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Sunday 6 December 2009

कौटिल्य का अर्थशास्त्र-मुख से कभी कटु वाणी न बोलें (hindu dharm sandesh-kabhi katu vani n bolen)

वाक्पारुध्यपरं लोक उद्वेजनमनर्थकम्।
न कुर्यात्प्रियया वाचा प्रकुर्याज्जगदात्मताम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब मनुष्य अपनी वाणी में कठोरता बरतता है तब उससे सुनने वाले लोग उत्तेजित होते हैं। यह अनर्थकारी है, अतः ऐसी वाणी न बोलें तथा मीठी वाणी बोलकर सभी को अपने वश में करें।
हृदये वागस्तिीक्षणो मर्मच्छिद्धि पतन्मुहुः।
तेन च्छिन्नोनरपतिः स दीप्तो याति वैरिताम्।।
हिन्दी में भावार्थ-
जब वाणी रूप कटार से किसी मनुष्य का हृदय विदीर्ण होता है तो वह क्रोध में आकर बदला लेने के लिये तैयार होता है। आहत मनुष्य कटु वाक्य बोलने वाले से बैर बांध लेता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय-मनुष्य की पहचान उसके बोलने से ही हो जाती है। कोई पढ़ा लिखा है या नहीं इसका पता वार्तालाप के दौरान सहजता से किया जा सकता है। उसी तरह जब कोई आदमी बोलता है तो उसके शब्दों को मन में तोलें तो उसकी मानसिकता उजागर हो जाती है। इतना ही नहीं अगर कोई व्यक्ति हमसे कटु भाषा में बर्ताव करे तो उसके प्रति बदले का भाव भी पैदा हमारे अंदर भी होता है। यह विचार करते हुए हमें दूसरों से सदैव मधुर वाक्यों का प्रयोग करते हुए बातचीत करना चाहिये क्योंकि जब हम किसी को सहन नहीं कर सकते तो दूसरा हमें सहन क्यों करेगा? अनेक वाद विवाद तो केवल इसलिये हो जाते हैं कि लोग एक दूसरे से कटु भाषा का प्रयोग करते हैं। मसला इतना गंभीर नहीं होता जितना शब्दों के प्रयोग से बन जाता है। समाचार पत्रोें में छपी खबरों के अनुसार परिवार, मोहल्ले, कालोनी तथा शहरों में केवल मुंहवाद को लेकर ही हिंसा हो जाती है। ऐसे झगड़ों की वजह ढूंढने निकलें तो लगता है कि वह इतनी बड़ी नहीं थी जितनी हिंसा हुई। यह अंतिम सत्य है कि हिंसा की तरह कटु वाणी से भी किसी का हल नहीं निकलता।
लेखक, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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Saturday 5 December 2009

संत कबीर वाणी-मांस का उपभोग कर दान करना भी व्यर्थ (mans khana aur daan karna-santi kabir das vaani

 तिल भर मछली खायके, कोटि गऊ के दान।

कासी करवट ले मरै, तौ भी नरक निदान।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि जो तिल भर मछली का मांस सेवन कर भले ही करोड़ों गायें दान करें और काश में जाकर देह का त्याग करें तो भी उनको नरक भी भोगना पड़ेगा। वह अपने पाप से कभी मुक्त नहीं हो सकते।

बकरी पाती खात है, ताकी काढ़ी खाल।

जो बकरी खात है, तिनका कौन हवाल।।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या
-हमारे देश के हिन्दू समाज को संभवतः विश्व में इसलिये ही आधुनिक सभ्यता में सर्वोच्च स्थान प्राप्त हुआ क्योंकि समय के साथ अपने वैचारिक आधारों में परिवर्तन करने की क्षमता उसमें है।  हमारे कुछ प्राचीन ग्रंथों में मांस खाने को स्वीकृत दी गयी है। संभवतः इसका कारण यह रहा है कि उसमें विभिन्न क्षेत्रों के ऋषियों और मुनियों ने अपना योगदान दिया है और उनमें शायद कुछ उन क्षेत्रों के रहे होंगे जहां उनके समय में वहां सब्जी आदि उत्पादन की तकनीकी विकसित नहीं होगी।  जैसे जैसे  सभ्यता का विकास हुआ वैसे वैसे खान पान और उत्पादन का स्वरूप बदला लोगों को मांसाहार से दूर होने के लिये कहा गया।  कम से कम यह तो लगता है कि श्रीमद्भागवत गीता के काल में यहां पूरी तरह से एक सभ्य समाज निर्मित हो गया था।  उसमें मांसाहार को त्याज्य बताया गया है। वैसे मांसाहार से किसी को रोका नहीं जाता पर इतना जरूर समझाया जाता है कि उससे मनुष्य के अंदर ही तामसी प्रवृत्तियों का निर्माण होता है।

