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Tuesday, July 24, 2007

संत कबीर वाणी: तहां न जाइये

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कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट का हेत
जानो काले अनार के, तन राता मन सेत

इसका आशय यह है कि वहां कदापि न जाइए जहाँ कपट का प्रेम हो। उस प्रेम को ऐसे ही समझो जैसे अनार की कली, जो ऊपरी भाग से लाल परंतु भीतर से सफ़ेद होती है। वैसे हे कपटी लोग मुहँ पर प्रेम दिखाते हैं पारु उनके भीतर कपट की सफेदी पुती रहती है ।

कबीर तहां न जाइए, जहाँ कपट को हेत
नौ मन बीज जू बोय के, खालि रहिगा खेत

इसका आशय यह है कि वहाँ कतई न जाएँ जहां कपट भरे प्रेम मिलने की संभावना हो। जैसे ऊसर वाले खेत में नौ मन बीज बोने पर भी खेत खाली रह जाता है, वैसे ही कपटी से कितना भी प्रेम कीजिये परन्तु उसका हृदय प्रेम-शून्य ही रहता है।

1 comment:

sanjay tiwari said...

"संत काबेर" पर ध्यान दिया जाए.

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