समस्त ब्लॉग/पत्रिका का संकलन यहाँ पढ़ें-

पाठकों ने सतत अपनी टिप्पणियों में यह बात लिखी है कि आपके अनेक पत्रिका/ब्लॉग हैं, इसलिए आपका नया पाठ ढूँढने में कठिनाई होती है. उनकी परेशानी को दृष्टिगत रखते हुए इस लेखक द्वारा अपने समस्त ब्लॉग/पत्रिकाओं का एक निजी संग्रहक बनाया गया है हिंद केसरी पत्रिका. अत: नियमित पाठक चाहें तो इस ब्लॉग संग्रहक का पता नोट कर लें. यहाँ नए पाठ वाला ब्लॉग सबसे ऊपर दिखाई देगा. इसके अलावा समस्त ब्लॉग/पत्रिका यहाँ एक साथ दिखाई देंगी.
दीपक भारतदीप की हिंद केसरी पत्रिका


हिंदी मित्र पत्रिका

यह ब्लाग/पत्रिका हिंदी मित्र पत्रिका अनेक ब्लाग का संकलक/संग्रहक है। जिन पाठकों को एक साथ अनेक विषयों पर पढ़ने की इच्छा है, वह यहां क्लिक करें। इसके अलावा जिन मित्रों को अपने ब्लाग यहां दिखाने हैं वह अपने ब्लाग यहां जोड़ सकते हैं। लेखक संपादक दीपक भारतदीप, ग्वालियर
Showing posts with label हिन्दी. Show all posts
Showing posts with label हिन्दी. Show all posts

Saturday, December 12, 2015

परदेस जाकर सुख की कामना करना बेकार-चाणक्य नीति के आधार पर चिंत्तन लेख(Pardes Jakr sukh ki kamna karna bekar(A Spiritual Thought article based on Chankyaniti)


                           पहले तो मनुष्य की पीढ़ियां दर पीढ़ियां ही शहर या गांव में जीवन गुजार देती थीं। आधुनिक युग में संचार, संपर्क तथा परिवहन के आधुनिक साधनों ने उसे मानसिक रूप से  अस्थिर बना दिया है। इसी कारण जहां पहले केवल श्रमिक वर्ग के ही लोग रोजगार के लिये परिगमन करते थे वहीं अब खाये पीये लोगों में भी बाहर जाकर आनंदमय जीवन बिताने का विचार जोर पकड़ता है-जिस स्थान पर सब कुछ मिल रहा है वह उन्हें ढेर सारे दोषों के साथ ही बोरियत देने वाला लगता है-पर्दे की प्रचार पंक्तियां उन्हें दूर के ढोल सुहावने दिखाती हैं।
चाणक्य नीति में कहा गया है कि
----------------
अलिस्यं नलिनीदलमध्यगः कमलिनीमकरन्दमदालसः।
विधिवशात्परंदेशमुपागतः कुटाजपुष्परसं बहु मन्यते।।
                           हिन्दी में भावार्थ-भौंरा जब तक कमलिनी के मध्यम रहते हुए पराग से रसपान कर उसके मद में आलसी हो जाता है पर कालवश परदेेश जाने के शौक से अन्य फूलों पर चला जाता  है जिनमें न रस होती न गंध।
                           अध्यात्मिक ज्ञान की कमी के कारण ही संपन्न परिवारों के मस्तिष्क में ऐसी अस्थिरता आई जिसे शब्दों में बयान करना ही कठिन लगता है।  ऐसे लोगों को भारतीयअध्यात्मिक दर्शन का अध्ययन जरूर करना चाहिये। हमारे देश में अनेक लोग अपने बच्चों को बाहर भेजकर यह सोचते हैं कि उनका जीवन धन्य हो गया पर बाद में उन्हें अपना जीवन अकेला गुजारना पड़ता है।
----------------
दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’’
कवि, लेखक एंव संपादक-दीपक 'भारतदीप",ग्वालियर 
poet,writer and editor-Deepak 'BharatDeep',Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
यह कविता/आलेख रचना इस ब्लाग ‘हिन्द केसरी पत्रिका’ प्रकाशित है। इसके अन्य कहीं प्रकाशन की अनुमति लेना आवश्यक है।
इस लेखक के अन्य ब्लाग/पत्रिकायें जरूर देखें
1.दीपक भारतदीप की हिन्दी पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अनंत शब्दयोग पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का  चिंतन
4.दीपक भारतदीप की शब्दयोग पत्रिका
5.दीपक भारतदीप की शब्दज्ञान का पत्रिका

