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Saturday, July 11, 2009

कौटिल्य अर्थशास्त्र-दूध न देने वाली गाय को बछड़ा भी त्याग देता है (dugdh n dene vali gay aur bachhda-kautilya ka arthshastra)

अर्थार्थी जीवलोकोऽय ज्वलन्तमुपसर्पति।
क्षीणढीरां निराजीव्यां वत्सत्स्त्तव जति मातरम्।।
हिंदी में भावार्थ-
धन में ही अपना स्वार्थ रखने वाला यह लोक लक्ष्मी की चमक से प्रज्जवलित पुरुष की सेवा करता है और दुग्धहीन जीविका न देने वाली माता को उसका बछड़ा भी त्याग देता है।

उत्थिता एव पूज्यन्ते जनाः काय्र्यार्थिमिनेरैः।
शत्रुवश पतितं कोऽयनुवन्दते मानवं पुंनः।।
हिंदी में भावार्थ-
जीवन में उत्थान की तरफ बढ़ते हुए पुरुष का कार्यभिलाषी पुरुष सम्मान करते हैं और भला पतन की तरफ जा रहे शत्रु के समान पुरुष का कौन पूछता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में अर्थ या धन सभी कुछ नहीं है पर फिर भी वह इस दैहिक जीवन का बहुत बड़ा आधार है। यह सच है कि अर्थ से धर्म का निर्वाह होता है पर उसका फल धन नहीं है परंतु संसार में जीवन को सुख और शांति से बिताने के लिये धन की आवश्यकता होती है। उसकी शक्ति ऐसी है कि पूरा मनुष्य समुदाय उसके पीछे भाग रहा है। कोई विद्वान या ज्ञानी अपने गुण, ज्ञान, दान और मार्गदर्शन से समाज के लिये बहुत काम करता है पर अगर वह स्वयं निर्धन है तो फिर लोग उसकी बात नहीं सुनते क्योंकि धन होना ही व्यक्ति की योग्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अगर पुरुष के पास धन पर्याप्त मात्रा में न हो तो उसके परिवार वाले भी उसे त्याग देते है। कहने का तात्पर्य यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना बहुत अच्छी बात है पर इसका आशय यह नहीं कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्म से विरक्त हो जाये। उसी तरह अध्यात्मिक ज्ञान रखने वाले अगर सांसरिक कर्म करते हैं तो यह नहीं समझना चाहिये कि वह अज्ञानी हैं।
हां, यह बात निश्चित है अगर कोई अध्यात्मिक ज्ञानी होने के साथ ही धन भीपर्याप्त मात्रा में प्राप्त कर चुका है तो उसका अधिक ही समान होता है बनिस्बत उसके जो केवल धन के सहारे ही सम्मान प्राप्त करता है। इस संसार में धन के क्षेत्र में जैसे ही मनुष्य उन्नति की तरफ जाता है वैसे ही समाज उसका सम्मान करता है। धनी आदमी की सेवा सभी करते हैं पर निर्धन को वह एक तरह से शत्रु समझता है।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Saturday, June 27, 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-उन्नतिशील पुरुष को ही मिलता है सम्मान

उत्थिता एव पूज्यन्ते जनाः काय्र्यार्थिमिनेरैः।
शत्रुवश पतितं कोऽयनुवन्दते मानवं पुंनः।।
हिंदी में भावार्थ-
जीवन में उत्थान की तरफ बढ़ते हुए पुरुष का कार्यभिलाषी पुरुष सम्मान करते हैं और भला पतन की तरफ जा रहे शत्रु के समान पुरुष का कौन पूछता है।
अर्थार्थी जीवलोकोऽय ज्वलन्तमुपसर्पति।
क्षीणढीरां निराजीव्यां वत्सत्स्त्तव जति मातरम्।।
हिंदी में भावार्थ-
धन में ही अपना स्वार्थ रखने वाला यह लोक लक्ष्मी की चमक से प्रज्जवलित पुरुष की सेवा करता है और दुग्धहीन जीविका न देने वाली माता को उसका बछड़ा भी त्याग देता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में अर्थ या धन सभी कुछ नहीं है पर फिर भी वह इस दैहिक जीवन का बहुत बड़ा आधार है। यह सच है कि अर्थ से धर्म का निर्वाह होता है पर उसका फल धन नहीं है परंतु संसार में जीवन को सुख और शांति से बिताने के लिये धन की आवश्यकता होती है। उसकी शक्ति ऐसी है कि पूरा मनुष्य समुदाय उसके पीछे भाग रहा है। कोई विद्वान या ज्ञानी अपने गुण, ज्ञान, दान और मार्गदर्शन से समाज के लिये बहुत काम करता है पर अगर वह स्वयं निर्धन है तो फिर लोग उसकी बात नहीं सुनते क्योंकि धन होना ही व्यक्ति की योग्यता का सबसे बड़ा प्रमाण है। अगर पुरुष के पास धन पर्याप्त मात्रा में न हो तो उसके परिवार वाले भी उसे त्याग देते है। कहने का तात्पर्य यह है कि अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करना बहुत अच्छी बात है पर इसका आशय यह नहीं कि मनुष्य अपने स्वाभाविक कर्म से विरक्त हो जाये। उसी तरह अध्यात्मिक ज्ञान रखने वाले अगर सांसरिक कर्म करते हैं तो यह नहीं समझना चाहिये कि वह अज्ञानी हैं।
हां, यह बात निश्चित है अगर कोई अध्यात्मिक ज्ञानी होने के साथ ही धन भीपर्याप्त मात्रा में प्राप्त कर चुका है तो उसका अधिक ही समान होता है बनिस्बत उसके जो केवल धन के सहारे ही सम्मान प्राप्त करता है। इस संसार में धन के क्षेत्र में जैसे ही मनुष्य उन्नति की तरफ जाता है वैसे ही समाज उसका सम्मान करता है। धनी आदमी की सेवा सभी करते हैं पर निर्धन को वह एक तरह से शत्रु समझता है।
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यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
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Saturday, June 13, 2009

