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Friday, April 27, 2018

आनंद उठाने का सबसे अच्छी तरीका यह है कि आप एकांत में जाकर ध्यान लगायें-चिंत्तन (Anand Uthane ka tareeka-Chinttan)


                       रोकड़ संकट बढ़ाओ ताकि मुद्रा का सम्मान भी बढ़ सके।
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                                 हम वृंदावन में अनेक संत देखते हैं जो भले ही शुल्क लेकर कथा करते हैं पर उनका कार्यक्रम अत्यंत हृदय प्रसन्न करने वाला होता है।  अनेक प्रसिद्ध संतों को पास से देखने का अवसर मिला जिन्हें हम टीवी पर देखते थे।  हमने देखा है कि अनेक प्रसिद्ध संत बिना राजपदधारी लोगों की सहायता के बिना ही अपने आभामंडल से लोकप्रिय हैं। राजपुरुषों के साथ फोटो खिंचवाने का शौक उनको नहीं है। ऐसे ही संतों पर भारतीय अध्ययात्मिक ज्ञान का रथ स्वतः संचालित है। हमने देखा है कि अनेक कथित संत राजपुरुषों से सम्मानित होकर फूल जाते हें या चुनावी राजनीति संगठनों के साथ जुड़कर गौरवान्वित अनुभव करते हैं पर भगवतवाचक संत इससे दूर हैं। यह संत हमें ज्ञानी लगते हैं क्योंकि जानते हैं कि ‘राजा के अगाड़ी गधे के पिछाड़ी चलने के नतीजे खतरनाक हैं।’ हम उन संतो को विवादों के साथ खतरे के बीच देखते हैं जो राजपुरुषों के निकट होने का दावा करते हैं। यह प्राकृत्तिक सच्चाई है कि आपके अपने ही आपको निपटाते हें। राजपुरुषों के साथ निकटता में बड़ा खतरा है कि क्योंकि उनके हाथ में डंडा है जो अपना पराया नहीं देखता। जिनके हाथ में कानून का डंडा है जो न बाप देखता हैं न बेटा!  अगर आप राजपुरुषों के अपने नहीं है तो स्वयं को सुरक्षित समझें। यह राजपुरुष जब आपस में द्वैरथ करें तब बीच  में तो जाना ही नहीं चाहिये-चाहे यह राष्ट्रवादी हो या प्रगतिशील या वामपंथी।  अगर आप कला, पत्रकारित या धार्मिक क्षेत्र में आत्मनिर्भर हैं तो कभी राजपुरुषों को अपना मत बनाईये न समझिये क्योंकि अपने ही अपनों को निपटतों हैं-बात समझ गये न! न समझे तो कभी पूरी कहानी लिखेंगे।
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                                 एटीएम में रोकड़ यानि केश नहीं मिल रहा है-हमारा मानना है कि मुद्रा संकट बढ़ाओ ताकि उसका सम्मान बढ़े। सेवा तथा सौदा प्रदान करने वाले मुद्रा लेने में अब मनमाना चयन करने लगे हैं। एक तथा दो के सिकक्े तो लेना ही नहीं है। पांच सौ या दो हजार नोट पर छपाई का कालापान आ गया हो तो लेना नहीं है। सीधी बात कहें तो मुद्रा एक हजार व पांच सौ के नोटों के समय जो बेइज्जत हो रही थी वह दो हजार के नोट आने के बाद दोगुनी अपमानित हो रही है। अर्थशास्त्र के सिद्धांतों के अनुसार जब मुद्रा की कमी होगी तो उसका मान बढ़ेगा। पिछले कुछ समय समय से हम जिस तरह सौदेबाजी में पांच व दस के सिक्कोें की बेइज्जती देख रहे हैं उससे तो लगता है कि सरकार को सिक्के अब बंद कर देना चाहिये।  हमने नोटबंदी के समय देखा था कि पांच सौ तथा हजार के नोटों का प्रचलन बंद होने के बाद अपराध तथा आतंकवाद बहुत कम हो गया था। दो हजार का नोट आने के अपराध, आतंकवाद तथा भ्रष्टाचार दोगुना बढ़ा है-ऐसा लोग मानते हैं। अब यह पता नहीं कि रोकड़ा संकट अचानक हुआ या योजनाबद्ध है पर होना चाहिये। शायद देश के सामाजिक संकट कुछ समय दूर रहे। अब मुद्रा की कमी कारण यह भी हो सकता है कि नोटबंदी के दौरान कालाधन भी बैंके के पास आ गया।  विशेषज्ञ जितना पहले कालाधन होने का अनुमान करते थे अब वह दुगुना होगा क्योंकि महंगाई बढ़ रही है।  यानि सरकार जितनी मुद्रा से देश चलाना चाहती थी उसका दुगुना उसे देना होगा क्योंकि उसे न तो कालाधन बनना रोका न भ्रष्टाचार। इसी कारण अब फिर वही सफेद होकर कालेपन की तरफ जा रहा है-यानि तिजोरियों में जमा हो रहा है। अगर हमारी सबात समझ आये तो गंभीर समझें वरना व्यंग्य समझकर भूल जायें।
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             आनंद उठाने का सबसे अच्छी तरीका यह है कि आप एकांत में जाकर ध्यान लगायें। अगर ऐसा नहीं कर सकते तो फिर बाहर की क्रियाओं से अंदर की अनुभूति करें। जिस तरह कहा जाता है कि खाने के समय बात नहीं करना चाहिये उसी तरह जब किसी विषय, वस्तु, या व्यक्ति से संपर्क होने पर आनंद आये तब मौन हेकर उसका लाभ उठायें। जिस तरह अपनी भूख और प्यास किसी दूसरे को हम बांट नहीं सकते उसी तरह आनंद भी किसी के साथ बांटना संभव नहीं है। जब हमें आनंद मिल रहा हो तब अपनी आंख, कान,मुख  तथा नासिका तथा बुद्धि को अंदर ही केंद्रित रखें। दूसरे को देखने या उससे बोलने पर आनंद कम हो जाता है।  अंततः आंनद न बाहर मिलता है न ही उसे हम बाहर देख सकते हैं। उसकी अनुभूति तो हम अंदर ही कर सकते हैं।
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Saturday, February 6, 2016

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में भेदभाव की दृष्टि रखना अज्ञान का प्रमाण.हिन्दी चिंत्तन लेख (HIndiReligion Messge Based on ShriMadBhagwatGeeta)

भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में भेदभाव की दृष्टि रखना अज्ञान का प्रमाण.हिन्दी चिंत्तन लेख
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              जब धर्म के विषय पर बहस हो और कोई संत वेशधारी उत्तेजित होकर बोलने लगे तो समझ लेना चाहिये कि वह घनघोर अज्ञान के अंधेरे में जीवन व्यतीत कर रहा है। शनिशिंगणापुर विषय पर प्रचार माध्यमों में जमकर बहस चलायी जा रही है। तय बात है कि यह  टीव चैनलों में विज्ञापनों का समय पास करने के लिये हो रहा है। इस बहस में अनेक कथित संत अपनी बात कहने आ रहे है। कथित संत शब्द हमने इसलिये लिखा है क्योंकि वह सन्यासी की वेशभूषा में होते हैं और उसकी गीता में जो ज्ञानी  व्याख्या है वह उसके ठीक विपरीत उनका आचरण होता है। अनेक बार उनकी वाणी से क्रोध से भरे शब्द निकलते हैं जैसे कि किसी के तर्क से उनका सब कुछ छिना जा रहा है। इनमें अनेक अधिक से अधिक कैमरा अपनी तरफ केंद्रिता होता देखने की ऐसी लालच होती है जिससे उनकी वाणी दिग्भ्रमित हो जाती है।
  धर्म की रक्षा में जीवन दाव पर लगाने वाले  यह कथित सन्त सन्यासी कभी अपनी वाणी से स्थिरप्रज्ञ नहीं दिखते जो कि श्रीमद्भागवतगीता के अनुसार ज्ञानी होने का प्रमाण है। भारतीय धर्म की पहचान उसके अध्यात्मिक ज्ञान से है जबकि कथित संत सन्यास कर्मकांडों के प्रचार को ही धार्मिकता का आधार मानते हैं।  श्रीगीता के अनुसार द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ बताया गया है जबकि धर्म के कथित पेशेवर प्रचारक कर्मकांडों से स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताते हैं कि उनको दान दक्षिणा मिल सके। श्रीमद्भागवत गीता में भक्त तथा भक्ति के तीन प्रकार बताये गये हैं इसलिये ज्ञान साधक समाज में भिन्नता को उसी दृष्टि से देखते हैं।  किसी भक्त की भक्ति के प्रकार पर प्रतिकूल टिप्पणी करना ज्ञानसाधक वर्जित समझते हैं।  महत्वपूर्ण बात यह कि श्रीगीता में यह स्पष्ट किया गया है कि जो भी मनुष्य साधना करेगा वह सुखी रहेगा। जातिए भाषा अथवा लिंग के आधार पर  भिन्नता देखना भक्ति के विषय में अस्वीकार कर दिया गया है।  ऐसे में कर्मकांड से जुड़ी किसी परंपरा में मनुष्य में किसी आधार पर भिन्नता देखी जाती है तो तय बात है कि वह श्रीमद्भागवतगीता में वर्णित समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है। ऐसे में अगर कोई सन्यासी या संत शनि शिंगणापुर में नारी प्रवेश का विरोध करता है तो उसके ज्ञान पर प्रश्न जरूर उठेंगे। वैसे संत वेदों व शास्त्रों की बात कर रहे हैं पर उन्हें यह ध्यान रखना चाहिये कि मथुरा मेें जन्मेए वृंदावन में पले फिर द्वारका में जाकर बसे महामना भगवान श्रीकृष्ण ने सारा ज्ञान समेटकर श्रीमद्भागवत गीता में रख दिया था। अगर संत भेदरहित दृष्टि से बोलकर अपना महत्व प्रमाणित करना चाहते हैं तो उन्हें यह याद रखना चाहिये कि इस देश में कर्मयोगियों की संख्या उनसे ज्यादा है जो उनकी बात को काट सकते हैं।

                  जब धर्म के विषय पर बहस हो और कोई संत वेशधारी उत्तेजित होकर बोलने लगे तो समझ लेना चाहिये कि वह घनघोर अज्ञान के अंधेरे में जीवन व्यतीत कर रहा है। शनिशिंगणापुर विषय पर प्रचार माध्यमों में जमकर बहस चलायी जा रही है। तय बात है कि यह  टीव चैनलों में विज्ञापनों का समय पास करने के लिये हो रहा है। इस बहस में अनेक कथित संत अपनी बात कहने आ रहे है। कथित संत शब्द हमने इसलिये लिखा है क्योंकि वह सन्यासी की वेशभूषा में होते हैं और उसकी गीता में जो ज्ञानी  व्याख्या है वह उसके ठीक विपरीत उनका आचरण होता है। अनेक बार उनकी वाणी से क्रोध से भरे शब्द निकलते हैं जैसे कि किसी के तर्क से उनका सब कुछ छिना जा रहा है। इनमें अनेक अधिक से अधिक कैमरा अपनी तरफ केंद्रिता होता देखने की ऐसी लालच होती है जिससे उनकी वाणी दिग्भ्रमित हो जाती है।
                   
धर्म की रक्षा में जीवन दाव पर लगाने वाले  यह कथित सन्त सन्यासी कभी अपनी वाणी से स्थिरप्रज्ञ नहीं दिखते जो कि श्रीमद्भागवतगीता के अनुसार ज्ञानी होने का प्रमाण है। भारतीय धर्म की पहचान उसके अध्यात्मिक ज्ञान से है जबकि कथित संत सन्यास कर्मकांडों के प्रचार को ही धार्मिकता का आधार मानते हैं।  श्रीगीता के अनुसार द्रव्यमय यज्ञ की अपेक्षा ज्ञानयज्ञ बताया गया है जबकि धर्म के कथित पेशेवर प्रचारक कर्मकांडों से स्वर्ग तथा मोक्ष प्राप्ति का मार्ग बताते हैं कि उनको दान दक्षिणा मिल सके। श्रीमद्भागवत गीता में भक्त तथा भक्ति के तीन प्रकार बताये गये हैं इसलिये ज्ञान साधक समाज में भिन्नता को उसी दृष्टि से देखते हैं।  किसी भक्त की भक्ति के प्रकार पर प्रतिकूल टिप्पणी करना ज्ञानसाधक वर्जित समझते हैं।  महत्वपूर्ण बात यह कि श्रीगीता में यह स्पष्ट किया गया है कि जो भी मनुष्य साधना करेगा वह सुखी रहेगा। जातिए भाषा अथवा लिंग के आधार पर  भिन्नता देखना भक्ति के विषय में अस्वीकार कर दिया गया है।  ऐसे में कर्मकांड से जुड़ी किसी परंपरा में मनुष्य में किसी आधार पर भिन्नता देखी जाती है तो तय बात है कि वह श्रीमद्भागवतगीता में वर्णित समानता के सिद्धांत के विरुद्ध है। ऐसे में अगर कोई सन्यासी या संत शनि शिंगणापुर में नारी प्रवेश का विरोध करता है तो उसके ज्ञान पर प्रश्न जरूर उठेंगे। वैसे संत वेदों व शास्त्रों की बात कर रहे हैं पर उन्हें यह ध्यान रखना चाहिये कि मथुरा मेें जन्मेए वृंदावन में पले फिर द्वारका में जाकर बसे महामना भगवान श्रीकृष्ण ने सारा ज्ञान समेटकर श्रीमद्भागवत गीता में रख दिया था। अगर संत भेदरहित दृष्टि से बोलकर अपना महत्व प्रमाणित करना चाहते हैं तो उन्हें यह याद रखना चाहिये कि इस देश में कर्मयोगियों की संख्या उनसे ज्यादा है जो उनकी बात को काट सकते हैं।

