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Thursday, June 11, 2009

विदुर नीति:मौन रहने से सत्य बोलना ठीक रहता है

  1. बोलने से न बोलना अच्छा बताया गया है, किन्तु सत्य बोलना भी एक गुण है। चुप या मौन रहने से सत्य बोलना दो गुना लाभप्रद है। सत्य मीठी वाणी में बोलना तीसरा गुण है और धर्म के अनुसार बोला जाये यह उसका चौथा गुण है।
  2. मनुष्य जैसे लोगों के साथ रहता है और जिन लोगों की सेवा में रहता है और जैसी उसकी कामनाएं होतीं है वैसा ही वह हो भी जाता है।
  3. मनुष्य जिन विषयों से मन हटाता है उससे उसकी मुक्ति हो जाती है। इस प्रकार यदि सब और से निवृत हो जाये तो उसे कभी भी दुख प्राप्त नहीं होगा।
  4. जो न तो स्वयं किसी से जीता जाता है न दूसरों को जीतने के इच्छा करता है न किसी से बैर करता और न दूसरे को हानि पहुंचाता है और अपनी निंदा और प्रशंसा में भी सहज रहता है वह दुख और सुख के भाव से परे हो जाता है।

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Saturday, April 4, 2009

सर्च इंजिनों में छायी रही रामनवमी-संपादकीय

रामनवमी के दिन सुबह अंतर्जाल पर दिलचस्प अनुभव हुआ। अपने आप में यह अनुभव बहुत सुखद था। सबसे पहला यह अनुभव तो यह था कि किसी दिन अगर कोई भारतीय पर्व है तो उस दिन उसके नाम से सर्च इंजिन पर खोज सुबह से ही प्रारंभ हो जाती है। ऐसे में अपने उससे संबंधित पुराने पाठ सामने ही कांउटर पर चमकने लगते हैं। रामनवमी के दिन भगवान श्री राम और रामनवमी के नाम से हिंदी और अंग्रेजी शब्दों के साथ सर्च इंजिनों पर खोज की गयी। ऐसे में इस लेखक के ब्लाग पर कम से कम पांच पाठ ऐसे थे जो पूरे दिन पाठकों के दृष्टिपथ में आये।

