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Saturday, June 13, 2009

श्रीगीता दर्शन-अपने धर्म पर दृढ़ रहना आवश्यक

श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात्।
स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।।
हिंदी में भावार्थ-
श्रीगीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं कि अपने धर्म से पराया धर्म श्रेष्ठ लगता है तब उसको कभी श्रेय न प्रदान करें। अपना धर्म संपन्न नहीं दिखता पर दूसरे का धर्म तो हमेशा भयावह परिणाम देने वाला होता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अक्सर लोग धर्म को लेकर बहस करते हैं पर उसका मतलब नहीं समझते। हर टीवी चैनल, अखबार और पत्रिका को उठाकर देख लें धर्म को लेकर तमाम सतही बातें लिखी मिल जायेंगी जिनका सार तो विषय सामग्री प्रस्तुत करने वाले स्वयं नहीं जानते न ही पाठक या दर्शक समझने का प्रयास करते हैं। कई बार तो ऐसा लगता है कि धर्म बिकने, खरीदने, और लाभ हानि वाली व्यापारिक वस्तु हो गयी है। अनेक प्रचार माध्यम बकायदा धर्मपरिवर्तित कर जिंदगी में भौतिक उपलब्धि प्राप्त करने वाले लोगों का प्रचार करते हैं। इतना ही नहीं धर्म परिवर्तित कर विवाह करने पर लड़कियों को वीरांगना करार दिया जाता है। यह केवल प्रचार है जिससे बुद्धिमान भारतीय तत्व ज्ञान से दिखने वाले कटु सत्यों से भागते हुए करते हैं क्योंकि भारतीय अध्यात्म ज्ञान जीवन के ऐसे रहस्यों को उद्घाटित करने के सत्यों से भरा पड़ा है जिसको जानने वाला धर्म न पकड़ता है न छोड़ता है।
हमारे भारतीय अध्यात्म में स्पष्ट रूप से धर्म को कर्म से जोड़ा गया न कि कर्मकांडों से। कर्मकांडों और रूढ़ियों को लेकर भारतीय धर्मों की आलोचना करने वाले मायावी लोग उस तत्व ज्ञान को जानते नहीं है पर उनको यह पता है कि अगर उसका प्रचार हो गया तो फिर उनकी माया धरी की धरी रह जायेगी।
एक मजे की बात है कि धर्म परिवर्तित दूसरा धर्म अपनाने वाली युवतियां विवाह कर लेती हैं इसमें बुराई नहीं है पर उसके बाद उनको जब दूसरे धर्म के संस्कार अपनाने पड़ते हैं तब उन पर क्या गुजरती है इस पर कोई प्रकाश नहीं डालता। दरअसल फिल्मों की कहानियों को केवल विवाह तक ही सीमित देखने वाले बुद्धिजीवी उससे आगे कभी सोच ही नहीं पाते। यही कारण है कि विवाह के बाद जब पराये धर्म के कर्मकांडों को मन मारकर अपनाना पड़ता है तब उन युवतियों की क्या कहानी होती है इस पर कोई भी आज का महापुरुष नहीं लिखता।
दरअसल धर्म दिखाने या छूने की वस्तु नहीं बल्कि हृदय में की जाने वाली अनुभूति है। बचपन से जिस धर्म के संस्कार पड़ गये उनसे पीछा नहीं छूटता विवाह या अन्य किसी भौतिक प्राप्ति के लिये धर्म परिवर्तन तो लोग कर लेते हैं उसके बाद जो उनपर तनाव आता है उसकी चर्चा भी गाहे बगाहे करते हैं। एक मजे की बात है कि कथित आधुनिक लोग धर्म परिवर्तन करते हैं पर उसके साथ अपना नाम और इष्ट भी परिवर्तित कर लेते हैं। मतलब वह दूसरे धर्म के के बंधन को ओढ़ते है और दावा आजादी का करते हैं। सच बात तो यह है कि धर्म का आशय सही मायने में भारतीय अध्यात्म में ही है जिसका आशय है कि बिना लोभ लालच और कामना के भगवान की भक्ति करते हुए जीवन व्यतीत करना न कि उनके वशीभूत होकर धर्म मानना। दूसरी बात यह है कि धर्म परिवर्तित करने वाले अपनी पहचान गुम होने के भय से अपना पुराना नाम भी साथ लगाते हैं। दूसरे के धर्म के क्या कर्मकांड हैं किसी को पता नहीं होता? इसलिये उस धर्म के लोग मजाक उड़ाते हैं जिसे अपनाया गया है।

