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Thursday, June 28, 2007

चाणक्य नीति:दिन में दीपक जलाना व्यर्थ

NARAD:Hindi Blog Aggregator

1. जिस प्रकार समुद्र के ऊपर वर्षा व्यर्थ है उसी प्रकार भोजन से तृप्त पुरुष से भोजन का अनुरोध करना भी व्यर्थ है। जिस प्रकार दिन में सूर्य के प्रकाश में दीपक जलना व्यर्थ है ठीक उसी प्रकार धन से संपन्न व्यक्ति को दान देना भी निरर्थक है। दान हमेशा अभाव पीड़ित को देना ही उचित है
२.अपने निरंतर अभ्यास से मनुष्य अनेक गुण प्राप्त कर लेता है पर कुछ गुण ऐसे होते हैं जो स्वाभाविक रुप से होते हैं-जैस दानशीलता, मधुर बोलना, शौर्यता तथा विद्वता।

1 comment:

sunita (shanoo) said...

बिल्कुल सही कह रहे है कुछ गुण मनुष्य मे वंशानुगत होते है और कुछ वो अर्जित करता है समाज घर और अपने आस-पास से...

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