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हिंदी मित्र पत्रिका

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Wednesday, January 6, 2010

संत कबीर के दोहे-सम्मान की चाहत बनती दुःख कारण (sant kabir ke dohe-samman ki chahat buri)

मान बड़ाई ऊरमी, ये जग का व्यवहार।
दीन गरीबी बन्दगी, सतगुरु का उपकार।।

संत शिरोमणि कबीरदास का कहना है कि जिस तरह दुनियां का व्यवहार है उससे देखकर तो यही आभास होता है कि मान और बड़ाई दुःख का कारण है। सतगुरु की शरण लेकर उनकी कृपा से जो गरीब असहाय की सहायता करता है, वही सुखी है।
मान बड़ाई देखि कर, भक्ति करै संसार।
जब देखैं कछु हीनता, अवगुन धरै गंवार।
संत कबीरदास जी कहते हैं कि दूसरों की देखादेखी कुछ लोग सम्मान पाने के लिये परमात्मा की भक्ति करने लगते हैं पर जब वह नहीं मिलता वह मूर्खों की तरह इस संसार में ही दोष निकालने लगते हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-भक्त और ज्ञानी की पहचान यह है कि वह कभी अपनी भक्ति और ज्ञान शक्ति का बखान नहीं करते बल्कि निर्लिप्त भाव से समाज सेवा करते हुए अपना जीवन यापन करते हैं। अपनी सच्ची भक्ति और ज्ञान के कारण कुछ लोग महापुरुषों की श्रेणी में आ जाते हैं उनको देखकर अन्य लोग भी यही प्रयास करते हैं कि उनकी पूजा हो। यह केवल अज्ञान का प्रमाण है अलबत्ता अपने देश में धार्मिक प्रवचन एक व्यवसाय के रूप में चलता रहा है। इस कारण तोते की तरह किताबों को रटकर लोगों को सुनाते हुए खूब कमाते हैं। उनको देखकर कुछ लोग यह सोचते हुए भक्ति का दिखावा करते हैं कि शायद उनको भी ऐसा ही स्वरूप प्राप्त हो। अनेक लोग संतों की सेवा में इसलिये जाते हैं कि हो सकता है कि इससे उनको किसी दिन उनकी गद्दी प्राप्त हो जाये। ऐसे में भक्ति और ज्ञान तो एक अलग विषय हो जाता है और वह मठाधीशी के चक्कर में राजनीति करने लगते हैं। किताबों को रटने की वजह से उनको शब्द ज्ञान याद तो रहता है ऐसे में वह थोड़ा बहुत प्रवचन भी कर लेते हैं पर उनकी भक्ति और ज्ञान प्रमाणिक नहीं है। वैसे भी अपने पौराणिक ग्रंथों का अध्ययन हर आदमी इतना तो कर ही लेता है कि उसे सारी कथायें याद रहती हैं। नहीं भी अध्ययन करे तो इधर उधर सुनकर उसे बहुत सारी कथायें याद आ ही जाती हैं। । किसी आदमी ने वह भी नहीं किया हो तो अपने अध्यात्मिक दर्शन के कुछ सूक्ष्म सत्य-निष्काम कर्म करो, परोपकार करो, दया करो और माता पिता की सेवा करे जैसे जुमले- सुनाते हुए श्रोताओं और दर्शकों की कल्पित कहानियों से मनोरंजन करता है। उनको सम्मानित होते देख अन्य लोग भक्ति में जुट जाते हैं यह अलग बात है कि कामना सहित यह भक्ति किसी को भौतिक फल दिलाती है किसी को नहीं।
फिर भक्ति हो या ज्ञानार्जन अगर कामना सहित किया जाये और सफलता न मिले तो आदमी संसार में दोष ढूंढने लगता है। यह केवल भक्ति या ज्ञान के विषय में नहीं है बल्कि साहित्य और कला के विषयों में भी यही होता है। आदमी आत्ममुग्ध होकर अपना काम शुरु करता है पर जब उसे सफलता नहीं मिलती तो वह निराश हो जाता है। निष्कर्ष यह है कि सम्मान पाने का मोह आदमी के लिये दुःख का कारण बनता है। एक बात याद रखें सम्मान पाने की चाह पूरी नहीं हुई तो दुःख तो होगा और अगर पूरी भी हो गयी तो अपमान भी हो सकता है। जहां सुख है वहां दुःख भी है। जहां आशा है वहां निराशा भी है। जहां सम्मान है वहां अपमान भी है। अगर सम्मान मिल गया तो चार लोग आपके दोष निकालकर अपमान भी कर सकते हैं।
इसलिये अच्छा यही है कि अपने कर्म निष्काम भाव से करें। इस संसार में निर्विवाद सम्मान पाने का बस एक ही तरीका है कि आप गरीब को धन और अशिक्षित को शिक्षा प्रदान करें। प्रयोजन रहित दया करें। ऐसे काम बहुत कम लोग करते हैं। जो सभी कर रहे हैं उसे आप भी करें तो कैसा सम्मान होगा? सम्मान तो उसी में ही संभव है जो दूसरे लोग न करते हों।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Monday, January 4, 2010