9.हिन्दी सरिता पत्रिका

Monday, August 25, 2008

संत कबीर वाणी:दूसरे का दर्द न समझे वह बुद्धिहीन

पीर सबन की एकसी, मूरख जाने नांहि
अपना गला कटाक्ष क, भिस्त बसै क्यौं नांहि


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि सभी मनुष्यों की पीड़ा एक जैसी होती है पर मूर्ख लोग इसे नहीं समझते। ऐसे अज्ञानी और हिंसक लोग अपना गला कटाकर स्वर्ग में क्यों नहीं बस जाते।

वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-इस दोहे में अज्ञानता और हिंसा की प्रवृत्ति वाले लोगों के बारे में बताया गया है कि अगर किसी दूसरे को पीड़ा होती है तो अहसास नहीं होता और जब अपने को होती है तो फिर दूसरे भी वैसी ही संवेदनहीनता प्रदर्शित करते हैं। अनेक लोग अपने शौक और भोजन के लिये पशुओं पक्षियों की हिंसा करते हैं। उन अज्ञानियों को यह पता नहीं कि जैसा जीवात्मा हमारे अंदर वैसा ही उन पशु पक्षियों के अंदर होता है। जब वह शिकार होते हैं तो उनके प्रियजनों को भी वैसा ही दर्द होता है जैसा मनुष्यों के हृदय में होता है। बकरी हो या मुर्गा या शेर उनमें भी मनुष्य जैसा जीवात्मा है और उनको मारने पर वैसा ही पाप लगता है जैसा मनुष्य के मारने पर होता है। यह अलग बात है कि मनुष्य समुदाय के बनाये कानून में के उसकी हत्या पर ही कठोर कानून लागू होता है पर परमात्मा के दरबार में सभी हत्याओं के लिऐ एक बराबर सजा है यह बात केवल ज्ञानी ही मानते हैं और अज्ञानी तो कुतर्क देते हैं कि अगर इन जीवो की हत्या न की जाये तो वह मनुष्य से संख्या से अधिक हो जायेंगे।

आजकल मांसाहार की प्रवृत्तियां लोगोंे में बढ़ रही है और यही कारण है कि संवदेनहीनता भी बढ़ रही है। किसी को किसी के प्रति हमदर्दी नहीं हैं। लोग स्वयं ही पीड़ा झेल रहे हैं पर न तो कोई उनके साथ होता है न वह कभी किसी के साथ होते हैं। इस अज्ञानता के विरुद्ध विचार करना चाहिये ।
------------------------------
यह पाठ मूल रूप से इस ब्लाग‘शब्दलेख सारथी’ पर लिखा गया है। अन्य ब्लाग
1.दीपक भारतदीप की शब्दलेख पत्रिका
2.दीपक भारतदीप की अंतर्जाल पत्रिका
3.दीपक भारतदीप का चिंतन
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप

Friday, February 29, 2008

संत कबीर वाणी:धुम्रपान से होती है हिंसा

पानी पिरथीके हते, धुवाँ सुनि के जीव

हूके में हिंसा घनी, क्यों कर पीवै पीव

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि धूम्रपान (हुक्के) के दुर्गन्धयुक्त गंदे पानी से पृथ्वी को बहुत हानि होती है। क्योंकि उससे कई छोटे जीवों की मृत्यु होती है इसलिए उसे कभी पीना नहीं चाहिए। आखिर लोग इसे क्यों पीना चाहते हैं।

छाजन भोजन हक्क है, और अनाहक लेय

आपन दोजख जात है, औरों दोजख देय

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन निर्वाह का अधिकार है और वह अनुचित रूप से उन पदार्थों को लेता है जो उसे नहीं लेना चाहिए। इस प्रकार ऐसा व्यसनी बनकर वह अपने आप तो नरक में जाता है साथ ही दूसरों को ले जाता है।

Monday, January 21, 2008

रहीम के दोहे:ओछे व्यक्ति से कोई संपर्क न रखें

रहिमन ओछे नरन सों, बैर भलो ना प्रीति
कटे चाटै स्वान के, दोउ भांति विपरीति

कविवर रहीम कहते हैं की तुच्छ विचार वाले नीच मनुष्य से प्रेम और द्वेष नहीं करना चाहिए, उससे किसी प्रकार का संबंध नहीं रखना चाहिऐ.

