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Monday, November 7, 2011

यजुर्वेद से संदेश-परमात्मा के स्मरण से बुद्धि श्रेष्ठ मार्ग पर चलती है (yajurved se sandesh-naam smaran se budhhi ki shuddhi)

                अक्सर लोग यह सवाल करते हैं कि जब परमात्मा ने हमें काम करने के लिये हाथ, चलने के लिये पैर, बोलने की लिये जीभ, सुनने के लिये कान, देखने के लिये आंख और सूंघने के लिये नाक देकर हमें अपने जीवन के लिये उत्तरदायित्वों के निर्वहन योग्य बना दिया है तो फिर उसका नाम लेकर समय खराब क्यों करें? कुछ लोग तो यह भी कहते हैं कि जब हम अपना कर्म शुद्ध हृदय से नित्य करते हैं तो भगवान का नाम लेने की आवश्यकता क्या है? कुछ लोग तो यह भी कहकर अपना ज्ञान बघारते हैं कि जीवन में चुपचाप अपना काम करना तथा कर्मकांड में लिप्त रहना ही धर्म है।
          दरअसल हम भले ही अपना नित्य कर्म शुद्ध हृदय से करें पर जब तक हमें अपने अध्यात्म का ज्ञान नहीं होगा तब कभी सुख की अनुभूति नहीं हो सकती। इस तरह तो मानसिक और वैचारिक रूप से हम एक ही धारा में बहते जायेंगे तो यह पता ही नहीं चलेगा कि जीवन का रहस्य क्या है? वैसे भी मनोविज्ञानिक मानते हैं कि नियमित रूप से एक ही कर्म करते रहना या मस्तिष्क को एक ही राह पर जाकर एक ही जगह ध्यान लगाये रखना भी स्वास्थ्य के लिये ठीक नहंी है। जो बहुत बड़े ज्ञानी और ध्यानी हैं वह तो अपने अभ्यास से एक ही जगह खड़े रहकर भी नित्य पल नवीनता का अनुभव करते हुए जीवन का सुख और आनंद उठाते हैं पर सामान्य आदमी का मन उसे इधर उधर चलने के लिये प्रेरित करता है-इसी कारण हमारे समाज में फिल्म देखना, पिकनिक मनाना या किटी पार्टी करने जैसी परंपरा प्रारंभ हो गयी हैं जो कि कालांतर में अधिक दुखदायी होती हैं। इन पर व्यय होने के साथ ही शारीरिक तथा मानसिक परेशानियों का दौर भी प्रारंभ होता है। आमतौर से लोग मनोरंजन की राह पर चले जाते हैं जहां दूसरे मनुष्य मन के व्यापारी बनकर उनका दोहन करते हैं। अपने नियमित कर्म के बाद परमात्मा की भक्ति से भले ही कोई लाभ न हो पर एक नवीन सुखद अनुभूति अवश्य होती है।
यजुर्वेद में कहा गया है कि
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तत्सवितुर्वरेण्य भर्गो देवस्य धीमहि।
धियो यो न प्रचोदयात!
          ‘‘जग नियंता, जगकर्ता, दिव्य गुण युक्त परमात्मा के शुद्ध स्वरूप का ध्यान हम करते हैं जो हमारी बुद्धि को श्रेष्ठ मार्ग पर लगाता है।’’
                 इसमें ओम भूर्भव स्वः शब्द जुड़ने से यह गायत्री मंत्र हो जाता है जो कि मंत्रों का राजा माना जाता है। इसमें यह स्पष्ट किया गया है कि नाम स्मरण करने से मन की शुद्ध होती है और बुद्धि परिष्कृत होती है। हम अपने अध्यात्म ग्रंथों की बातों को भले ही न माने पर पश्चिमी विशेषज्ञों की इस धारणा को तो नहीं भुलाना चाहिए कि हमें अपनी नियमित दिनचर्या में एकरसता से बचना चाहिए।
संकलक, लेखक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर
writer and editor-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep', Gwalior
http://dpkraj.blogspot.com
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Saturday, November 5, 2011

