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हिंदी मित्र पत्रिका

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Saturday, July 31, 2010

भर्तृहरि नीति शतक-मणि के बावजूद विषधर किसी को प्रिय नहीं होता (mani aur vish-bhartrihari neeti shatak)

आरंभगुर्वी क्षयिणी क्रमेण लघ्वी पुरा वृद्धिमति च पश्चात्
दिनस्य पूर्वाद्र्धपराद्र्ध-भिन्ना छायेव मैत्री खलसज्जनानाम्।।
हिन्दी में भावार्थ- जिस तरह दिन की शुरूआत में छाया बढ़ती हुई जाती है और फिर उत्तरार्द्ध  में धीरे-धीरे कम होती जाती है। ठीक उसी तरह सज्जन और दुष्ट की मित्रता होती है।
दुर्जनः परिहर्तवयो विद्ययाऽलङ्कृतोऽपि सन्
मणिनाः भूषितः सर्पः किमसौ न भयंकर।।
हिन्दी में भावार्थ- इसका आशय यह है कि कोई दुर्जन व्यक्ति विद्वान भी हो  तो उसका साथ छोड़ देना चाहिए। विषधर में मणि होती है पर इससे उससे उसका भयंकर रूप प्रिय नहीं हो जाता।
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-सज्जन व्यक्तियों से मित्रता धीरे-धीरे बढ़ती है और स्थाई रहती है। सज्जन लोग अपना स्वार्थ न होने के कारण बहुत शीघ्र मित्रता नहीं करते पर जब वह धीरे-धीरे आपका स्वभाव समझने लगते हैं तो फिर स्थाई मित्र हो जाते हैं-उनकी मित्रता ऐसे ही बढ़ती है जैसे पूर्वाद्ध में सूर्य की छाया बढ़ती जाती है। इसके विपरीत दुर्जन लोग अपना स्वार्थ निकालने के लिए बहुत जल्दी मित्रता करते हैं और उसके होते ही उनकी मित्रता वैसे ही कम होने लगती है जैसे उत्तरार्द्ध  में सूर्य का प्रभाव कम होने लगता है। पड़ौस तथा कार्यस्थलों में हमारा संपर्क अनेक ऐसे लोगों से होता है जिनके प्रति हमारे हृदय में क्षणिक आत्मीय भाव पैदा हो जाता है। वह भी हमसे बहुत स्नेह करते हैं पर यह यह संपर्क नियमित संपर्क के कारण मौजूद हैं।  उन कारणों के परे होते ही-जैसे पड़ौस छोड़ गये या कार्य का स्थान बदल दिया तो-उनसे मानसिक रूप से दूरी पैदा हो जाती है।  इस तरह यह बदलने वाली मित्रता वास्तव में सत्य नहीं होती। मित्र तो वह है जो दैहिक रूप से दूर होते भी हमें स्मरण करता है और हम भी उसे नहीं भूलते। इतना ही नहीं समय पड़ने पर उनसे सहारे का आसरा मिलने की संभावना रहती है।  अतः स्थितियों का आंकलन कर ही किसी को मित्र मानकर उससे आशा करना चाहिये। जहां तक हो सके दुष्ट और स्वार्थी लोगों से मित्रता नहीं करना चाहिये जो कि कालांतर में घातक होती है।उसी तरह अपने व्यक्तित्व का भी निर्माण इसी तरह करना चाहिए कि वह दूसरों को प्रिय लगे।
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संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Tuesday, March 23, 2010

संत कबीर वाणी-तंत्र मंत्र से बुद्धि भ्रष्ट होती है (sant kabir vani-tantra aur mantra)

