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Wednesday, December 30, 2009

मनुस्मृति-धन और काम में आसक्ति से परे हो, वही सच्चा धार्मिक उपदेशक (sachcha sant-manu smriti in hindi)

अर्थकामेष्वसक्तनां धर्मज्ञानं विधीयते।
धर्म जिज्ञासमानाना प्रमाणं परमं श्रुतिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
महाराज मनु के अनुसार धर्म का उपदेश और प्रचार का काम केवल उन्हीं लोगों को करना चाहिए जो काम और अर्थ के विषय में आसक्त नहीं है। जिनकी काम और अर्थ में आसक्ति है उनकी धर्म में अधिक रुचि नहीं रहती। इसके अलावा उनको धर्म के उपदेश स्वयं ही समझ में नहीं आता इसलिये उनके वचन प्रमाणिक नहीं होते।
श्रुतिद्वेघं तु यत्र स्यात्तत्र धर्मवुभोस्मृतौ।
उभावपि हि तौ धर्मो सम्यगुक्तौ मनाीषिभिः।।
हिन्दी में भावार्थ-
वेदों में जहां किसी विषय पर आपस में विरोधी संदेश हों वहां पर संभव है कि संदर्भ के कारण अलग अलग अर्थ दिखते हैं पर ज्ञानी लोग इस बात समझते हैं और उनसे इस विषय में परामर्श करना चाहिए।
वर्तमान संदर्भ में संपादकीय व्याख्या-मनु महाराज का स्पष्ट मानना है कि जो धर्मोपदेश या प्रवचन आदि करते हैं उनको काम और अर्थ में रुचि नहीं दिखाना चाहिये। आजकल ऐसी संत परंपरा प्रचलन में आई है कि जिसमें मठाधीश स्वयं ही धन की उगाही कर कथित रूप से धर्मार्थ काम कर रहे हैं। सच बात तो यह है कि एक संत को चाहिये कि वह जीवन रहस्यों से संबंधित विषयों पर ही अपनी बात अपने श्रोताओं के सामने रखे न कि उनकी सांसरिक समस्याओं को हल करे। बीमारी, गरीबी तथा अन्य घरेलू संकट आदमी के भौतिक परेशानी है और अगर उसका मन और शरीर स्वस्थ हो वह उनका सामना स्वयं ही कर सकता है। इसके लिये यह जरूरी है कि वह योग साधना तथा ध्यान से अपने मन, शरीर और विचारों के विकार निकाले तथा तत्व ज्ञान को धारण करे। वह वही खाये जो पचा सके और इसके लिये उसे किसी सलाह की आवश्यकता नही पड़े अगर वह प्रतिदिन योग आसन कर उसका निरीक्षण करे।
कहने की आवश्यकता है कि व्यक्ति निर्माण सांसरिक विषयों पर चर्चा कर नहीं किया जा सकता है बल्कि उसके लिये अध्यात्मिक ज्ञान आवश्यक है। इसके विपरीत अनेक कथित गुरु प्राचीन ग्रंथों की कथायें पर लोगों का मनोरंजन करते हैं पर दावा यह कि वह तो धर्म का काम रहे हैं। वह धन संचय के लिये अपने भक्तों के सामने झोली फैलाते हैं और दिखाने के लिये गरीबों की सेवा करने के साथ ही बीमारों के इलाव की व्यवस्था करते हैं। यह ढोंग है। कई संत तो ऐसे भी हैं जो यह दावा करते हैं कि वह तो जमीन पर सोते हैं भले ही उनके आश्रम पंचसितारा सुविधाओं से सुसज्जित है। अब यह कौन देख पाता है कि उनका अंदर रहन सहन कैसा है? इतना ही नहीं कुछ संत यह चाणक्य महाराज का यह कथन दोहराते हैं कि ‘धर्म निर्वाह के लिये धन का होना आवश्यक है’। दरअसल चाणक्य महाराज ने यह बात सामान्य गृहस्थ को सन्यासी जीवन से विरक्त करने के लिये लिखी है न कि कथित सन्यासियों के धन संग्रह की प्रवृत्ति जगाने के लिये ऐसा कहा है।
संकलक एवं संपादक-दीपक भारतदीप,Gwalior
http://deepkraj.blogspot.com

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1 comment:

Udan Tashtari said...

मुझसे किसी ने पूछा
तुम सबको टिप्पणियाँ देते रहते हो,
तुम्हें क्या मिलता है..
मैंने हंस कर कहा:
देना लेना तो व्यापार है..
जो देकर कुछ न मांगे
वो ही तो प्यार हैं.


नव वर्ष की बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ.

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