श्रीगुरुवाणी-अध्यात्म कर्म करने से हृदय में निरंतर ज्योति प्रकाशित होती है (shri guruwani-adhyatma karama aur hridaya aur heart) rt)

             देश का विकास और आम आदमी का जीवन स्तर उठाने का दावा करने वाले यह कभी नहीं जानते कि बिना अध्यात्मिक ज्ञान के कोई भी विकास होता ही नहीं है। अक्सर यह दावा कि किया जाता है कि आजादी के बाद हमारे देश ने आर्थिक, वैज्ञानिक तथा सामाजिक क्षेत्र में विकास किया है पर इससे जो अपराध पनपा है उसकी बात कोई नहीं बताता। सच तो यह है कि पश्चिम में आर्थिक विकास और अपराध का संबंध स्पष्ट रूप से देखा जाता है पर आजादी के प्रारंभिक दिनों में आम भारतीय के अध्यात्मिक ज्ञान में लिप्त होने की वजह से इसका आभास नहीं होता था क्योंकि वह विकास के साथ अपने ज्ञान की रक्षा करता था। भारतीय शिक्षा पद्धति से भारतीय अध्यात्मिक ग्रंथों को परे किया गया पर फिर भी घर घर मौजूद रामायण, रामचरितमानस, और श्रीमद्भागवत गीता पढ़ी जाती थी तब इस कारण लोगों को तत्वज्ञान का पूर्ण ज्ञान नहीं तो मूल तत्व का आभास रहता था। अब शिक्षा ही इतनी कठिन और बोझ वाली हो गयी है कि घरों में भी अध्यात्म का अध्ययन संभव नहीं रहा इसलिये बच्चे ही क्या उनके माता पिता भी अध्यात्म ज्ञान से रहित होकर परिवारिक विकास की तरफ लगे हैं और उनका लक्ष्य केवल समाज में अपनी प्रतिष्ठा बचाये रखना हो गया है। चारों तरफ आर्थिक विकास की धूम है। कुछ लोगों ने समाज के अध्यात्म विकास को भी लक्ष्य बनाते हैं पर वह स्वयं ही अध्यात्म से परिचित नहीं है।
                          गुरुग्रंथ साहिब में कहा गया है कि
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                   गिआन अंजनु गुरि दीआ, अगिआन अंधेर बिनासु।
                  हरि किरपा ते संत भेटिआ, नानक मति परगासु।।
            ‘‘गुरु ज्ञान का दीपक मनुष्य के अंदर प्रकाशित करता है जिससे उसके अज्ञान के ंअंधेरा विलुप्त होता है। हरिकृपा से ही किसी संत से भेंट होती है जो कि परमगति का कारण बनती है।’’
                        अधिआत्म करम करे दिनु राती।
                       निरमल जोति निरंतरि जाती।।’’
               ‘‘अध्यात्म करम दिन रात करने से हृदय में निरंतर पवित्र ज्योति जलती है जो कि निर्मलता प्रदान करती है।’’
                     सच बात तो यह है कि अधिकांश पहली लोग अध्यात्म का अर्थ ही नहीं जानते हैं। उनके विचार में अध्यात्म कोई बाहर विचरने वाला तत्व है। अध्यात्मिक ज्ञान की बड़ी बड़ी बातें करने वाले लोगों को यही नहीं पता कि अध्यात्म का मतलब हम स्वयं हैं और ज्ञान का मतलब हमें अपने को पहचानना है। इसके लिये जरूरी है कि देह से प्रथक होकर विचार किया जाये। अपनी सांसरिक सक्रियता में मन और बुद्धि तत्व के योगदान और आत्म तत्व की निष्क्रियता को अनुभव किया जाये। इसके लिये आवश्यक है कि कोई ज्ञानी गुरु मिले। ज्ञानी गुरु न मिले तो अपने इष्ट देव की हृदय से भक्ति करें तो कभी न कभी ज्ञान गुरु मिल ही जायेगा।
संकलक, लेखक और संपादक-दीपक राज कुकरेजा ‘भारतदीप’,ग्वालियर 
athor and editor-Deepak Raj Kukreja "Bharatdeep",Gwalior
http://zeedipak.blogspot.com
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