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Tuesday 7 April 2009

चाणक्य नीतिः पेट खराब होने पर भोजन विष जैसा लगता है

अनभ्यासे विषं शास्त्रमजीर्णे भोजनं विषम्।
दरिद्रस्य विषं गोष्ठी वृद्धस्य तरुणी विषम्।।

हिंदी में भावार्थ-अगर शास्त्र का निंरतर अभ्यास न करना, पेट खराब होने पर भोजन करना, दरिद्र व्यक्ति के लिये सभा में जाना और वृद्ध पुरुष के लिये युवा स्त्री विष की तरह होती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन में हर व्यक्ति किसी किसी प्रकार की पुस्तकों से शिक्षा प्राप्त करता है। शिक्षा प्राप्त करने का उसका उद्देश्य ज्ञान और रोजगार प्राप्त करना-दोनों ही या दोनों में से कोई एक-हो सकता है। ऐसे में उसे अपनी पुस्तकों या शास्त्रों का नियमित अभ्यास करते रहना चाहिये। अगर वह ऐसा नहीं करता तो उसके लिये अलाभकर स्थिति हो जाती है। एक तो वह पूर्ण रूप से अपने विषय या ज्ञान में पारंगत नहीं हो पाता जिसकी वजह से उसे सफलता नहीं मिलती और मन अशांत रहता है दूसरा यह कि उसे पहले पढ़े हुए विषय दिमाग में घूमते रहते हैं और कुछ नया सोच ही नहीं सकता। इस तरह उसके जीवन के विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। वैसे आजकल इंसान के लिये स्वतंत्र रूप से अपने व्यवसाय करना कठिन हो गया है। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद अगर आदमी को उससे संबंधित रोजगार न मिले तो उसका अभ्यास नहीं रह जाता। आजकल रोजगार की जो स्थिति है उससे तकनीकी, विज्ञान, वाणिज्य तथा साहित्य विषयों में उपाधियां प्राप्त करने वाले सभी लोगों को उससे संबंधित काम नहीं मिल पाता और अनेक लोगों को जीवन यापन के लिये जब उसे कोई अन्य नौकरी या व्यवसाय करना पड़ता है पर अपनी पूर्व शिक्षा के कारण उनको बहुत मानसिक कष्ट होता है। तब उन्हें अपना जीवन ही विषैला लगता है।
उसी तरह अगर कोई ज्ञान जीवन के लिये प्राप्त किया है तो उसका निंरतर अभ्यास करना चाहिये ताकि वह याद रहे और समय आने पर उस ज्ञान से हम अपनी रक्षा कर सकें।
यही स्थिति भोजन की है। जब हमारा पेट खराब हो तब भोजन नहीं करना चाहिये। ऐसे में अगर जबरन भोजन किया तो अपना स्वास्थ्य अधिक बिगड़ जाता है। वैसे भी कहते हैं कि भूख से कम, खाने से लोग अधिक बीमार पड़ते हैं। शरीर की बीमारियों का मुख्य कारण पेट का खराब होना ही है।
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Monday 6 April 2009

चाणक्य नीतिः ज्ञान मनुष्य का सेनापति होता है

हर्त ज्ञार्न क्रियाहीनं हतश्चाऽज्ञानतो नर।
हर्त निर्नायकं सैन्यं स्त्रियो नष ह्यभर्तृकाः ।।

