- बुरे राजा के राज में भला जनता कैसे सुखी रह सकती है।
- बुरे मित्र से भला क्या सुख मिल सकता है। वह और भी गले की फांसी सिद्ध हो सकता है।
- बुरी स्त्री से भला घर में सुख शांति और प्रेम का भाव कैसे हो सकता है।
- बुरे शिष्य को गुरू लाख पढाये पर ऐसे शिष्य पर किसी भी प्रकार का प्रभाव नहीं पड़ सकता है।
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Friday, July 20, 2007
चाणक्य वाणी
Sunday, July 15, 2007
आध्यात्मिक ज्ञान के बिना विकास अधूरा
देश को विकास की ओर ले जाने की बात सभी करते है और करना चाहिऐ, पर आज तक कोई भी स्पष्ट नहीं का सका कि उसका स्वरूप क्या? क्या भौतिक साधनों के उपलब्धि ही विकास है? क्या आदमी के मानसिक विकास को कोई मतलब नही है?
अगर हम विकास का अर्थ केवल भौतिक विकास से करते हैं तो वह स्वाभाविक रुप से आता ही है, और साथ में विनाश भी होता है। जो आज है उसका स्वरूप भी बदलेगा-इसी बदलाव को हम विकास कहते हैं और फिर एक दिन उसका विनाश भी होता है। इतने सारे भौतिक साधन होते हुए भी पूरे विश्व में अमन चैन नहीं है। एक तरफ सरकारें विकास का ढिंढोरा पीटती हैं दूसरी तरफ आतंकवादी उन्हीं साधनों का इस्तेमाल गलत उद्देश्यों के लिए करते है उनके पास धन और अन्य साधन प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं और जैसे जैसे संचार के क्षेत्र में नये नए साधन आ रहे आम आदमी के पास इस्तेमाल के लिए बाद में पहुंचते है आतंकवादी उसे शुरू कर चुके होते हैं। इसका सीधा आशय यही है उनके पास धन और साधनों की उपलब्धता है पर विचार शक्ति नहीं है। यह विचार शक्ति तभी आदमी में आती है जब वह अपने अध्यात्म को पहचानता है। आजकल आदमी को भौतिक शिक्षा तो दीं जाती है पर अध्यात्म का ज्ञान नहीं दिया जाता और वह दूसरों के लिए उपयोग की वस्तु बनकर रह जाता है।
हमारा देश विश्व में अध्यात्म गुरू की छबि रखता है और यहां के अध्यात्म आदमी में सर्वांगीण विकास कि प्रवृति उत्पन्न करता है। हमारे महर्षियों और संतों ने अपनी तपस्या और तेज से यहाँ ऐसे बीज बो दिए हैं जो आज तक हमारे देश की छबि उज्जवल है पर अपने धर्म ग्रंथो को असांसारिक और भक्ति से ओतप्रोत मानकर
उन्हें नियमित शिक्षा से दूर कर दिया गया है, यही कारण है हमारे देश के प्रतिभाशाली लोग भौतिक शिक्षा ग्रहण कर विदेश में तो ख़ूब नाम कमा रहे हैं पर देश को उसका लाभ नहीं मिल पाया वजह हर जगह अज्ञान का बोलबाला है। वह विदेशों में नाम कमा रहे हैं और यहाँ हम खुश होते हैं पर कभी यह सोचा है कि हमारे देश में रहकर वह लोग कम क्यों नहीं कर पाये?
केवल भौतिक शिक्षा से सुख-समृद्धि तो आ सकती है पर शांति का केवल एक ही जरिया है और वह है अध्यात्म का विकास। इसका आशय यह है कि आदमी समय के अनुसार बड़ा होता है और अपने प्रयासों से भौतिक साधनों का निर्माण और संचय स्वाभाविक रुप से करेगा ही पर वह तब तक अध्यात्मिक विकास नहीं कर सकते जब तक उसे कोई गुरू नहीं मिलेगा। अगर हम विश्व में फैले आतंकवाद को देखें तो अधिकतर आतंकवादी भौतिक शिक्षा से परिपूर्ण है वह हवाई जहाज उड़ाने, कंप्युटर चलाने और बम बनने में भी माहिर है और कुछ तो चिकित्सा और विज्ञान में ऊंची उपाधिया प्राप्त हैं, इसके बावजूद आतंकवाद की तरफ अग्रसर हो जाते हैं उसमें उनका दोष यही होता है कि धन और धर्म के नाम पर भ्रम में डालकर उन्हें इस रास्ते पर आने को बाध्य कर दिया जाता है ।
इस तरह यह जाहिर होता है कि भौतिक साधनों के विकास के साथ अध्यात्म का विकास भी जरूरी है। अगले अंक में अध्यात्म के विकास के स्वरूप पर चर्चा करेंगे।
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