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Sunday, March 6, 2011

अधर्म का धन होली पर्व पर चुराई गयी लकड़ी की तरह शीघ्र नष्ट होता है-रहीम के दोहे (adharm ka dhan holi ke parva ki lakdi ki tarah-rahim ke dohe)

अक्सर लोग शिकायत करते हैं कि‘आजकल समय खराब हो गया है और नयी पीढ़ी व्यसनों का शिकार हो रही है।’
हम समाज के नैतिक और अध्यात्मिक पतन के लिये बढ़ते हुए भौतिकतावद को दोष देते हैं। यह सही है पर इसके लिये मनुष्य के की शारीरिक सुख सुविधा तथा मनोरंजन के लिये बनी वस्तुओं का उपभोग नहीं बल्कि उनको खरीदने की लिये धन का वह स्वरूप है जो अधर्म पर आधारित होता है। सच तो यह है कि जब पहले देश में जब कृषि आधारित व्यवस्था में श्रम की प्रधानता थी तब लोग ईमानदारी और परिश्रम के मार्ग से अपना भौतिक विकास करते थे। यह मार्ग लंबा होता था पर लोग सहजता से जीवन व्यतीत करते थे। विश्व में आर्थिक उदारीकरण की लहर के बाद देश की सामान्य कार्यप्रणाली में परिवर्तन आया है। अब जिसे देखो नौकरी के पीछे भाग रहा है। जिनके पास शिक्षा की उपाधि है उनमें कोई भी व्यवसाय या कृषि को अपना लक्ष्य नहीं बनाता। जल्दी जल्दी धन कमाने के लिये अनेक व्यक्ति अधर्म तथा अपराध का काम करने लगते हैं। ऐसे में उनकी उपभोग की प्रवृत्ति भी वैसी होती जा रही है। शराब, जुआ तथा सट्टा जैसे व्यसनों का प्रकोप बड़ रहा है।
कविवर रहीम कहते हैं कि
रहिमन वित्त अधर्म को, जरत न लागै बार।
चोरी करि होरी रची, भई तनिक में छार।।
‘‘पाप के धन को नष्ट होने में अधिक समय नहीं लगता। ठीक उसी तरह जैसे होली के अवसर पर कुछ लोग लकड़ी चुराकर लाते हैं और वह जलकर जल्दी नष्ट हो जाती है।’’
पाप का धन होली के लिये चुराई गयी लकड़ी की तरह ही नष्ट होता है। जिन लोगों के पास अधर्म की कमाई है उनका पैसा भी वैसे ही खर्च होता है। किसी को स्वयं ही शराब, जुआ, तथा सट्टे की आदत लग जाती है या फिर उनके परिवार के सदस्य इसका शिकार होते हैं। यह भी नहीं हुआ तो बीमारी अपना रौद्र रूप प्रकट कर पैसा बाहर निकलवाती है। इसलिये जहां तक संभव हो धर्म की कमाई करें क्योंकि शरीर के अच्छ स्वास्थ्य और मन की प्रसन्नता का यही एक उपाय है।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
Editor and writer-Deepak Raj Kukreja 'Bharatdeep'
http://deepkraj.blogspot.com
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Friday, March 4, 2011

भोजन के प्रति लापरवाही ठीक नहीं-हिन्दी लेख (bhojan mein laparvahi n karen-hindi lekh)

मनुष्य हो या अन्य कोई जीव सभी का जीवन भोजन पर आधारित रहता है। यह अलग बात है कि अन्य जीव अपनी देह के अनुकूल भोजन ग्रहण करते हैं और अन्य प्रकार की वस्तु वह ग्रहण नहीं करते जिससे उनकी देह को हानि पहुंचे। इसके विपरीत मनुष्य जिसकी बुद्धि अन्य जीवों से अधिक तीक्ष्ण है वह भोजन के प्रति लापरवाह तो रहता ही है स्वाद के लिये ऐसी वस्तुऐं भी ग्रहण करता है जो शरीर के लिये अत्यंत हानिकारक है। प्रकृति ने मनुष्य के लिये अनेक प्रकार की वस्तुओं का निर्माण किया है पर वह मांसाहार करता है। अनेक लोगों को यह समझाना कठिन काम है कि मांस में मूलतः कोई स्वाद नहीं होता बल्कि नमक, मिर्च तथा अन्य मसालों का प्रयोग उसे खाने योग्य बनाता है। चाणक्य नीति में कहा गया है कि मांस से दस गुना अधिक शक्ति घी में है पर प्रचार यही किया जाता है कि मांस खाने से मनुष्य में अधिक शक्ति आती है। जबकि सच यह है कि मांस मनुष्य के लिये अपच भोजन है।
भोजन के विषय में वेदांत दर्शन की मान्यता है कि
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सर्वानन्नुमतिश्च प्राणात्ययेतद्दर्शनात्।।
"अन्न बिना प्राण न रहने की आशंका होने पर ही सब प्रकार के अन्न भक्षण करने की अनुमति है।"
आबधाच्च
"वैसे आपातकाल में भी आचार का त्याग नहीं करना चाहिए।"
शब्दश्चातोऽकामकारे।।
"इच्छानुसार अभक्ष्य भोजन करना निषेध ही है।"
इसके अलावा माया के खेल में फंसे अनेक लोग तो भोजन को दूसरी प्राथमिकता देते हैं जो कि उनकी उस देह का आधार है जो संघर्ष के दौर में साथ निभाती है। आजकल फास्ट फूड का सेवन बढ़ रहा है और उसके साथ समाज में बीमारियां भी पांव फैला रही हैं। भोजन के प्रति चेतना न रहना मनुष्य को एक तरह से पशु बनाये दे रही है। अगर अपने पास समय न हो या वस्तु उपलब्ध न दिखे तब तो पेट भरने के लिये कभी कभार ऐसा भोजन ले लिया तो कोई बात नहीं जिससे कि शरीर को अधिक लाभ नहीं मिलता पर हमेशा ही उसका प्रयोग शरीर को उम्र से पहले बूढ़ा बना देता है। अतः जहां तक हो सके शाकाहारी तथा उपयुक्त भोजना करना चाहिए।
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लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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Thursday, March 3, 2011