संत कबीरदास और चाणक्य भी कहते हैं कि दूसरे धर्म या समुदाय का आसरा लेना हमेशा दुःख का कारण होता है। किसी भी व्यक्ति या समाज को बाहर से देखकर यह नहीं कहा जा सकता कि उसका धर्म कैसा है या वह उसे कितना मानता है। वह तो जब कोई नया आदमी धर्म परिवर्तन कर उस धर्म में जाता है तब उसे पता लगता है कि सच क्या है? इसके बावजूद यह सच है कि दूसरा धर्म नहीं अपनाना चाहिये क्योंकि उससे तनाव बढ़ता है। हालांकि आजकल प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्षा लाभों के लिये अनेक लोग धर्म बदल लेते हैं। वह भले ही दावा करें कि उनको ज्ञान प्राप्त हुआ है पर यह झूठ है। जिसे ज्ञान प्राप्त होता है वह धर्म से परे होकर योग साधना, ध्यान और भक्ति में रहते हुए निष्काम कर्म और निष्प्रयोजन दया करता है न कि धर्म छोड़ने या पकड़ने के चक्कर में पड़ता है।
हां एक बात महत्वपूर्ण है कि भारतीय धर्म व्यापक दृष्टिकोण वाले होते हैं क्योंकि इसमें किसी प्रकार की भाषा या उस पर आधारित नाम या कर्मकांड की बाध्यता नहीं होती। हमारा श्रीगीता ग्रंथ दुनिया का अकेला ऐसा धर्म ग्रंथ है जिसमें ज्ञान के साथ विज्ञान की भी चर्चा है। इसमें निरंकार परमात्मा की निष्काम भक्ति के साथ ही अन्य जीवों पर निष्प्रयोजन दया करने का भी संदेश है। यह मनुष्य को विकास की तरफ जाने के लिये प्रेरित करने के साथ विनाश से भी रोकता है।
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Sunday, June 7, 2009

ध्यान और स्मरण में देह की पवित्रता का विचार न करें-आलेख

स्नातो या यदि वाऽस्नातः शुचिवां यदि वाऽशुचि।
विभूतिं विश्वरूपं च संस्मरन्सर्वदा शुचिः।
हिंदी में भावार्थ-
स्नान किया हो या न किया हो, देह पवित्र हो या अपवित्र पर जो मनुष्य परमात्मा के विश्वरूप का स्मरण करता है वह सदा ही पवित्र है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-परमात्मा की सच्चे हृदय से भक्ति करने से ही मन और देह को शांति मिलती है। अक्सर लोग यह कहते हैं कि स्नान आदि करके ही परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। इसके अलावा अनेक भक्त मूर्तियों पर फूल और जल चढ़ाकर उसे ही सच्ची भक्ति मान लेते हैं। कई लोग तो केवल इसलिये भक्ति का वह तरीका अपना लेते हैं कि दूसरा भी ऐसा ही कर रहा है तो कुछ दूसरों को दिखाने के लिये कर्मकांड या हवन करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग कुछ अपने को तो कुछ दूसरों को दिखाने के लिये भक्ति करते हैं जबकि भक्ति, स्मरण और ध्यान हृदय से ही की जाना चाहिए।

आखिर यह कैसे पता चले कि हम भक्ति कर रहे हैं? जब हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान कर रहे हों तब किसी अन्य बात का विचार हमारे अंदर न आये तब यह समझना चाहिये कि हम हृदय से भक्ति कर रहे हैं। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जब हम जब परमात्मा के निरंकार स्वरूप का स्मरण प्रारंभ करते हैं तब उनका कोई स्वरूप हमारे मस्तिष्क में रहता है। उस पर ध्यान केंद्रित करते समय शुरुआत में हमारे अंदर तमाम तरह के विचार आते हैं। उन्हें आने दीजिये। उनके आने से अपना ध्यान लगाना बंद मत कीजिये। दरअसल वह विचार एक विकार के रूप में हमारे अंदर रहते हैं। ध्यान लगाते हुए हमारे अंदर जो ज्ञानाग्नि प्रज्जवलित होती है वही विकार उसमें पूर्णाहति की तरह जलने आते हैं। जब दृढ़ता से अपने ध्यान में स्थिर रहेंगे तब धीरे धीरे अनुभव होगा कि हमारा ध्यान केवल भृकुटि पर ही केद्रित हो गया है और वहां हम आत्मिक रूप से केवल शून्य में स्थित हैं। यह ध्यान की सबसे रोचक और चरम स्थिति है।
स्मरण या ध्यान करने के बाद जब हम वापस लौटें तब हमें इस दुनियां में नवीनता का अनुभव हो तभी यह समझना चाहिए कि उसका लाभ हुआ है। शुरुआत में शायद ऐसा न लगे पर हम ध्यान, भक्ति और स्मरण के तत्काल बाद यह अनुभव करने का अभ्यास करें तो एसा लगने लगेगा कि ध्यान के बाद प्रतिदिन एकदम नवीन होता है।
वैसे तो ध्यान या स्मरण दैहिक स्वच्छता के बाद करना चाहिए पर स्वास्थ्य खराब होने के कारण यह किसी अन्य वजह से नहाना न हो पाये तब भी उतने ही उत्साह से ही भक्ति, स्मरण और ध्यान करना चाहिए। अगर अवकाश हो या समय मिल जाये तब चाहे जब ध्यान और स्मरण हो सकता है। जैसे दोपहर के खाने के बाद ऐसा लगता है कि कुछ देर ध्यान करना या कोई धार्मिक पुस्तक पुस्तक पढ़ना अच्छा रहेगा तो अपने विचार को इसलिये स्थगित न करें कि अस्वच्छ देह से ऐसा करना ठीक नहीं है। तात्पर्य यह है कि भक्ति, स्मरण और ध्यान में दृढता पूर्वक अपन हृदय लगाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इससे मानसिक और वैचारिक तनाव कम होता है।
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