Tuesday, January 15, 2008

रहीम के दोहे:नयन बाण की चोट व्यक्ति नहीं सह पाता

रहिमन तीर के चोट ते, चोट परे बचि जाय
नैन बाण की चोट ते, चोट परे मरि जाय


कविवर रहीम कहते हैं की बाण बाण की चोट लगने से व्यक्ति बच जाता है, परन्तु नयन-बाणों की चोट से व्यथित जीवित नहीं रह पाता।

रहिमन देखि बडेंन को , लघु न दीजिये हारि
जहाँ काम न आये सुई कहा के तलवारि


कविवर रहीम कहते हैं की महान पुरुषों को देखकर तुच्छ मनुष्यों को व्यर्थ समझकर उनका निरादर मत कीजिए। जहाँ सुई काम आती हैं जहाँ तलवार काम नहीं कर सकती।

Friday, January 11, 2008

रहीम के दोहे:विदेश में धन कमाने के लिए सम्मान खोना पड़ता है

भलो भयो घर ते छुट्यो, हँस्यो सीस परिखेत
काके काके नवत हम, अपने पेट के हेत


कविवर रहीम कहते हैं की घर से निकलकर भला ही हुआ, परन्तु सिर पर जो रक्षक है उसने उपहास किया, क्योंकि अपने पेट की खातिर परदेश में जाकर न जाने किस-किस के आगे झुकना पडा.
भावार्थ-आदमी पेट की खातिर अपना घर,अपना देश और अपना परिवार छोड़कर विदेश जाता और अच्छी आय अर्जित कर बहुत खुश होता है पर इसके लिए उसे कैसे-कैसे लोगों के सामने सिर झुकाना पढता है. एक तरह से अपना सम्मान खोना पड़ता है. आदमी की इस प्रवृति को देखकर परमात्मा भी हँसता रहता है.

भार झोंकी के भार में, रहिमन उतरे पार
ये बूड़े बड़े मझधार में, जिनके सिर पर भर


कवि रहीम कहते हैं की इस संसार में भाड़ झोंककर भवसागर से हमारा उद्धार हुआ, परन्तु जिनके मस्तक पर सांसारिक भार (पारिवारिक और सामाजिक उत्त्दायित्व) था वे बेचारे मझधार में ही डूब गए.

Saturday, December 29, 2007

क्रिकेट, फिल्म और बाज़ार प्रबंधन

मैं जब भी टीवी और अखबारों में खेलों और फिल्मों के बारे में पढता हूँ तो ऐसा लगता है प्रचार माध्यमों को अब अपने केवल पाठको और दर्शकों के लिए न केवल पठनीय और दर्शनीय सामग्री चाहिऐ बल्कि उसके लिए उनको ऐसे माडल और फोटोजनिक चेहरे चाहिऐ जो उसमें सज सकें। यहीं बाजार के प्रबंधकों की सक्रियता बढ़ गयी लगती है। वह हर क्षेत्र में सक्रिय हैं और फिल्म में अभिनेता और खेल में खिलाडी नहीं बल्कि माडल ढूंढते हैं।

किसी क्रिकेट खिलाडी ने एक दो मैंच में रन बना लिए तो वह उसके प्रचार में जुट जाते हैं। उसके माँ-बाप, भाई-बहिन और दोस्त जो भी मिल जाये उसके बारे में चर्चा कर बचपन के संस्मरण अपने कार्यक्रमों और कालमों में छापते हैं गोया कि बचपन से उसमें बडे आदमी बनने के गुण मौजूद थे। इसी तरह नये फिल्म अभिनेता के-जिनमें अधिकतर के माँ-बाप फिल्मों में काम कर चुके हैं-के बारे में प्रचार माध्यम यह कहने में जरा भी कहने के संकोच नहीं करते कि अभिनय तो उसके खून में है-हालांकि क्या उनके माँ-बाप के भी खून में अभिनय है इस पर प्रकाश नहीं डालते।