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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Thursday, January 14, 2016

ज्ञान के कारण भारत में सहिष्णुता का भाव हमेशा रहा है(Adhyatmik Gyan ki karan Bharat mein sahishnuta ka Bhav hamesha rahaa hai)

                              सऊदी अरब में एक शिया धर्मगुरु को फांसी दी गयी है। अरब देशों में अपने ही धर्म के विचारधारा के आधार पर जितनी शत्रुता दिखती है उससे नहीं लगता कि राज्य प्रबंध में वहां मानवता के नियमों का पालन होता है। आप जरा भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा का महान प्रभाव देखिये।  पहले तो हमारे यहां धर्म का आशय मनुष्य के आचरण तथा कर्म के आधार पर लिया जाता है। कहीं कर्म को ही धर्म का नाम दिया जाता है। जैसे ब्राह्मण धर्म, क्षत्रिय धर्म, वैश्य धर्म तथा सेवक या शुद्र धर्म। यही जातियां, वर्ण या व्यवसाय भी कहें जाते हैं। इसे हम सनातन विचारधारा या धर्म की संज्ञा भी देते हैं। दरअसल भारतीय अध्यात्मिक विचाराधारा सत्य पर आधारित है जिसके स्वरूप में  बदलाव कभी नहीं हुआ पर सनातन धर्म के बाद भी यहां बौद्ध, जैन तथा सिख धर्म की धारायें प्रवाहित हुईं। कोई विरोध या धार्मिक द्वंद्व नहीं हुआ। इतना ही नहीं मूल भारतीय ज्ञान तत्व हमेशा ही सभी धाराओं में प्रवाहित देखा गया है।
                             कभी भारत में यह नहीं सुना गया कि यहां उत्पन्न धार्मिक विचारधाराओ के बीच संघर्ष हुआ हो। उससे भी महत्वपूर्ण बात यह कि जिन्हें हिन्दू विचाराधारा वाला माना जाता है वह तो यहां उत्पन्न सभी धर्मों के पवित्र स्थानों में जाने से कभी संकोच नहीं करते। यह अलग बात है कि बाहरी आक्रमणकारियों के साथ आयी विदेशी विचाराधारायें अपने आपसी ही नहीं वरन् आंतरिक द्वंद्व भी यहां साथ लायीं। विदेशी विचाराधारायें सर्वशक्तिमान के एक ही प्रकार के दरबार तथा एक ही किताब में आस्था का प्रचार करती हैं। तत्वज्ञान के नाम पर उनमें कुछ है इसका आभास भी नहीं होता। उन दोनों विचारधाराओं में जड़ता दिखती है जबकि भारतीय अध्यात्मिक विचारधारा समय समय के साथ परिवर्तनों से मिले अनुभवों को संजोकर चलती है।  इसी कारण हमारे यहां धार्मिक संघर्ष कभी नहीं देखे गये जैसे कि विदेशों में देखे जाते हैं।
                             भारत में धार्मिक विषय पर तर्क वितर्क करने का पूर्ण अधिकार है यही कारण है कि यहां कभी धर्म के नाम पर कभी संघर्ष नहीं होते।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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9.हिन्दी सरिता पत्रिका

Saturday, December 12, 2015

परदेस जाकर सुख की कामना करना बेकार-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(Pardes Jakr sukh ki kamna karna bekar(A Spiritual Thought article based on Chankyaniti)


                           पहले तो मनुष्य की पीढ़ियां दर पीढ़ियां ही शहर या गांव में जीवन गुजार देती थीं। आधुनिक युग में संचार, संपर्क तथा परिवहन के आधुनिक साधनों ने उसे मानसिक रूप से  अस्थिर बना दिया है। इसी कारण जहां पहले केवल श्रमिक वर्ग के ही लोग रोजगार के लिये परिगमन करते थे वहीं अब खाये पीये लोगों में भी बाहर जाकर आनंदमय जीवन बिताने का विचार जोर पकड़ता है-जिस स्थान पर सब कुछ मिल रहा है वह उन्हें ढेर सारे दोषों के साथ ही बोरियत देने वाला लगता है-पर्दे की प्रचार पंक्तियां उन्हें दूर के ढोल सुहावने दिखाती हैं।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
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अलिस्यं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः।
विधिवशात्परंदेशमुपागतः कुटाजपुष्परसं बहु मन्यते।।
                           हिन्दी में भावार्थ-भौंरा जब तक कमलिनी के मध्यम रहते हुए पराग से रसपान कर उसके मद में आलसी हो जाता है पर कालवश परदेेश जाने के शौक से अन्य फूलों पर चला जाता  है जिनमें न रस होती न गंध।
                           अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण ही संपन्न परिवारों के मस्तिष्क में ऐसी अस्थिरता आई जिसे शब्दों में बयान करना ही कठिन लगता है।  ऐसे लोगों को भारतीयअध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन जरूर करना चाहिये। हमारे देश में अनेक लोग अपने बच्चों को बाहर भेजकर यह सोचते हैं कि उनका जीवन धन्य हो गया पर बाद में उन्हें अपना जीवन अकेला गुजारना पड़ता है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Friday, November 20, 2015

स्वर्ग और मोक्ष-हिन्दी कविता(Swarg aur Moksh-Hindi Kavita)