हिंदी में भावार्थ- जिस ज्ञान को आचरण में प्रयोग न किया जाये वह व्यर्थ है। अज्ञानी पुरुष हमेशा ही संकट में रहता हुआ ऐसे ही शीघ्र नष्ट हो जाता है जैसे सेनापति से रहित सेना युद्ध में स्वामीविहीन स्त्री जीवन में परास्त हो जाती है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या- मनुष्य का सेनापित उसका ज्ञान होता है। उसके बिना वह किसी का गुलाम बन जाता है या फिर पशुओं की तरह जीवन जीता है। ज्ञान वह होता है जो जीवन के आचरण में लाया जाये। खालीपीली ज्ञान होने का भी कोई लाभ नहीं है जब तक उसको प्रयोग में न लाया जाये। हमारे देश में ज्ञानोपदेश करने वाले ढेर सारे लोग है जो ‘दान, तत्वज्ञान, तपस्या, धर्म, अहिंसा, प्रेम, और भक्ति की महिमा’ का बखान करते हैं पर उनका जीवन उसके विपरीत विलासिता, धन संग्रह, और अपने बड़े होने के अभिमान में व्यतीत होता है। देखा जाये तो उनके लिये ज्ञान विक्रय और उनके अनुयायियों के लिये क्रय की वस्तु होती है। उसके आचरण से न तो गुरु का और न ही शिष्य का लेना देना होता है।

यही कारण है कि हमारा समाज जितना धार्मिक माना जाता है उतना ही व्यवसायिक भी। भारतीय प्राचीन ग्रथों का तत्वज्ञान का मूल सभी जानते हैं पर उसके भाव को कोई नहंीं जानता। अनेक गुरु ज्ञानोपदेश करते हुए बीच में ही यह बताने लगते हैं कि ‘धर्म के प्रचार के लिये धन की आवश्यकता है’। वह अपने भक्तों में दान और त्याग का भाव पैदा कर अपने लिये धन जुटाते है। भक्त भी अपने मन में स्थित दान भाव की शांति के लिये उनकी बातों में आकर अपनी जेब ढीली कर देते हैं। कथित गुरु अपने शिष्यों को ज्ञान के पथ पर लाकर उनका भौतिक दोहन कर फिर उनको अज्ञान के पथ पर ढकेल देते हैं। यही कारण है कि अध्यात्मिक गुरु कहलाने वाला अपना देश भौतिकता के ऐसे जंजाल में फंस कर रह गया है जहां विकास केवला एक नारा है जिसकी अंतिम मंजिल विनाश है।
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Saturday 4 April 2009

सर्च इंजिनों में छायी रही रामनवमी-संपादकीय

रामनवमी के दिन सुबह अंतर्जाल पर दिलचस्प अनुभव हुआ। अपने आप में यह अनुभव बहुत सुखद था। सबसे पहला यह अनुभव तो यह था कि किसी दिन अगर कोई भारतीय पर्व है तो उस दिन उसके नाम से सर्च इंजिन पर खोज सुबह से ही प्रारंभ हो जाती है। ऐसे में अपने उससे संबंधित पुराने पाठ सामने ही कांउटर पर चमकने लगते हैं। रामनवमी के दिन भगवान श्री राम और रामनवमी के नाम से हिंदी और अंग्रेजी शब्दों के साथ सर्च इंजिनों पर खोज की गयी। ऐसे में इस लेखक के ब्लाग पर कम से कम पांच पाठ ऐसे थे जो पूरे दिन पाठकों के दृष्टिपथ में आये।