कुछ लोग समझ नहीं पाते तो कुछ गुस्सा होते हैं पर उन्हें यह समझना चाहिए कि ऐसा प्रचार माध्यम इसलिए करते हैं ताकि उनके विज्ञापनोंदाताओं के लिए माडल जुटा सकें। पहले उनको जन्मजात नायक और खिलाडी के रूप में लोगों की दृष्टि में स्थापित किया जाता है फिर उसे भुनाया जाता है। ऐसे में जो क्रिकेट में खेल की तकनीकी और फिल्म में जो अभिनय देखना चाहते हैं उन्हें निराशा तो होगी उसके लिए अपने ऊपर कोई तनाव लेने की जरूरत नहीं हैं।

भारतीय फिल्में आस्कर अवार्ड के लिए जातीं है उसका प्रचार इस तरह होता है जैसे कि वह कोई पुरस्कार लाकर लौटेंगी-ऐसा हो नहीं सकता। हिन्दी फिल्मो के पास दर्शक बहुत है पर इसका मतलब यह नहीं है कि स्तर विश्व में कोई बहुत ऊंचा है-राष्ट्रपिता महात्मा गांधी पर जानदार और आकर्षक फिल बनाने का श्रेय इस देश के निर्देशकों और कलाकारों के पास नहीं बल्कि उन अंग्रेजों के पास है जिनके खिलाफ उन्होने आजादी की लड़ाई लड़ी । क्रिकेट में कई महान खिलाड़ी हैं तो केवल इसलिए कि उन्हें देश में देखने वाले बहुत है पर विश्व स्तर पर उनकी कोई अहमियत नहीं है। देश के लोगों भी उनको इसलिए अधिक जानते हैं कि प्रचार माध्यम उन्हें हमेशा उनके सामने किये रहते हैं ताकि लोग उन्हें याद रखें और उनके तेल, शैंपू, गाडियाँ और मोबाइल के विज्ञापनों से प्रभावित होकर अपनी जेब ढीली करे।

Saturday, December 8, 2007

मनु स्मृति: धर्म के होते हैं दस लक्षण

  1. वेद स्मृति के अनुसार चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम श्रेष्ठ है। इसका कारण यह है कि गृहस्थाश्रम में रहने वाला ही आदमी इन तीन आश्रमों में रहने वालों का पालन करता है।
  2. वेद मंत्रों का जाप सभी को अभीष्ट फल प्रदान करता है, चाहे ज्ञानी करें या अज्ञानी, स्वर्ग के सुखों की इच्छा करने वाला करे अथवा मोक्ष की इच्छा करने वाला।
  • संकलन कर्ता का अभिमत है यहाँ स्वर्ग के सुखों से आशय यह नहीं है जो मरने के बाद प्राप्त होते है वरन इस इहलोक में भी हम वह तमाम आनंद इन मंत्रों के हृदय से उच्चारण कर प्राप्त कर सकते हैं जो इस देह के लिए अभीष्ट होते हैं।

3. धर्म के दस लक्षण हैं १.धैर्य रखना २.क्षमा करना ३.मन पर नियंत्रण करना ४,चोरी नहीं करना ५.मन,वचन और कर्म करना ६.ज्ञानेद्रियाँ एवं कामेद्रियाँ अर्थात सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण करना ७.शास्त्र का ज्ञान प्राप्त करना ८.ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना ९.सच बोलना १०.क्रोध नहीं करना।

4. आत्म साक्षात्कार कर लेने वाला योगी कर्मों के बंधनों में नहीं पड़ता। जो ब्रह्म के दर्शन नहीं कर पाता वही कर्तापन के अहंकार से अच्छे-बुरे कर्मों के परिणाम स्वरूप आवागमन के चक्र में पड़ता है।

Friday, November 30, 2007

संत कबीर वाणी:सेवा के बदले फल चाहने वाले सेवक नहीं

फल कारण सेवा करे, करे न मन से काम
कहैं कबीर सेवक नहीं, कहैं चौगुना दाम

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो मनुष्य अपने मन में इच्छा को रखकर निज स्वार्थ से सेवा करता है वह सेवक नही क्योंकि सेवा के बदले वह कीमत चाहता है।