भूखा पेेट एक रोटी से भी भरे
लोभ में चाहे पकवान खाये।

दिल की चाहत अनंत
सोने के पहाड़ पर चढ़े
हीरे का ख्याल सताये।

कहें दीपकबापू समाधि में
स्वर्ग गिरता आकर चरण में
मोक्ष आ जाता शरण में
जाने वही जो लगाये।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Saturday, October 31, 2015

देश के वातावरण पर असली आपकी बात-ट्विटर और फेसबुक पर लिखे संदेश(Desh ka vatavaran par Asli Aap Ki Baat-Message on Twitter &FaceBook)

अब सत्य कहें जो कि विश्व तथा भारत में हो रही घटनाओं पर आधारित है। वह यह कि भारत में वातावरण खराब होने वाली बात यूं ही नहीं दोहराई जा रही है। इसके पीछे कोई  प्रायोजित कार्यक्रम है। हमारे देश में जब इतना भ्रष्टाचार दशकों से रहा है तो साहित्य, कला, फिल्म और अन्य क्षेत्रों में दिये जाने वाले सम्मान उससे अछूते नहीं रह सकते।  तय बात है कि यह सम्मान भी कुछ तय करके लिये और दिये गये होंगे। अब वापसी भी उसी प्रक्रिया का भाग हैं।
                                   इससे देश की विदेशों में प्रतिष्ठा गिरने वाली बात एक तरह से मसखरी ही है। जिस तरह विदेशों में वातावरण है उससे तो विदेशों में यह छवि बन रही होगी कि भारतीय अधिक चेतना वाले हैं जो अपने देश की स्थिति वैसी होने से चिंतित हो रहे हैं जैसी आज विदेशी झेल रहे हैं।
वह बातें जो फेसबुक और ट्विटर पर लिखी गयीं
सम्मान वापसी करने वालों पर चेतन भगत की टिप्पणियों पर उन्हें मसखरा कहा जा रहा है। सच तो यह है कि पूरे देश में सम्मान वापसी का मुद्दा एक मसखरी ही माना जा रहा है। इसलिये मसखरा बनकर ही टिप्पणी की जा सकती है।
देश की मुख्य समस्यायें महंगाई, बेरोजगारी और खराब प्रबंधन हैं। आम लोगों की नज़र में यही मुद्दे हैं जिन पर चर्चा होना चाहिये। मांस खाने का विरोध करना गलत है पर उसके प्रत्युत्तर में सार्वजनिक रूप से खाने का प्रदर्शन करना भी बुरा है।
 देश का वातावरण बिगड़ा नहीं बल्कि बिगड़ जाये इसके प्रयास अधिक हो रहे हैं। ऐसा लगता है कि कुछ लोगों इससे लाभ है।
महंगाई, बेरोजगारी और अन्य मुद्दों पर बोलने से प्रचार नहीं मिलता इसलिये माहौल बिगड़ने की बात कहीं जा रही है।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, October 11, 2015

ब्लॉग लेखकों को ज्ञानपीठ सम्मान देना प्रारंभ करें-हिन्दी व्यंग्य चिंत्तन लेख(Give Gyanpith Award to Blog Writter-Hindi Satire Thought Artcel)

                 प्रतिदिन कोई न कोई सम्मानीय अपना सम्मान पुराने सामान की तरह बाहर फैंक रहा है। इससे तो यही लगता है जितने साहित्यक सम्मान देश में बांटे गये हैं उससे तो अगले दस वर्ष तक टीवी चैनलों पर रोज सम्मान वापसी की प्रमुख खबर रहने वाली है।  खासतौर से विशिष्ट रविवार की सामग्री केवल सम्मान वापसी रहने वाली है।  हमारी सलाह है कि अब ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान सभी भाषाओं के ब्लॉग लेखकों को ही दिया जाना चाहिये जो कभी भी यह वापस नहीं करेंगे और करेंगे तो खबर भी नहीं बनेगी।  अंतर्जाल पर भारत की क्षेत्रीय भाषाओं के ब्लॉग लेखक सक्रिय है।  वह कैसा लिखते हैं यह तो पता नहीं पर यही स्थिति पुराने सम्मानीय लेखकों की भी है। इनमें से अनेक तो ऐसे हैं जिन्हें अपनी भाषा के लोग भी तब जान पाये जब उन्हें सम्मानित किया गया।
                                   हमारी यह सलाह है कि जिस तरह यह लोग अब फनी-इसका मतलब न पूछिये हमें पता नहीं-हो रहे हैं तो उसका मुकाबला भी उनके फन से होना चाहिये।  ब्लॉग भी अब एक किताब की तरह हैं। एक बार सम्मान प्रदान करने वाली संस्था के प्रबंधक भी फनी होकर ब्लॉग लेखकों को ज्ञानीपीठ से सम्मानित कर दें। यही प्रतिक्रियात्मक प्रयास इन पुराने सम्माानीयों के जख्म पर नमक छिड़कने की तरह होगा। एक अध्यात्मिक ज्ञान साधक की दृष्टि से हमारा मानना है कि राजसी कर्म में जस से तस जैसा व्यवहार करना ही चाहिये।  कम से कम हिन्दी में अनेक ऐसे ब्लॉग लेखक हैं जिन्हें हम बहुत काबिल मानते हैं। उन्हें ज्ञानपीठ सम्मान इसलिये भी मिलना चाहिये क्योंकि अंतर्जाल पर हिन्दी उन्हीं की वजह से जमी है। सबसे बड़ी बात यह पुराने सम्मानीय उन्हें दोयम दर्जे का मानते हैं और जब उन्हें ज्ञानपीठ तथा अन्य सम्मान मिलने लगे तो सारी हेकड़ी निकल जायेगी।
                                   हमारा ज्ञानपीठ के लिये कोई दावा नहीं है, यह बात साफ कर देते हैं क्योंकि हमें नहीं लगता कि फन इतना भी स्तरहीन नहीं होना चाहिये कि भन-इसका मतलब भी नहीं पूछिये- लगने लगे। अगर बात जमे तो  गहन चिंत्तन करें नहीं तो व्यंग्य समझकर आगे बढ़ जायें।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Thursday, September 24, 2015

दीपकबापू वाणी (Deepak Bapu Wani)Sum Hindi Poem


लज्जा नारी का आभूषण थीअब अल्पवस्त्र पहचान हो गयी।
कहें दीपकबापू अबला छाप खत्मविज्ञापन की जान हो गयी।।

