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Sunday, October 28, 2007

शब्द जो बारूद बन गए

हमने कुछ कहा
उन्होने कुछ और सुना
समझा कुछ और
लोगों को कुछ और बताने लगे
शहर में हो रही थी चर्चा
हमारे कहे की
जो शब्द हमने कहे ही नहीं
लोग हमें बताने लगे
दिल से उनकी भलाई के लिए
बोले गए शब्द ही हमें
शहर में बदनाम कराने लगे
हम जलते रहे उस आग में
जिसे लोग हमारी चिगारी
से लगी जताने लगे
हम सोचते हैं लोगों से
कोई शब्द बोलने से तो अच्छा है
खामोशी ओढ़ लें
ऐसे कीमती शब्द उन्हें देने से क्या फ़ायदा
जो बारूद बनाकर हमें ही उडाने लगे

1 comment:

Mired Mirage said...

बहुत बढ़िया भाव हैं । सच में 'ऐसे कीमती शब्द उन्हें देने से क्या फ़ायदा '? बिल्कुल सही लिखा है । जो शब्दों का मूल्य ,भावनाएँ ,व उनके जीवन्त होने को ना समझ पाएँ उनपर शब्द बर्बाद करने से कोई लाभ नहीं है ।
घुघूती बासूती

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