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Saturday 6 November 2010

भर्तृहरि नीति शतक-हे मन, कब तक तू दूसरों को प्रसन्न करेगा (man ki prasnnata-bharathari neeti shatak in hindi)

परेषां चेतांसि प्रतिदिवसमाराध्य बहुधा प्रसादं किं नेतुं विशसि हृदय क्लेशकलितम्।
प्रसन्ने त्वय्यन्तः स्वयमुदितचिन्तामणिगणो विविक्तः संकल्पः किमभिलषितं पुष्यति न ते।।
हिन्दी में भावार्थ-
महाराज भर्तृहरि यहां अपने मन को कहते हैं कि‘तू दूसरों के चित्त को प्रसन्न करने के लिये बहुत प्रयास करता है पर अपने हृदय में झांककर नहीं देखता कि यह प्रयास क्लेश का कारण ही है। स्वयं अंतर्मुखी होकर तू अपने हृदय में झांक तो वहीं सारी प्रसन्नता का भंडार है। वहां देख तो परमात्मा स्वयं प्रगट होगा और क्या वह तेरी सुख की कामना पूर्ण नहीं करेगा?
वर्तमान संदर्भ में सम्पादकीय व्याख्या-आदमी मन का दास है और जैसे वह निर्देश देता है वैसे उसका शरीर संचालित होता है। यह तो आदमी का भ्रम है कि वह अपनी मर्जी से चल रहा है। दूसरे लोगों की चाटुकारिता कर अपना लक्ष्य प्राप्त करने की इच्छा मनुष्य को कभी यंत्रवत तो कभी पशुवत चलने को बाध्य कर देती है। धन, पद, तथा प्रतिष्ठत होने का मोह मनुष्य को कायर तथा बंधुआ बनाकर रख देता है। अपनी स्वतंत्रता को गिरवी रखकर मनुष्य भला कब खुश रह पाया है? सब कुछ पा लेने के बाद आत्मिक परंतत्रता का बोध जब उसे होने लगता है तब उसका मस्तिष्क तनाव का घर बन जाता है। जिनके आसरे महल खड़े किये उनको अब छोड़ नहीं रह सकता पर मन है कि आज़ादी की मांग करने लगता है। राजाओं, मंत्रियों, साहुकारों, जमींदारों को प्रसन्न करते आम आदमी थक जाता है। वह प्रसन्न नहीं होते क्योंकि वह भी मनुष्य होते हैं और प्रसन्न होने की कला नहीं जानते। ऐसे में थका हुआ आम आदमी भी टूटने लगता है। मन में निराशा के साथ ही जीवन नीरस दिखाई देने लगता है
बाह्य सौंदर्य और वैभव दिखावा है, और उसे पाकर भी मन संतुष्ट नहीं होता। लालच का कोई अंत नहीं है और अहंकार से बड़ा कोई ऐसा शत्रु नहीं है जिससे इंसान परास्त हो जाये। इसके लिये यह आवश्यक है कि अपने अंदर झांका जाये। ध्यान तथा योगासाधना के अभ्यास से देह, मन और विचारों के विकार बाहर निकाल दिये जायें तो अपने हृदय में निर्मलता का भाव लाया जा सकता है जो कि साक्षात् परमात्मा की निकटता की अनुभूति कराता है। हृदय में परमात्मा विराज गये तो फिर बाकी सुखों से को कोई प्रयोजन नहीं रहता और जीवन आनंदमय हो जाता है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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Friday 5 November 2010

पंतजलि योग दर्शन-सुख और दुःख की अनुभूति क्लेश का परिणाम (patanjali yoga shastra-dukh aur sukh ki anubhuti)

सुखानुशयी रागः।।
हिन्दी में भावार्थ-
सुख प्राप्ति की अनुभूति कराने वाला क्लेश भाव राग का है।
दुःखानुशयी द्वेष।।
हिन्दी में भावार्थ-
दुख की अनुभूति के पीछे क्लेश भाव ही द्वेष है।
दुग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवासिमता।।
हिन्दी में भावार्थ-
दृष्टा और दर्शन का एक होना ‘अस्मिता’ है।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-जीवन को दृष्टा भाव से जीना भी एक कला है। इस कला में महारत हासिल करने वाले योग साधन तथा ज्ञानी लोग दुःख और सुख के भाव से परे होते हैं। जब मनुष्य को सुख की अनुभूति होती है तो वह उसके अंदर विद्यमान राग के भाव की वजह से है यह समझना चाहिए। जब आदमी के अंदर दुःख की अनुभूति हो तो उसे द्वेष भाव से उत्पन्न ही माने। इन दोनों को क्लेश भाव कहा गया है। हम अगर सहज योग की विधा से अपनी देह की गतिविधियों     का अवलोकन करें तो यह दृष्टिगोचर स्वतः होगा कि जब हम नीम का पत्ता और करेला खातें है तब कड़वाहट का अनुभव होता है और मिठाई का सेवन करते हैं तब मिठास लगता है पर यह सभी प्रकार के पदार्थ चाहे मीठे हों या कड़वे देह में जाते ही दोनों कचड़े के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं।
यही स्थिति दृश्य की भी है। हम आंखों से अप्रिय व्यक्ति को देखें या प्रिय को पर उनका प्रभाव एक जैसा ही है क्योंकि अंततः दृश्य अंततः तनाव का कारण बनता है।
कहने का अभिप्राय यह है कि हम ग्रहण करने वाली इंद्रियों से चाहे जैसा भी ग्रहण करें निष्कासन अंगों तक आते आते उनका प्रभाव कचड़े जैसा ही होता है। इससे यूं भी कहें कि सभी प्रकार के पदार्थों का सेवन करने से जहां देह में विकार आता है वैसे ही श्रवण, दर्शन, स्पर्श तथा गंध ग्रहण करने की क्रियाओं से भी मन और विचारों में विकार आता है। इनका पूर्णरूपेण निष्कासन आवश्यक है जो योग साधना से ही संभव है। इसलिये योगासन, प्राणायाम, ध्यान तथा मंत्र जाप से अभ्यास करने वाले योगी अंततः दृष्टा भाव को प्राप्त हो जाते हैं। उनको राग और द्वेष से उत्पन्न होने वाला क्लेश छू भी नहीं पाता। उनको यह तत्व ज्ञान स्वतः प्राप्त हो जाता है कि इंद्रिया ही इंद्रियों में और गुण ही गुण में बरत रहे हैं। सुख में मिली प्रसन्नता हो या दुःख में प्राप्त विलाप दोनों ही विकार उत्पन्न करने वाले हैं। ऐसी सिद्धि केवल योग साधना से प्राप्त होना संभव है यह निश्चित है।
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संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com

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