वैभवस्वामी होते क्षीण बुद्धिझुके सिर से अपना मान जाने।
दीपकबापू पैसे पद में डूबेमोलतोल की कला ही ज्ञान जाने।।
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कोई खुश होता है पुतला जलाकर, कोई पत्थर फैंककर मारे।
दीपकबापूअधर्मी पर फिदा, लगते हैं दुनियां के लोग सारे।।
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रोटी न होती भूख भी न होती, भलाई का अवसर कहां मिलता।
दीपकबापू सब त्याग कर जीते, राजाओं को घर कहां मिलता।।
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श्रम और बुद्धि का संगम, संसार में अर्थ सिद्धि का यही मंत्र।
दीपकबापूसब खायें खुश रहें, समाज बनता धर्म का तंत्र।।
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कर्ज लेना हमेशा सस्ता लगे, चुकाना पड़ता महंगा ब्याज।
दीपकबापू नमक से ही सब्जी सजायें, त्यागें महंगा प्याज।।
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वातानुकूलित यंत्र न ही ईंधन का चौपाया, फिर भी अपनी मौज है।
 कहें दीपकबापू दौलत के पीछे, अक्ल के अंधों की बेचैन फौज है।
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जितना नचाये माया  तू नाच, फिर मोर की तरह उदास न होना।
दीपकबापूदौलत का ढेर लगा, फिर पहरेदारी में चैन न खोना।।
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दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
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Sunday, July 13, 2014

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-योग्य मंत्रियों से ही राष्ट्र की रक्षा संभव(kautilya ka arthshastra-yogya matriyon se hi rashtra ki raksha sambhav)



      हम जब किसी राष्ट्र की स्थिरता की बात करते हैं तो यह भूल जाते हैं कि उसमें सक्रिय सामाजिक समूहों में भी स्थिरता होना चाहिये।  समाज की  परिवारों  और परिवारों  की स्थिरता व्यक्ति में अंतर्निहित होती है।  हम आज जब देश की स्थिति को देखते हैं तो राष्ट्र की स्थिरता को लेकर भारी चिंत्तायें व्याप्त हैं। इधर हमारे यहां विकास के दावे भी किये जा रहे हैं उधर राष्ट्र में व्याप्त सामाजिक, आर्थिक तथा धार्मिक तनावों की चर्चा भी हो रही है। यह विरोधाभास हमारी उन नीतियों का ही परिणाम है जिसमें किसी मनुष्य के लिये  अर्थार्जन ही एक श्रेष्ठ और अंतिम लक्ष्य माना जाता है।  अर्थार्जन में भी केवल पेट की रोटी तक ही सीमित लक्ष्य माना गया है।  यह आज तक समझा नहीं गया कि उदर की भूख की शांत होने के बाद भी मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी  सीमित नहीं रहते। सभी जीवों मे नरमादा होते हैं और जो कहीं न कहीं अगली पीढ़ी का सृजन करते हैं।  यह कामुक प्रवृत्ति सभी में होती हैं पर मनुष्य को उसके लिये भी अर्थ का सृजन संचय के लिये  करना पड़ता है। पशु पक्षी विवाह पद्धति नहीं अपनाते जबकि मनुष्य को इसे सामाजिक बाध्यता के रूप में स्वीकार करना ही पड़ता है। मनुष्य की संचयी प्रवृत्ति का ऐसे अर्थशास्त्री कतई अध्ययन नहीं करते जिनका लालन पालन धनपति करते हैं।
      हमारे देश के कुछ विद्वान अर्थशास्त्री गरीबी रेखा की सीमा के लिये एक राशि तय करते हैं। उसमें वह मनुष्य के खाने और कपड़े का ही हिसाब रखते हैं। उनका मानना है कि एक मनुष्य को खाने और कपड़े के अलावा जिंदा रहने के लिये कुछ अन्य नहीं चाहिये।  वातानुकूलित कक्षों में उनके इस चिंत्तन को मजाक ही माना जाता है।  वह मनुष्य में व्यापत उस संचयी प्रवृत्ति का आभास होते हुए भी तार्किक नहीं मानते जिसमें वह विश्ेाष अवसरों पर व्यय करने के लिये बाध्य होता है। वह मनुष्य को केवल एक पशु की श्रेणी में रखकर अपनी राय देते हैं।  इस तरह के चिंत्तन ने ही देश की अर्थव्यवस्था को भारी निराशाजनक दौर में पहुंचा दिया है। महंगाई, बेरोजगारी तथा अपराध देश में बढ़ते जा रहे हैं।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र में कहा गया है कि

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जलान्नायुधयन्त्राछृर्य धीरयोधरधिष्ठितं।

निवासाय प्रशस्यन्ते भमुजां भूतिच्छितां।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-जल, अन्न, शस्त्र और यन्त्रों से सम्पन्न, धीर वीर योद्धाओं के साथ ही योग्य मंत्रियों तथा आचार्यों से रक्षित दुर्ग की ही महत्ता होती है।

      एक तरह से हम देश में शुद्ध रूप से पूंजी पर आधारित अर्थव्यवस्था  का एक विकट रूप देख रहे हैं जिसमें मानवीय संवेदनाओं के साथ ही संस्कृति, संस्कार और परंपराओं के निर्वाह की बाध्यता को कोई स्थान नहीं है। सच बात तो यह है कि अमीर और गरीब के बीच स्थित एक समन्वित कड़ी मध्यम वर्ग रहा है जिसकी परवाह किसी को नहीं है।  यह लड़खड़ा रहा है और इससे जो समाज में अस्थिरता का वातावरण है वह अत्यंत चिंत्ताजनक है।  यह वर्ग अन्य दोनों वर्गों की बौद्धिक सहायता करने के साथ ही अपने श्रम के साथ ही सक्रिय भी रहता है।
      हम यहां इस वर्ग के लिये कोई याचना नहीं कर रहे बल्कि इतना कहना चाहते हैं कि देश की स्थिरता में इसी वर्ग का अन्य दोनों की अपेक्षा कहीं अधिक योगदान रहता है। अगर देश में समाज में निजी पूंजी का प्रभाव बढ़ा और मध्यम वर्ग केवल कंपनियों की नौकरी के इर्दगिर्द ही सिमटा तो कालांतर में ऐसे संकट उत्पन्न होंगे जिसकी कल्पना तक हम अभी नहीं कर सकते।  इसलिये देश के आर्थिक रणनीतिकारों को इस तरफ ध्यान जरूर देना चाहिये।

दीपक राज कुकरेजा ‘‘भारतदीप’’
ग्वालियर मध्यप्रदेश
Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep"
Gwalior Madhyapradesh
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 