रहीम के दोहे-चिंता तो जीव को ही लील जाती है (rahim ke dohe-chinta aur chita)

रहिमन कठिन चितान ते विंतर करे चित चेत।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत।।
कविवर रहीम कहते हैं कि कठिन चिंताओं का चिंतन करने की अपेक्षा चित पर ध्यान करें क्योंकि चिता तो प्राणहीन शव को दग्ध करती है पर चिंता तो जीवित मनुष्य को ही लील जाती है।
रहिमन कबहुं बड़ने के, नाहिं गर्व को लेस।
भारत धरैं संसार को, तऊ कहावत सेस।।
कविवर रहीम कहते हैं कि महान पुरुषों को कभी अपने बड़प्पन का अहंकार नहीं होता। इतनी भरी धरती को धारण करने वाले भगवान कहलाते तो शेष ही हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने ध्यान पर नियंत्रण करना जरूरी है। इसी ध्यान के द्वारा ही हम अपने मन, बुद्धि तथा अहंकार पर दृष्टि रख सकते हैं। निरर्थक चिंतायें पालने से शरीर जलने लगता है। इस संसार का जीवन कोई हमारी करनी से नहीं चल रहा है बल्कि उसका शाश्वत नियम ही बहना है। हम अपनी देह और उससे जुड़े लोगो की चिंता करते हुए यह सोचते हैं कि हम उनके कर्ता हैं। यह भ्रममात्र है। जो घटनायें घट रही हैं उनको तो घटना ही है हम तो केवल भौतिक तत्व होने के कारण उससे जुड़े होते हैं।
यह कर्तापन का अहंकार न केवल अपने लिये दुःखदायी है बल्कि समाज में छवि को भी खराब करता है। कहा जाता है ‘थोथा चना बाजे घना’ और समाज में ऐसे तत्वों का बोलबाला है जो कथित रूप से अपनी भौतिक उपलब्धियों के कारण इतराते बहुत हैं। तब जिनके पास भौतिक साधनों का अभाव है वह लोग अपने अंदर मानसिक कुंठायें पाल लेते हैं। अनेक लोग तो इस चिंता में अपना शरीर जला देते हैं कि हम अमुक व्यक्ति जैसा ही सामाजिक स्तर प्राप्त करें। उधर अहंकार में डूबे भौतिकता से संपन्न लोग भी शारीरिक श्रम करने वालों को हेय समझते हैं। उनकी इसी प्रवृत्ति के कारण छोटे लोगों में जो विद्रोह पैदा होता है उसका अनुमान नहीं करते। यही विद्रोह कहीं अपराध में तो कहीं हिंसा में प्रकट होता है।
अतः जीवन सहज भाव से जीने और समाज में समरसता का भाव बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि चिंता और अहंकार के भाव से मुक्त रहा जाये।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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Sunday, January 3, 2010

संत कबीर के दोहे-ज्ञानी और भक्त अपनी आलोचना से विचलित नहीं होते (gyani aur bhakt-sant kabir ke dohe)

जिनके नाम निशान हैं, तिन अटकावै कौन।
पुरुष खजाना पाइया, मिटि गया गौन।।
जिनके मन में भगवान के प्रति भक्ति और ज्ञान है उनको भला कौन अटका सकता है। उस तत्व ज्ञान को पाकर तो मनुष्य जीवन मृत्यु के भाव से मुक्त हो जाता है।
ऐसे साच मानई, तिलकी देखो जोस
जारि जारि कोयला करै, जमता देखो सोय।।
यदि किसी बात को सच नहीं मानते तो तिल के काष्ट को जाकर देखो। उसे जलाकर राख कर दिया जाता है पर वह फिर अंकुरित होकर प्रकट होता है। जो तत्व ज्ञान है वह हर परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ज्ञानी और भक्त किसी की परवाह नहीं करते। यह अलग बात है कि वह इसे प्रकट नहीं करते और संसार के कार्यों में लिप्तता प्रदर्शित करते हैं। ज्ञानी और भक्त की पहचान यह है कि वह तमाम तरह की आलोचना और निंदा को झेलते हुए भी अपने पथ से विचलित नहीं होते। इस संसार में मनुष्य का तो स्वभाव है कि वह अल्प ज्ञान क आधार पर ही सम्मान पाना चाहता है और वह इसके लिये दूसरे की निंदा भी करने को तैयार हो जाता है। जिनके पास ज्ञान और भक्ति का भंडार है वह कभी छोटी मोटी बातों से विचलित नहीं होते। उनकी पहचान यह है कि अगर उनका निंदक भी उनके सामने आ जाये तो उसे अपमानित नहीं करते। क्षमा उनका स्वाभाविक गुण होता है।
इसके विपरीत जिन्होंने ज्ञान की किताबें रट ली है उनकी भक्ति का प्रयोजन केवल अन्य लोगों पर अपना प्रभाव जमाना होता है। वह उस ज्ञान का अक्सर बखान करते हैं पर उनके आचार विचार में वह धारण किया हुआ प्रकट नहीं होता। ऐसे लोग थोड़ी सी आलोचना पर भी उत्तेजित हो जाते हैं। अगर सच्चे और ढोंगेी ज्ञानी का पहचान करनी हो तो इस बात को देखें कि कौन अपनी बात पर अमल करता है और कौन केवल मौखिक बात कहकर उसे भूल जाता है।
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Friday, January 1, 2010

