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हिंदी मित्र पत्रिका

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Tuesday, April 21, 2009

चाणक्य नीतिः महल के शिखर पर बैठने से कौआ गरुड़ नहीं हो जाता।

न निर्मितः केन न दृष्टपूर्वः न श्रूयते हेममयः कुरंगः।
तथापि तृष्णा रघुनंदनस्य विनाशकाले विपरीत बुद्धि।।

हिंदी में भावार्थ- न तो किसी ने पहले ही सोने का मृग बनाया न ही किसी ने सुना तब भी भगवान श्रीराम जैसे अवतारी पुरुष के मन में उसे पाने की इच्छा हुई। सही कहते हैं कि विनाशकाल में बुद्धि विपरीत हो जाती है।
गुणैरुत्तमतां याति नोच्चैरासनसंस्थिताः।
प्रासादशिखरस्थोऽपि काकः किं गरुडावते।।
हिंदी में भावार्थ-
गुण की वजह से कोई ऊंचा कहलाता है न कि उच्च स्थान पर विराजमान होने से ही सम्मान पाया जा सकताहै। महल के शिखर पर बैठने से कौआ गरुड़ नहीं हो जाता।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-उच्च पद, धन या बाहूबल से संपन्न व्यक्तियों से समाज का बहुत बड़ा वर्ग डरता है। इसी कारण लोग उनके सामने होने पर उनकी झूठी प्रशंसा जरूर करते हैं पर इससे उनको बड़ा आदमी नहीं मान लेना चाहिये। जब तक बड़े आदमी में छोटे के प्रति उदारता और सम्मान का भाव नहीं है उसका समाज के लिये केाई महत्व नहीं है किसी आदमी में दया, दान, उदारता और दूसरों की सहायता के लिये तत्पर रहने का गुण नहीं है तब तक वह अपने आपको कितना भी बड़ा समझे पर यह उसका वहम हैं। सच बात ेतो यह है कि जो अपने गुण से सभी प्रकार के लोगों का हृदय प्रसन्न कर देता है वही गुणवान बड़ा आदमी है। उच्च पद, पैसा और प्रतिष्ठा दांव पैंच से अर्जित किये जा सकते हैं पर समाज का हृदय केवल अपने गुणों से ही जीता जा सकता है।

मन की तृष्णा मनुष्य को इधर से उधर नचाती है-इसलिये वह असंभव से चीजों को अपना लक्ष्य बना लेता है। मन की तृष्ण का यह हाल है कि सामान्य इंसान की बात तो छोड़िये भगवान श्रीराम जैसे गुणी भी उस स्वर्णमय हिरन के पीछे दौड़ पड़े जो पहले कभी नहीं बना न सुना गया। तृष्णा ने उनको भ्रम में डाल दिया।
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Thursday, April 9, 2009

चाणक्य नीतिः दुष्ट मित्र से अच्छा है मित्रविहीन रहना

वरं न राज्यं कुराजराज्यं वरं न मित्रं न कुमित्रमित्रम्।
वरं न शिष्यो कुशिष्यशिष्यो वरं न दारा न कुदारदारा।।

हिन्दी में भावार्थ-अयोग्य राजा के राज्य में रहने से अच्छा है राज्यविहीन राज्य में रहना। दुर्जन मित्र से अच्छा है कोई मित्र ही न हो। मूर्ख शिष्य से किसी शिष्य का न होना ही अच्छा है। बुरे विचारों से वाली नारी से अच्छा है साथ में कोई नारी ही न हो।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-व्यक्ति को अपने जीवन में संगत न मिले पर उसे कुसंग नहीं करना चाहिये। कहते हैं कि गुण ही गुणों को बरतते हैं। जिस तरह की संगत वाले लोग होते हैं वैसे ही वह व्यवहार करते हैं। उनकी वाणी और दृष्टि की अपवित्रता का प्रभाव स्वाभविक रूप से उनकी संगत करने वाले पर होता है। अक्षम, अयोग्य, और बकवाद करने वाला संगी साथी हो तो वह अपने दुष्प्रभाव से जीवन को नरक बना देता है।
मित्रता करने के विषय में लोग अत्यंत लापरवाह होते हैं। कहते हैं कि ‘दुष्ट और नकारा मित्र हो तो हमें क्या फर्क पड़ता है।’ यह सोचना स्वयं को ही धोखा देना है। जिन लोगों के साथ हम रहते हैं उनकी छबि अगर खराब है तो निश्चित रूप से हमारी भी खराब होगी। कभी कभी तो ऐसा भी होता है कि उनके साथ रहने पर उनके ही किये अपराध में हमारा सहयोग होने का संदेह लोगों को होता है। ऐसी अनेक घटनायें हो चुकी हैं जिसमें कपटी, दुष्ट और अपराधी मित्र का दुष्परिणाम उनके मित्रों को ही भोगना पड़ता है।
जिस तरह आजकल छल कपट की प्रवृत्ति बढ़ रही है उसके देखते हुए तो और अधिक सतर्क रहने की आवश्यकता है मगर इसके विपरीत लोग चाहे जिसे अपना मित्र बनाकर अपने लिये संकट का आमंत्रण देते हैं।
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Tuesday, April 7, 2009