तीनों लोकों की संपदा पाने के लिये लोग जीवन नष्ट कर देते हैं-हिन्दी धार्मिक लेख (aadmi ka jivan-hindi dharmik lekh)

सिख गुरु गोविंद सिंह जी का कहना था कि ‘धन बहुत बड़ी चीज है, पर आदमी को खाने के लिये बस दो रोटी चाहिए।’
इसका आशय यही है कि भले ही आदमी कितना भी कमा ले पर उसका पेट अन्न के बिना नहीं भर सकता। हम इसका व्यापक तथा गुढ़ भाव देखें तो यह बात समझ में आती है कि खाने के लिये जहां हमें रोटी चाहिए तो प्यास बुझाने के लिये पानी। देह को बचाने के लिये कपड़ा चाहिये और रात गुजारने के लिये छत की आवश्यकता होती है। यह धन से प्राप्त होती हैं पर दैहिक आवश्यकता की पूर्ति वस्तुओं से होती है कि कागज के नोटों से। यह बात लोग नहीं समझते और पैसा कमाने का लक्ष्य रखकर ही चलते जाते हैं और फिर अंततः उनकी देह नष्ट हो जाती है। इस दुनियां के अधिकतर मनुष्य जितना कमाते हैं उतना खर्च नहंी कर पाते। वह ऐसा भौतिक संसार रच जाते हैं जो बाद में दूसरों के काम आता है।
इस विषय पर संत कबीरदास कहते हैं कि
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कबीरा औंधी खोपड़ी, कबहूं धापै नाहिं
तीन लोक की सम्पदा, कब आवै घर माहिं
संत शिरोमणि कबीरदास जी कहते हैं कि मनुष्य की खोपड़ी उल्टी होती है क्योंकि वह कभी भी धन प्राप्ति से थकता नहीं है। वह अपना पूरा जीवन इस आशा में नष्ट कर देता है कि तीनों लोकों की संपदा उसके घर कब आयेगी।
हालांकि लोग धन का पीछा करते हुए थकते नहीं हैं पर एकरसता से जो ऊब पैदा होती है उसको भी नहीं समझ पाते। योगसाधना, ध्यान, और मंत्रजाप उनके लिये फालतु की चीज हैं। कुछ लोग पैसे के कारण भी भक्ति का दिखावा करते हुए बड़े बड़े कार्यक्रम भी करते हैं पर उनका आचरण, व्यवहार और वाणी हमेशा ही उनके अंदर के विकारों से ग्रसित दिखाई देती है। आजकल तो ऐसे लोग भी हो गये हैं जो धर्म का व्यापार इसलिये करते हैं ताकि उनके लिये सुखसुविधा का संग्रह होता रहे। अनेक लोग समाज पर दबदबा बनाये रखने के लिये भगवान की आड़ लेते हैं। ऐसे लोग वैभव, पद और बाहुबल से संपन्न दिखते जरूर हैं पर मानसिक रूप से विकृति को प्राप्त हो जाते हैं।
इस संसार में सुख से रहने का मार्ग अध्यात्मिक ज्ञान प्राप्त करने से ही सुलभ होता है। यही सोचकर तत्व ज्ञानी जितना मिलता है उसी से संतोष कर लेते हैं। वह न केवल अपना जीवन आनंद से बिताते हैं बल्कि दूसरों को भी सुख देते हैं।

लेखक संकलक एवं संपादक-दीपक राज कुकरेजा  'भारतदीप',Gwalior
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