अभिप्राय-हमने देखा होगा कई लोग समाज की सेवा का दावा करते हैं पर उनका मुख्य उद्देश्य केवल आत्मप्रचार करना होता है। कई लोग ऐसे भी हैं उन्होने अपने नाम से सेवा संस्थान बना लिए है और दानी लोगों से चन्दा लेकर तथाकथित रूप से समाज सेवा करते हैं और मीडिया में अपनी 'समाजसेवी" की छबि का प्रचार करते हैं ऐसे लोगों को समाज सेवक तो माना ही नहीं जा सकता। इसके अलावा कई धनी लोगों ने अपने नाम से दान संस्थाए बना राखी हैं और वह उसमें पैसा भी देते हैं पर उनका मुखु उद्देश्य करों से बचना होता है या अपना प्रचार करना-उन्हें भी इसी श्रेणी में रखा जाता है क्योंकि वह अपनी समाज सेवा का विज्ञापन की रूप में इस्तेमाल करते हैं।

Friday, November 2, 2007

भक्ति में विश्वास और चमत्कार की आस-चिंतन

रात का समय.......धीरे-धीरे दिन अपने कोलाहल को समेट रहा कर जा रहा है और रात का अंधियारा अपने साथ ला रहा है चिंतन के लिए अनमोल पल जो हृदय की जिज्ञासा को शांत कराने के लिए सुविधाजनक होते हैं। रात की शांति दिनभर के कोलाहल का विश्लेषण करने के करने का अवसर प्रदान करती हैं।

चिंतन नहीं करूंगा चिंता शुरू हो जायेगी। आख़िर क्या फर्क है चिंतन और चिन्ता में? दिन भर मैंने जो किया या मेरे साथ हुआ उस पर दृष्टिपात कराने का प्रयास करता हूँ। इसमें अपने 'मैं' को हटा लेता हूँ क्योंकि अगर ऐसा नहीं करूंगा तो केवल हर घटना का केवल ऐक ही पक्ष देख पाऊँगा और अपनी गलतियाँ नही दिखाईं देंगीं, हर बार अपना ही सही पक्ष देखने का प्रयास करूगा। अपने से जुडे घटना से मैं' को अलग आकर देखना चिंतन है और जब उसमें मैं जोड़ कर रखेंगें तो चिन्ता शुरू हो जायेगी। हम न भी चाहें तो दोनों में से काम तो होगा ही क्योंकि हमारे अन्दर मन, बुद्धि और अंहकार ऎसी प्रकृतियां जो अपना काम करेंगी ही हम चाहे या न चाहे।

हुआ यह कि मैं कुछ दिन पहले ऐक मंदिर में गया। उस मंदिर में अक्सर जाता हूँ। यह मंदिर शहर के मध्य भाग में स्थित है और इसके चारों और ऐक बहुत बडा पार्क है। यह मंदिर बहुत पुराना और आज भी देखने में आकर्षक है पर वहाँ लोगों कम ही आते हैं। शहर में अन्य भी अनेक आकर्षक मंदिर हैं और यह उनसे कम नहीं है, पर क्योंकि इसके पास लोगों की रिहायश कम है और शायद यही कारण है कि प्रसाद और माला के लिए दुकाने कम होने से लोग यहाँ कम आते हैं। मंदिर के चारों और बने पार्क में बहुत संख्या में घुमते हैं पर उस मंदिर में फिर भी नहीं जाते क्योंकि भगवान के दरबार में जाने वाले लोगों के मन में प्रसाद और माला ले जाने की इच्छा होती है और कोई अपने घर या बाजार से लेने की बजाय उसी जगह खरीदना चाहता है जहाँ मंदिर स्थित होता है और चूंकि इसके आसपास सरकारी नियंत्रण इतना कडा है कि कोई अतिक्रमण कर वहां दुकान बना ही नही सकता। हालांकि पार्क की दृष्टि से यह अच्छा भी है कि वहाँ किसी प्रकार का गंदगी नहीं होती।मैं अपने परिवार के साथ वहां जाता हूँ पर मंदिर में अकेला ही जाता हूँ कोई साथ नहीं चलता। क्योंकि उस मंदिर के सिद्ध होने की चर्चा कहीं भी नहीं होती है और अपने देश के लोगों का नियम है जिसमें चमत्कार कराने की शक्ति नही होती उसे नमस्कार नही करते। वैसे तो कोई चमत्कार नहीं करता पर उसके लिए प्रसिद्ध तो उसे होना ही चाहिए भले ही उसके पीछे पाखंड होता हो ।

