यथा।।
हिन्दी में भावार्थ--
ऐसे माता पिता अपनी संतान के बैरी है जो उससे शिक्षित नहीं करते। अशिक्षित व्यक्ति कभी भी बुद्धिमानो की सभा में सम्मान नहीं पाता। वहां उसकी स्थिति हंसों के झुण्ड में बगुले की तरह होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ऐसे समाचार अक्सर आते हैं कि माता पिता को उनके बच्चों ने छोड़ दिया या उनकी देखभाल नहीं करते। अपने देश में बुजुर्गों की देखभाल बच्चों के ही द्वारा की जाये इसके लिये कानून भी बनाया गया। मगर एक सवाल जो कोई नहीं उठाता कि आखिर बुजुर्गों की ऐसी स्थिति ऐसी होती क्यों है? पहले तो ऐसा नहीं होता था। दरअसल पाश्चात्य शिक्षा में केवल रोजगार प्राप्त करने का ही पाठ्यक्रम होता है-वह भी सेठ या पूंजीपति बनने की नहीं बल्कि गुलाम बनाने की योजना का ही हिस्सा है। ऐसे में शिक्षित व्यक्ति नौकरी आदि के चक्कर में अपने परिवार से दूर हो जाता है। ऐसे कई परिवार हैं जिसमें तीन तीन लड़के हैं पर सभी नौकरी के लिये अपने माता पिता को छोड़ जाते हैं। माता पिता अपनी संपत्ति की रक्षा उनके लिये करते हुए अकेले रह जाते हैं। इसके अलावा अगर उनके पास संपत्ति नहीं भी है तो नौकरी पर लगे बेटे के पास दूसरे शहर में वैसा मकान या रहने की स्थिति नहीं है जिससे वह अपने माता पिता को दूर रखता है। जहां तक समाज का काम है वह तो कहता ही रहता है कि अमुक आदमी ऐसा है या वैसा है पर सच यही है कि पाश्चात्य रहन सहन ने समाज में एक तरह से विघटन पैदा किया है और इसके लिये जिम्मेदारी वह माता पिता भी हैं जो अपनी संतान को सही शिक्षा नहीं देते। वह आधुनिक विद्यालयों में अपने बच्चों को शिक्षा के लिये भेजकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते हैं।
दूसरा भी एक सवाल है जिससे कोई नहीं उठाता कि माता पिता यह कहते हैं कि हमने बच्चे को पढ़ाया लिखाया पर उससे वह आखिर बना ही क्या? एक नौकर न! ऐसे में आजकल के लोगों के सामने यह भी समस्या है कि अपनी नौकरी से जूझते हुए अपने परिवार की देखभाल उनके लिये कठिन हो जाती है। ऐसे में पारिवारिक तनाव भी उनके लिये एक संकट हो जाता है।
कहने का तात्पर्य यह है कि माता पिता अपने बच्चों से उन संस्कारों का फल चाहते हैं जो उन्होंने उनमें बोये ही नहीं। वह केवल अपने बच्चों को कमाने और खाने के अलावा कोई अन्य शिक्षा देते ही नहीं-जिससे वह समाज या धर्म का मतलब समझे-फिर बाद में उसे ही कोसते हैं। इसलिये होना तो यह चाहिए कि बच्चों को आधुनिक शिक्षा के साथ प्राचीन ज्ञान भी प्रदान करने का माता पिता दायित्व स्वयं उठायें।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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