दो वर्ष पूर्व रामनवमी पर एक पाठ इस लेखक ने लिखा था जो कृतिदेव में होने के कारण पढ़ा नहीं जा सकता था और उसे पिछले साल यूनिकोड से परिवर्तित कर पुनः प्रकाशित किया। इसके अलावा पिछले ही वर्ष रामनवमी पर लिखा गया आलेख भी निरंतर इस वर्ष निरंतर पढ़ा जाता रहा। यह दोनों पाठ ब्लाग स्पाट के ब्लाग/पत्रिका अनंत शब्दयोग पर थे और कल इनकी वजह से जितने पाठकों ने पढ़ा उतने आम तौर से सामान्य दिनों में पाठक नहीं पढ़तें। इसके अलावा वर्डप्रेस के ब्लाग पर तो भी भगवान श्रीराम पर दिपावली और अन्य अवसरों पर लिखे गये आलेख चमकते दिख रहे थे। संत कबीरदास और रहीम के संदेशों में जहां भगवान श्रीराम के नाम का उल्लेख है उन पर भी कल पाठक अधिक थे।
इन पाठों पर सुबह ही इतने पाठक देखकर विचार आया कि नया लेख लिखने की बजाय इसे ही अपडेट किया जाये। ब्लाग स्पाट और वर्डप्रेस पर यह एक सुविधा है कि आप अपने पुराने पाठ नयी तारीख में अपडेट कर सकते हैं। तब लगा कि अनंत शब्दयोग के पाठ को अपडेट किया जा सकता है। इस सुविधा का लाभ उठाया जा सकता है ताकि पाठकों को यह न लगे कि वह कोई पुराना लेख पढ़ रहे है। दरअसल इससे कुछ अंतर नहीं पड़ता पर लोगों में अखबार और पत्र पत्रिकाओं ताजा पढ़ने की आदत पड़ गयी है कि वह यहां भी ताजा पढ़ना चाहते हैं। इसलिये अपडेट करते समय यह देख लिया कि उसमें कोई नयी बात जोड़ी जा सकती है तो जोड़ दें। बहरहाल उसे अपडेट किया। शाम को आकर देखा तो उस अकेले पाठ ने ही 58 पाठक जुटा लिये थे। अन्य पाठों को मिलाकर कुल 175 से अधिक पाठक भगवान श्रीराम पर लिखित पाठों पर आये। मजे की बात यह है कि हिंदी के ब्लाग एक जगह दिखाये जाने वाले फोरमों पर इस तरह के अपडेट नहीं पहुंचते और यही कारण है कि वहां से कोई पाठक नहीं आ सका। सारे पाठक सर्च इंजिनों से आये। इससे यह पता लगता है कि भगवान श्रीराम के प्रति हमारे देश के लोगों के कितने गहरी सीमा तक भक्ति का भाव है।
प्रसंगवश यह ब्लाग/पत्रिका कल ही दस हजार की संख्या आधिकारिक रूप से पार कर गया। वैसे यह ब्लाग दो वर्षों से सक्रिय है पर इस काउंटर पिछले साल ही लगाया गया। इसका सहधर्मी ब्लाग अंतर्जाल पत्रिका पहले ही दस हजार पार चुका है। इस ब्लाग पर संख्या प्रारंभ से ही अधिक रही है और वह निश्चित रूप से प्रदंह हजार से अधिक होगी पर प्रमाणिक रूप कल ही इसने यह संख्या पार की। यह पहला अध्यात्मिक ब्लाग बनाते समय ऐसा नहीं लगा था कि यह ब्लाग यात्रा इतनी दिलचस्प रहने वाली है। हां, इस ब्लाग/पत्रिका से यह अनुभूति इस लेखक को हुई अपने देश के लोग भले ही अन्य विषयों में लिप्त होते हैं पर जहां भी अध्यात्मिक विषय उनके सामने आता है वह अन्य विषय भूल जाते हैं।
सच बात तो यह है कि यह लेखक संपादक अपनी अध्यात्मिक रुचियों और टाईपिंग के ज्ञान का पूरा सुख उठाते हुए इस ब्लाग/पत्रिका पर अपने पाठ लिखता है। यह इंटरनेट की माया ही है कि अपने ही लिखे पाठ को लेखक भूलना भी चाहे तो भूल नहीं सकता क्योंकि पाठक ही उसे याद दिलाते हैं कि उसने क्या लिखा है? दो वर्ष पहले ही प्रारंभ में और फिर पिछले वर्ष ही भगवान श्रीराम पर लिखे गये आलेखों को लिखने का आनंद इस वर्ष अनुभव हुआ जब सुबह से पाठकों को सर्च इंजिन में उनको ढूंढते पाया। फिर अपडेट करने से वह पाठ नये भी लगने लगे साथ ही यह अनुभव हुआ कि लोगों के मन में अध्यात्मिकता के प्रति कितना गहरा लगाव है। इसलिये ही रामनवमी के दिन भगवान श्री राम और रामनवमी का नाम सर्चइंजिनों में उनका नाम छाया रहा।
बहरहाल इस अध्यात्मिक ब्लाग के दस हजार पाठक संख्या पार करने में इस लेखक का तो नहीं बल्कि भारतीय अध्यात्मिक के मनीषियों और उनके ज्ञान में रुचि रखने वाले श्रद्धालु लोगों का अधिक योगदान है। इस लेखक का तो बस इतना ही योगदान है कि वह लिखने का आनंद पहले ही उठा लेता है पढ़ने वालों के हिस्से में वह बाद में आता है। भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान की धारा अंतर्जाल पर बृहद रूप में बहती रहे ऐसी आशा हम सभी को करनी चाहिए।
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Friday 3 April 2009

