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Sunday, June 7, 2009

ध्यान और स्मरण में देह की पवित्रता का विचार न करें-आलेख

स्नातो या यदि वाऽस्नातः शुचिवां यदि वाऽशुचि।
विभूतिं विश्वरूपं च संस्मरन्सर्वदा शुचिः।
हिंदी में भावार्थ-
स्नान किया हो या न किया हो, देह पवित्र हो या अपवित्र पर जो मनुष्य परमात्मा के विश्वरूप का स्मरण करता है वह सदा ही पवित्र है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-परमात्मा की सच्चे हृदय से भक्ति करने से ही मन और देह को शांति मिलती है। अक्सर लोग यह कहते हैं कि स्नान आदि करके ही परमात्मा का स्मरण करना चाहिए। इसके अलावा अनेक भक्त मूर्तियों पर फूल और जल चढ़ाकर उसे ही सच्ची भक्ति मान लेते हैं। कई लोग तो केवल इसलिये भक्ति का वह तरीका अपना लेते हैं कि दूसरा भी ऐसा ही कर रहा है तो कुछ दूसरों को दिखाने के लिये कर्मकांड या हवन करते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग कुछ अपने को तो कुछ दूसरों को दिखाने के लिये भक्ति करते हैं जबकि भक्ति, स्मरण और ध्यान हृदय से ही की जाना चाहिए।

आखिर यह कैसे पता चले कि हम भक्ति कर रहे हैं? जब हम परमात्मा का स्मरण या ध्यान कर रहे हों तब किसी अन्य बात का विचार हमारे अंदर न आये तब यह समझना चाहिये कि हम हृदय से भक्ति कर रहे हैं। यहां यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि जब हम जब परमात्मा के निरंकार स्वरूप का स्मरण प्रारंभ करते हैं तब उनका कोई स्वरूप हमारे मस्तिष्क में रहता है। उस पर ध्यान केंद्रित करते समय शुरुआत में हमारे अंदर तमाम तरह के विचार आते हैं। उन्हें आने दीजिये। उनके आने से अपना ध्यान लगाना बंद मत कीजिये। दरअसल वह विचार एक विकार के रूप में हमारे अंदर रहते हैं। ध्यान लगाते हुए हमारे अंदर जो ज्ञानाग्नि प्रज्जवलित होती है वही विकार उसमें पूर्णाहति की तरह जलने आते हैं। जब दृढ़ता से अपने ध्यान में स्थिर रहेंगे तब धीरे धीरे अनुभव होगा कि हमारा ध्यान केवल भृकुटि पर ही केद्रित हो गया है और वहां हम आत्मिक रूप से केवल शून्य में स्थित हैं। यह ध्यान की सबसे रोचक और चरम स्थिति है।
स्मरण या ध्यान करने के बाद जब हम वापस लौटें तब हमें इस दुनियां में नवीनता का अनुभव हो तभी यह समझना चाहिए कि उसका लाभ हुआ है। शुरुआत में शायद ऐसा न लगे पर हम ध्यान, भक्ति और स्मरण के तत्काल बाद यह अनुभव करने का अभ्यास करें तो एसा लगने लगेगा कि ध्यान के बाद प्रतिदिन एकदम नवीन होता है।
वैसे तो ध्यान या स्मरण दैहिक स्वच्छता के बाद करना चाहिए पर स्वास्थ्य खराब होने के कारण यह किसी अन्य वजह से नहाना न हो पाये तब भी उतने ही उत्साह से ही भक्ति, स्मरण और ध्यान करना चाहिए। अगर अवकाश हो या समय मिल जाये तब चाहे जब ध्यान और स्मरण हो सकता है। जैसे दोपहर के खाने के बाद ऐसा लगता है कि कुछ देर ध्यान करना या कोई धार्मिक पुस्तक पुस्तक पढ़ना अच्छा रहेगा तो अपने विचार को इसलिये स्थगित न करें कि अस्वच्छ देह से ऐसा करना ठीक नहीं है। तात्पर्य यह है कि भक्ति, स्मरण और ध्यान में दृढता पूर्वक अपन हृदय लगाने का प्रयास करना चाहिए क्योंकि इससे मानसिक और वैचारिक तनाव कम होता है।
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Tuesday, August 12, 2008

संत कबीर वाणी:शाब्दिक ज्ञान बघारना भक्ति का प्रमाण नहीं

हरि गुन गावे हरषि के, हिरदय कपट न जाय
आपन तो समुझै नहीं, औरहि ज्ञान सुनाय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि भगवान के भजन और गुण तो नाचते हुए गाते तो बहुत लोग हैं पर उनके हृदय से कपट नहीं जाता। इसलिये उनमे भक्ति भाव और ज्ञान नहीं होता परंतु वह दूसरों के सामने अपना केवल शाब्दिक ज्ञान बघारते है।

पढ़त गुनत रोगी भया, बढ़ा बहुत अभिमान
भीतर ताप जू जगत का, घड़ी न पड़ती सान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि पढ़ते और गुनते हुए आदमी का अभिमान बढ़ता गया। उसके अंतर्मन में जो तृष्णाओं और इच्छाओं की अग्नि जलती है उसके ताप से उसे मन में कभी शांति नहीं मिलती है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वर्तमान काल में शिक्षा का प्रचार प्रसार तो बहुत हुआ है पर अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण आदमी को मानसिक अशांति का शिकार हुआ है। वर्तमान काल में जो लोग भी शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं उनका उद्देश्य उससे नौकरी पाना ही होता है-उसमें रोजी रोटी प्राप्त करने के साधन ढूंढने का ज्ञान तो दिया जाता है पर अध्यात्म का ज्ञान न होने के कारण भटकाव आता है। बहुत कम लोग हैं जो शिक्षा प्राप्त कर नौकरी की तलाश नहीं करते-इनमें वह भी उसका उपयोग अपने निजी व्यवसायों में करते हैं। कुल मिलाकर शिक्षा का संबंध किसी न किसी प्रकार से रोजी रोटी से जुड़ा हुआ है। ऐसे में आदमी के पास सांसरिक ज्ञान तो बहुत हो जाता है पर अध्यात्मिक ज्ञान से वह शून्य रहता है। उस पर अगर किसी के पास धन है तो वह आजकल के कथित संतों की शरण में जाता है जो उस ज्ञान को बेचते हैं जिससे उनके आश्रमों और संस्थानों के अर्थतंत्र का संबल मिले। जिसे अध्यात्मिक ज्ञान से मनुष्य के मन को शांति मिल सकती है वह उसे इसलिये नहीं प्राप्त कर पाता क्योंकि वह अपनी इच्छाओं और आशाओं की अग्नि में जलता रहता है। कुछ पल इधर उधर गुजारने के बाद फिर वह उसी आग में आ जाता है।
जिन लोगों को वास्तव में शांति चाहिए उन्हें अपने प्राचीन ग्रंथों में आज भी प्रासंगिक साहित्य का अध्ययन करना चाहिए। यह अध्ययन स्वयं ही श्रद्धा पूर्वक करना चाहिए ताकि ज्ञान प्राप्त हो। हां, अगर उन्हें कोई योग्य गुरू इसके लिये मिल जाता है तो उससे ज्ञाना भी प्राप्त करना चाहिए। यह जरूरी नहीं है कि गुरु कोई गेहुंए वस्त्र पहने हुए संत हो। कई लोग ऐसे भी भक्त होते हैं और उनसे चर्चा करने से भी बहुत प्रकार का ज्ञान प्राप्त होता है। इसलिये सत्संग में जाते रहना चाहिये।
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