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Monday, January 4, 2010

रहीम के दोहे-चिंता तो जीव को ही लील जाती है (rahim ke dohe-chinta aur chita)

रहिमन कठिन चितान ते विंतर करे चित चेत।
चिता दहति निर्जीव को, चिंता जीव समेत।।
कविवर रहीम कहते हैं कि कठिन चिंताओं का चिंतन करने की अपेक्षा चित पर ध्यान करें क्योंकि चिता तो प्राणहीन शव को दग्ध करती है पर चिंता तो जीवित मनुष्य को ही लील जाती है।
रहिमन कबहुं बड़ने के, नाहिं गर्व को लेस।
भारत धरैं संसार को, तऊ कहावत सेस।।
कविवर रहीम कहते हैं कि महान पुरुषों को कभी अपने बड़प्पन का अहंकार नहीं होता। इतनी भरी धरती को धारण करने वाले भगवान कहलाते तो शेष ही हैं।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-अपने ध्यान पर नियंत्रण करना जरूरी है। इसी ध्यान के द्वारा ही हम अपने मन, बुद्धि तथा अहंकार पर दृष्टि रख सकते हैं। निरर्थक चिंतायें पालने से शरीर जलने लगता है। इस संसार का जीवन कोई हमारी करनी से नहीं चल रहा है बल्कि उसका शाश्वत नियम ही बहना है। हम अपनी देह और उससे जुड़े लोगो की चिंता करते हुए यह सोचते हैं कि हम उनके कर्ता हैं। यह भ्रममात्र है। जो घटनायें घट रही हैं उनको तो घटना ही है हम तो केवल भौतिक तत्व होने के कारण उससे जुड़े होते हैं।
यह कर्तापन का अहंकार न केवल अपने लिये दुःखदायी है बल्कि समाज में छवि को भी खराब करता है। कहा जाता है ‘थोथा चना बाजे घना’ और समाज में ऐसे तत्वों का बोलबाला है जो कथित रूप से अपनी भौतिक उपलब्धियों के कारण इतराते बहुत हैं। तब जिनके पास भौतिक साधनों का अभाव है वह लोग अपने अंदर मानसिक कुंठायें पाल लेते हैं। अनेक लोग तो इस चिंता में अपना शरीर जला देते हैं कि हम अमुक व्यक्ति जैसा ही सामाजिक स्तर प्राप्त करें। उधर अहंकार में डूबे भौतिकता से संपन्न लोग भी शारीरिक श्रम करने वालों को हेय समझते हैं। उनकी इसी प्रवृत्ति के कारण छोटे लोगों में जो विद्रोह पैदा होता है उसका अनुमान नहीं करते। यही विद्रोह कहीं अपराध में तो कहीं हिंसा में प्रकट होता है।
अतः जीवन सहज भाव से जीने और समाज में समरसता का भाव बनाये रखने के लिये यह आवश्यक है कि चिंता और अहंकार के भाव से मुक्त रहा जाये।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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1 comment:

मोहिन्दर कुमार said...

निश्चय ही दोहे... गागर में सागर समान हैं..
समझ में आ जायें और अनुसरण हो तो जीवन सफ़ल है..

"शेष" .. इस संसार में जो कुछ भी है सब नश्वर है... जो "शेष" है वही विशेष भी है..
शायद दोहा लिखते हुये रचना कार के मन में यही भाव रहा होगा.

लिखते रहिये
मोहिन्दर कुमार
http://dilkadarpan.blogspot.com

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