दो वर्ष पूर्व रामनवमी पर एक पाठ इस लेखक ने लिखा था जो कृतिदेव में होने के कारण पढ़ा नहीं जा सकता था और उसे पिछले साल यूनिकोड से परिवर्तित कर पुनः प्रकाशित किया। इसके अलावा पिछले ही वर्ष रामनवमी पर लिखा गया आलेख भी निरंतर इस वर्ष निरंतर पढ़ा जाता रहा। यह दोनों पाठ ब्लाग स्पाट के ब्लाग/पत्रिका अनंत शब्दयोग पर थे और कल इनकी वजह से जितने पाठकों ने पढ़ा उतने आम तौर से सामान्य दिनों में पाठक नहीं पढ़तें। इसके अलावा वर्डप्रेस के ब्लाग पर तो भी भगवान श्रीराम पर दिपावली और अन्य अवसरों पर लिखे गये आलेख चमकते दिख रहे थे। संत कबीरदास और रहीम के संदेशों में जहां भगवान श्रीराम के नाम का उल्लेख है उन पर भी कल पाठक अधिक थे।
इन पाठों पर सुबह ही इतने पाठक देखकर विचार आया कि नया लेख लिखने की बजाय इसे ही अपडेट किया जाये। ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस पर यह एक सुविधा है कि आप अपने पुराने पाठ नयी तारीख में अपडेट कर सकते हैं। तब लगा कि अनंत शब्दयोग के पाठ को अपडेट किया जा सकता है। इस सुविधा का लाभ उठाया जा सकता है ताकि पाठकों को यह न लगे कि वह कोई पुराना लेख पढ़ रहे है। दरअसल इससे कुछ अंतर नहीं पड़ता पर लोगों में अखबार और पत्र पत्रिकाओं ताजा पढ़ने की आदत पड़ गयी है कि वह यहां भी ताजा पढ़ना चाहते हैं। इसलिये अपडेट करते समय यह देख लिया कि उसमें कोई नयी बात जोड़ी जा सकती है तो जोड़ दें। बहरहाल उसे अपडेट किया। शाम को आकर देखा तो उस अकेले पाठ ने ही 58 पाठक जुटा लिये थे। अन्य पाठों को मिलाकर कुल 175 से अधिक पाठक भगवान श्रीराम पर लिखित पाठों पर आये। मजे की बात यह है कि हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर इस तरह के अपडेट नहीं पहुंचते और यही कारण है कि वहां से कोई पाठक नहीं आ सका। सारे पाठक सर्च इंजिनों से आये। इससे यह पता लगता है कि भगवान श्रीराम के प्रति हमारे देश के लोगों के कितने गहरी सीमा तक भक्ति का भाव है।
प्रसंगवश यह ब्लाग/पत्रिका कल ही दस हजार की संख्या आधिकारिक रूप से पार कर गया। वैसे यह ब्लाग दो वर्षों से सक्रिय है पर इस काउंटर पिछले साल ही लगाया गया। इसका सहधर्मी ब्लाग अंतर्जाल पत्रिका पहले ही दस हजार पार चुका है। इस ब्लाग पर संख्या प्रारंभ से ही अधिक रही है और वह निश्चित रूप से प्रदंह हजार से अधिक होगी पर प्रमाणिक रूप कल ही इसने यह संख्या पार की। यह पहला अध्यात्मिक ब्लाग बनाते समय ऐसा नहीं लगा था कि यह ब्लाग यात्रा इतनी दिलचस्प रहने वाली है। हां, इस ब्लाग/पत्रिका से यह अनुभूति इस लेखक को हुई अपने देश के लोग भले ही अन्य विषयों में लिप्त होते हैं पर जहां भी अध्यात्मिक विषय उनके सामने आता है वह अन्य विषय भूल जाते हैं।
सच बात तो यह है कि यह लेखक संपादक अपनी अध्यात्मिक रुचियों और टाईपिंग के ज्ञान का पूरा सुख उठाते हुए इस ब्लाग/पत्रिका पर अपने पाठ लिखता है। यह इंटरनेट की माया ही है कि अपने ही लिखे पाठ को लेखक भूलना भी चाहे तो भूल नहीं सकता क्योंकि पाठक ही उसे याद दिलाते हैं कि उसने क्या लिखा है? दो वर्ष पहले ही प्रारंभ में और फिर पिछले वर्ष ही भगवान श्रीराम पर लिखे गये आलेखों को लिखने का आनंद इस वर्ष अनुभव हुआ जब सुबह से पाठकों को सर्च इंजिन में उनको ढूंढते पाया। फिर अपडेट करने से वह पाठ नये भी लगने लगे साथ ही यह अनुभव हुआ कि लोगों के मन में अध्यात्मिकता के प्रति कितना गहरा लगाव है। इसलिये ही रामनवमी के दिन भगवान श्री राम और रामनवमी का नाम सर्चइंजिनों में उनका नाम छाया रहा।
बहरहाल इस अध्यात्मिक ब्लाग के दस हजार पाठक संख्या पार करने में इस लेखक का तो नहीं बल्कि भारतीय अध्यात्मिक के मनीषियों और उनके ज्ञान में रुचि रखने वाले श्रद्धालु लोगों का अधिक योगदान है। इस लेखक का तो बस इतना ही योगदान है कि वह लिखने का आनंद पहले ही उठा लेता है पढ़ने वालों के हिस्से में वह बाद में आता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की धारा अंतर्जाल पर बृहद रूप में बहती रहे ऐसी आशा हम सभी को करनी चाहिए।
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Friday, April 3, 2009

संत कबीर के दोहे-मन तो खाने में लालची और भजन में आलसी होता है

कबीर यह मन लालची, समझै नहीं गंवार।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी के मतानुसार मन खाने में एक तरह से लालची और भजन में आलसी होता है। वह एक गंवार की तरह है जो कोई बात समझना ही नहीं चाहता है।