सार शब्द निज जानि के, जिन कीन्ही परतीति।
काग कुमत तजि हंर ह्नै, चले सु भौजल जीति।।
संत कबीरदास के मतानुसार शब्द का ज्ञान होने पर जिसने अपना व्यवहार निष्कपट बनाने के साथ जीवन में परमात्मा के प्रति श्रद्धा और विश्वास भाव हृदय में धारण कर लिया वह वैसे ही कुमति को त्याग देता है जैसे कि हंस ने प्राप्त की और उसका उद्धार हो गया।
जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय।
सार शब्द जानै बिना, कागा हंस न होय।।
संत शिरोमणि कबीरदास जी का कहना है कि इस ंसंसार में जंत्र मंत्र सब झूठ है और इनसे बुद्धि भ्रमित हो जाती है। जब तक शब्द का ज्ञान न हो तब तक कोई मनुष्य वैसे ही ज्ञानी नहीं बन सकता जैसे कि कौआ कभी हंस नहीं बन सकता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे देश में तंत्र मंत्र को लेकर अनेक लोग भ्रमित होते हैं। अनेक लोग तो पशु बलि देकर अपना काम सिद्ध करना चाहते हैं। बहुत बड़ी संख्या में कथित श्रद्धालु सांसरिक कामों की सिद्धि के लिये तांत्रिकों और कथित सिद्धों के दरवाजे पर हाजिरी देते हैं। यही कारण है कि अनेक ढोंगी लोगों ने तंत्र मंत्र को अपना व्यवसाय बना लिया है। अनेक लोग तो ऐसे हैं जो गढ़े खजाने की खोज का काम भी करते हैं। जितना हमारे देश का अध्यात्मिक ज्ञान समृद्ध है उतना ही तंत्र मंत्र के वहमों का अंधेरा भी यहीं दिखाई देता है।
दरअसल सृष्टि का नियम है कुछ काम तो समय आने पर स्वयमेव सिद्ध होते हैं पर उनके पूर्ण होने की तीव्रतर इच्छा अनेक लोगों को इन तंत्र मंत्रों के चक्कर में डाल देती है। यह तंत्र मंत्र उस अध्यात्मिक ज्ञान का भाग नहंी है जो जीवन का मार्ग प्रशस्त करने के लिये ऐसी बुद्धि प्रदान करता है जिससे मनुष्य अपना काम सिद्ध करने में स्वयं ही सक्षम हो जाता है। ऐसे तांत्रिक या कथित सिद्ध भले ही अपने आपको धार्मिक व्यक्ति बताते हों पर यह कृत्य धर्म का हिस्सा नहीं है। यह विचार करते हुए उनसे दूर ही रहना अच्छा है। इससे अच्छा तो यह है कि भगवान का नाम स्मरण करते रहें जिससे मन में शांति और धीरज बना रहता है और जीवन संसार के काम तो समय आपने पर ही स्वयं ही सिद्ध होते हैं।
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Sunday, December 27, 2009

भर्तृहरि शतक-स्वतंत्र व्यक्ति का राजा से क्या काम? (state and free man-hindu dharm sandesh)

न नटा न विटा न गायकाः न च सभ्येतरवादचुंचवः।
नुपमीक्षितुमत्र के वयं स्तनभारानमिता न योषितः।।

हिन्दी में भावार्थ- न तो हम नट न हैं न भांड है न गायक है और न ही सभ्यता से हटकर वार्तालाप करने वाले न ही हमें सुंदरियों से कोई मतलब है तब राजाओं से हमारा क्या काम है?

स जात कोऽप्यासन्मदनरिपुण मूघ्र्नि घवलं कपालं यस्योच्चैर्विनिहितमलंारविधये।
नृभिः प्राणत्राणप्रवणमतिभिः कैश्चिदधुना नमदिभ् कः पंसामयतुलदर्प ज्वरभरः।
हिन्दी में भावार्थ-पुरातनकाल में अनेक मनुष्य ऐसे हुए जिनकी खोपड़ियों की माला भगवान शिव ने अपने गले डालकर अपना श्रृंगार किया। अब तो ऐसे मनुष्य है जो अपना पेट भरने के लिये अभिवादन करने वालों से प्रतिष्ठा पाकर ही अहंकार के बुखार में तप रहे हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-एक मनुष्य की सही पहचान उसकी स्वतंत्र स्थिति है। वह अपना व्यवसाय करे, अपना चिंतन स्वयं करे, अपने निर्णय स्वयं ले और परमपिता परमात्मा के अलावा किसी अन्य के आगे नतमस्तक होने की उसे आवश्यकता न पड़े। यही नहीं उसके सज्जन होने का यह भी प्रमाण है कि कोई अन्य व्यक्ति भय, लालच अथवा स्वार्थवश बिना किसी दबाव के उसका सम्मान करे। आज स्थितियां बदल गयी हैं। हालांकि भर्तृहरि के जीवन काल में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं थी यही कारण है कि वह मनुष्य के स्वतंत्र अस्तित्व की पहचान बता गये पर आजकल तो हालत यह है कि मनुष्य स्वयं नौकरी कर रहे हैं पर उससे मिली भौतिक उपलब्धियों को ऐसे बखान करते हैं जैसे कि वह किसी स्वतंत्र व्यवसाय के स्वामी हों।
पूरे विश्व में व्यवस्था ऐसी हो गयी है कि स्वतंत्र व्यवसाय करने वाले न चाहते हुए भी शासकीय नौकरी करने वालों को सम्मान देते हैं और जरूरत पड़े तो उनको कमीशन भी देते हैं। जैसे जैसे उदारीकरण बढ़ रहा है निजी क्षेत्रों में भी यही हो रहा है। सभी जगह अधिकारी और कर्मचारी करने को तो नौकरी कर रहे हैं पर उनका भाव ऐसा होता है जैसे कि वह समाज के शासक हों। उनको कोई व्यक्ति अपने स्वार्थवश अभिवादन करता है तो वह अपने आप को साहब समझकर फूलने लगते हैं।
भारतीय इतिहास में गुलाम वंश के शासन का उल्लेख मिलता है। ऐसा लगता है कि अब तो गुलाम समाज का ही शासन चल रहा है। स्वतंत्र रूप से मनुष्य का सांस लेना पूरे विश्व में कठिन हो रहा है। कहने को पश्चिमी राष्ट्र आधुनिक सभ्यता का दंभ भरते हैं पर उनकी कंपनी प्रणाली भी गुलामी का ही प्रतीक है। उनको आधुनिक शासन प्रणाली का जनक कहा जाता है जिसमें आदमी को एक देश से दूसरे जाने के लिये पासपोर्ट और वीजा की आवश्यकता होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रतिबंधों को आधुनिक सभ्यता का प्रतीक मानते हैं। यह प्रतिबंध बीमार मानसिकता का प्रमाण है पर दुनियां हैं कि अपने आधुनिक सभ्यता का भाग होने पर फूल रही है।



संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday, December 24, 2009

भर्तृहरि शतक-जब आदमी धन की गरमी से रहित हो जाता है (money and socity-hindu dharm sandesh)

भर्तृहरि नीति शतक में कहा गया है कि
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यसयास्ति वित्तं स नरः कुलीन स पण्डित स श्रुतवान्गुणज्ञः।

स एव वक्ता स च दर्शनीयः।

सर्वे गुणा कांचनमाश्रयन्ति।।

     हिन्दी में भावार्थ-जिस मनुष्य के पास माया का भंडार उसे ही कुलीन, ज्ञानी, गुणवान माना जाता है। वही आकर्षक है। स्पष्टतः सभी के गुणों का आंकलन उसके धन के आधार पर किया जाता है।
तानीन्द्रियाण्यविकलानि तदेव नाम सा बुद्धिप्रतिहता वचनं तदेव।

अर्थोष्मणा विरहितः पुरुष क्षणेन सोऽप्यन्य एव भवतीति विचित्रमेतत्।।


     हिन्दी में भावार्थ-एक जैसी इंद्रियां, एक जैसा नाम और काम, एक ही जैसी बुद्धि और वाणी पर फिर भी जब आदमी धन की गरमी से क्षण भर में रहित हो जाता है तब उसकी स्थिति बदल जाते है। इस धन की बहुत विचित्र महिमा है।
     वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-यह समाज भर्तृहरि महाराज के समय में भी था और आज भी है। हम बेकार में परेशान होकर कहते हैं कि आजकल का जमाना खराब हो गया है।सच बात तो यह है कि सामान्य मनुष्य की प्रवृत्तियां ही ऐसी है कि वह केवल भौतिक उपलब्धियां देखकर ही दूसरे के गुणों का आंकलन  करता है। इधर गुणवान मनुष्य अपने अंदर गुणों का संचय करते हुए इतना ज्ञानी हो जाता है कि वह इस बात को समझ लेता है कि धन से नहीं वरन गुणों से  ही उसके जीवन की रक्षा होगी। इसलिये वह समाज में प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिये कोई अधिक प्रयास नहीं करता। उधर अल्पज्ञानी और ढोंगी लोग थोड़ा पढ़लिखकर सामान्य व्यक्तियों के सामने अपनी चालाकियों के सहारे उन्हीं से धन वसूल कर प्रतिष्ठित भी हो जाते हैं। यह अलग बात है कि इतिहास हमेशा ही उन्हीं महान लोगों को अपने पन्नों में दर्ज करता है जिन्होंने अपने गुणों से वास्तव में समाज को प्रभावित किया जाता है।
      इसका एक दूसरा पहलू भी है। अगर हमारे पास अधिक धन नहीं है तो इस बात की परवाह नहीं करना चाहिए। समाज के सामान्य लोगों की संकीर्ण मानसिकता का विचार करके अपने सम्मान और असम्मान की उपेक्षा कर देना चाहिए।  जिसके पास धन है उसे सभी मानेंगे। आप अच्छे लेखक, कवि, चित्रकार या कलाकार हैं पर उसकी अगर भौतिक उपलब्धि नहीं होती तो फिर सम्मान की आशा न करें। इतना ही नहीं अगर आप परोपकार के काम में लगे हैं तब भी यह आशा न करें  कि बिना दिखावे अथवा विज्ञापन के आपको कोई सम्मान करेगा। सम्मान या असम्मान से उपेक्षा करने के बाद आपके अंदर एक आत्मविश्वास पैदा होगा जिससे जीवन में अधिक आनंद प्राप्त कर सकेंगे। संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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