भर्तृहरि शतक-धनहीन होने पर भी विद्वान रत्न के समान (garib vidvan bhee ratna saman-hindu dharma sandesh)

शास्त्रोपस्कृतशब्द सुंदरगिरः शिष्यप्रदेयाऽऽगमा विख्याताः कवयो वसन्ति विषये यस्य प्रभर्निर्धनाः।
तज्जाड्यं वसुधाधिपस्य कवयस्त्वर्थ विनाऽपीश्वराः कुत्स्या स्युः कुपरीक्षका हि मणयो यैरर्घतः पातिताः।।
हिन्दी में भावार्थ-
ग्रंथों का अध्ययन से उसमें वर्णित शब्दों के ज्ञान को धारण कर सुंदर वाणी बोलने के साथ ही शिष्यों को उनका उपदेश करने वाले विद्वान तथा काव्य की मधुर धारा प्रवाहित करने वाले कवि जिस राज्य में निर्धन होते हैं, उसका राजा या राज्य प्रमुख अयोग्य कहा जाता है। विद्वान धनहीन होने पर भी रत्न के समान है और उसका सम्मान सभी जगह होता है और जो ऐसे रत्नों का अपमान करता है वह निंदा योग्य है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-हम इस संदेश को आज की नई सभ्यता में देखें तो यह दायित्व पूरे समाज का है कि वह लोगों को तत्व ज्ञान तथा सत्य का उपदेश देने वाले विद्वानो के साथ ही कवियों और लेखकों को भी संरक्षण दे। राज्य प्रमुख का तो यह उच्चतर दायित्व है पर आजकल जिस तरह पूंजीवाद ने व्यापक आधार बनाया है तो उसके शिखर पुरुषों को भी इस तरह ध्यान देना चाहिए। सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक शिखरों पर बैठे माननीय लोगों की उपेक्षा का ही यह परिणाम है कि आजकल समाज में कोई अपने बच्चे को अध्यात्मिक ज्ञान न तो देना चाहता है न ही किसी से प्राप्त करने के लिये प्रेरित करता है। यही हाल साहित्य का है। इस देश में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति हो जो अपने लड़के या लड़की का किसी भी भाषा का लेखक होना पसंद करे-सिवाय अंग्रेजी के। इसका कारण यही है कि हमारे उच्च शिखर पुरुषों ने यह मान लिया है कि समाज को वैचारिक, साहित्यक तथा अध्यात्मिक मार्ग पर आगे ले जाने वाले विद्वानों, कवियों और लेखकों को संरक्षण देने की आवश्यकता नहीं है। उनकी उपेक्षा का ही यह परिणाम है कि समाज में हर कोई अपने बच्चे को चिकित्सक, अभियंता, उच्च श्रेणी का अध्यापक तथा प्रशासनिक अधिकारी बनाना चाहता है जो अधिक से अधिक धन का स्वयं दोहन कर सके क्योंकि विद्वानों या लेखकों को आश्रय देने वाला कोई नहीं है।
इसी कारण हमारे समाज में एक ‘खिचड़ी संस्कृति’ बन गयी है। आपने देखा होगा कि आजकल अनेक लोग यह शिकायत करते हैं कि ‘बुढ़ापे में बच्चे उनकी देखभाल नहीं करते।’ उनसे पूछिये कि ‘क्या आप इसके लिये जिम्मेदार नहीं हैं क्योंकि आपने ही ऐसे संस्कार नहीं दिये।’
हमारे शिखर पुरुष कानून के द्वारा समाज को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहे हैं। यह एक बेकार का प्रयास है। एक तरफ आप पूरी तरह पाश्चात्य सभ्यता का अनुकरण न केवल स्वयं कर रहे बल्कि अपने बच्चों को भी उस पर चलते देखना चाहते हैं। फिर उनसे देशी व्यवहार की आशा करना कहां तक उचित है?
देश की सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक प्रक्रिया में विद्वानों की निष्क्रियता समाज के लिये घातक होती है, इसलिये जितना हो सके सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक शिखर बैठे लोग उनको संरक्षण दें या फिर समाज के बिगड़ने का रोना बंद कर दें।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
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