बहरहाल उस दिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो भारी भीड़ थी तो मुझे आश्चर्य हुआ। अचानक हमारी श्रीमती जी बोली आज इस मंदिर में भगवान जी की मूर्ति को करोडों रुपये के जेवर पहनाये जायेंगे, इसलिए लोग उसे अधिक संख्या में आ रहे हैं। यह गहने बहुत दिन से कहीं रखें हुए थे और इन्हें बरसों से पहनाया नहीं गया।'

मैं हैरान रह गया. जिनके भगवान् के दर्शन आसानी से कर लेता था उनके लिए मुझे हजार लोगों की लाइन में खडा होना था। वहाँ मेरा एक मित्र-जो अपनी पत्नी को दर्शन कराने के लिए लाया था- भी मिल गया और बोला-"चलो लाइन में लगते हैं।"
मैंने कहा-'नहीं मैं तो बाहर से हाथ जोड़कर जा रहा हूँ। मैं तो शनिवार को अक्सर आता हूँ।'

तो वह बोला-''कल तो गहने उतार लिए जायेंगे। आज खास दिन है, इसलिए गहने पहनाये गए हैं और लोग वही गहने देखने के लिए आ रहे हैं।'

मैंने कहा-''यह मेरी श्रद्धा का मामला है। मैं तो इस मंदिर में ध्यान लगाने जाता हूँ। गहनों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। इतनी भीड़ में खड़े होने के लिए मेरा अंतर्मन इजाजत नहीं देता।'

तब उसने मेरी और अपनी पत्नी को लाइन में खड़े होकर दर्शन करने का सुझाव दिया। मेरी स्वीकृति से पहले ही दोनों एक स्वर में बोलीं-''हाँ हम जाते हैं।"
मैंने और मेरे मित्र ने बाहर से हाथ जोड़कर अपने भाव व्यक्त किये और दूर खड़े होकर नजारा देखने लगे। इतनी भीड़ देखकर मैंने अपने मित्र से कहा-' भगवान् की मूर्ति पूजने से मानसिक लाभ होते हैं यह तो मैं भी मानता हूँ, पर इस तरह गहने पहनाना और उसे देखने के लिए लोगों की आतुरता देखकर तो यही लगता है कि लोग अपने धर्म और आध्यात्म को समझते ही नहीं।'
मेरे मित्र ने कहा-''लोगों को यह पता ही नहीं है कि धर्म है क्या? वह तो केवल कर्मकांडों को कर यही समझते हैं कि वही धर्म हैं। असल में मैं तुम्हारी इस बात से सहमत हूँ जो तुम अक्सर कहते हों कि झगडा धर्मों का नहीं बल्कि कर्मकांडों का है,इस बात से सहमत हूँ।लोग पूजा और दर्शन केवल औपचारिकतावश ही कर यह सोचते हैं कि हो गया धर्म का निर्वाह।'

लोग हजारों की संख्या में आ रहे थे और सबके जुबान पर गहनों की बात थी। उस दिन मैं पहली बार यह देख रहा था कि भक्त नहीं बल्कि दर्शक आ रहे थे। वह जो सब खेल रचता है उसे ही खिलौना समझने की गलती कर रहे थे। दोनों स्त्रियाँ लाइन के बीच में घुसकर दर्शन करे आयीं। उसके बात हम घर लौटे। सच बात है कि भगवान की मूर्तियों को पूजने का लाभ तभी है जब उसे अपने मन में धारण करें। विभिन्न धातुओं या पत्थरों को तराश कर उनमें मानवीय अंगों की आकृति रचकर मूर्तियों को इसलिए बनाया गया है कि उनमें जीवन्तता की अनुभूति हो सके और उसे धारण कर अपने मन को पवित्र कर सकें पर लोग इस बात को नहीं समझते। उन्हें तो बस चमत्कार चाहिए। अगर कोई खाली पत्थर भी चमत्कारी घोषित कर दिया जाये तो लोग उसे पूजने लगेंगे। विश्वास और श्रद्धा किसी के मन में नहीं दिखाई देती बस चमत्कार और आकर्षण की आस में इधर-उधर भटकते हैं।

Sunday, October 28, 2007

शब्द जो बारूद बन गए

हमने कुछ कहा
उन्होने कुछ और सुना
समझा कुछ और
लोगों को कुछ और बताने लगे
शहर में हो रही थी चर्चा
हमारे कहे की
जो शब्द हमने कहे ही नहीं
लोग हमें बताने लगे
दिल से उनकी भलाई के लिए
बोले गए शब्द ही हमें
शहर में बदनाम कराने लगे
हम जलते रहे उस आग में
जिसे लोग हमारी चिगारी
से लगी जताने लगे
हम सोचते हैं लोगों से
कोई शब्द बोलने से तो अच्छा है
खामोशी ओढ़ लें
ऐसे कीमती शब्द उन्हें देने से क्या फ़ायदा
जो बारूद बनाकर हमें ही उडाने लगे