कबीर मन परबत भया, अब मैं पाया जान
टांकी लागी प्रेम की, निकसी कंचन खान


संत कबीरदास जी के अनुसार अब मैं समझ पाया हूं कि मन तो पर्वत की तरह विशाल है। अगर इसमें प्रेम का टांका लगा दिया जाये तो सोने का भंडार मिलता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे प्राचीन अध्यात्मिक मनीषियों ने यह रहस्या बहुत पहले ही खोज निकाला कि मनुष्य ही नहीं बल्कि हर जीव अपने मन से संचालित होता हैं। पांच तत्वों से बनी इस देह में तीन प्रकृतियां मन, बुद्धि और अहंकार रहती हैं और समय के अनुसार उनका कार्य भी होता हैं। मन को चंचल माना जाता है यही कारण है कि कोई भी जीव एक जगह स्थिर नहीं रह पाता। यह मन शक्तिशाली है इसलिये इस पर नियंत्रण रखा जाये तो जीवन सफल हो जाता है पर अगर इसके नियंत्रण में रहकर काम किया तो पूरा जीवन गुलाम की तरह बिताना पड़ता है। श्रीगीता के अनुसार गुण ही गुणों के बरतते हैं। अगर हम अपने मन में विलासिता, घृणा और लोभ के बीज बोंऐंगे तो उनके पीछे हम अपनी देह साथ ही ले जायेंगे जो कि अंततः हमारें दुःख का कारण बनेगा। उसी तरह अगर उसमें प्रेम, त्याग और विश्वास के बीज बोऐंगे तो उसका फल सुखद होगा। अतः मन को दृष्टा की तरह देखना चाहिये तभी उसे नियंत्रण में ला पायेंगे।
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Sunday, March 29, 2009

चाणक्य नीतिः अपने धर्म, समुदाय, विश्वास और वर्ग को बदलें नहीं

आत्मवर्ग परित्यन्य परवर्गे समाश्रितः।
स्वयमेव लयं याति यथा राजात्यधर्मतः।।

नीति विशारद चाणक्य कहते हैं कि अपना समूह,समुदाय वर्ग या धर्म त्याग कर दूसरे का सहारा लेने वाले राजा का नाश हो जाता है वैसे ही जो मनुष्य अपने समुदाय या धर्म त्यागकर दूसरे का आसरा लेता है वह भी जल्दी नष्ट हो जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- अक्सर लोग धर्म की व्याख्या अपने ढंग से करते हैं। अनेक लोग निराशा, लालच या आकर्षण के वशीभूत होकर धर्म में परिवर्तन कर दूसरा अपना लेते हैं-यह अज्ञान का प्रतीक है। दरअसल मनुष्य के मन में जो विश्वास बचपन में उसके माता पिता द्वारा स्थापित किया जाता है उसी को मानकर वह आगे बढ़ता जाता है। कहा भी जाता है कि माता पिता प्रथम गुरू होते हैं। उनके द्वारा मन में स्थापित संस्कार,आस्था तथा इष्ट के स्वरूप में बदलाव नहीं करना चाहिये। इसका कारण यह है कि बचपन से ही मन में स्थापित संस्कार और आस्थाओं से आदमी आसानी से नहीं छूट पाता-एक तरह से कहा जाये कि पूरी जिंदगी वह उनसे परे नहीं हो पाता।

कहा भी जाता है कि आदमी में संस्कार,नैतिकता और आस्था स्थापित करने का समय बाल्यकाल ही होता है। ऐसे में कुछ लोग निराशा, लालच,भय या आकर्षण की वजह से से अपने धर्म या आस्था में बदलाव लाते हैं पर बहुत जल्दी ही उनमें अपने पुराने संस्कार, आस्थाऐं और इष्ट के स्वरूप का प्रभाव अपना रंग दिखाने लगता है पर तब उनको यह डर लगता है कि हमने जो नया विश्वास, धर्म या इष्ट के स्वरूप को अपनाया है उसको मानने वाले दूसरे लोग क्या कहेंगे? एक तरफ अपने पुराने संस्कार और आस्थाओं की खींचने वाला मानसिक विचार और दूसरे का दबाव आदमी को तनाव में डाल देता है। धीरे धीरे यह तनाव आदमी की देह और मन में विकार पैदा कर देता है। इसलिये अपने अंदर बचपन से स्थापित संस्कार,आस्था और इष्ट के स्वरूप में मेें कभी बदलाव नहीं करना चाहिये बल्कि अपने धर्म के साथ ही चलते हुए सांसरिक कर्मों में निष्काम भाव से लिप्त होना चाहिये। भगवान श्रीकृष्ण ने भी श्रीगीता में कहा भी है कि अपना धर्म गुणहीन क्यों न हो पर उसका त्याग नहीं करें क्योंकि दूसरे का धर्म कितना भी गुणवान हो अपने लिये डरावना ही होता है।
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Friday, March 20, 2009

भर्तृहरि शतकः हंसों के मूल गुण को विधाता भी नहीं छीन सकता

अम्भोजिनी वनविहार विलासमेव हंसस्य हंति नितरां कुपितो विधाता।
न त्वस्य दुग्धवाभेदविधौ प्रसिद्धां वेंदग्ध्यकीर्तिमपहर्तुमसौं समर्थः

