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Sunday, January 3, 2010

संत कबीर के दोहे-ज्ञानी और भक्त अपनी आलोचना से विचलित नहीं होते (gyani aur bhakt-sant kabir ke dohe)

जिनके नाम निशान हैं, तिन अटकावै कौन।
पुरुष खजाना पाइया, मिटि गया गौन।।
जिनके मन में भगवान के प्रति भक्ति और ज्ञान है उनको भला कौन अटका सकता है। उस तत्व ज्ञान को पाकर तो मनुष्य जीवन मृत्यु के भाव से मुक्त हो जाता है।
ऐसे साच मानई, तिलकी देखो जोस
जारि जारि कोयला करै, जमता देखो सोय।।
यदि किसी बात को सच नहीं मानते तो तिल के काष्ट को जाकर देखो। उसे जलाकर राख कर दिया जाता है पर वह फिर अंकुरित होकर प्रकट होता है। जो तत्व ज्ञान है वह हर परीक्षा की कसौटी पर खरा उतरता है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-ज्ञानी और भक्त किसी की परवाह नहीं करते। यह अलग बात है कि वह इसे प्रकट नहीं करते और संसार के कार्यों में लिप्तता प्रदर्शित करते हैं। ज्ञानी और भक्त की पहचान यह है कि वह तमाम तरह की आलोचना और निंदा को झेलते हुए भी अपने पथ से विचलित नहीं होते। इस संसार में मनुष्य का तो स्वभाव है कि वह अल्प ज्ञान क आधार पर ही सम्मान पाना चाहता है और वह इसके लिये दूसरे की निंदा भी करने को तैयार हो जाता है। जिनके पास ज्ञान और भक्ति का भंडार है वह कभी छोटी मोटी बातों से विचलित नहीं होते। उनकी पहचान यह है कि अगर उनका निंदक भी उनके सामने आ जाये तो उसे अपमानित नहीं करते। क्षमा उनका स्वाभाविक गुण होता है।
इसके विपरीत जिन्होंने ज्ञान की किताबें रट ली है उनकी भक्ति का प्रयोजन केवल अन्य लोगों पर अपना प्रभाव जमाना होता है। वह उस ज्ञान का अक्सर बखान करते हैं पर उनके आचार विचार में वह धारण किया हुआ प्रकट नहीं होता। ऐसे लोग थोड़ी सी आलोचना पर भी उत्तेजित हो जाते हैं। अगर सच्चे और ढोंगेी ज्ञानी का पहचान करनी हो तो इस बात को देखें कि कौन अपनी बात पर अमल करता है और कौन केवल मौखिक बात कहकर उसे भूल जाता है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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1 comment:

परमजीत बाली said...

बहुत सुन्दर व्याख्या प्रेषित की है।आभार।

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