श्रीगीता दर्शन-अपने धर्म पर दृढ़ रहना आवश्यक

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।
हिंदी में भावार्थ-
श्रीगीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपने धर्म से पराया धर्म श्रेष्ठ लगता है तब उसको कभी श्रेय न प्रदान करें। अपना धर्म संपन्न नहीं दिखता पर दूसरे का धर्म तो हमेशा भयावह परिणाम देने वाला होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग धर्म को लेकर बहस करते हैं पर उसका मतलब नहीं समझते। हर टीवी चैनल, अखबार और पत्रिका को उठाकर देख लें धर्म को लेकर तमाम सतही बातें लिखी मिल जायेंगी जिनका सार तो विषय सामग्री प्रस्तुत करने वाले स्वयं नहीं जानते न ही पाठक या दर्शक समझने का प्रयास करते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि धर्म बिकने, खरीदने, और लाभ हानि वाली व्यापारिक वस्तु हो गयी है। अनेक प्रचार माध्यम बकायदा धर्मपरिवर्तित कर जिंदगी में भौतिक उपलब्धि प्राप्त करने वाले लोगों का प्रचार करते हैं। इतना ही नहीं धर्म परिवर्तित कर विवाह करने पर लड़कियों को वीरांगना करार दिया जाता है। यह केवल प्रचार है जिससे बुद्धिमान भारतीय तत्व ज्ञान से दिखने वाले कटु सत्यों से भागते हुए करते हैं क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान जीवन के ऐसे रहस्यों को उद्घाटित करने के सत्यों से भरा पड़ा है जिसको जानने वाला धर्म न पकड़ता है न छोड़ता है।
हमारे भारतीय अध्यात्म में स्पष्ट रूप से धर्म को कर्म से जोड़ा गया न कि कर्मकांडों से। कर्मकांडों और रूढ़ियों को लेकर भारतीय धर्मों की आलोचना करने वाले मायावी लोग उस तत्व ज्ञान को जानते नहीं है पर उनको यह पता है कि अगर उसका प्रचार हो गया तो फिर उनकी माया धरी की धरी रह जायेगी।
एक मजे की बात है कि धर्म परिवर्तित दूसरा धर्म अपनाने वाली युवतियां विवाह कर लेती हैं इसमें बुराई नहीं है पर उसके बाद उनको जब दूसरे धर्म के संस्कार अपनाने पड़ते हैं तब उन पर क्या गुजरती है इस पर कोई प्रकाश नहीं डालता। दरअसल फिल्मों की कहानियों को केवल विवाह तक ही सीमित देखने वाले बुद्धिजीवी उससे आगे कभी सोच ही नहीं पाते। यही कारण है कि विवाह के बाद जब पराये धर्म के कर्मकांडों को मन मारकर अपनाना पड़ता है तब उन युवतियों की क्या कहानी होती है इस पर कोई भी आज का महापुरुष नहीं लिखता।
दरअसल धर्म दिखाने या छूने की वस्तु नहीं बल्कि हृदय में की जाने वाली अनुभूति है। बचपन से जिस धर्म के संस्कार पड़ गये उनसे पीछा नहीं छूटता विवाह या अन्य किसी भौतिक प्राप्ति के लिये धर्म परिवर्तन तो लोग कर लेते हैं उसके बाद जो उनपर तनाव आता है उसकी चर्चा भी गाहे बगाहे करते हैं। एक मजे की बात है कि कथित आधुनिक लोग धर्म परिवर्तन करते हैं पर उसके साथ अपना नाम और इष्ट भी परिवर्तित कर लेते हैं। मतलब वह दूसरे धर्म के के बंधन को ओढ़ते है और दावा आजादी का करते हैं। सच बात तो यह है कि धर्म का आशय सही मायने में भारतीय अध्यात्म में ही है जिसका आशय है कि बिना लोभ लालच और कामना के भगवान की भक्ति करते हुए जीवन व्यतीत करना न कि उनके वशीभूत होकर धर्म मानना। दूसरी बात यह है कि धर्म परिवर्तित करने वाले अपनी पहचान गुम होने के भय से अपना पुराना नाम भी साथ लगाते हैं। दूसरे के धर्म के क्या कर्मकांड हैं किसी को पता नहीं होता? इसलिये उस धर्म के लोग मजाक उड़ाते हैं जिसे अपनाया गया है।