मनुष्य तीन प्रवृत्तियों के माने जाते हैं सात्विक, राजसी और तामसी। यहां यह प्रश्न नहीं है कि आप क्या खाते और पीते हैं।  आप चाहे भी जिस चीज का सेवन करें पर यह बात याद रखिये उसके अनुसार ही आपके अंदर विचारों और संकल्पों का निर्माण होगा।  साथ ही यह भी याद रखिये कि आप जिन लोगों के संपर्क मेें है वह भी अपने खान पान, रहन सहन और चाल चलन के कारण उनसे पैदा होने वाले गुणों के अनुसार काम करते हैं। गुण ही गुणों को बरतते हैं-यह श्रीमद्भागवत गीता का एक वैज्ञानिक सूत्र है।  इसका आशय यह है कि आप अगर चाहते हैं कि आपके अंदर सात्विक विचार हमेशा बने रहें तो मांसाहार से दूर रहें।  उसी तरह अगर आपके संपर्क में जो लोग शराब तथा मांस का सेवन करते हैं उनके बारे में यह अवश्य सोचें कि उनकी प्रवृत्तियों में कोई दोष हो सकता है इसलिये उनसे सावधान रहें या फिर संकट पड़ने पर उनसे सहायता की आशा न ही करें तो अच्छा।  आप किसी से यह न कहें कि मांस या शराब का सेवन न करे क्योंकि बिना मांगे उपदेश देना  अहंकार भाव का प्रमाण है जिससे ज्ञानी को दूर रहना चाहिये अलबत्ता इस बात को याद रखें कि अपने व्यसनों जीभ के स्वाद के दास भल कहां आपके काम आ सकेंगे।

कुछ जगह मंदिरों में अभी भी बलि प्रथा चल रही है। अब उनको बंद कर देना चाहिये क्योंकि यह तब की हैं जब शुद्ध खाद्य पदार्थ उपलब्ध नहीं थे।  वैसे अपने देश में अनेक मंदिर अब इस प्रथा से दूर हो गये हैं।  हमारे  समाज में इस बात की गुंजायश हमेशा रही है कि यहां विद्वान और संत आकर समय के अनुसार अपना ज्ञान प्रस्तुत कर वैचारिक आधार पर बदलाव लाते हैं-जैसे अपने देश में श्रीगुरुनानक देव, कबीर और तुलसीदास का नाम लिया जाता है।   इसके विपरीत अन्य समाजों में केवल पुरानी किताबों पर ही चिपके रहकर लोग रूढ़िवादी हो जाते हैं।  यही कारण है कि अन्य समाजों में अभी भी मांसाहार को अनुचित नहीं माना जाता जबकि वास्तविकता यह है कि आदमी के दिलोदिमाग पर आहार के प्रकार का प्रभाव अवश्य पड़ता है।  दूसरा यह है कि आप मांसाहार कर चाहे कितना भी दान करें बेकार है दूसरा यह है कि जब उसके प्रभाव से विचार और मन कलुषित होंगे तो शुद्ध हृदय से भक्ति भी नहीं हो पाती।
लेखक, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Thursday 3 December 2009

समाज जड़ नहीं है-आलेख (samajik chetna-hindi article)