Thursday, August 16, 2007

संत कबीर वाणी:परमार्थ है पीपल समान

स्वारथ सूका लाकडा, छाँह बिहूना सूल
पीपल परमारथ भजो, सुख सागर को मूल

संत शिरोमणि कबीरदास कहते हैं कि स्वार्थ तो सूखे लक्कड़ के समान है, जिसमें न तो छाया मिलती है और न ही सुख, बल्कि कांटे के समान कष्टदायी है। परमार्थ और सदाचार पीपल के वृक्ष के समान है जो सदैव सबको सुख-शांति प्रदान करता है। अत परमार्थ के मार्ग का अनुसरण करो।

चाणक्य नीति:बिना पूछे दान देना

१.पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत शेष जल विकारों से युक्त हो जाता अत: उसे उपयोग में लाना अत्यंत निकृष्ट होता है। पत्थर पर चंदन घिसकर लगाना और अपना ही मुख पानी में देखना भी अशुभ माना गया है।
२.बिना बुलाए किसी के घर जाने की बात, बिना पूछे दान देना और दो व्यक्तियों के बीच वार्तालाप में बोल पडना भी अधर्म कार्य माना जाता है।
३.शंख का पिता रत्नों की खदान है। माता लक्ष्मी है फिर भी वह शंख भीख माँगता है तो उसमें उसके भाग्य का ही खेल कहा जा सकता है।
४.उपकार करने वाले पर प्रत्युपकार, मारने वाले को दण्ड दुष्ट और शठ के सख्ती का व्यवहार कर ही मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है। 1

Friday, August 10, 2007

चाणक्य नीति: जीवन में आडम्बर भी जरूरी

  1. राजा, बालक, दुसरे का कुत्ता, मूर्ख व्यक्ति, सांप, सिंह और सूअर इन सात जीवों को सोते हुए से कभी नहीं जगाना चाहिए, इन्हें जगाने से मनुष्य को हानि ही हो सकती है लाभ नहीं। इनके आक्रमण करने से अपनी रक्षा करना कठिन होगा। अत: अच्छा यही है यदि वह सो रहे हैं तो उन्हें सोता छोड़ आगे बढ जाना चाहिए।
  2. जो व्यक्ति निस्तेज यानी प्रभावहीन है न तो उसके प्रसन्न होने पर किसी व्यक्ति को अर्थ की प्राप्ति होती है न ही नाराजगी पर किसी सजा का भय ही प्रतीत होता है। जिसकी कृपा होने पर पुरस्कार न मिलता हो और न ही जो किसी को दण्ड देने का अधिकारी हो ऐसा व्यक्ति रुष्ट भी हो जाये तो कोई उसकी चिंता नहीं करता।
  3. आज के युग में आडम्बर का अपना अलग ही महत्व है। वह झूठ भी हो तो भी आदमी को कुछ न कुछ लाभ मिल ही जाता है। सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह मुख तो फैला ही देता है जिससे लोग भयभीत होकर पीछे त जाते हैं। उसकी फुफकार ही दूसरों को डराने और अपनी रक्षा करने में पर्याप्त होती है। यदि सर्प अपने फन भी न फैलाये तो कोई बच्चा भी मार डालेगा। इसलिये कुछ न कुछ आडम्बर करना हर प्राणी के लिए आवश्यक है।

Sunday, August 5, 2007

चाणक्य नीति: एक से भले दो होते हैं

NARAD:Hindi Blog Aggregator

  1. संसार के दुखों से दुखित पुरुष को तीन ही स्थान पर थोडा विश्राम मिलता है- वह हैं संतान, स्त्री और साधू
  2. राजा की आज्ञा, पंडितों का बोलना और कन्यादान एक ही बार होता है।
  3. एक व्यक्ति का तपस्या करना, दो का एक साथ मिलकर पढ़ना, तीन का गाना, चार का मिलकर राह काटना, पांच का खेती करना और बहुतों का मिलकर युद्ध करना
  4. पक्षियों में कोआ, पशुओं में कुत्ता और मुनियों में पापी चांडाल होता है पर निंदा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल होता है।