चाणक्य नीतिः पेट खराब होने पर भोजन विष जैसा लगता है

अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्।।

हिंदी में भावार्थ-अगर शास्त्र का निंरतर अभ्यास न करना, पेट खराब होने पर भोजन करना, दरिद्र व्यक्ति के लिये सभा में जाना और वृद्ध पुरुष के लिये युवा स्त्री विष की तरह होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में हर व्यक्ति किसी किसी प्रकार की पुस्तकों से शिक्षा प्राप्त करता है। शिक्षा प्राप्त करने का उसका उद्देश्य ज्ञान और रोजगार प्राप्त करना-दोनों ही या दोनों में से कोई एक-हो सकता है। ऐसे में उसे अपनी पुस्तकों या शास्त्रों का नियमित अभ्यास करते रहना चाहिये। अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसके लिये अलाभकर स्थिति हो जाती है। एक तो वह पूर्ण रूप से अपने विषय या ज्ञान में पारंगत नहीं हो पाता जिसकी वजह से उसे सफलता नहीं मिलती और मन अशांत रहता है दूसरा यह कि उसे पहले पढ़े हुए विषय दिमाग में घूमते रहते हैं और कुछ नया सोच ही नहीं सकता। इस तरह उसके जीवन के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। वैसे आजकल इंसान के लिये स्वतंत्र रूप से अपने व्यवसाय करना कठिन हो गया है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद अगर आदमी को उससे संबंधित रोजगार न मिले तो उसका अभ्यास नहीं रह जाता। आजकल रोजगार की जो स्थिति है उससे तकनीकी, विज्ञान, वाणिज्य तथा साहित्य विषयों में उपाधियां प्राप्त करने वाले सभी लोगों को उससे संबंधित काम नहीं मिल पाता और अनेक लोगों को जीवन यापन के लिये जब उसे कोई अन्य नौकरी या व्यवसाय करना पड़ता है पर अपनी पूर्व शिक्षा के कारण उनको बहुत मानसिक कष्ट होता है। तब उन्हें अपना जीवन ही विषैला लगता है।
उसी तरह अगर कोई ज्ञान जीवन के लिये प्राप्त किया है तो उसका निंरतर अभ्यास करना चाहिये ताकि वह याद रहे और समय आने पर उस ज्ञान से हम अपनी रक्षा कर सकें।
यही स्थिति भोजन की है। जब हमारा पेट खराब हो तब भोजन नहीं करना चाहिये। ऐसे में अगर जबरन भोजन किया तो अपना स्वास्थ्य अधिक बिगड़ जाता है। वैसे भी कहते हैं कि भूख से कम, खाने से लोग अधिक बीमार पड़ते हैं। शरीर की बीमारियों का मुख्य कारण पेट का खराब होना ही है।
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Sunday, March 29, 2009

चाणक्य नीतिः अपने धर्म, समुदाय, विश्वास और वर्ग को बदलें नहीं

आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।

कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में मेें कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है।
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Monday, December 8, 2008

चाणक्य सन्देश: उपकार का बदला चुकाकर होती हैं सुरक्षा

1.पाँव धोने का जल और संध्या के उपरांत शेष जल विकारों से युक्त हो जाता अत: उसे उपयोग में लाना अत्यंत निकृष्ट होता है। पत्थर पर चंदन घिसकर लगाना और अपना ही मुख पानी में देखना भी अशुभ माना गया है।
२.बिना बुलाए किसी के घर जाने की बात, बिना पूछे दान देना और दो व्यक्तियों के बीच वार्तालाप में बोल पडना भी अधर्म कार्य माना जाता है।
३.शंख का पिता रत्नों की खदान है। माता लक्ष्मी है फिर भी वह शंख भीख माँगता है तो उसमें उसके भाग्य का ही खेल कहा जा सकता है।
४.उपकार करने वाले पर प्रत्युपकार, मारने वाले को दण्ड दुष्ट और शठ से सख्ती का व्यवहार कर ही मनुष्य अपनी रक्षा कर सकता है।