संत कबीरदास और चाणक्य भी कहते हैं कि दूसरे धर्म या समुदाय का आसरा लेना हमेशा दुःख का कारण होता है। किसी भी व्यक्ति या समाज को बाहर से देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका धर्म कैसा है या वह उसे कितना मानता है। वह तो जब कोई नया आदमी धर्म परिवर्तन कर उस धर्म में जाता है तब उसे पता लगता है कि सच क्या है? इसके बावजूद यह सच है कि दूसरा धर्म नहीं अपनाना चाहिये क्योंकि उससे तनाव बढ़ता है। हालांकि आजकल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षा लाभों के लिये अनेक लोग धर्म बदल लेते हैं। वह भले ही दावा करें कि उनको ज्ञान प्राप्त हुआ है पर यह झूठ है। जिसे ज्ञान प्राप्त होता है वह धर्म से परे होकर योग साधना, ध्यान और भक्ति में रहते हुए निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया करता है न कि धर्म छोड़ने या पकड़ने के चक्कर में पड़ता है।
हां एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय धर्म व्यापक दृष्टिकोण वाले होते हैं क्योंकि इसमें किसी प्रकार की भाषा या उस पर आधारित नाम या कर्मकांड की बाध्यता नहीं होती। हमारा श्रीगीता ग्रंथ दुनिया का अकेला ऐसा धर्म ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान की भी चर्चा है। इसमें निरंकार परमात्मा की निष्काम भक्ति के साथ ही अन्य जीवों पर निष्प्रयोजन दया करने का भी संदेश है। यह मनुष्य को विकास की तरफ जाने के लिये प्रेरित करने के साथ विनाश से भी रोकता है।
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Wednesday, March 25, 2009

संत कबीर वाणीः मन पर स्वयं सवारी करें, उसे सवार न बनायें

मन के मते न चालिये, मन के मते अनेक
जो मन पर असवार है,सौ साधु कोय एक

संत कबीर कहते हैं कि मन के अनुसार हमेशा मत चला क्योंकि उसमें हमेशा विचार आते रहते हैं। बहुत कम ऐसे लोग ऐसे हैं जिन पर मन सवारी नहीं करता बल्कि वह उस पर सवारी करते हैं। ऐसे ही लोग साधु कहलाते हैं।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनुष्य की पहचान उसके मन से है जो उसे चलाता है पर यह गलतफहमी उसे होती है कि वह स्वयं चल रहा है। वैसे बिना मन के कोई मनुष्य तो चल ही नहीं सकता पर अंतर इतना है कि कुछ लोग मन पर सवारी करते हैं और कुछ लोगों पर मन सवार हो जाता है। सामान्य मनुष्य के मन में अनेक इच्छायें जाग्रत होती हैं और वह उनके वशीभूत होकर जीवन भर भटकते हैं। एक पूरी होती है तो दूसरी जाग्रत होती है और फिर तीसरी और चौथी। इच्छा पूरी होने पर मनुष्य प्रसन्न होता है और न पूरी होने पर दुःखी । इस तरह वह जीवन भर अज्ञान के अंधेरे में भटकता है। दूसरे वह लोग होते हैं जो अपने अंदर उत्पन्न इच्छाओं को दृष्टा की तरह देखते हैं। ऐसे लोग साधु कहलाते हैं और वह अपने देह के लिये आवश्यक वस्तुओं को जुटाते हुए अपना जीवन व्यतीत करते हैं पर सुविधा और विलास की वस्तुओं के प्रति उत्पन्न मोह को वह अपने अंदर अधिक देर तक टिकने नहीं देते। ऐसा नहीं है कि उनके मन में उन चीजों को पाने की इच्छा नहीं आती पर वह उनको अनावश्यक समझकर उसे अधिक तवज्जो नहीं देते। वह हर वस्तु के पीछे अंधे होकर नहीं भागते।
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