Thursday, August 2, 2007

चाणक्य वाणी: संतोष नन्दन वन और विद्या कामधेनु के समान

NARAD:Hindi Blog Aggregator
  1. क्रोध यमराज के समान है, उसके कारण मनुष्य मृत्यु की गोद में चला जाता है।
  2. तृष्णा वैतरणी नदी की तरह है जिसके कारण मनुष्य को सदैव कष्ट उठाने पड़ते हैं।
  3. विद्या कामधेनु के समान है । मनुष्य अगर भलीभांति शिक्षा प्राप्त करे को वह कहीं भी और कभी भी फल प्रदान कर सकती है।
  4. संतोष नन्दन वन के समान है। मनुष्य अगर अपने अन्दर उसे स्थापित करे तो उसे वैसे ही सुख मिलेगा जैसे नन्दन वन में मिलता है।
  5. रुप की शोभा गुण है। अगर गुण नहीं है तो रूपवान स्त्री और पुरुष भी कुरूप लगने लगता है।
  6. कुल की शोभा शील मैं है। अगर शील नहीं है तो उच्च कुल का व्यक्ति भी नीच और गन्दा लगने लगता है।
  7. विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।
  8. धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ

Saturday, July 21, 2007

चाणक्य वाणी: तिनकों की एकता

NARAD:Hindi Blog Aggregator
  1. एकता में बहुत शक्ति होती है। बिखरे हजारों तिनकों को हाथी रौंद डालता है, वह सब मिलकर ढाका के रुप में उसे वश में कर लेते हैं। तलवार का वार भी वर्षा के मेघ तृण समूह को काट नहीं सकता।
  2. जल में तेल पड़ते ही थोडी मात्रा में विस्तार आ जाता है।
  3. दुष्ट व्यक्ति से कही गुप्त बात बिजली की गति से फैलती है।

Sunday, July 15, 2007

संत कबीर वाणी: सोया सौ निष्फल गया

NARAD:Hindi Blog Aggregator
सोया सौ निष्फल गया, जागा सो फल लेहि
साहिब हक्क न राखसी, जब मांगे तब देहि
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो सो गया उसने सब खो दिया। जो समय सोने में गया वह सब व्यर्थ गया और जो जाग गया, सो पा गया। जागने के समय का अवश्य ही फल भोगा। ईश्वर का यह विधान है जो जैसा करेगा वैसा पायेगा। जो मागेगा उसे जरूर मिलेगा।

Saturday, July 14, 2007

चाणक्य वाणी:मन की लगाव के बिना आत्मीयता होना कठिन

NARAD:Hindi Blog Aggregator

  1. जिसके प्रति सच्चा प्रेम हैं वह दूर रहते हुए भी समीप रहता है। इसके विपरीत जिससे लगाव नहीं है वह आदमी पास रहते हुए भी दूर रहता है। यह एक वास्तविकता है कि मन के लगाव के बिना आत्मीयता का भाव बन ही नहीं सकता है।
  2. जिस किसी व्यक्ति से मिलने की संभावना है उससे सदैव मधुर व्यवहार करना चाहिऐ। उदाहरण के लिए मृग का शिकार करने की इच्छा रखने वाला चालाक शिकारी उसके आसपास रहकर मधुर स्वर में गीत गाता रहता है ।
  3. अगर तुम्हें लोगों में अपना सम्मान बनाए रखना है तो किसी के सामने किसी की बुराई नहीं करो .

Friday, July 13, 2007

संत कबीर वाणी: गंगा जल शीतल भया

NARAD:Hindi Blog Aggregator
कुटिल वचन नहिं बोलिए, शीतल बैन ले चीन्हि
गंगा जल शीतल भया, परबत फोडा तीन्हि
कभी भी कड़वे वचन मत बोलो, शीतल वचनों को समझो तथा उन्हीं का प्रयोग करो। पावन गंगा जल को देखो। उस शीतल जल ने पर्वत फोड़कर अपना मार्ग भी बना लिया, अर्थात मधुर वचनों द्वारा कठोर हृदय वाले व्यक्ति को भी अपने अनुकूल बनाकर कार्य सिद्ध कर सकते हैं।

विशिष्ट पत्रिकायें