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Friday, November 2, 2007

भक्ति में विश्वास और चमत्कार की आस-चिंतन

रात का समय.......धीरे-धीरे दिन अपने कोलाहल को समेट रहा कर जा रहा है और रात का अंधियारा अपने साथ ला रहा है चिंतन के लिए अनमोल पल जो हृदय की जिज्ञासा को शांत कराने के लिए सुविधाजनक होते हैं। रात की शांति दिनभर के कोलाहल का विश्लेषण करने के करने का अवसर प्रदान करती हैं।

चिंतन नहीं करूंगा चिंता शुरू हो जायेगी। आख़िर क्या फर्क है चिंतन और चिन्ता में? दिन भर मैंने जो किया या मेरे साथ हुआ उस पर दृष्टिपात कराने का प्रयास करता हूँ। इसमें अपने 'मैं' को हटा लेता हूँ क्योंकि अगर ऐसा नहीं करूंगा तो केवल हर घटना का केवल ऐक ही पक्ष देख पाऊँगा और अपनी गलतियाँ नही दिखाईं देंगीं, हर बार अपना ही सही पक्ष देखने का प्रयास करूगा। अपने से जुडे घटना से मैं' को अलग आकर देखना चिंतन है और जब उसमें मैं जोड़ कर रखेंगें तो चिन्ता शुरू हो जायेगी। हम न भी चाहें तो दोनों में से काम तो होगा ही क्योंकि हमारे अन्दर मन, बुद्धि और अंहकार ऎसी प्रकृतियां जो अपना काम करेंगी ही हम चाहे या न चाहे।

हुआ यह कि मैं कुछ दिन पहले ऐक मंदिर में गया। उस मंदिर में अक्सर जाता हूँ। यह मंदिर शहर के मध्य भाग में स्थित है और इसके चारों और ऐक बहुत बडा पार्क है। यह मंदिर बहुत पुराना और आज भी देखने में आकर्षक है पर वहाँ लोगों कम ही आते हैं। शहर में अन्य भी अनेक आकर्षक मंदिर हैं और यह उनसे कम नहीं है, पर क्योंकि इसके पास लोगों की रिहायश कम है और शायद यही कारण है कि प्रसाद और माला के लिए दुकाने कम होने से लोग यहाँ कम आते हैं। मंदिर के चारों और बने पार्क में बहुत संख्या में घुमते हैं पर उस मंदिर में फिर भी नहीं जाते क्योंकि भगवान के दरबार में जाने वाले लोगों के मन में प्रसाद और माला ले जाने की इच्छा होती है और कोई अपने घर या बाजार से लेने की बजाय उसी जगह खरीदना चाहता है जहाँ मंदिर स्थित होता है और चूंकि इसके आसपास सरकारी नियंत्रण इतना कडा है कि कोई अतिक्रमण कर वहां दुकान बना ही नही सकता। हालांकि पार्क की दृष्टि से यह अच्छा भी है कि वहाँ किसी प्रकार का गंदगी नहीं होती।मैं अपने परिवार के साथ वहां जाता हूँ पर मंदिर में अकेला ही जाता हूँ कोई साथ नहीं चलता। क्योंकि उस मंदिर के सिद्ध होने की चर्चा कहीं भी नहीं होती है और अपने देश के लोगों का नियम है जिसमें चमत्कार कराने की शक्ति नही होती उसे नमस्कार नही करते। वैसे तो कोई चमत्कार नहीं करता पर उसके लिए प्रसिद्ध तो उसे होना ही चाहिए भले ही उसके पीछे पाखंड होता हो ।

बहरहाल उस दिन जब मैं वहाँ पहुंचा तो भारी भीड़ थी तो मुझे आश्चर्य हुआ। अचानक हमारी श्रीमती जी बोली आज इस मंदिर में भगवान जी की मूर्ति को करोडों रुपये के जेवर पहनाये जायेंगे, इसलिए लोग उसे अधिक संख्या में आ रहे हैं। यह गहने बहुत दिन से कहीं रखें हुए थे और इन्हें बरसों से पहनाया नहीं गया।'

मैं हैरान रह गया. जिनके भगवान् के दर्शन आसानी से कर लेता था उनके लिए मुझे हजार लोगों की लाइन में खडा होना था। वहाँ मेरा एक मित्र-जो अपनी पत्नी को दर्शन कराने के लिए लाया था- भी मिल गया और बोला-"चलो लाइन में लगते हैं।"
मैंने कहा-'नहीं मैं तो बाहर से हाथ जोड़कर जा रहा हूँ। मैं तो शनिवार को अक्सर आता हूँ।'