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Wednesday, November 26, 2008

चाणक्य सन्देश : विरोधी संस्कार वालों का मेल नहीं होता

1.मन की शुद्ध भावना से यदि लकड़ी, पत्थर या किसी धातु से बनी मूर्ति की पूजा की जायेगी तो सब में व्याप्त परमात्मा वहां भी भक्त पर प्रसन्न होंगें। अगर भावना है तो जड़ वस्तु में भी भगवान का निवास होता है ।

2.इस क्षण-भंगुर संसार में धन-वैभव का आना-जाना सदैव लगा रहेगा। लक्ष्मी चंचल स्वभाव की है। घर-परिवार भी नश्वर है। बाल्यकाल, युवावस्था और बुढ़ापा भी आते हैं और चले जाते हैं। कोई भी मनुष्य उन्हें सदा ही उन्हें अपने बन्धन में नहीं बाँध सकता। इस अस्थिर संसार में केवल धर्म ही अपना है। धर्म का नियम ही शाश्वत है और उसकी रक्षा करना ही सच्चा कर्तव्य है।

3.सच्ची भावना से कोई भी कल्याणकारी काम किया जाये तो परमात्मा की कृपा से उसमें अवश्य सफलता मिलेगी। मनुष्य की भावना ही प्रतिमा को भगवान बनाती है। भावना का अभाव प्रतिमा को भी जड़ बना देता है।

4.विद्या की शोभा उसकी सिद्धि में है । जिस विद्या से कोई उपलब्धि प्राप्त हो वही काम की है।

5.धन की शोभा उसके उपयोग में है । धन के व्यय में अगर कंजूसी की जाये तो वह किसी मतलब का नहीं रह जाता है, अत: उसे खर्च करते रहना चाहिऐ।
6.तेल में जल नहीं मिल सकता, घी में जल नहीं मिलता. पारा किसी से नहीं मिल सकता। इसी प्रकार विपरीत स्वभाव और संस्कार वाले एक दूसरे से नहीं मिल सकते।

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Monday, October 13, 2008

चाणक्य सन्देश:कभी कभी आडम्बर भी काम आता है

१. राजा, बालक, दुसरे का कुत्ता, मूर्ख व्यक्ति, सांप, सिंह और सूअर इन सात जीवों को सोते हुए से कभी नहीं जगाना चाहिए, इन्हें जगाने से मनुष्य को हानि ही हो सकती है लाभ नहीं। इनके आक्रमण करने से अपनी रक्षा करना कठिन होगा। अत: अच्छा यही है यदि वह सो रहे हैं तो उन्हें सोता छोड़ आगे बढ जाना चाहिए।
२. जो व्यक्ति निस्तेज यानी प्रभावहीन है न तो उसके प्रसन्न होने पर किसी व्यक्ति को अर्थ की प्राप्ति होती है न ही नाराजगी पर किसी सजा का भय ही प्रतीत होता है। जिसकी कृपा होने पर पुरस्कार न मिलता हो और न ही जो किसी को दण्ड देने का अधिकारी हो ऐसा व्यक्ति रुष्ट भी हो जाये तो कोई उसकी चिंता नहीं करता।
३. आज के युग में आडम्बर का अपना अलग ही महत्व है। वह झूठ भी हो तो भी आदमी को कुछ न कुछ लाभ मिल ही जाता है। सर्प के मुख में विष न हो तो भी वह मुख तो फैला ही देता है जिससे लोग भयभीत होकर पीछे जाते हैं। उसकी फुफकार ही दूसरों को डराने और अपनी रक्षा करने में पर्याप्त होती है। यदि सर्प अपने फन भी न फैलाये तो कोई बच्चा भी मार डालेगा। इसलिये कुछ न कुछ आडम्बर करना हर प्राणी के लिए आवश्यक है

४. संसार के दुखों से दुखित पुरुष को तीन ही स्थान पर थोडा विश्राम मिलता है- वह हैं संतान, स्त्री और साधू
५. राजा की आज्ञा, पंडितों का बोलना और कन्यादान एक ही बार होता है।
६. एक व्यक्ति का तपस्या करना, दो का एक साथ मिलकर पढ़ना, तीन का गाना, चार का मिलकर राह काटना, पांच का खेती करना और बहुतों का मिलकर युद्ध करना
७. पक्षियों में कोआ, पशुओं में कुत्ता और मुनियों में पापी चांडाल होता है पर निंदा करने वाला सबसे बड़ा चांडाल होता है।
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