Friday, June 27, 2014

ईख के खेत में रसभरा पौधा नहीं होता-रहीम दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(eekh ke khet mein rasbhara paudya nahin hota-A hindu hindi religion thought based on rahim darshan)



                      हमारे देश में धर्म पर व्याख्यान करना भी एक तरह से पेशा रहा है। यह अलग बात है कि कथित धर्म प्रचारक कभी प्रत्यक्ष रूप से अपने परिश्रम का प्रतिफल शुल्क या मूल्य के रूप में नहीं लेते देखे गये  पर दान दक्षिणा के नाम पर उन्हें इतना मिल जाता है कि वह अपना घर चला ही लेते हैं। अब तो यह देखा जा रहा है कि धार्मिक संगठनों के प्रमुख किसी पूंजीपति  से कम नहीं रह गये।  दवा, कपड़े खानेपीने का सामान तथा पूजा सामग्री बेचने के अलावा अनेक धार्मिक संगठन तीर्थयात्राओं का भी इंतजाम करने लगे हैं। अनेक धार्मिक प्रमुखों के आश्रम राजमहल की तरह हैं तो उनके शिष्यों के आवास भी होटल से कम नहीं होते।
                      हम जिस धर्म को आचरण में लाने पर प्रमाणिक मानते हैं वही वस्तुओं के विक्रय तथा अनेक सेवाओं के लिये एक विज्ञापन की छाप बन गया है। एक तरह से बाज़ार स्वामियों  का एक बहुत बड़ा भाग धर्म की आड़ लेकर व्यापार कर रहा है। यही कारण है कि ऐसा लगता है जैसे हमारा पूरा देश ही धर्ममय हो रहा है पर इधर यह भी दिखाई देता है कि समाज में  नैतिक आचरण भी निरंतर पतन की तरफ जा रहा है। आर्थिक विकास दृष्टि से हम जहां आगे जा रहा है वहीं मानसिक रूप से हमारा समाज पिछड़ रहा है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
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रहिमन जो तुम कहत थे, संगति ही गुन होय।
बीच उखारी रसभरा, रस काहै न होय।।
                   सरल हिन्दी में व्याख्या-यह कहना गलत है कि सत्संग का असर मनुष्य पर सदैव अच्छा होता है।  ईख के खेत में उगन वाला रसभरा पौधा कभी रस से नहीं होता है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि हम भौतिक विषयों पर किसी एक सूत्र के आधार पर निर्णय नहीं कर सकते क्योंकि मनुष्य देह जहां प्रत्यक्ष दिखती है वहीं उसमें बैठा मन कभी दिखाई नहीं देता जो कि बंदर की तरह नाचता और नचाता है। मनुष्य मन को धर्म के नाम पर सहजता से भरमाया जा सकता है। वह कब किसी तरह गुलाटी मारेगा इसका कोई तयशुदा सूत्र नहीं है। यही कारण है कि जहां हमारे देश के ऋषि मुनि समाज को हमेशा ही अन्धविश्वास  से दूर रहने की प्रेरणा देते रहे हैं वहीं चालाक लोगों का एक वर्ग कर्मकांडों से समाज को स्वर्ग दिलाने की आड़ में भ्रमित करता रहा है।  आधुनिक समय में पैसे का खेल इस कदर हो गया है कि अनेक प्रकार के आकर्षक धार्मिक स्थान बन गये हैं जो जहां लोग श्रद्धा से कम पर्यटन करने अधिक जाते हैं।  अनेक पर्यटन स्थल तो सर्वशक्तिमान की दरबारों की वजह से ही प्रसिद्ध हैं। वहां भारी भीड़ जुटती है। करोड़ों का चढ़ावा आता है।  आने वाले सभी लोगों को श्रद्धालू और दानी माने तो हमारा पूरा समाज देवत्व का प्रमाण माना जाना चाहिये पर ऐसा है नहीं। देश में व्याप्त भ्रष्टाचारशोषण, महिलाओं के प्रति बढ़ते अपराध, नशेबाजी और सट्टेबाजी को देखें तब लगता है कि यहां असुरों की संख्या भी कम नहीं है।
                      कहने का अभिप्राय यह है कि कथित रूप से धर्म की संगत करने का कोई लाभ तब तक नहीं होता जब तक अपनी नीयत साफ न हो। श्रद्धा के बिना सत्संग में जाने से मन में विचार स्वच्छ नहीं होते और इसके अभाव में मनुष्य का व्यवहार अच्छा नहीं होता।

संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
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Saturday, May 17, 2014

मनुष्य अपनी आदत के अनुसार रस और विष ग्रहण करता है-तुलसीदास के दर्शन के आधार पर चिंत्तन लेख(manush apni adat ke anusha ras aur vish chunta hai-A hindi religion thouhg based on tulsidas darshan)



