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Sunday, March 27, 2011

शब्द चोरी करने वाला सबसे बड़ा चोर-हिन्दू धार्मिक लेख (shabd chori karane wala sabse bada chor-hindu dharmik lekh)

हमारी पांच इंद्रियां आंख, कान, नाम. मुख तथा हाथ पांव अपना काम करती हैं। यह देह में स्थित मन, बुद्धि तथा अहंकार की प्रकृतियों से नियंत्रित होती है। हमारी देह बाहरी गतिविधियों से प्रभावित होती है। वह नाक से सुगंध ग्रहण करती है, आंखों से सांसरिक रूप देखती और कान से शब्द स्वर सुनती है। मुख से रस ग्रहण करती है और शरीर से स्पर्श अनुभव करती है। हम बाहरी गतिविधियों से प्रभावित होते हैं इसलिये शब्द बोलने और सुनने का प्रभाव भी अनुभव करते हैं। जिन लोगों के पास तत्वज्ञान नहीं है वह अपनी इंद्रियों की गतिविधियों और उनके प्रभाव से अवगत न होने के कारण हमेशा असहजता की स्थिति में रहते हैं। खासतौर से शब्दों में मामले में लापरवाह होते हैं। न केवल अनाप शनाप शब्द बोलते हैं बल्कि बकवास करने वालों की संगत भी करते हैं।
मनुस्मृति में कहा गया गया है कि
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वाच्यार्था नियताः सर्वेवांमूलाः वाग्विनिःसृताः।
तां तु यः स्तेदयेद्वाचं स सर्वस्तेयकृन्नरः।।
‘‘शब्द से सभी अर्थ उत्पन्न होते हैं। उनके बोलने से ही सभी का ज्ञान होता है। समस्त शास्त्रों ं का प्रादुर्भाव शब्द से ही हुआ है। अतः शब्द ही संसार का मूलाधार है। अतः झूठ बोलने वाला या दूसरे के शब्द चोरी करने वाला सबसे बड़ा चोर है।’
एक दूसरी बात भी सामने आती है। अक्सर कुछ लोग दूसरे की कही बात अपने नाम से कहते हैं। वैसे हम हिन्दी साहित्य जगत में यह भी देखते हैं कि विचार, कविता और कथाऐं चोरी कर ली जाती हैं। हिन्दी में इंटरनेट पर कुछ सामान्य लोग अपनी रचनाऐं लिखते हैं और अनेक पत्र पत्रिकाऐं चोरी कर उसे छाप देती हैं। ऐसा भी हुआ है कि अध्यात्मिक विषयों के लेखों की चोरी कर लेखक से कहा जाता है कि ‘आप तो वैसे ही सेवा कर रहे हैं पर नाम की चिंता क्यों करते हैं।’
कहने का अभिप्राय यह है कि यह चोरी सबसे बड़ा पाप है। इसके अलावा आजकल तो झूठ बोलने का फैशन हो गया है। लोग झूठ बोलना चालाकी मानने लगे हैं। समाज में इसलिये ही नैतिक पतन चरम पर पहुंच गया है। संवेदनाऐं मर गयी हैं और भले मनुष्य होने का दावा सभी करते हैं पर कुछ लोग पशुओं से अधिक बुरा व्यवहार करने लगे हैं। हमें ऐसी बुराई से बचना चाहिए जिसके पाप का पश्चाताप नहीं किया जा सके, पर इसके लिये यह जरूरी है कि पाप क्या है और पुण्य क्या, इस बात को समझें।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Tuesday, December 30, 2008

मनुस्मृति-सन्यासी किसी को अपना मित्र न बनायें

अति वादांस्तितिक्षेत नावमनयेत क´्वल।
न चेमं देहमाश्रित्य वैरं कुर्वीत केनचित्

हिंदी में भावार्थ-सन्यासी को चाहिये कि दूसरे के कटु वचनों को भी सहन करे। उसे किसी के अभद्र शब्द का उत्तर वैसे ही नहीं देना चाहिये। किसी का अपमान नहीं करना चाहिये। यह देह तो नाशवान है इसके लिये किसी से क्या बैर करना।
एक एवं चरेन्नितयं सिद्धयर्थसहायवान्
सिद्धिमेकस्य सम्पश्यनन जहाति न हीयते

हिंदी में भावार्थ-सन्यासी को किसी से मित्रता की इच्छा न करते हुए जीवन में एकाकी विचरण करना चाहिये तभी उसे मोक्ष मिलता है। उसे यह विचार यह करना चाहिये कि न वह कुछ यहां छोड़ेगा और न कोई उसे छूटेगा।
पाणिग्राहस्य साध्वी स्त्री जीवतो वा मृतस्य वा
पतिलोकमभीप्सन्ती नाचरेत्सिञ्विदप्रियम्

हिंदी में भावार्थ-अगले जन्म में अच्छा पति पाने की इच्छा रखने वाली स्त्री को इस जन्म के पति की जीवित रहते या मृत्यु हो जाने पर भी उसे बुरा लगने वाला कोई कार्य नहीं करना चाहिये।
संक्षिप्त संपादकीय व्याख्या-वर्तमान काल में कई ऐसे संत हैं जो अपने आपको सन्यासी प्रदर्शित करते हैं पर उनका यह केवल ढोंग होता हैं। पर्दे के पीछे वह माया की दुनियां में ही रमण करते हैं। जिसे सन्यास कहा गया है उसमें किसी से मिलना निषिद्ध नहीं है पर कोई संपर्क बनाना वर्जित है। कहीं मित्रता या गुरु-शिष्य का संबंध बनाने वाले को सन्यासी नहीं कहा जा सकता। सन्यासियों को लिये कठिन नियम है। उसे किसी से अभद्र शब्द नहीं बोलना चाहिये और न कभी उत्तेजित होना चाहिये। अगर उन नियमों को देखा जाये तो आजकल किसी को सन्यासी नहीं मानना जा सकता है। फिर भी कुछ ऐसे गृहस्थ होते हैं जो सन्यास भले ही न लें पर ईश्वर के प्रति भक्ति तथा ज्ञान नियमित रूप से प्राप्त करत हैं तो उनका भाव सन्यास को ही प्राप्त हो जाता है। ऐसे लोग सदाचार से जीवन व्यतीत करते हैं। जीवन में गृहस्थाश्रम में रहते हुए भी आचार विचार के संबंध में जो सन्यासियों के बारे में है उनको मानकर जीवन प्रसन्नता से व्यतीत किया जा सकता है। गृहस्थाश्रम में रहते हुए मित्रा आदि तो बनाने पड़ते हैं पर सन्यास भाव वाले उनसे किसी स्वार्थ पूरे होने की आशा नहीं करते क्योंकि भविष्य में उसके पूर्ण न होने पर निराशा का भाव मन में नहीं आता।
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