हिंदी में भावार्थ- अगर परमात्मा नाराज हो जाये तो वह हंसों का वनों में विहार करने से रोक सकता है लेकिन उनमें पानी और दूध को अलग अलग करने का जो स्वाभाविक गुण है उसे नष्ट नहीं कर सकता।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- श्रीगीता के संदेश के अनुसार भी जीव का जन्म परमात्मा की इच्छा से ही होता है पर पंच तत्वों से बनी देह में मन, अहंकार और बुद्धि से संचालन वह स्वयं करते हुए अपने कर्मों के फल के लिये दायी होता है। अधिकतर धर्मों के गुरु अपने भक्तों के सामने यह भ्रम पैदा करते हैं कि उनके कर्म और फल के लिये परमात्मा ही जिम्मेदार है, इसलिये वह केवल उसकी भक्ति करें। सच बात तो यह है कि इस तरह वह सांसरिक कर्मों से लोगों को विमुख करने का प्रयास करते हैंं पर साथ ही फिर अपनी दान दक्षिण के नाम उन्हें धन संग्रह के लिये भी प्रेरित करते हैं। व्यक्ति को नैतिकता, अंिहंसा और परोपकार का उपदेश तो सभी गुरु देते हैं पर उसके लिये प्रेरित करने का उनके पास कोई उपाय नहीं होता। बस प्रवचनों में उनकी बात सुनो फिर भूल जाओ फिर सुनने आओ-यह क्रम चलता रहता है।

जब कोई व्यक्ति अपना दुःख लेकर ऐसे गुरुओं के पास पहुंचता है तो यही कहते हैं कि ‘जैसी परमात्मा की मर्जी। हमें तो बस यह संसार देखना है।’ आदमी अपने गुणों और अवगुणों का अध्ययन कर अपने कर्म का निर्णय करे ऐसा उपाय कोई नहीं बताता। अगर यह देह है तो आदमी अपने स्वाभाविक गुणों के वशीभूत कर कोई न कोई कर्म करेगा पर ज्ञानी परिणाम और स्थिति देखकर कदम बढ़ाते है जबकि सामान्य आदमी बिना सोचे समझे कर्मफल पर दृष्टि रखते हुए आगे बढ़ता है और फिर परेशान होता है। आत्म मंथन किये बिना मनुष्य जब आगे बढ़ता है तो उसे सफलता मिलना कठिन हो जाती है। आत्म मंथन से आशय यह है कि अपने अंदर मौजूद गुणों और अवगुणों का अवलोकन करते हुए अपना लक्ष्य निर्धारित करना चाहिये। परमात्मा ने हमें कर्म करने की सारी शक्ति दी है इसलिये अपने कर्म की प्रेरणा के लिये उसकी तरफ ताकने की बजाय अपने गुणों के आधार पर लक्ष्य की तरफ बढ़ना चाहिये। सच बात तो यह है कि परमात्मा ने जिन गुणों को स्वाभाविक रूप से हमें सौंपा है उन्हें वह चाहकर भी वापस नहीं ले सकता क्योंकि वह फल को प्रदान तो करता है पर कर्र्म का निर्धारण जीव को स्वयं ही करना है।
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Friday, March 13, 2009

रहीम दर्शन: कथनी और करनी में भेद अज्ञान का प्रमाण

अनकीन्ही बातें करै, सोवत जागै जोय
ताहि सिखाय जगायबो, रहिमन उचित न होय

कविवर रहीम कहते हैं कि कई लोग ऐसे हैं जो कहते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। ऐसे लोग जागते हुए भी सोते हैं। ऐसे अहंकार व्यक्ति को सिखाना या जागृत करना बिल्कुल व्यर्थ है।

कदल सीप भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन
जैसी संगति बैठिए, तैसोई फल दीन