            पूरे विश्व में उपभोग संस्कृति का प्रभाव बढ़ रहा है। धार्मिक गुरु तथा समाज चिंत्तक भले ही अपने समाजों के सांस्कृतिक, धार्मिक तथा श्रेष्ठ होने का दावा भले करें पर सच यह है कि अध्यात्मिक दृष्टि से लोगों की चेतना का एक तरह से हरण हो गया है।  स्थिति यह हो गयाी है कि विषयों में  अधिक लोग इस तरह लिप्त हो गये हैं कि उनकी वजह से जो दैहिक, मानसिक तथा शारीरिक विकार पैदा हो रहे हैं उनका आंकलन कोई नहीं कर रहा।  अनेक लोगों के पास ढेर सारा धन है पर उनका पाचन क्रिया तंत्र ध्वस्त हो गया है।  महंगी दवाईयां उनकी सहायक बन रही हैं। दूसरी बात यह है कि जिसके पास धन है वह स्वतः कभी किसी अभियान पर दैहिक तथा मानसिक बीमारी के कारण समाज का सहयोग नहीं कर सकता। उसके पास देने के लिये बस धन होता है। जहां समाज को शारीरिक तथा मानसिक सहायता की आवश्यकता होती है वह मध्यम तथा निम्न वर्ग का आदमी ही काम आ सकता है।
            अनेक लोग धन के मद में ऐसे वस्त्र पहनते हैं जो उनकी छवि के अनुरूप नहीं होते। उसी तरह औषधियों का निरंतर सेवन करने से  उनकी रोगप्रतिरोधक क्षमता का हृास हो जाता है। यहां तक कि अनेक लोगों को सामान्य जल भी बैरी हो जाता है। अनेक बीमारियों में चिकित्सक कम पानी पीने की सलाह देते हैं।  अधिक दवाईयों का सेवन भी उनके लिये एक तरह से दुर्योग बन जाता है।    
संत तुलसीदास कहते हैं कि
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ग्रह भेषज जल पवन पट, पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग, लखहिं सुलच्छन लोग।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-ग्रह, वेशभूषा, पानी, वायु तथा औषधि समय अनुसार दुर्योग तथा संयोग बनाते हैं।
जो जो जेहि जेहि रस मगन, तहं सो मुदित मन मानि
रसगुन दोष बिचारियो, रसिक रीति पहिचानि।।
            सामान्य हिन्दी में भावार्थ-प्रत्येक मनुष्य अपने स्वभाव के अनुसार संसार के विषयों के रस में मग्न रहता है। उसे उसके रस के दोषों के प्रभाव को नहीं जानते। इसके विपरीत ज्ञानी लोग रसों के गुण दोष को पहचानते हुए ही आनंद उठाते है। एक तरह से ज्ञानी ही सच्चे रसिक होते हैं।
            जिन लोगों की भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में रुचि है वह जानते हैं कि हर विषय के उपभोग की सीमा होती है।  अति हमेंशा वर्जित मानी जाती है। योग और ज्ञान साधना का नियमित अभ्यास करने वाले जानते हैं कि सांसरिक विषयों में जब अमृत का आभास होता है तो बाद में परिवर्तित होकर विष बन जाते हैं जिसे योग तथा ज्ञान साधना से ही नष्ट किया जा सकता है। यही कारण है कि जब विश्व में उपभोग संस्कृति से जो दैहिक, मानसिक तथा वैचारिक विकारों का प्रभाव बढ़ा है तब भारतीय योग साधना तथा श्रीमद्भागवत गीता के संदेशों की चर्चा हो रही है क्योंकि अमृत से विष बने सांसरिक विषयों के रस को जला देने की कला इन्हीं में वर्णित है।


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Sunday, May 11, 2014

अधम की सेवा कभी न करें-मनुस्मृति के आधार पर हिन्दी चिंत्तन लेख(adham ke sewa kabhi na kareh-A hindu religion thought mased on manu smriti)



        हमारे देश में ज्योतिष, काला जादू तथा तंत्र मंत्र की आड़ में  लोगों को सांसरिक विषयों में सफलता दिलाने के लिये कथित रूप से अनेक व्यवसायिक धार्मिक ठेकेदार सक्रिय हैं। सच बात तो यह है कि सांसरिक विषयों में लिप्त रहते हुए नैतिक आचरण करना ही धर्म है पर इसका आशय यह कतई नहीं है कि हम अपने महान धर्मभीरु होने का दावा करते हुए गाते फिरें।  दूसरी बात यह कि कथित रूप से जो गुरु या संत सांसरिक विषयों पर बोलते हैं उनको धर्म का प्रवर्तक मानना ही गलत है।  उससे ज्यादा बुरी बात यह है कि खांस वस्त्रों को पहनकर घूमने वाले लोगों को संबंधित धर्म का ज्ञानी मानना एकदम मूर्खता है।  अगर भेड़ की खाल पहनकर भेड़िया शाकाहारी होने का स्वांग करे और  कोई हिरण मान ले तो मूर्ख ही कहा जाता  है। यही स्थिति मनुष्य की है। वह किसी भी कथित धर्म प्रचारक के मुख से अच्छी बातें सुनकर उसे संत या सन्यासी मानने लगता है।  इसी कारण अनेक लोग ज्ञान के व्यवसायिक प्रचारकों को ही गुरु मानने लगते हैं। हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार ज्ञान होना ही पर्याप्त नहीं है वरन् उसे धारण कर जीवन में उतारना ही पूर्ण ज्ञानी होने का प्रमाण होता है।
                        इस बात को अनेक  लोग नहीं समझते और ज्ञान की बातें सुनाने वालों को संत कहने लगते हैं। यही कारण है कि अनेक लोगों ने धर्म के नाम पर हमारे देश में अपना व्यापार चला रखा है।  इन लोगों में धन कमाने की प्रवृत्तियां किसी सामान्य मनुष्य से अधिक खतरनाक ढंग से विद्यमान देखी जाती है। 
मनस्मृति में कहा गया है कि

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अकर्मशीलं च महाशनं च लोकद्विष्टं महुमायं नृशंसम्।

अदेशकालज्ञमनिष्टवेषमेतान् गृहे न प्रतिवासयेत्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-अकर्मण्य, अधिक भोजन करने वाले, सबसे बैर बांधने वाले, मायावी, क्रूर, देशकाल का ज्ञान न रखने वाले, निन्दित वेश धारण वाले मनुष्यों को कभी अपनी घर में नहीं  ठहराये।