जहां तक विद्वान लोगों का ज्ञान है वह इस बात की पुष्टि नहीं करता कि इस देश का पूरा समाज मूर्ख और रूढ़िवादी हैं और जिस तरह पिछले साठ वर्षों से पर जिस तरह राजनीति, सामाजिक तथा आर्थिक रूप से कुछ मुद्दे पेशेवर समाज सेवकों और बुद्धिजीवियों ने तय कर रखे हैं , उनमें कभी कोई बदलाव नहीं आया उससे तो लगता है कि वह यहां के आम आदमी को ऐसा ही समझते हैं। उनकी बहसें और प्रचार से तो ऐसा लगता है कि जैसे यहां का समाज बौद्धिकरूप से जड़ है और यह उन भ्रम उन विद्वानों को भी हो सकता है जो ज्ञान होते हुए भी कुछ देर अपना दिमाग इस तरह की बहसों और प्रचारित विषयों को देखने सुनने में लगा देते हैं। दरअसल जब राजनीति, समाज सेवा और अध्यात्मिक ज्ञान देना एक व्यापार हो गया हो तब यह आशा करना बेकार है कि इन क्षेत्रों में सक्रिय महानुभाव अपने प्रयोक्तओं या उपभोक्ताओं के समक्ष अपनी विक्रय कला का प्रदर्शन कर उनको प्रभावित न करें। हम उन पर आक्षेप नहीं कर सकते क्योंकि प्रयोक्ताओं और उपभोक्ताओं को भी अपने ढंग से सोचना चाहिये। अगर आम आदमी कहीं इस तरह के व्यापारों में सेद्धांतिक और काल्पनिक आदर्शवाद ढूंढता हो तो दोष उसमें उसकी सोच का है।
हां, हम इसी सोच की बात करने जा रहे हैं जो हमारे लिये महत्वपूर्ण है। जिस तरह इस देह में स्थित मन के लिये दां मार्ग है एक रोग का दूसरा योग का तो बुद्धि के लिये भी दो मार्ग है एक सकारात्मक और दूसरा नकारात्मक। जब बुद्धि सकारात्मक मार्ग पर चलती है तब मनुष्य के अंतर्मन में कोई नयी रचना करने का भाव आने के साथ ही तार्किक ढंग से विचार करने की शक्ति पैदा होती है। जब बुद्धि नकारात्मक मार्ग का अनुसरण करती है तब मनुष्य कोई चीज तोड़ने को लालायित होता है और तर्क श्क्ति से तो उसका कोई वास्ता हीं नहीं रह जाता-वह असहज हो जाता है। यही असहजता उसे ऐसे मार्ग पर ले जाती है जहां उसका ऐसे ही भावनाओं के व्यापारी उसका भौतिक दोहन करते हैं जो स्वयं भी अनेक कुंठाओं और अशंकाओं का शिकार होते हैं और धन संचय में उनको अपने जीवन की सुरक्षा अनुभव होती है।
अपने स्वार्थ के कारण ही आर्थिक, सामाजिक तथा वैचारिक शिखर पर बैठे शीर्ष पुरुष समाज में ऐसे विषयों का प्रतिपादन करते हैं जिनसे समाज की बुद्धि उनके अधीन रहे और नये विषय या व्यक्ति कभी समाज में स्थापित न हो पायें-एक तरह से उनका वंश भी उनके बनाये शिखर पर विराजमान रहे। वह अपने प्रयास में सफल रहते हैं क्योंकि समाज ऐसे ही कथित श्रेष्ठ पुरुषों का अनुसरण करता है। अगर कोई सामान्य वर्ग का कोई चिंतक उनको नयेपन की बात कहे तो पहले वह उसकी भौतिक परिलब्धियों की जानकारी लेते है। सामान्य लोगों की भी यही मानसिकता है कि जिसके पास भौतिक उपलब्धियां हैं वही श्रेष्ठ व्यक्ति है।
बहरहाल यही कारण है कि बरसों से बना एक समाज है तो उसकी बुद्धि को व्यस्त रखने वाले विषय भी उतने ही पुराने हैं। मनुष्य द्वंद्व देखकर खुश होता है तो उसके लिये वैसे विषय हैं। उसी तरह उनमें कुछ लोग सपने देखने के आदी हैं तो उनको बहलाने के लिये काल्पनिक कथानक भी बनाये गये। इनमें भी बदलाव नहीं आता।
पिछले एक सदी से इस देश मेें भाषा, जाति, धर्म, और क्षेत्र के नाम पर विवाद खड़े किये गये। उनका लक्ष्य किसी समाज का भला करने से अधिक उसके नाम पर चलने वाले अभियानों के मुखियाओं का द्वारा अपने घर भरना था। ऐसा करते हुए वह नये देवता बनते नजर आने लगे। सच बात तो यह है कि इस दुनियां में कभी भी कोई अभियान बिना माया के नहीं चल सकता। फिर जो लोग दावा करते हैं कि वह अमुक समूह का भला कर रहे हैं उनका कृत्य देखकर कोई नहीं कह सकता कि यह काम निस्वार्थ कर रहे हैं। ऐसे में बार बार एक ही सवाल आता है कि कौन लोग हैं जो उनको धन प्रदान कर रहे हैं। तय बात है कि यह धन उन्हीं मायावी लोगों द्वारा दिया जाता होगा जो इस समाज को सैद्धांतिक मनोरंजन प्रदान करने के लिये उनका आभार मानते हैं।