कविवर रहीम कहते हैं कि कि स्वाति नक्षत्र की वर्षा की बूंदें कदली में प्रवेश कर कपूर बना जाता है, समुद्र की सीपी में जाकर मोती का रूप धारण कर लेता है और वही जल सर्प के मुख में जाकर विष बन जाता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-इस संसार में ऐसे व्यक्तियों की अभाव नहीं है जो अपनी कथनी और करनी में भारी भेद प्रकट करते हुए थोड़ा भी संकोच अनुभव नहीं करते। एक तरफ वह आदर्श की बात करते हुए नहीं थकते पर दिन भर वह माया के फेरे में सारी नैतिकता को तिलांजलि देते हैंं। अगर ऐसा न होता तो इस देश में इतने सारे साधु और संत और उनके करोड़ों शिष्य हैं फिर भी पूरे देश मेंे अनैतिकता, भ्रष्टाचार, गरीबों और परिश्रमियों का दोहन तथा अन्य अपराधों की प्रवृतियों वाले लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। आजकल ईमादारी से संग्रह करना कठिन हो गया है। इसका आशय यह है कि जो कमा रहे हैं वही दान कर रहे हैं और अपने गुरुओं के आश्रमों में भी उपस्थिति दिखाते हैं। हर जगह धन सम्राज्य है पर माया से दूर रहने की बात सभी करते हैं। अपराधी हो या सामान्य आदमी भक्ति जरूर करते दिखते हैं। अपराधी अपने दुष्कर्म से बाज नहीं आता और सामान्य आदमी को अपने काम से ही समय नहीं मिलता। बातें सभी आदर्श की करते हैं। यही भेद है जिसके कारण देश में अव्यवस्था फैली है।

इसके अलावा सभी लोग भले आदमी से संगति तो करना ही नहीं चाहते। जो समाज को अपनी शक्ति से आतंकित कर सकता है लोग उससे अपने संपर्क बनाने को लालायित रहते हैं। वह सोचते हैं कि ऐसे असामाजिक तत्व समय पर उनके काम में आयेंगे पर धीरे-धीरे उनके संपर्क में रहते हुए उनका स्वयं का नैतिक आचरण पतन की ओर अग्रसर हो जाता है। संगति का प्रभाव होता है-यह बात निश्चित है। अगर किसी शराबी के पास कोई व्यक्ति बैठ जाये तो उसकी बातें सुनकर उसका स्वयं का मन वितृष्णा से भर जाता है और वही व्यक्ति किसी सत्संगी के पास बैठे तो उसमें अच्छे और सुंदर भावों का प्रवाह अनभूति कर सकता है। अतः अपने लिये हमेशा अच्छी संगति ही ढूंढना चाहिए।
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Wednesday, March 11, 2009

संत कबीर के दोहे: जीवन ऐसे ही जैसे समुद्र में नाव

अहं अगनि हिरदै, जरै, गुरू सों चाहै मान
जिनको जम नयौता दिया, हो हमरे मिहमान


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जब किसी मनुष्य में अहंकार की भावना जाग्रत होती है तो वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहता है। ऐसी प्रवृत्ति के लोग अपने देह को कष्ट देकर विपत्तियों को आमंत्रण भेजते हैं और अंततः मौत के मूंह में समा जाते हैं।

कबीर गर्व न कीजिये, रंक न हंसिये कोय
अजहूं नाव समुद्र में, ना जानौं क्या होय


संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि अपनी उपलब्धियौं पर अहंकार करते हुए किसी निर्धन पर हंसना नहीं चाहिए। हमारा जीवन ऐसे ही जैसे समुद्र में नाव और पता नहीं कब क्या हो जाये।
वर्तमान संदर्भ में व्याख्या-अहंकार आदमी का सबसे बड़ा शत्रू होता है। कुछ लोग अपने गुरू से कुछ सीख लेकर जब अपने जीवन में उपलब्धियां प्राप्त कर लेते हैं तब उनमें इतना अहंकार आ जाता है कि वह अपने गुरू से भी सम्मान चाहते हैं। वैसे आजकल के गुरू भी कम नहीं है वह ऐसे ही शिष्यों को सम्मान देते हैं जिसके पास माल टाल हो। यह गुरू दिखावे के ही होते हैं और उन्होंने केवल भारतीय अध्यात्म ग्रंथों की विषय सामग्री को रट लिया होता है और जिसे सुनाकर वह अपने लिये कमाऊ शिष्य जुटाते हैं। गरीब भक्तों को वह भी ऐसे ही दुत्कारते हैं जैसे कोई आम आदमी। कहते सभी है कि अहंकार छोड़ दो पर माया के चक्कर में फंस गुरू और शिष्य इससे मुक्त नहीं हो पाते। ऐसे में यह विचार करना चाहिए कि हमारा जीवन तो ऐसे ही जैसे समुद्र के मझधार में नाव। कब क्या हो जाये पता नहीं। माया का खेल तो निराला है। खेलती वह है और मनुष्य सोचता है कि वह खेल रहा है। आज यहां तो कल वहां जाने वाली माया पर यकीन नहीं करना चाहिए। इसलिये अपने संपर्क में आने वाले व्यक्ति को सम्मान देने का विचार मन में रखें तो बहुत अच्छा।
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