संक्लिष्टकर्माणमतिप्रमादं नित्यानृतं चाटृढभक्तिकं च।

विसृष्टरागं पटमानिन्र चाप्येतान् न सेवेत नराधमान् षट्।।

                        हिन्दी में भावार्थ-क्लेश करने वाला, अत्यंत प्रमादी, झूठ बोलने वाला, अस्थिर भक्ति वाला, स्नेह से रहित तथा अपने को ही चतुर मानने वाला, यह छह प्रकार के लोग अधम माने जाते हैं। इनकी सेवा कतई न करें।
                        कभी कभी तो यह लगता है कि धर्म के नाम पर व्यापार चलाने वाले उतने ही खतरनाक है जितना अफीम बेचने वाले लोग होते हैं।  हमने देखा है कि मादक द्रव्य बेचने में लगे लोग अपने ही स्वाजातीय व्यवसायियों के विरुद्ध हिंसक गतिविधियां करते हैं। ऐसे ही धर्म व्यवसायियों के कारण प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कार्ल मार्क्स से धर्म को अफीम कहा था।  हम उसके कथित अर्थशास्त्र के सिद्धांतों से सहमत हों या न हों पर भारत के संदर्भ में उसका धर्म को अफीम मानने का सिद्धांत एकदम सही लगता है।  अनेक बार तो ऐसा लगता है कि धर्म का व्यापार करने वाले यह लोग अधर्म की राह पर चलते हुए शक्ति, संपत्ति तथा शिष्य संग्रह कर अपनी ताकत इसलिये बढ़ाते हैं ताकि राजकीय संस्थाओं पर प्रभाव जमाया जा सके।  ऐसे लोगों की सेवा करना या उनकी भक्ति में लगे रहने से मन के कलुषित होने का भय रहता है।
                        हमारे यहां कहा भी जाता है कि भक्ति भगवान की करो किसी बंदे को भजना ठीक नहीं है। कथित गुरुओं की व्यवसायिक चालाकियों के चलते अनेक लोग फंस कर भगवान की बजाय अपने कथित गुरुओं  को ही भगवान मानने लगते हैं। जब उनको अपने गुरु की असलियत पता चलती है तो उनके अंदर निराशा और तनाव का ज्वार उठने लगता है। अनेक कथित गुरु अपने सत्संग में चुटकुले और अपनी कल्पित कहानियां सुनाकर हास्य का भाव भी पैदा करते हैं। अपने शिष्य समुदाय को बनाये रखने के लिये अनेक प्रकार के स्वांग भी रचते हैं।  कहना चाहिये कि वह धर्म के नाम पर अभिनय करते हैं। जब पोल खुलती है तब शिष्य अपने को एक अंधेरे कुंऐं में गिरा अनुभव करते हैं।
                        जिन लोगों के अंदर अध्यात्मिक ज्ञान की ललक है उनको गुरु ढूंढने की बजाय अपने ही अध्यात्मिक ग्रंथों का अध्ययन करना चाहिये।  हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार कोई भोग कभी किसी का उद्धार नहीं कर सकता। यह शक्ति केवल त्यागी भाव के गुरु में ही संभव है जिसकी पहचान यह होती है कि वह जहां खड़ा हो जाये वहीं आश्रम लगने लगे। जब बोले तो लगे कि अमृतवाणी प्रवाहित हो रही है। वह संपत्ति और शिष्य संचय की बजाय सर्वजन हिताय के भाव से समाज में सलंग्न रहता है।   

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Saturday, May 10, 2014

दूसरे से जलने वाले का भाग्य रूठ जाता है-तुलसीदास दर्शन पर आधारित चिंत्तन लेख(doosre se jalane wale ka bhag rooth jaata-A hindi religion thought basen on tulsidas darshan)




      सामान्य मनुष्य की इंद्रियां अपने समक्ष घटित दृश्य, उपस्थित वस्तु तथा व्यक्ति के साथ ही स्वयं से जुड़े विषय पर ही केंद्रित रहती है। ज्ञान के अभाव में मनुष्य सहजता से बहिर्मुखी रहता है जिस कारण उसे जल्दी ही मानसिक तनाव घेर लेता है। अगर कोई व्यक्ति साधक बनकर योगाभ्यास तथा ज्ञानार्जन का प्रयास करे तो ंअंततः उसकी अंतर्चेतना जाग्रत हो सकती है।  बाहरी विषयों से तब उसका संपर्क सीमित रह जाता है।  बहिर्मुखी  भाव कभी थकावट तो कभी बोरियत का शिकार बनाता है।  यही कारण है कि जिन लोगों के पास धनाभाव है वह अधिक धनी को देखकर उसके प्रति ईर्ष्या पालकर कुंठित होते हुए स्वयं को रोगग्रस्त बना लेते हैं। उसी तरह धनी भी आसपास गरीबी देखकर इस भय से ग्रसित रहता है कि कहीं उसकी संपत्ति पर किसी की वक्रदृष्टि न पड़े। वह अपने वैभव की रक्षा की चिंता में अपनी देह गलाता है। आर्थिक विशेषज्ञ  कहते हैं कि हमारे देश में धनिकों की संख्या बढ़ी है तो स्वास्थ्य विशेषज्ञ इस बात की जानकारी भी सार्वजनिक रूप से करते हैं कि देश में राजरोगों का प्रकोप बढ़ा है। हमारे समाज में चर्चायें अब अध्यात्म विषय पर कम संसार के भोगों पर अधिक होती है। इससे चिंतायें, ईर्ष्या तथा वैमनस्य का जो भाव बढ़ा है उसका अंाकलन किया जाना चाहिये।
संत तुलसीदास जी कहते हैं कि

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पर सुख संपति देखि सुनि, जरहिं जे लड़ बिनु आगि।

तुलसीतिनके भागते, चलै भलाई भागि।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-दूसरे की सुख और संपत्ति देखकर जलने वाले बिना आग के ही जलते हैं। उनके भाग्य से कल्याण दूर भाग जाता है।

तुलसीके कीरति चहहिं, पर की कीरति खोइ।

तिनके मुंह मस लागिहै, मिटिहि न मरिहै धोइ।।

     सामान्य हिन्दी में भावार्थ-इस संसार में जो दूसरे की निंदा कर अपनी कीर्ति बढ़ाना चाहते हैं वह अज्ञानी हैं।  उनके मुख पर ऐसी कालिख लगती है वह बहुत धोने पर भी मिटती नहीं है।
     अपनी भौतिक भूख शांत करने के लिये जीवन बिताने वाले लोगों के लिये यह संभव नहीं है कि वह परोपकार का काम करें इसलिये अपनी प्रतिष्ठा बढ़ाने के लिये दूसरे की निंदा करते हैं।  अपनी बड़ी लकीर खींचने की बजाय थूक से दूसरे की खींची लकीर को छोटा करने लगते हैं। यह अलग बात है कि पीठ पीछे ऐसे निंदकों के विरुद्ध भी जनमत बन ही जाता है।  उनके विरुद्ध लोग अधिक अनर्गल प्रलाप करते हैं।  सच बात तो यह है कि अगर अपनी प्रतिष्ठा बनानी है तो हमें वास्तविक रूप से दूसरों की भलाई करने का काम करना चाहिये न कि अपना बखान स्वयं कर हास्य का विषय बने।
      हमारे अध्यात्मिक दर्शन के अनुसार हमारे संकल्प के अनुसार ही हमारे लिये इस संसार का निर्माण होता है इसलिये न केवल अपने तथा परिवार के लिये बल्कि मित्र, पड़ौसी तथा रिश्तेदारों के लिये भी मंगलकामना करना चाहिये। यह संभव नहीं है कि हम अपने लिये तो सुखद भविष्य की कामना करें और दूसरे के अहित का विचार करें। ऐसे में यह उल्टा भी हो सकता है कि आप दूसरे का अनिष्ट सोचें उसका तो भला हो आये पर आपकी मंगल कामना करने की बजाय सुख की बजाय दुख चला आये। इसलिये अपने हृदय में सुविचारों को स्थान देना चाहिये।

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