संत कबीर के दोहे-मन तो खाने में लालची और भजन में आलसी होता है

कबीर यह मन लालची, समझै नहीं गंवार।
भजन करन को आलसी, खाने को तैयार।।

संत शिरोमणि कबीरदास जी के मतानुसार मन खाने में एक तरह से लालची और भजन में आलसी होता है। वह एक गंवार की तरह है जो कोई बात समझना ही नहीं चाहता है।

कबीर मन परबत भया, अब मैं पाया जान
टांकी लागी प्रेम की, निकसी कंचन खान


संत कबीरदास जी के अनुसार अब मैं समझ पाया हूं कि मन तो पर्वत की तरह विशाल है। अगर इसमें प्रेम का टांका लगा दिया जाये तो सोने का भंडार मिलता है।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हमारे प्राचीन अध्यात्मिक मनीषियों ने यह रहस्या बहुत पहले ही खोज निकाला कि मनुष्य ही नहीं बल्कि हर जीव अपने मन से संचालित होता हैं। पांच तत्वों से बनी इस देह में तीन प्रकृतियां मन, बुद्धि और अहंकार रहती हैं और समय के अनुसार उनका कार्य भी होता हैं। मन को चंचल माना जाता है यही कारण है कि कोई भी जीव एक जगह स्थिर नहीं रह पाता। यह मन शक्तिशाली है इसलिये इस पर नियंत्रण रखा जाये तो जीवन सफल हो जाता है पर अगर इसके नियंत्रण में रहकर काम किया तो पूरा जीवन गुलाम की तरह बिताना पड़ता है। श्रीगीता के अनुसार गुण ही गुणों के बरतते हैं। अगर हम अपने मन में विलासिता, घृणा और लोभ के बीज बोंऐंगे तो उनके पीछे हम अपनी देह साथ ही ले जायेंगे जो कि अंततः हमारें दुःख का कारण बनेगा। उसी तरह अगर उसमें प्रेम, त्याग और विश्वास के बीज बोऐंगे तो उसका फल सुखद होगा। अतः मन को दृष्टा की तरह देखना चाहिये तभी उसे नियंत्रण में ला पायेंगे।
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Thursday 2 April 2009

भृर्तहरि शतकः समदर्शी भाव से पवित्र स्थान पर शिवजी के मंत्र का जाप करें

अहौ वा हारे बलवति रिपौ वा सुहृदि वा
मणौ वा लोष्ठे वा कुसुमशयने वा दृषदि वा।
तृणे वा स्त्रैणे वा मम समदृशो यान्ति दिवसः
क्वचित् पुण्यारण्ये शिव-शिव शिवेति प्रलपतः।।


हिंदी में भावार्थ-सांप का हो या फूलों का हार, क्रूर शत्रु हो या सहृदय मित्र, कीमती हीरा हो या मिट्टी का ढेला, फूलों की सेज हो या पत्थर का बिस्तर, कांटों में रहना हो या स्त्रियों के मध्य अपना तो यही विचार है कि समदर्शी भाव से किसी पवित्र स्थान रहकर शिव के मंत्र का जाप करते हुए जीवन व्यतीत करें।

वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भारतीय अध्यात्मिक दर्शन में शिव को सत्य का प्रतीक माना जाता है। अनेक सच्चे संत और साधु इसलिये ही लोगों को शिव का मंत्र जाप करने का संदेश देते हैं। इस संसार में स्थितियां बदलती रहती हैं। कभी सोने के लिये अच्छा बिस्तर मिलता है तो कभी पत्थर पर ही सोना पड़ता है। कभी हीरा मिलता है तो कभी पत्थर का टुकड़ा हाथ में आता है। हमारे अंदर कामनाओं का भाव रहता है जो कभी निराशा मेें तो कभी प्रसन्नता में स्थित करता है। दोनों ही दुःखकारक हैं। निराशा तो है ही प्रसन्नता के बाद अगर कोई तकलीफ वाली बात सामने आती है तो मन में तनाव भी अधिक होता है।

इसलिये हमारे प्राचीन काल के ऋषि और मुनि जीवन में समदर्शी और निष्काम भाव से रहने का संदेश देते हैं। इसके लिये ‘ओम नमो शिवायः’ मंत्र का जाप किया जाये तो बहुत अच्छा है। इससे मन और विचारों से मुक्ति मिलती है और अध्यात्मिक भाव स्वतः ही पैदा होता है। राजा भर्तृहरि की तरह ही अनेक अध्यात्मिक मनीषियों ने मनुष्यों को समदर्शी और निष्काम भाव से जीवन में कार्य करने का संदेश इसलिये ही दिया क्योंकि जहां आसक्ति है वहीं विरक्ति भी है। मगर आसक्ति आसानी से पीछा नहीं छोड़ती और विरक्ति को हम चाहते नहीं है। यह द्वंद्व जीवन में अशांति फैलाता है। इससे बचने का उपाय है कि भगवान शिव की आराधना की जाये।
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Wednesday 1 April 2009

भर्तृहरि शतकः जमीन का छोटा टुकड़ा पाकर मूर्ख लोग ही गरियाते हैं

अभुक्तायां यस्यां क्षणमपि न यातं नुपशर्तर्भुवस्तस्या लाभे क इव बहुमानः क्षितिभुजाम्।
तदंशस्याष्यंशे तदवयलेशेऽपि पतयो विषादे कत्र्तव्ये विदधति जडाः प्रत्युत मुदम्।।


हिंदी में भावार्थ-इस प्रथ्वी को अनेक राजाओं ने भोगा पर फिर भी इसे पाने वाले नये राजा अभिमान करते रहे। इसके छोटे से छोटे अंश को पाकर भी मूर्ख लोग अपनी अकड़ दिखाने लगते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-वैसे खाने पीने का विषय हो तो लोग झूठा खाने को तैयार नहीं होते। ऐसा करना वह अपनी शान के खिलाफ मानते हैं मगर यह प्रथ्वी जो सदियों से अपनी धुरी पर घूम रही है और इसे अनेक राजा भोग चुके हैं पर इसका एक अंश मिल जाने पर भी उसका नया मालिक इतराने लगता है। तब उसे यह विचार नहीं आता कि यह प्रथ्वी पहले किसी अन्य के स्वामित्व में थी और अब यह उसे झूठन के रूपें मिली है फिर इस पर इतराना नहीं चाहिये। भले ही जमीन के अंश पर नयी इमारत बने पर वह है तो किसी की झूठन ही न! क्या लोग दूसरे की झूठन किसी नयी थाली में मिलने पर स्वीकार करते हैं? कतई नहीं! इसलिये ज्ञानी लोग नया मकान या भूखंड मिलने पर अपने स्वामित्व का अहंकार नहीं पालते पर मूर्ख लोग ऐसे व्यवहार करते हैं जैसे कि वह जमीन का वह टुकड़ा आसमान से उतार कर स्वयं लाये हैं।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि अहंकार मनुष्य को अज्ञानी बना देता है और वह अपनी भौतिक उपलब्धियों पर ऐसे इतराता है जैसे उसने पर ससंार ही स्वयं बनाया हो। इसके विपरीत ज्ञानी मनुष्य इस बात को जानते हैं कि आज जो उसके पास है वह पहले किसी अन्य के पास था और उसके बाद किसी अन्य के पास होगा।
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