अभियान चल रहे हैं। आंदोलन इतने पुराने कि कब शुरु हुए उनका सन् तक याद नहीं रहता। आंदोलन के मुखिया देह छोड़ गये या इसके तैयार हैं तो उनके परिवार के पास वह विरासत में जाता है। पिता नहीं कर सका वह पुत्र करेगा-यानि समाज सेवा, अध्यात्मिक ज्ञान तथा कलाजगत का काम भी पैतृक संपदा की तरह चलने लगा है।
सत्य और माया का यह खेल अनवरत है। ऐसा नहीं है इस संसार में ज्ञानी लोगों की कमी है अलबत्ता उनकी संख्या इतनी कम है कि वह समाज को बनाने या बिगाड़ने की क्षमता नहीं रखते। वैसे भी कहीं किसी नये विषय या वस्तु का सृजन चाहता भी कौन है? अमन में लोग जीना भी कहां चाहते हैं। अमन तो स्वाभाविक रूप से रहता है इसलिये लोग तो शोर चाहते हैं। ऐसा छोर जो उनको अंदर तक प्रसन्न कर सके। यह काम तो व्यापारी ही कर सकते हैं। इसके अलावा लोगों को चाहिये अनवरत अपने दिल बहलाने वाला विषय! यह तभी संभव है जब उसे अनावश्यक खींचा जाये-टीवी चैनलों में सामाजिक कथानकों को विस्तार देने के लिये यही जाता है। यह विस्तार बहस करने के लायक विषयों में अधिक नहीं हो सकता क्योंकि उसमें तो नारे और वाद ही बहुत है। समाज को नारी, बालक, वृद्ध, जवान, बीमार, भूखा, बेरोजगार तथा अन्य शीर्षकों के अंदर बांटकर उनके कल्याण का नारा देकर काम चल जाता है। इसके अलावा इतनी सारी भाषायें हैं जिसके लिये अनेक सेवकों की आवश्यकता पड़ती है जो सेवा करते हुए स्वामी बन जाते हैं। ऐसा हर सेवक अपनी भाषा, जाति, धर्म तथा क्षेत्र के विकास और उसकी रक्षा के लिये जुटा है।
मगर क्या वाकई लोग इतने भोले हैं! नहीं! बात दरअसल यह है कि इस देश का आदमी कहीं न कहीं से अपने देश के अध्यात्मिक ज्ञान से सराबोर है। वह यह सब मनोरंजन के रूप में देखता है। सामने नहीं कहता पर जानता है कि यह सब बाजारीकरण है। यही कारण है कि कोई भी बड़ा आंदोलन या अभियान चलता है तब उसमें लोगों की संख्या सीमित रहती है। वह इसलिये अधिक दिखते हैं क्योंकि वह शोर करते हैं। शोर करने वाला दिखता है पर शांति रखने वाले की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता। पिछले अनेक महापुरुषों को पौराणिक कथानकों के नायकों की तरह स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा हैं इतने सारी पुण्यतिथियां और जन्म दिन घोंिषत किये गये हैं कि लगता है कि सदियों में नहीं बल्कि हर वर्ष एक महापुरुष पैदा होता है। लोग सुनते हैं पर देखते और समझते नहीं है। यह जन्म दिन और पुण्यतिथियां उन लोगों के नाम पर भी बनाये गये जो भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के पुरोधा समझे जाते हैं जिसमें जन्म और मृत्यु को दैहिक सीमा में रखा गया है-दूसरे शब्दों में कहें तो उसकी अवधारणा को यह कहकर खारिज किया गया है कि आत्मा तो अमर है। जो लोग बचपन से ऐसे कार्यक्रम देख रहे हैं वह जानते हैं कि आम आदमी इनसे कितना जुड़ा है। हालांकि इसका परिणाम यह हो गया है कि लोगों ने अपने अपने जन्म दिन मनाना शुरु कर दिया है। प्रचार माध्यमों ने अति ही कर दी है। हर दिन उनके किसी खिलाड़ी या फिल्म सितारे का जन्म दिन होता है जिससे उनको उस पर समय खर्च करने का अवसर मिल जाता है। काल्पनिक महानायकों से पटा पड़ा है प्रचार माध्यमों को पूरा जाल।
इसके बावजूद एक तसल्ली होती है यह देखकर कि काल्पनिक व्यवसायिक महानायकों का कितना भी जोरशोर से प्रचार किया जाता है पर उससे आम आदमी अप्रभावित रहता है। वह उन पर अच्छी या बुरी चर्चा करता है पर उसके हृदय में आज भी पौराणिक महानायक स्थापित हैं जो दैहिक रूप से यहां भले ही मौजूद न हों पर इंसानों के दिल में उनके लिये जगह है। यह काल्पनिक व्यवसायिक नायक तभी तक उसकी आंखो में चमककर उसकी जेब जरूर खाली करा लें जब तक वह देह धारण किये हुए हैं उसके बाद उनको कौन याद रखता है। सतही तौर पर जड़ समाज अपने अंदर चेतना रखता है यह संतोष का विषय है भले ही वह व्यक्त नहीं होती।
लेखक, संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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