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Saturday, August 6, 2011

श्रीगुरुवाणी-इस सृष्टि का आदि और अंत केवल परमात्म ही जानता है (shri gurugranth sahib-srishti ka aadi aur ant ka gyan nahin)

         विश्व इतिहास में अनेक विद्वान हो गये पर वह इस बात का पता नहीं लगा सके कि इस सृष्टि का प्रारंभ कब और कहां से हुआ। सच तो यह है कि धर्म के ठेकेदार तमाम तरह के दावे करते हैं कि इस सृष्टि में तो बस एक ही आकाश, धरती और पाताल है जबकि पश्चिमी वैज्ञानिकों का मानना है कि अन्य जगह भी इस तरह की सृष्टि होने की संभावना हो सकती है। इस विषय पर अनेक शोध चल रहे हैं पर लगता नहीं है कि अभी निकट भविष्य में कोई वास्तविक रहस्य खोज पायेगा। यह बात अलग है कि इस विषय पर धर्म की आड़ लेकर अनेक बहसें होती हैं और कुछ लोग मानसिक विलास करते हैं। कोई कहता है कि परमात्मा एक है तो अनेक लोग कहते हैं कि परमात्मा तो अनंत है फिर कैसे माना जाये कि वह एक या अनेक।
गुरु ग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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थिति वारु न जोगी जाणै, रुति माह न कोई।
जा करता सिरठी कउ साजे, आपे जाणै सोई।।
          ‘‘बड़े बड़े ज्ञानी इस सृष्टि  का आदि और अंत नहीं जान सके। जिस समय इस सृष्टि की रचना हुई उस समय यहां क्या था यह केवल परमात्मा ही जान सकता है।
इह अंत जाणै कोई।
पाताला पाताल लख आगासा, आगास।
तिथे खंड मंडल चरभेंड।
             ‘‘इस सृष्टि के आदि और अंत को कोई नहीं जान सकता क्योंकि इसें आखों आकाश और पाताल हैं। इसकी रचना किसी कालखंड में हुई इसका ज्ञान तो केवल परमात्मा कोई ही हो सकता है।’’
         इन बहसों में उलझने से अच्छा है कि आदमी नाम स्मरण कर अपना जीवन बिताये। मुख्य बात यह है कि मनुष्य का मन एकरसता से ऊब जाता है। नियमित धनसंग्रह, परिवार का पालन पोषण तथा मनोरंजन करते हुए मनुष्य का मन कुछ विराम चाहता है जो केवल ध्यान की प्रक्रिया से ही संभव है। विश्व के स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि सांसरिक विषय ये अलग हटकर एकांत में ध्यान करने से मनुष्य को नवीनता अनुभव होती है। भारतीय दर्शन भी ध्यान के इर्दगिर्द ही अपना लक्ष्य निर्धारित करने का संदेश देता है। चूंकि भारतीय अध्यात्मिक ज्ञान के संदर्भ ग्रंथों में अनेक रुचिकर कथायें हैं तो लोग उनका श्रवण और अध्ययन मनोरंजन की दृष्टि से करते हैं इसलिये उनका ध्यान सांसरिक भोग पदार्थों से विरक्त नहीं हो पाता। कुछ लोग सृष्टि के निर्माण की चर्चा करते हैं तो कुछ उस पर अपने व्यख्यान देकर अपने आपको ज्ञानी सिद्ध करते हैं मगर सच यही है कि इस सृष्टि के सही स्वरूप का ज्ञान किसी को नहीं है।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, May 21, 2011

रिश्वत लेना नर का मांस खाने के समान-श्रीगुरुवाणी साहिब से संदेश (corruption anti religion work and crime-acording shri gurubani)

        वैसे राजकाज से जुड़े लोगों का भ्रष्टाचार हमारे देश के लिये नयी बात नहीं है पर पहले यह कम था। अब तो यह स्थिति यह है कि राजकाज से जुड़े लोग जनहित की बात सोचने से अधिक अपने स्वार्थ पर अधिक ध्यान देते हैं। रिश्वत लेना उनके लिये कमाई है। कहने को तो हमारे देश में धर्मभीरु लोगों की कमी नहीं है पर सवाल यह उठता है कि उसके अनुसार आचरण कितने लोग करते हैं?
       स्थिति यह है कि दो नंबर की कमाई तथा रिश्वत से उगाही करने वाले लोग भी धर्म के कार्यक्रम आयोजित करते दिखते हैं। समाज सेवा का आडम्बर करते हुए अनेक लोग तो महान मायापति हो गये हैं। जहां धर्म की बात आये तो वहां ऐसे संवदेनशील हो जाते हैं जैसे कि हमेशा ही अपनी आस्था के साथ जीते हों पर सच यह है कि धर्म का दिखावा और समाज की रक्षा की बात वही लोग अधिक करते हैं जिनका इसमें अपना व्यवसायिक लाभ होता है।
      श्रीगुरुग्रंथ साहिब में रिश्वत और भ्रष्टाचार की निंदा करते हुए कहा गया है कि
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   ‘माणसखाणे करहि निवाज।
    छुरी बगाइन तिन गलि नाग।।'
       ‘‘रिश्वत खाने वाला मनुष्य नरभक्षी एवं दूसरे के गले पर छुरी चलाने वाला कसाई जैसे होता है।’’
            देश में अनेक लोग भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन कर रहे हैं पर सवाल यह है कि उनका स्वयं का आचरण कितना प्रमाणिक है? कई बार तो ऐसा लगता है कि भ्रष्टाचार से तंग लोगों का मन बहलाने के लिये इस तरह के आंदोलन प्रयोजित वही लोग कर रहे हैं जिनकी कमाई के स्त्रोत अपवित्र होने के साथ अज्ञात हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि धर्म के नाम पर दिये जा रहे दान को आस्था के कारण पवित्र माना जाता है जबकि हमारे धर्मग्रंथों के अनुसार धर्म के लिये व्यय होने वाले धन के स्त्रोत भी पवित्र होना चाहिए। एक मजेदार बात यह है कि धर्म के ठेकेदारों से जब उनके धन का स्त्रोत पूछा जाता है तो कहते हैं कि ‘यह तो भगवान के भक्तों का दिया हुआ है?’’
        पहली बात तो उस धन का स्त्रोत धर्म के ठेकेदारों को स्वयं नहीं पता दूसरा यह कि वह उस धन से अर्जित संपत्ति के स्वामीपन का अहंकार भी पालते हैं। इसी कारण धर्म के नाम पर अनेक ट्रस्ट बन गये हैं जबकि कहीं न कहीं उनका स्वामित्व निजी होने के साथ ही उनके कार्यक्रम भी व्यवसाय के सिद्धांतों पर आधारित हैं। इतना ही नहीं इन ट्रस्टों के भक्ति स्थलों में प्रवेश के लिये भी पैसा लिया जाता है जो कि रिश्वत का ही रूप है। यही कारण है कि हम अपने देश में इस समय धर्म के नाम पर शोरशराबा खूब देख रहे हैं जबकि आचरण की दृष्टि से पूरा समाज ही विपरीत मार्ग पर जाता दिखता है।
लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
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