तो वह बोला-''कल तो गहने उतार लिए जायेंगे। आज खास दिन है, इसलिए गहने पहनाये गए हैं और लोग वही गहने देखने के लिए आ रहे हैं।'

मैंने कहा-''यह मेरी श्रद्धा का मामला है। मैं तो इस मंदिर में ध्यान लगाने जाता हूँ। गहनों में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं है। इतनी भीड़ में खड़े होने के लिए मेरा अंतर्मन इजाजत नहीं देता।'

तब उसने मेरी और अपनी पत्नी को लाइन में खड़े होकर दर्शन करने का सुझाव दिया। मेरी स्वीकृति से पहले ही दोनों एक स्वर में बोलीं-''हाँ हम जाते हैं।"
मैंने और मेरे मित्र ने बाहर से हाथ जोड़कर अपने भाव व्यक्त किये और दूर खड़े होकर नजारा देखने लगे। इतनी भीड़ देखकर मैंने अपने मित्र से कहा-' भगवान् की मूर्ति पूजने से मानसिक लाभ होते हैं यह तो मैं भी मानता हूँ, पर इस तरह गहने पहनाना और उसे देखने के लिए लोगों की आतुरता देखकर तो यही लगता है कि लोग अपने धर्म और आध्यात्म को समझते ही नहीं।'
मेरे मित्र ने कहा-''लोगों को यह पता ही नहीं है कि धर्म है क्या? वह तो केवल कर्मकांडों को कर यही समझते हैं कि वही धर्म हैं। असल में मैं तुम्हारी इस बात से सहमत हूँ जो तुम अक्सर कहते हों कि झगडा धर्मों का नहीं बल्कि कर्मकांडों का है,इस बात से सहमत हूँ।लोग पूजा और दर्शन केवल औपचारिकतावश ही कर यह सोचते हैं कि हो गया धर्म का निर्वाह।'

लोग हजारों की संख्या में आ रहे थे और सबके जुबान पर गहनों की बात थी। उस दिन मैं पहली बार यह देख रहा था कि भक्त नहीं बल्कि दर्शक आ रहे थे। वह जो सब खेल रचता है उसे ही खिलौना समझने की गलती कर रहे थे। दोनों स्त्रियाँ लाइन के बीच में घुसकर दर्शन करे आयीं। उसके बात हम घर लौटे। सच बात है कि भगवान की मूर्तियों को पूजने का लाभ तभी है जब उसे अपने मन में धारण करें। विभिन्न धातुओं या पत्थरों को तराश कर उनमें मानवीय अंगों की आकृति रचकर मूर्तियों को इसलिए बनाया गया है कि उनमें जीवन्तता की अनुभूति हो सके और उसे धारण कर अपने मन को पवित्र कर सकें पर लोग इस बात को नहीं समझते। उन्हें तो बस चमत्कार चाहिए। अगर कोई खाली पत्थर भी चमत्कारी घोषित कर दिया जाये तो लोग उसे पूजने लगेंगे। विश्वास और श्रद्धा किसी के मन में नहीं दिखाई देती बस चमत्कार और आकर्षण की आस में इधर-उधर भटकते हैं।

2 comments:

बाल किशन said...

अगर कोई खाली पत्थर भी चमत्कारी घोषित कर दिया जाये तो लोग उसे पूजने लगेंगे। विश्वास और श्रद्धा किसी के मन में नहीं दिखाई देती बस चमत्कार और आकर्षण की आस में इधर-उधर भटकते हैं।
वह साहब क्या बात कही है. लेकिन सर एक बात कहना चाहूँगा ये चमत्कार और आकर्षण की आस भक्ति और श्रद्धा से ही आती है.

परमजीत बाली said...

सही कहा है-


''लोगों को यह पता ही नहीं है कि धर्म है क्या? वह तो केवल कर्मकांडों को कर यही समझते हैं कि वही धर्म हैं। असल में मैं तुम्हारी इस बात से सहमत हूँ जो तुम अक्सर कहते हों कि झगडा धर्मों का नहीं बल्कि कर्मकांडों का है,इस बात से सहमत हूँ।लोग पूजा और दर्शन केवल औपचारिकतावश ही कर यह सोचते हैं कि हो गया धर्म का निर्वाह।'

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